जब पुलिस आपका फ़ोन या लैपटॉप ज़ब्त करे
पुलिस फ़ोन कब ले सकती है, ज़ब्ती मेमो, वीडियो और हैश वैल्यू जो उसे दर्ज करनी है, क्या पासवर्ड देना ज़रूरी है, और डिवाइस वापस कैसे पाएँ।
संक्षेप में
- पुलिस वही डिवाइस ज़ब्त कर सकती है जो जाँच में चल रहे अपराध से जुड़ा हो धारा 106 BNSS, या आपको लिखित में उसे पेश करने का आदेश दे सकती है धारा 94 BNSS। यह आपकी पूरी ज़िंदगी खंगालने का लाइसेंस नहीं है।
- उसे ज़ब्ती मेमो (मेक, मॉडल, IMEI/सीरियल) बनाना, डिवाइस सील करना, ज़ब्ती की वीडियो रिकॉर्डिंग करना धारा 105 BNSS और मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट देना ज़रूरी है। अपनी कॉपी माँगें।
- क्या आपको पासवर्ड देने पर मजबूर किया जा सकता है, यह तय नहीं है। अनुच्छेद 20(3) आपको अपने ही ख़िलाफ़ गवाह बनाए जाने से बचाता है। कहें, "वकील से बात करके जवाब दूँगा"।
- डिवाइस वापस पाने के लिए धारा 497 BNSS में मजिस्ट्रेट को अर्ज़ी दें; अदालतें अक्सर डेटा की सत्यापित कॉपी (हैश-मिलान वाली इमेज) रखवाकर डिवाइस छोड़ देती हैं।
- मुफ़्त वकील: 15100। साइबर ठगी के पीड़ित: 1930।
आपके फ़ोन में आपके संदेश, तस्वीरें, बैंक ऐप, काम की फ़ाइलें और हर जान-पहचान वाले का ब्योरा है। पुलिस इसे ले ले तो वह आपकी ज़िंदगी का उतना हिस्सा देख सकती है जितना घर की तलाशी से भी नहीं दिखता, और एक झटके में आप काम, पैसे और परिवार से कट जाते हैं। जाँच के दौरान पुलिस के पास डिवाइस ज़ब्त करने की शक्ति ज़रूर है, पर उसके साथ नियम भी हैं। उन्हें जानने से आपकी निजता बचती है और डिवाइस जल्दी लौटता है।
पुलिस आपका डिवाइस कब ले सकती है
- जाँच के दौरान ज़ब्ती। धारा 106 BNSS (पहले धारा 102 CrPC) के तहत पुलिस अधिकारी ऐसी संपत्ति ज़ब्त कर सकता है जिसके चोरी की होने का शक हो या जो ऐसे हालात में मिले जिनसे किसी अपराध का शक पैदा हो। ज़ब्ती की रिपोर्ट बिना देरी मजिस्ट्रेट को देनी होती है।
- पेश करने का लिखित आदेश। धारा 94 BNSS (पहले धारा 91 CrPC) के तहत अदालत या थाने का प्रभारी अधिकारी आपको लिखित में कोई दस्तावेज़ या चीज़ पेश करने का आदेश दे सकता है, और इस धारा में अब साफ़ तौर पर डिजिटल सबूत रखने वाले "संचार डिवाइस" शामिल हैं। आदेश में लिखा होना चाहिए कि वह किस मामले से जुड़ा है।
- क़ानूनी तलाशी या गिरफ़्तारी के दौरान। वारंट से या धारा 185 BNSS के तहत किसी जगह की तलाशी में, या गिरफ़्तारी के समय आपके पास मिला डिवाइस ज़ब्त किया जा सकता है।
हर हाल में डिवाइस का जाँच वाले अपराध से संबंध होना चाहिए। ट्रैफ़िक चेकिंग या पड़ोसी से झगड़े में "बस देखने के लिए" फ़ोन माँगने वाले अधिकारी को उसे लेने की कोई शक्ति नहीं है। आप विनम्रता से पूछ सकते हैं: "कौन-सा FIR नंबर, और किस धारा में ज़ब्त कर रहे हैं?"
पुलिस को कौन-सी प्रक्रिया अपनानी होगी
- ज़ब्ती मेमो (पंचनामा)। जो लिया गया उसकी लिखित सूची, मेक, मॉडल, रंग, IMEI या सीरियल नंबर, SIM का ब्योरा और डिवाइस की हालत (चालू या बंद, लॉक या अनलॉक) के साथ, दो स्वतंत्र गवाहों और आपके दस्तख़त से। दस्तख़त से पहले पढ़ें। कोई ब्योरा ग़लत या छूटा हो तो अपनी आपत्ति मेमो पर ही लिखें।
- ऑडियो-वीडियो रिकॉर्डिंग। धारा 105 BNSS के तहत तलाशी और ज़ब्ती की प्रक्रिया, सूची बनाने और गवाहों के दस्तख़त समेत, किसी ऑडियो-वीडियो डिवाइस, बेहतर हो मोबाइल फ़ोन, पर रिकॉर्ड होनी चाहिए और रिकॉर्डिंग बिना देरी मजिस्ट्रेट को भेजनी होगी। यह 2024 से नया है और संहिता के तहत हर ज़ब्ती पर लागू है।
- सील करना। डिवाइस बंद करके, आपकी मौजूदगी में सील लिफ़ाफ़े या फ़ैराडे बैग में रखा जाना चाहिए और सील पर दस्तख़त होने चाहिए। उसे सिर्फ़ फ़ॉरेंसिक लैब में खोला जाना चाहिए। सील डिवाइस को थाने में चुपचाप खंगाला नहीं जा सकता।
- हैश वैल्यू। हैश वैल्यू डेटा की डिजिटल उँगलियों की छाप है। जब फ़ॉरेंसिक लैब डिवाइस की कॉपी ("इमेज") बनाती है, तो हैश दर्ज करती है ताकि अदालत बाद में देख सके कि कुछ बदला तो नहीं गया। धारा 63 BSA (भारतीय साक्ष्य अधिनियम, जिसने साक्ष्य अधिनियम की धारा 65B की जगह ली) के तहत सबूत में इस्तेमाल होने वाले इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के साथ प्रमाणपत्र चाहिए, और तय फ़ॉर्म में हैश वैल्यू शामिल है। माँग करें कि इमेज बनाते समय हैश दर्ज हो और आपको दिया जाए।
क्या आपको पासवर्ड देना या उँगली से अनलॉक करना होगा?
भारत में यह अंतिम रूप से तय नहीं है। अनुच्छेद 20(3) कहता है कि किसी अपराध के आरोपी को अपने ही ख़िलाफ़ गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यह गवाही वाली मजबूरी को रोकता है, जैसे आपको जो पता है वह बोलने या लिखने पर मजबूर करना, पर उँगलियों के निशान या लिखावट के नमूने जैसे भौतिक सबूत को नहीं (State of Bombay v. Kathi Kalu Oghad, 1961), और ज़बरदस्ती नार्को-एनालिसिस या ब्रेन-मैपिंग इसका उल्लंघन है (Selvi v. State of Karnataka, 2010)। पासवर्ड आपके दिमाग़ में रहता है, इसलिए कई वकील इसे गवाही मानते हैं; उँगली या चेहरे से अनलॉक भौतिक है, इसलिए पुलिस कहती है कि वह नहीं है। हाई कोर्टों की राय अलग-अलग रही है, और कुछ ने पुलिस को अनलॉक के आदेश के लिए मजिस्ट्रेट के पास जाने की इजाज़त दी है।
डिजिटल डिवाइसों की तलाशी और ज़ब्ती के लिए दिशा-निर्देश माँगने वाली याचिकाएँ (Foundation for Media Professionals v. Union of India, और साथ में Ram Ramaswamy v. Union of India) 2021–22 से सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं। नवंबर 2023 में कोर्ट ने कहा कि दिशा-निर्देश ज़रूरी हैं और केंद्र को उन्हें बनाने का निर्देश दिया; दिसंबर 2023 में केंद्र ने कहा कि एक समिति काम कर रही है और तब तक CBI की डिजिटल साक्ष्य नियमावली (manual) का पालन होगा। 2026 तक सुप्रीम कोर्ट के कोई बाध्यकारी दिशा-निर्देश जारी नहीं हुए हैं। तब तक सुरक्षित रास्ता यह है: झूठ न बोलें, शारीरिक विरोध न करें, और कहें कि पासवर्ड के बारे में वकील से सलाह के बाद जवाब देंगे।
आपकी निजता अब भी मौलिक अधिकार है। Justice K.S. Puttaswamy v. Union of India (2017) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर दख़ल क़ानूनी, ज़रूरी और अनुपातिक होना चाहिए। किसी छोटे अपराध की जाँच के लिए आपका पूरा फ़ोन कॉपी कर लेना ऐसा दख़ल है जिसकी जाँच अदालत से कराई जा सकती है।
क़दम दर क़दम: डिवाइस वापस पाना
- ज़ब्त डिवाइस "केस प्रॉपर्टी" बन जाता है। धारा 497 BNSS (पहले धारा 451 CrPC) के तहत अदालत को उसके पेश होने के 14 दिन में उसका विवरण तैयार करना है, फ़ोटो या वीडियो बनवाना है, और उसके बाद 30 दिन के भीतर आदेश देना है कि उसका क्या किया जाए, जिसमें लौटाना भी शामिल है।
- अपने वकील के ज़रिए मजिस्ट्रेट के सामने अंतरिम अभिरक्षा (interim custody) की अर्ज़ी दें। पेशकश करें कि पुलिस डेटा की हैश से सत्यापित फ़ॉरेंसिक इमेज रख ले, और आप ज़रूरत पड़ने पर डिवाइस पेश करेंगे, बॉन्ड के साथ।
- पुलिस कहे कि डिवाइस अभी चाहिए, तो अदालत से फ़ॉरेंसिक रिपोर्ट की समय-सीमा तय करने को कहें। अदालतें अब मानने लगी हैं कि इमेज बन जाने के बाद असली डिवाइस रखने का कोई मक़सद नहीं।
- SIM न बदलें और क्लाउड बैकअप ऐसे न मिटाएँ जिसे सबूत नष्ट करना समझा जाए। दूसरे डिवाइस से बैंकिंग और ईमेल के पासवर्ड ज़रूर बदलें, और बैंक को बताएँ।
लखनऊ के डिलीवरी राइडर इमरान से उनके पुराने नियोक्ता के ख़िलाफ़ ठगी के मामले की जाँच कर रही पुलिस कहती है कि "कुछ दिन के लिए" उनका फ़ोन चाहिए। वे FIR नंबर और धारा पूछते हैं, और उन्हें धारा 94 BNSS का लिखित आदेश दिखाया जाता है। वे ज़ब्ती मेमो पर ज़ोर देते हैं, IMEI सही है या नहीं देखते हैं, फ़ोन को सील और वीडियोग्राफ़ होते देखते हैं, और मेमो की फ़ोटो लेते हैं। दो हफ़्ते बाद उनका क़ानूनी सहायता वाला वकील धारा 497 BNSS में अर्ज़ी देता है, बॉन्ड की पेशकश करता है और माँग करता है कि डिवाइस की जगह हैश-सत्यापित इमेज रखी जाए। मजिस्ट्रेट फ़ॉरेंसिक लैब को फ़ोन की इमेज बनाकर दस दिन में लौटाने का आदेश देते हैं।
ये तैयार रखें
- ज़ब्ती मेमो और धारा 94 के आदेश या वारंट (अगर हो) की कॉपी या फ़ोटो
- FIR नंबर, थाना, अधिकारियों और गवाहों के नाम
- IMEI/सीरियल नंबर दिखाता ख़रीद का बिल या डिब्बा
"समय बचाने के लिए" अनलॉक फ़ोन न थमाएँ और पुलिस दरवाज़े पर हो तो कुछ भी डिलीट न करें; सबूत नष्ट करना अलग अपराध है। इसी तरह कोरे या अधूरे ज़ब्ती मेमो पर दस्तख़त न करें। बाद में अदालत में आप जो भी कहेंगे, वह उसी मेमो और वीडियो पर टिका होगा।
कहाँ जाएँ
- मामले के न्यायिक मजिस्ट्रेट: ज़ब्ती रिकॉर्ड और वीडियो की कॉपी, और धारा 497 BNSS में डिवाइस लौटाने की अर्ज़ी।
- पुलिस अधीक्षक, फिर राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण या राज्य मानवाधिकार आयोग: बिना मेमो, वीडियो या क़ानूनी आधार की ज़ब्ती पर।
- ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (15100) मुफ़्त वकील के लिए।
- 1930 / cybercrime.gov.in अगर आप साइबर ठगी के पीड़ित हैं और पुलिस को सबूत के लिए आपका फ़ोन चाहिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या पुलिस बिना वारंट मेरा फ़ोन जाँच सकती है?
पुलिस जाँच में चल रहे अपराध से जुड़ा फ़ोन धारा 106 BNSS में ज़ब्त कर सकती है, या धारा 94 BNSS में उसे पेश करने का आदेश दे सकती है, बिना अदालत के वारंट के। वह मनमाने ढंग से, जैसे ट्रैफ़िक चेकिंग में, आपका फ़ोन खंगालने की माँग नहीं कर सकती। हर ज़ब्ती मेमो में दर्ज, धारा 105 BNSS में वीडियो-रिकॉर्ड और मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट होनी चाहिए।
क्या मुझे पुलिस को अपना फ़ोन पासवर्ड देना होगा?
क़ानून तय नहीं है। अनुच्छेद 20(3) आरोपी को अपने ही ख़िलाफ़ गवाह बनाए जाने से बचाता है, और पासवर्ड इसमें आता है या नहीं, इस पर सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फ़ैसला नहीं आया है; डिजिटल डिवाइस ज़ब्ती पर दिशा-निर्देशों की याचिकाएँ 2026 तक वहाँ लंबित हैं। झूठ न बोलें, विरोध न करें; कहें कि वकील से सलाह के बाद जवाब देंगे, और वकील चाहिए तो 15100 पर कॉल करें।
पुलिस मेरा ज़ब्त फ़ोन कितने समय तक रख सकती है?
जाँच की कोई तय अवधि नहीं है, पर धारा 497 BNSS के तहत अदालत को पेश होने के 14 दिन में संपत्ति का विवरण बनाना, फ़ोटो या वीडियो लेना, और उसके बाद 30 दिन के भीतर तय करना है कि उसका क्या होगा। आप अंतरिम अभिरक्षा की अर्ज़ी दे सकते हैं, बॉन्ड और पुलिस के रखने के लिए डेटा की हैश-सत्यापित कॉपी की पेशकश के साथ।
हैश वैल्यू क्या है और क्यों मायने रखती है?
हैश वैल्यू किसी फ़ाइल या पूरे डिवाइस की इमेज की अनूठी डिजिटल छाप है। एक बाइट भी बदले तो हैश बदल जाता है। पुलिस आपका डिवाइस कॉपी करे तब इसे दर्ज कराने से अदालत बाद में जाँच सकती है कि डेटा बदला या प्लांट नहीं किया गया। धारा 63 BSA के तहत इलेक्ट्रॉनिक सबूत के साथ लगने वाले प्रमाणपत्र में हैश वैल्यू शामिल होती है।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।