धारा 35 BNSS का पुलिस नोटिस: क्या करें
धारा 35(3) BNSS (पुरानी 41A CrPC) का नोटिस मिला है? इसका मतलब, यह गिरफ़्तारी से कैसे बचाता है, क्या साथ ले जाएँ, जवाब कैसे दें, और नज़रअंदाज़ करने पर क्या होगा।
संक्षेप में
- धारा 35(3) BNSS का नोटिस आपको थाने आकर सवालों के जवाब देने के लिए बुलाता है। यह न गिरफ़्तारी है, न अदालत का समन।
- सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस को गिरफ़्तारी की जगह नोटिस देना होगा, जब तक वह लिखित कारण दर्ज न करे कि गिरफ़्तारी ज़रूरी क्यों है।
- अगर आप हाज़िर होते हैं और सहयोग करते रहते हैं, तो उस अपराध में आपकी गिरफ़्तारी नहीं हो सकती, जब तक अधिकारी नए कारण दर्ज न करे (धारा 35(5) BNSS)।
- नोटिस को नज़रअंदाज़ करने पर पुलिस गिरफ़्तार कर सकती है (धारा 35(6) BNSS)। तय तारीख़ पर न जा सकें तो लिखकर दूसरी तारीख़ माँगें।
- नोटिस, पहचान पत्र और हो सके तो वकील के साथ जाएँ। मुफ़्त क़ानूनी सहायता: 15100।
एक पुलिसकर्मी आपको एक काग़ज़ थमाता है। उसमें एक FIR नंबर लिखा है, कहा गया है कि आपको एक तय तारीख़ को थाने में "हाज़िर होना है", और दस्तख़त माँगे जाते हैं। ज़्यादातर लोग इसे जेल की पहली सीढ़ी समझ लेते हैं। असल में ज़्यादातर मामलों में इसका मतलब उल्टा है: क़ानून ने अधिकारी से कहा है कि आपको बंद करने की जगह बुलाकर पूछताछ करे।
यह काग़ज़ धारा 35(3) BNSS (भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 1 जुलाई 2024 से लागू; पहले धारा 41A CrPC) के तहत हाज़िरी का नोटिस (notice of appearance) है। यह गाइड बताती है कि इसका मतलब क्या है और नोटिस को गिरफ़्तारी में बदलने से कैसे बचें।
पुलिस को गिरफ़्तारी की जगह नोटिस कब देना होगा
सात साल तक की सज़ा वाले अपराध में पुलिस अधिकारी बिना वारंट के तभी गिरफ़्तार कर सकता है जब दो बातें सच हों: उसके पास यह मानने का कारण हो कि आपने अपराध किया है, और वह संतुष्ट हो कि गिरफ़्तारी किसी तय वजह से ज़रूरी है, जैसे आगे अपराध रोकना, सबूत या गवाहों की हिफ़ाज़त, या अदालत में आपकी हाज़िरी पक्की करना (धारा 35(1)(b) BNSS)। कारण लिखित में दर्ज करने होंगे।
जहाँ इन कसौटियों पर गिरफ़्तारी ज़रूरी नहीं, वहाँ धारा 35(3) BNSS कहती है कि अधिकारी नोटिस जारी करेगा ("shall"), जिसमें आपको उसके सामने या किसी तय जगह हाज़िर होने का निर्देश होगा। यह "shall" शब्द अहम है। नोटिस नियम है; गिरफ़्तारी अपवाद। सुप्रीम कोर्ट ने यह बात Arnesh Kumar v. State of Bihar (2014) में तय की और Satender Kumar Antil v. CBI में बार-बार दोहराई है, जिसमें अदालत ने कई सालों में आदेश दिए हैं। जनवरी 2025 में उसने हर राज्य को निर्देश दिया कि ये नोटिस सिर्फ़ क़ानून में बताए तरीक़े से तामील हों, और कहा कि WhatsApp या ऐसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजना उसका विकल्प नहीं है। इसी मामले में जनवरी 2026 के फ़ैसले में उसने कहा कि नोटिस का पालन न करने पर गिरफ़्तारी ऐसी सामग्री पर टिकी होनी चाहिए जो नोटिस जारी करते समय अधिकारी के पास नहीं थी, और यह शक्ति कम से कम इस्तेमाल होनी चाहिए।
नोटिस में क्या होना चाहिए
असली नोटिस काग़ज़ पर होता है, आमतौर पर थाने के लेटरहेड पर, और उसमें ये बातें होनी चाहिए: FIR नंबर और तारीख़, थाना, अपराध की धाराएँ, जाँच अधिकारी (investigating officer) का नाम, और हाज़िरी की तारीख़, समय और जगह। उस पर अधिकारी के दस्तख़त होने चाहिए। तामील करने वाला आपसे पावती (acknowledgment) पर दस्तख़त माँगेगा। दस्तख़त सिर्फ़ यह पुष्टि करते हैं कि नोटिस आपको मिला; यह किसी बात को क़बूल करना नहीं है।
सहयोग करने पर आपकी सुरक्षा
धारा 35(4) BNSS के तहत नोटिस की शर्तों का पालन करना आपका कर्तव्य है। बदले में धारा 35(5) BNSS कहती है कि जब तक आप पालन करते रहेंगे, नोटिस में लिखे अपराध के लिए आपको गिरफ़्तार नहीं किया जाएगा, जब तक अधिकारी यह कारण दर्ज न करे कि अब गिरफ़्तारी क्यों ज़रूरी हो गई है। पालन का मतलब है: दी गई तारीख़ों पर हाज़िर होना, सवालों के जवाब देना, और अधिकारी द्वारा क़ानूनी तौर पर माँगे गए दस्तावेज़ देना।
दो और सुरक्षाएँ हैं। संविधान का अनुच्छेद 20(3) कहता है कि आपको अपने ही ख़िलाफ़ गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, इसलिए जो सवाल आपको फँसा सकता हो, उसका जवाब देने से आप मना कर सकते हैं। धारा 38 BNSS के तहत पूछताछ के दौरान आप अपनी पसंद के वकील से मिल सकते हैं, हालाँकि वकील पूरी पूछताछ के दौरान साथ नहीं बैठ सकता।
धारा 35(7) BNSS एक नया नियम जोड़ती है: अगर आपकी उम्र साठ साल से ऊपर है, या आप अशक्त (infirm) हैं, और अपराध की सज़ा तीन साल से कम है, तो पुलिस उप पुलिस अधीक्षक (Deputy Superintendent of Police) या उससे ऊपर के अधिकारी की पहले से अनुमति के बिना आपको गिरफ़्तार नहीं कर सकती।
हाज़िर न होने पर क्या होगा
धारा 35(6) BNSS के तहत, अगर आप नोटिस का पालन नहीं करते, या अपनी पहचान बताने से मना करते हैं, तो अधिकारी नोटिस में लिखे अपराध के लिए आपको गिरफ़्तार कर सकता है, बशर्ते किसी अदालत ने कोई और आदेश न दिया हो। बहुत से लोग सिर्फ़ डर के मारे दूर रहकर नोटिस की सुरक्षा खो देते हैं। ऐसा न करें।
अगर आप बीमारी, परीक्षा, किसी और अदालत की तारीख़ या पारिवारिक आपात स्थिति की वजह से सचमुच उस तारीख़ को नहीं जा सकते, तो तारीख़ से पहले जाँच अधिकारी को लिखें। कारण बताएँ, सबूत लगाएँ (मेडिकल सर्टिफ़िकेट, परीक्षा का प्रवेश पत्र, यात्रा टिकट), और दूसरी तारीख़ माँगें। थाने में देकर रसीद लें, या ईमेल और रजिस्टर्ड डाक से भेजें। कॉपी रखें। कारण सहित, रिकॉर्ड पर दूसरी तारीख़ माँगना पालन है; चुप्पी नहीं।
क़दम दर क़दम
- नोटिस पूरा पढ़ें और कॉपी रखें। पावती पर पढ़ने के बाद ही दस्तख़त करें, और दस्तख़त के पास मिलने की तारीख़ और समय लिखें।
- उसी दिन वकील से बात करें। अनुच्छेद 22(1) आपको अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने का अधिकार देता है। पैसे न हों तो 15100 पर कॉल करें या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) के दफ़्तर जाएँ, जो आमतौर पर ज़िला अदालत परिसर में होता है।
- FIR लें। आप या आपका वकील थाने से या राज्य पुलिस की वेबसाइट से कॉपी ले सकते हैं, जहाँ (संवेदनशील मामलों को छोड़कर) ज़्यादातर FIR अपलोड होती हैं। आरोप जानकर आप तैयारी कर सकते हैं।
- समय पर जाएँ, हो सके तो वकील के साथ। नोटिस, फ़ोटो पहचान पत्र और नोटिस में माँगे गए दस्तावेज़ साथ रखें। विनम्र और सच्चे रहें। ख़ाली काग़ज़ या बिना पढ़े किसी बयान पर दस्तख़त न करें।
- डायरी रखें। जिन अधिकारियों से मिले उनके नाम, पहुँचने और निकलने का समय, और हर वह दस्तावेज़ नोट करें जिस पर दस्तख़त किए या जो सौंपा।
- सहयोग के बावजूद गिरफ़्तारी का डर हो, तो वकील से अग्रिम ज़मानत (anticipatory bail, यानी धारा 482 BNSS के तहत सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट से पहले से मिलने वाली ज़मानत) के बारे में पूछें।
नागपुर की स्कूल शिक्षिका रेखा को पड़ोसी के साथ ज़मीन के झगड़े से जुड़ी एक FIR में हाज़िरी का नोटिस मिलता है। अपराध में तीन साल तक की सज़ा है। वह घबरा जाती हैं, लेकिन उनके क़ानूनी सहायता वकील समझाते हैं कि धारा 35(3) के तहत पुलिस को उन्हें गिरफ़्तार करने की जगह बुलाना ही था। वह पुलिस की वेबसाइट से FIR की कॉपी लेती हैं, तय तारीख़ पर वकील और अपनी रजिस्ट्री के साथ थाने जाती हैं, एक घंटे सवालों के जवाब देती हैं, और हाज़िरी रजिस्टर पर दस्तख़त करती हैं। वह अधिकारी का नाम और निकलने का समय नोट करती हैं। उनकी गिरफ़्तारी नहीं होती, और पुलिस बाद में अदालत में रिपोर्ट दाख़िल करती है, जहाँ वह अपना पक्ष रखेंगी।
ये तैयार रखें
- नोटिस, और तारीख़-समय सहित आपकी दस्तख़त की हुई पावती
- FIR की कॉपी (थाने या राज्य पुलिस की वेबसाइट से)
- फ़ोटो पहचान पत्र (आधार, वोटर ID या ड्राइविंग लाइसेंस) और पते का सबूत
- आरोप से जुड़े दस्तावेज़ (समझौते, रसीदें, चैट, बैंक स्टेटमेंट)
- वकील या DLSA का फ़ोन नंबर, और थाने के हर दौरे का नोट
WhatsApp, SMS या फ़ोन कॉल पर "आपके ख़िलाफ़ नोटिस जारी हुआ है, निपटाने के लिए पैसे भेजें" जैसा संदेश धारा 35 का नोटिस नहीं है। असली नोटिस काग़ज़ पर, आपको व्यक्तिगत रूप से या आपके पते पर तामील होता है। कोई अधिकारी कॉल पर पैसे नहीं लेता, और "डिजिटल अरेस्ट" नाम की कोई चीज़ क़ानून में नहीं है। ऐसी कॉल की शिकायत 1930 पर करें।
अगर पुलिस प्रक्रिया का दुरुपयोग करे
अगर सहयोग के बावजूद आपको गिरफ़्तार किया जाता है और कोई नया कारण दर्ज नहीं है, तो 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश होने पर (धारा 58 BNSS) यह बात मजिस्ट्रेट को बताएँ। आगे हिरासत मंज़ूर करने से पहले मजिस्ट्रेट को जाँचना होगा कि गिरफ़्तारी क़ानूनी कसौटियों पर खरी थी या नहीं। इन नियमों के उल्लंघन में की गई गिरफ़्तारी पर अधिकारी के ख़िलाफ़ विभागीय कार्रवाई हो सकती है, और अदालतों ने इस आधार पर ज़मानत दी है। आप पुलिस अधीक्षक या आयुक्त को, और राज्य मानवाधिकार आयोग को भी लिखित शिकायत कर सकते हैं।
कहाँ जाएँ
- नोटिस में नामित जाँच अधिकारी, FIR की कॉपी या तारीख़ बदलवाने के लिए (लिखित में, रसीद के साथ)
- पुलिस अधीक्षक या आयुक्त, नोटिस के दुरुपयोग या ग़लत गिरफ़्तारी की लिखित शिकायत के लिए
- ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण या NALSA हेल्पलाइन 15100, मुफ़्त वकील के लिए
- मजिस्ट्रेट की अदालत, पहली पेशी पर ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तारी पर आपत्ति के लिए; सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट, अग्रिम ज़मानत के लिए
- राज्य मानवाधिकार आयोग या NHRC, हिरासत में दुर्व्यवहार के लिए; आपात स्थिति में 112; "डिजिटल अरेस्ट" ठगी की कॉल पर 1930
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या धारा 35 BNSS का नोटिस पुरानी धारा 41A CrPC के नोटिस जैसा ही है?
हाँ। 1 जुलाई 2024 को पुरानी धारा 41A CrPC की जगह धारा 35(3) BNSS आई, और मूल नियम वही है: सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस को गिरफ़्तारी की जगह हाज़िरी का नोटिस देना होगा, जब तक गिरफ़्तारी ज़रूरी न दिखाई जाए। BNSS ने धारा 35(7) में साठ से ऊपर या अशक्त व्यक्तियों के लिए नई सुरक्षा जोड़ी है।
नोटिस के बाद थाने जाने पर क्या मुझे गिरफ़्तार किया जा सकता है?
नोटिस में लिखे अपराध के लिए नहीं, जब तक आप सहयोग करते हैं, सिवाय इसके कि अधिकारी यह कारण दर्ज करे कि गिरफ़्तारी अब ज़रूरी हो गई है (धारा 35(5) BNSS)। सुप्रीम कोर्ट ने जनवरी 2026 में कहा कि धारा 35(6) के तहत गिरफ़्तारी ऐसी सामग्री पर टिकी होनी चाहिए जो नोटिस जारी करते समय पुलिस के पास नहीं थी। फिर भी गिरफ़्तारी हो तो पहली पेशी पर मजिस्ट्रेट को बताएँ।
क्या मुझे पुलिस के हर सवाल का जवाब देना होगा?
आपको अपनी पहचान बतानी होगी और निर्देश के मुताबिक़ हाज़िर होना होगा। जवाब सच्चे दें, लेकिन संविधान के अनुच्छेद 20(3) के तहत आपको ऐसे जवाब देने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता जो आपको फँसाएँ। झूठ न बोलें, और बिना पढ़े किसी बयान पर दस्तख़त न करें। किन सवालों का जवाब देना है, इस पर वकील सलाह दे सकता है।
क्या पुलिस WhatsApp पर नोटिस भेज सकती है?
जनवरी 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि धारा 35 BNSS और पुरानी धारा 41A के नोटिस क़ानून में बताए तरीक़े से तामील हों, और कहा कि WhatsApp या ऐसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजना उसका विकल्प नहीं है। ऐसा संदेश मिले तो उसे नज़रअंदाज़ करने की जगह सीधे थाने से पुष्टि करें, और नोटिस को औपचारिक रूप से तामील करने को कहें।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।