ज़मानत नियम है, जेल अपवाद: ज़मानत कैसे मिलती है
ज़मानती और ग़ैर-ज़मानती अपराध, किस अदालत में अर्ज़ी दें, क्या साथ ले जाएँ, ज़मानती (surety) कौन है, और पैसे न हों तो क्या करें। BNSS की धाराएँ सरल भाषा में।
संक्षेप में
- ज़मानत (bail) का मतलब है केस चलते हुए रिहाई, इस लिखित वादे पर कि आप अदालत में हाज़िर होंगे। यह बरी होना नहीं है।
- पहले पता करें कि BNS की कौन-सी धारा लगी है। ज़मानती (bailable) अपराध में ज़मानत थाने में ही आपका अधिकार है (धारा 478 BNSS)। ग़ैर-ज़मानती (non-bailable) अपराध में मजिस्ट्रेट, फिर सेशन कोर्ट, फिर हाई कोर्ट में अर्ज़ी दें।
- हर गिरफ़्तार व्यक्ति को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना ज़रूरी है। उसी पहली पेशी पर ज़मानत माँगें।
- वकील का ख़र्च न उठा सकें तो मुफ़्त वकील आपका हक़ है। 15100 पर कॉल करें या अदालत से क़ानूनी सहायता माँगें। ज़मानती न मिले तो जज को बताएँ; अदालत निजी मुचलका (personal bond) मान सकती है।
जब आपके किसी अपने को गिरफ़्तार किया जाता है, तो पहला सवाल सीधा होता है: वह घर कब लौटेगा? जवाब आम तौर पर ज़मानत पर टिका होता है। ज़मानत का मतलब है गिरफ़्तार व्यक्ति को केस चलने के दौरान रिहा करना, इस वादे पर कि जब भी बुलाया जाए वह अदालत आएगा।
भारतीय अदालतों ने बार-बार कहा है कि अपराध का आरोपी भी तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक दोष साबित न हो। मुक़दमे से पहले उसे जेल में रखना, दोष साबित होने से पहले सज़ा देना है। इसीलिए जज एक छोटा-सा वाक्य दोहराते हैं: ज़मानत नियम है, जेल अपवाद।
यह सिद्धांत कहाँ से आया
यह विचार संविधान के अनुच्छेद 21 से निकलता है: किसी भी व्यक्ति को उसके जीवन या निजी स्वतंत्रता से क़ानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के बिना वंचित नहीं किया जाएगा। State of Rajasthan v. Balchand (1977) में जस्टिस कृष्ण अय्यर ने साफ़ शब्दों में कहा: मूल नियम ज़मानत है, जेल नहीं। Arnesh Kumar v. State of Bihar (2014) में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से कहा कि सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में अपने-आप गिरफ़्तारी न करें; गिरफ़्तारी ज़रूरी होनी चाहिए और उसके कारण लिखे जाने चाहिए। यह सुरक्षा अब धारा 35 BNSS में है, जिसके तहत ऐसे ज़्यादातर मामलों में पुलिस को गिरफ़्तारी के बजाय हाज़िर होने का नोटिस देना होता है।
Satender Kumar Antil v. CBI (2022) में अदालत ने कहा कि ज़मानत की अर्ज़ियाँ आम तौर पर दो हफ़्ते में तय होनी चाहिए, और जिस व्यक्ति को जाँच के दौरान गिरफ़्तार नहीं किया गया और जिसने सहयोग किया, उसे सिर्फ़ चार्जशीट दाख़िल होने पर हिरासत में नहीं भेजा जाना चाहिए।
क़ानून क्या कहता है
1 जुलाई 2024 से ज़मानत भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत चलती है, जिसने दंड प्रक्रिया संहिता की जगह ली है। हर अपराध या तो ज़मानती है या ग़ैर-ज़मानती। BNSS की पहली अनुसूची में सूची है; आपका वकील या थाने का ड्यूटी अफ़सर एक मिनट में बता सकता है।
- ज़मानती अपराध। ज़मानत आपका अधिकार है। धारा 478 BNSS (पहले धारा 436 CrPC) के तहत पुलिस अधिकारी या अदालत को, आपके ज़मानत देने को तैयार होते ही, आपको रिहा करना ही होगा। अगर आप गिरफ़्तारी के एक हफ़्ते के भीतर ज़मानत का इंतज़ाम नहीं कर पाते, तो क़ानून मान लेता है कि आप निर्धन (indigent) हैं, और आपको बिना ज़मानती के अपने मुचलके पर छोड़ा जा सकता है।
- ग़ैर-ज़मानती अपराध। ज़मानत अपने-आप नहीं मिलती, पर मना भी नहीं है। धारा 480 BNSS (पहले धारा 437 CrPC) के तहत मजिस्ट्रेट ज़मानत दे सकता है। क़ानून अदालत से कहता है कि सोलह साल से कम उम्र के व्यक्ति, महिला, और बीमार या अशक्त व्यक्ति के प्रति गंभीर मामलों में भी ख़ास नरमी बरते।
- सेशन कोर्ट और हाई कोर्ट। धारा 483 BNSS (पहले धारा 439 CrPC) के तहत इन अदालतों के पास व्यापक शक्तियाँ हैं और ये किसी भी मामले में, मौत या उम्रक़ैद की सज़ा वाले अपराधों में भी, ज़मानत दे सकती हैं।
दो शब्द जो आप सुनेंगे: मुचलका (bond) अदालत में हाज़िर होने का आपका लिखित वादा है, जिसमें एक रक़म लिखी होती है जो न आने पर ज़ब्त हो जाती है। ज़मानती (surety) वह दूसरा व्यक्ति है जो आपके लिए ऐसा ही वादा करता है और आपके फ़रार होने पर वह रक़म खोने का जोखिम उठाता है। "निजी मुचलका" (personal bond या PR bond) यानी सिर्फ़ आपका अपना वादा, बिना ज़मानती के।
अदालत क्या देखती है
ग़ैर-ज़मानती मामले में जज कुछ सवाल तौलता है। आरोप कितना गंभीर है और अब तक सबूत कितने मज़बूत हैं? क्या आपके भागने का असली ख़तरा है? क्या आप गवाहों को धमका सकते हैं या सबूतों से छेड़छाड़ कर सकते हैं? क्या आपका पुराना आपराधिक रिकॉर्ड है? मुक़दमा कितना लंबा चलेगा? अदालत शर्तें लगा सकती है, जैसे तय दिनों पर थाने में हाज़िरी, पासपोर्ट जमा करना, या शिकायतकर्ता से दूर रहना।
कुछ विशेष क़ानून, जैसे UAPA (आतंकवाद), NDPS Act (नशीले पदार्थ) और PMLA (मनी लॉन्ड्रिंग), ज़मानत की कहीं कड़ी कसौटी रखते हैं। वहाँ भी Union of India v. K.A. Najeeb (2021) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बिना मुक़दमे के बहुत लंबी हिरासत अपने-आप में ज़मानत का आधार हो सकती है, क्योंकि अनुच्छेद 21 वहाँ भी लागू है।
क़दम दर क़दम
- FIR नंबर और धाराएँ लें। FIR की मुफ़्त प्रति आपका हक़ है। देखें कि हर धारा ज़मानती है या नहीं, और अधिकतम सज़ा क्या है।
- 24 घंटे के नियम पर ज़ोर दें। गिरफ़्तार व्यक्ति को, सफ़र का समय छोड़कर, 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना ज़रूरी है (धारा 58 BNSS)। पुलिस को गिरफ़्तारी के आधार बताने और किसी रिश्तेदार या दोस्त को सूचना देनी होती है।
- ज़मानती अपराध: थाना प्रभारी से कहें कि आप ज़मानत देने को तैयार हैं। आधार या वोटर कार्ड, पते का सबूत और, माँगे जाने पर, पहचान और पते के सबूत के साथ एक ज़मानती ले जाएँ।
- ग़ैर-ज़मानती अपराध: वकील मजिस्ट्रेट की अदालत में ज़मानत अर्ज़ी दाख़िल करता है (आम तौर पर उसी दिन या अगले दिन)। अदालत सरकारी वकील को सुनकर फ़ैसला करती है। मना होने पर धारा 483 BNSS के तहत सेशन कोर्ट, फिर हाई कोर्ट जाएँ। हालात बदलने पर दोबारा अर्ज़ी के लिए लंबा इंतज़ार ज़रूरी नहीं।
- ज़मानती का इंतज़ाम करें। ज़मानती आम तौर पर आधार या वोटर कार्ड, पते का सबूत और हैसियत का सबूत (सैलरी स्लिप, संपत्ति के काग़ज़, बैंक पासबुक या गाड़ी की RC) लाता है। अदालत के क्लर्क से पूछें कि आपके ज़िले में क्या चाहिए।
- मुचलका भरें और रिहाई आदेश लें। अदालत रिहाई का वारंट जेल भेजती है। ज़मानत आदेश की प्रति संभालकर रखें; हर आने वाली तारीख़ पर इसकी ज़रूरत पड़ेगी।
- वकील के पैसे नहीं? विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत हिरासत में हर व्यक्ति, चाहे आय कितनी भी हो, मुफ़्त क़ानूनी सहायता का हक़दार है। मजिस्ट्रेट से लीगल एड वकील माँगें, 15100 पर कॉल करें, या ज़िला अदालत भवन में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के दफ़्तर जाएँ।
24 साल का डिलीवरी कर्मचारी रमेश एक दुकान के बाहर हाथापाई के बाद गिरफ़्तार होता है। FIR में स्वेच्छा से चोट पहुँचाने की धारा है, जो ज़मानती अपराध है। उसकी बहन उसके आधार कार्ड और एक चाचा के साथ थाने पहुँचती है, जिनके पास राशन कार्ड और बैंक पासबुक है। वह थाना प्रभारी से विनम्रता से पर साफ़ कहती है कि अपराध ज़मानती है, इसलिए धारा 478 BNSS के तहत रमेश को ज़मानत पर छोड़ा जाए। चाचा ज़मानती के रूप में दस्तख़त करते हैं। रमेश उसी रात घर आ जाता है। अगर अफ़सर मना करता, तो अगला क़दम अगली सुबह लीगल एड वकील के साथ मजिस्ट्रेट के पास जाना होता।
ये तैयार रखें
- FIR की प्रति (मुफ़्त) और गिरफ़्तारी मेमो।
- आरोपी की पहचान और पते का सबूत: आधार, वोटर कार्ड, राशन कार्ड।
- ज़मानती की पहचान, पते और आय या संपत्ति का सबूत।
- मेडिकल काग़ज़, उम्र का सबूत या दिव्यांगता प्रमाणपत्र, जिन पर अदालत को विचार करना होता है।
ऐसे किसी को पैसे न दें जो पुलिस या जज से ज़मानत "करवाने" का वादा करे। ज़मानत सिर्फ़ लिखित आदेश से मिलती है, और अदालत सिर्फ़ उस आदेश में दर्ज मुचलके की रक़म ही लेती है। साथ ही, ज़मानत के बाद तारीख़ पर न पहुँचने से ज़मानत रद्द और वारंट जारी हो सकता है।
ज़मानत मिल गई पर अब भी जेल में हैं?
कई ग़रीब क़ैदी सिर्फ़ इसलिए अंदर रहते हैं कि उन्हें ज़मानती नहीं मिलता या मुचलके की रक़म नहीं जुटती। सुप्रीम कोर्ट ने In Re: Policy Strategy for Grant of Bail (2023) में इस पर निर्देश दिए। ज़मानत आदेश के सात दिन के भीतर रिहाई न हो तो जेल अधीक्षक DLSA को सूचित करेगा, जो मदद के लिए पैरा-लीगल वॉलंटियर भेज सकता है; एक महीने में मुचलका न भरा जाए तो अदालत ख़ुद शर्तों में ढील पर विचार करे; और अदालतें "स्थानीय" ज़मानती की शर्त से बचें। अदालत को लिखित में बताएँ कि आप ज़मानती नहीं ला सकते और निजी मुचलके या कम रक़म की माँग करें।
जो व्यक्ति विचाराधीन क़ैदी (undertrial) के रूप में पहले ही लंबा समय हिरासत में बिता चुका है, उसके लिए धारा 479 BNSS अधिकतम सज़ा का एक हिस्सा काटने के बाद रिहाई का प्रावधान करती है। विचाराधीन क़ैदियों के अधिकारों पर हमारी अलग गाइड पढ़ें।
कहाँ जाएँ
- ज़मानती अपराध में ज़मानत के लिए थाना प्रभारी।
- ग़ैर-ज़मानती अपराध में न्यायिक मजिस्ट्रेट (पहली पेशी), फिर सेशन कोर्ट, फिर हाई कोर्ट।
- मुफ़्त वकील और ज़मानती में मदद के लिए ज़िला अदालत में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण, या NALSA हेल्पलाइन 15100।
- गिरफ़्तार व्यक्ति ख़तरे में हो या अदालत में पेश किए बिना रखा जा रहा हो तो आपातकालीन 112; वकील हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका भी दायर कर सकता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
ज़मानत मिलने में कितना समय लगता है?
ज़मानती अपराध में रिहाई थाने से कुछ घंटों में हो सकती है। ग़ैर-ज़मानती अपराध में मजिस्ट्रेट आम तौर पर सरकारी वकील को सुनकर कुछ दिनों में फ़ैसला करता है। Satender Kumar Antil (2022) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ज़मानत अर्ज़ियाँ सामान्यतः दो हफ़्ते में तय हों।
ज़मानत में कितना पैसा लगता है?
कोई तय फ़ीस नहीं है। अदालत आदेश में मुचलके की रक़म तय करती है, और जब तक आप मुचलका नहीं तोड़ते, कुछ देना नहीं पड़ता। रक़म या ज़मानती का इंतज़ाम न हो सके तो जज को बताएँ; अदालत रक़म घटा सकती है या आपका निजी मुचलका मान सकती है। लीगल एड वकील का कोई ख़र्च नहीं।
क्या पुलिस ज़मानत दे सकती है?
हाँ, ज़मानती अपराधों में थाना प्रभारी को धारा 478 BNSS के तहत ज़मानत पर छोड़ना ही होगा। ग़ैर-ज़मानती अपराधों में सिर्फ़ अदालत ज़मानत दे सकती है, हालाँकि जहाँ पुलिस गिरफ़्तारी ज़रूरी न समझे, वहाँ वह व्यक्ति को मुचलके पर छोड़ सकती है।
मजिस्ट्रेट ने ज़मानत नामंज़ूर कर दी, क्या सब ख़त्म?
नहीं। आप धारा 483 BNSS के तहत सेशन कोर्ट और फिर हाई कोर्ट में अर्ज़ी दे सकते हैं। हालात बदलने पर, जैसे चार्जशीट दाख़िल होना या मुक़दमे में लंबी देरी, उसी अदालत में दोबारा अर्ज़ी भी दी जा सकती है।
क्या ज़मानत रद्द हो सकती है?
हाँ, अगर आप गवाहों को धमकाएँ, दूसरा अपराध करें, पेशियों पर न जाएँ या कोई शर्त तोड़ें। अभियोजन को अर्ज़ी देनी होती है और अदालत को आपको सुनना होता है। सिर्फ़ इसलिए ज़मानत रद्द नहीं होती कि पुलिस ने बाद में चार्जशीट दाख़िल कर दी।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।
