पुराने अहम फ़ैसले
सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस अपने-आप गिरफ़्तारी नहीं कर सकती
Arnesh Kumar v. State of Bihar · Supreme Court of India · 2014
सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस से कहा कि वह आदतन गिरफ़्तारी बंद करे और लिखे कि गिरफ़्तारी सचमुच क्यों ज़रूरी है। किसी को हिरासत में भेजने से पहले मजिस्ट्रेट को इन कारणों की जाँच करनी होगी।
मामला किस बारे में था
पत्नी के परिवार ने एक व्यक्ति पर क्रूरता और दहेज माँगने का आरोप लगाया था, और उसे तुरंत गिरफ़्तारी का डर था। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले के ज़रिए एक बड़ी समस्या पर विचार किया: ऐसे अपराधों में भी आदतन गिरफ़्तारी, जहाँ इसकी ज़रूरत नहीं थी।
अदालत ने क्या कहा
- सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में सिर्फ़ शिकायत होने पर पुलिस गिरफ़्तारी नहीं कर सकती। उसे संतुष्ट होना होगा कि गिरफ़्तारी ज़रूरी है, जैसे दूसरा अपराध रोकने, सही जाँच करने, या सबूत या गवाहों से छेड़छाड़ रोकने के लिए।
- पुलिस को ये कारण लिखित में दर्ज करने होंगे।
- जहाँ गिरफ़्तारी ज़रूरी नहीं, वहाँ पुलिस हाज़िर होने का नोटिस दे। व्यक्ति नोटिस का पालन करे तो आमतौर पर उसे गिरफ़्तार नहीं किया जाना चाहिए।
- हिरासत की अनुमति देने से पहले मजिस्ट्रेट को पुलिस के कारण पढ़कर संतुष्ट होना होगा, यंत्रवत मंज़ूरी नहीं देनी चाहिए।
- इन निर्देशों का पालन न करने वाले अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई और अदालत की अवमानना की कार्रवाई हो सकती है।
आज की स्थिति
नए आपराधिक प्रक्रिया क़ानून में ये सुरक्षाएँ भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 35 में हैं, जिसने CrPC की धारा 41 और 41A की जगह ली है।