समन या वारंट? मिले तो क्या करें
अदालती समन, पुलिस नोटिस, ज़मानती और ग़ैर-ज़मानती वारंट: हर एक का मतलब, eCourts पर असली है या नहीं कैसे जाँचें, नज़रअंदाज़ करने पर क्या होगा, और जवाब कैसे दें।
संक्षेप में
- समन (summons) अदालत का हाज़िर होने या दस्तावेज़ पेश करने का आदेश है। यह गिरफ़्तारी नहीं है। हाज़िर हों, या वकील से कारण बताकर छूट (exemption) माँगें।
- वारंट पुलिस को आपको गिरफ़्तार करके अदालत लाने का आदेश है। ज़मानती (bailable) वारंट में पुलिस आपको बॉन्ड पर छोड़ देती है; ग़ैर-ज़मानती (non-bailable) में ज़मानत अदालत से लेनी होती है।
- धारा 35(3) BNSS का पुलिस नोटिस आपको थाने बुलाता है, अदालत नहीं। पालन करें तो गिरफ़्तारी नहीं होनी चाहिए।
- कोई भी काग़ज़ eCourts पर केस नंबर से जाँचें। वीडियो कॉल पर कोई गिरफ़्तारी नहीं होती, और कोई अदालत वारंट "रद्द" करने के लिए फ़ोन पर पैसे नहीं लेती।
- समन को नज़रअंदाज़ करने पर वारंट, फिर उद्घोषणा (proclamation) और संपत्ति की कुर्की होती है। तारीख़ चूकना सुधारा जा सकता है; छिपना नहीं।
अदालत से आया लिफ़ाफ़ा, दरवाज़े पर काग़ज़ लिए खड़ा पुलिसवाला, या फ़ोन कॉल कि आपके नाम वारंट जारी हो गया है। हर एक घबराहट पैदा कर सकता है। लेकिन हर क़ानूनी काग़ज़ का मतलब गिरफ़्तारी नहीं, और पुलिस का नाम लेने वाला हर फ़ोन असली नहीं। फ़र्क़ जानने से आप शांति से जवाब दे सकते हैं और अदालत को नज़रअंदाज़ करने की मुसीबत से बच सकते हैं।
समन: अदालत चाहती है कि आप हाज़िर हों
समन अदालत का लिखित आदेश है जो आपसे किसी तय तारीख़ को हाज़िर होने, या कोई दस्तावेज़ पेश करने को कहता है। अदालतें इसे कम गंभीर मामलों के आरोपियों, गवाहों और दीवानी मामलों में इस्तेमाल करती हैं। धारा 63 BNSS (पहले धारा 61 CrPC) के तहत समन लिखित, दो प्रतियों में, पीठासीन अधिकारी के दस्तख़त और अदालत की मुहर के साथ होना चाहिए। BNSS अदालत की मुहर या डिजिटल हस्ताक्षर वाले एन्क्रिप्टेड इलेक्ट्रॉनिक रूप में भी समन की इजाज़त देती है (धारा 70 BNSS), इसलिए आपके रजिस्टर्ड ईमेल पर आया समन वैध हो सकता है।
काग़ज़ी समन आमतौर पर पुलिस या अदालत का अधिकारी देता है, जो एक प्रति आपको देकर दूसरी पर दस्तख़त करवाता है (धारा 64 BNSS)। दस्तख़त सिर्फ़ मिलने की पावती है। आप घर पर न हों तो यह परिवार के किसी वयस्क सदस्य को दिया जा सकता है, या तामील न हो पाने पर दरवाज़े पर चिपकाया जा सकता है।
समन का मतलब गिरफ़्तारी नहीं है। आरोपी हैं तो आमतौर पर पहली तारीख़ पर ज़मानत की अर्ज़ी दे सकते हैं, और अच्छा कारण हो तो अदालत अक्सर आपकी जगह वकील को पेश होने देती है। गवाह हैं तो अदालत बताएगी कि गवाही के लिए कब आना है; यात्रा ख़र्च माँगें, जिसका आदेश अदालत दे सकती है।
वारंट: अदालत पुलिस भेजती है
गिरफ़्तारी का वारंट अदालत का लिखित आदेश है जो पुलिस को किसी व्यक्ति को गिरफ़्तार करके अदालत के सामने लाने का निर्देश देता है (धारा 72 BNSS, पहले धारा 70 CrPC)। यह लिखित, पीठासीन अधिकारी के दस्तख़त और मुहर वाला होना चाहिए, और तामील या रद्द होने तक लागू रहता है।
अदालत वारंट को ज़मानती बना सकती है। धारा 73 BNSS के तहत अदालत वारंट पर लिख सकती है कि अगर आप तय तारीख़ पर हाज़िर होने का बॉन्ड, ज़मानतदार के साथ या बिना, दे दें तो अधिकारी आपको छोड़ देगा। ग़ैर-ज़मानती वारंट में ऐसा कुछ नहीं लिखा होता: पुलिस आपको अदालत में पेश करेगी और ज़मानत वहीं माँगनी होगी। अदालतें आमतौर पर वारंट तभी जारी करती हैं जब कोई समन को नज़रअंदाज़ करे। Inder Mohan Goswami v. State of Uttaranchal (2007) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतें पहले समन को तरजीह दें, और ग़ैर-ज़मानती वारंट तभी जारी करें जब व्यक्ति के फ़रार होने या बचने की आशंका हो।
पुलिस नोटिस अलग चीज़ है
पुलिस धारा 35(3) BNSS (पहले धारा 41A CrPC) के तहत हाज़िरी का नोटिस भेज सकती है, जो सात साल तक की सज़ा वाले अपराध में, जहाँ गिरफ़्तारी ज़रूरी नहीं, आपको पूछताछ के लिए थाने बुलाता है। हाज़िर होकर सहयोग करें तो गिरफ़्तारी नहीं होनी चाहिए, जब तक अधिकारी नए कारण दर्ज न करे। यह पुलिस का काग़ज़ है, अदालत का नहीं। विस्तार के लिए धारा 35 के नोटिस पर हमारा लेख देखें।
नज़रअंदाज़ करने पर क्या होता है
- अदालती समन को नज़रअंदाज़ करने पर आमतौर पर वारंट जारी होता है। क़ानूनी रूप से बाध्य होते हुए जानबूझकर हाज़िर न होना धारा 208 BNS के तहत ख़ुद अपराध हो सकता है, और अदालत में ख़ुद हाज़िर होने के समन पर छह महीने तक की सज़ा है।
- वारंट से बचने के लिए कोई छिप रहा हो तो अदालत उद्घोषणा प्रकाशित कर सकती है, जिसमें कम से कम 30 दिन के भीतर हाज़िर होने को कहा जाता है (धारा 84 BNSS), और संपत्ति की कुर्की (attachment) का आदेश दे सकती है (धारा 85 BNSS)।
- उद्घोषणा के बाद हाज़िर न होना धारा 209 BNS के तहत अलग अपराध है, जिसमें तीन साल तक की सज़ा है, और उद्घोषित अपराधी (proclaimed offender) घोषित होने पर सात साल तक।
क़दम दर क़दम
- काग़ज़ ध्यान से पढ़ें। अदालत का नाम, केस नंबर और प्रकार (जैसे आपराधिक शिकायत मामले के लिए "CC"), तारीख़, और आपको गवाह बुलाया गया है या आरोपी, यह नोट करें।
- असली है या नहीं, जाँचें। केस नंबर ecourts.gov.in या eCourts मोबाइल ऐप पर खोजें, या अदालत के दफ़्तर में फ़ोन करें। संदिग्ध संदेश में दिए नंबर पर कभी कॉल न करें।
- पावती पर दस्तख़त करें। असली समन पर दस्तख़त से कुछ क़बूल नहीं होता। तामील की तारीख़ नोट करें।
- तारीख़ से पहले वकील से मिलें। पैसे न हों तो 15100 पर कॉल करें या ज़िला अदालत परिसर में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) जाएँ।
- तारीख़ पर हाज़िर हों। सचमुच न जा सकें तो वकील कारण और सबूत (मेडिकल सर्टिफ़िकेट, यात्रा टिकट) के साथ छूट की अर्ज़ी दे सकता है।
- वारंट पहले ही जारी हो गया हो, तो जल्दी करें। वकील वारंट वापस लेने (recall) या रद्द करने की अर्ज़ी दे सकता है, आमतौर पर हाज़िर होने के वचन के साथ, और आप अदालत में समर्पण (surrender) करके उसी दिन ज़मानत माँग सकते हैं।
इंदौर के दुकानदार प्रदीप को अपने शटर पर चिपका एक समन मिलता है, चेक बाउंस के ऐसे मामले में जिसके बारे में उसे पता ही नहीं था। तारीख़ निकल चुकी है। वह eCourts पर केस नंबर देखता है और पाता है कि हाज़िर न होने पर ज़मानती वारंट जारी हो गया है। उसका क़ानूनी सहायता वकील अगली सुबह वारंट वापस लेने की अर्ज़ी देता है, यह बताते हुए कि समन कभी हाथ में दिया ही नहीं गया, और प्रदीप ख़ुद हाज़िर होता है। मजिस्ट्रेट वारंट वापस लेता है, बॉन्ड लेता है, और अगली तारीख़ देता है। अगर प्रदीप काग़ज़ को नज़रअंदाज़ करता, तो अगला क़दम ग़ैर-ज़मानती वारंट और फिर उद्घोषणा होता।
ये तैयार रखें
- समन या नोटिस, जिस पर मिलने की तारीख़ लिखी हो
- eCourts से केस स्टेटस का स्क्रीनशॉट या प्रिंट
- फ़ोटो पहचान पत्र और पते का सबूत, अदालत और बॉन्ड के लिए
- मामले से जुड़े दस्तावेज़ (समझौते, चेक, रसीदें, चैट)
- ग़ैरहाज़िरी के कारण का सबूत (मेडिकल सर्टिफ़िकेट, परीक्षा टिकट, यात्रा बुकिंग)
अदालतें और पुलिस वीडियो कॉल पर किसी को गिरफ़्तार नहीं करतीं, और भारतीय क़ानून में "डिजिटल अरेस्ट" नाम की कोई चीज़ नहीं है। कोई असली अधिकारी या अदालत वारंट "क्लियर" करने या खाता "वेरिफ़ाई" करने के लिए पैसे ट्रांसफ़र करने को नहीं कहेगी। फ़ोन काटें और 1930 पर या cybercrime.gov.in पर शिकायत करें।
कहाँ जाएँ
- काग़ज़ पर लिखी अदालत (उसका दफ़्तर, या eCourts पर केस स्टेटस), जाँच और हाज़िरी के लिए
- ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण या NALSA हेल्पलाइन 15100, छूट, वारंट वापसी या ज़मानत के लिए मुफ़्त वकील
- धारा 35 नोटिस में लिखा थाना, लिखित में, दूसरी तारीख़ माँगने के लिए
- नकली वारंट और "डिजिटल अरेस्ट" कॉल के लिए साइबर धोखाधड़ी हेल्पलाइन 1930; आपात स्थिति में 112
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या समन पर पुलिस मुझे गिरफ़्तार कर सकती है?
नहीं। समन सिर्फ़ अदालत में हाज़िर होने या दस्तावेज़ पेश करने को कहता है। गिरफ़्तारी के लिए अदालत का वारंट चाहिए, या ऐसी स्थिति जहाँ क़ानून बिना वारंट गिरफ़्तारी की इजाज़त देता हो। लेकिन समन को नज़रअंदाज़ करें तो अदालत वारंट जारी कर सकती है, इसलिए हाज़िर हों या वकील से छूट माँगें।
ज़मानती और ग़ैर-ज़मानती वारंट में क्या फ़र्क़ है?
ज़मानती वारंट पर धारा 73 BNSS के तहत अदालत का पृष्ठांकन होता है कि तय तारीख़ पर हाज़िर होने का बॉन्ड देने पर पुलिस आपको छोड़ देगी। ग़ैर-ज़मानती वारंट में ऐसा नहीं होता, इसलिए पुलिस आपको अदालत में पेश करेगी और ज़मानत वहीं माँगनी होगी। दोनों को अर्ज़ी देकर अदालत वापस ले सकती है।
मैं अदालत की तारीख़ चूक गया। क्या मुझे गिरफ़्तार किया जाएगा?
अपने आप नहीं। अदालत पहले ज़मानती वारंट जारी कर सकती है। वकील से ग़ैरहाज़िरी का कारण और हाज़िर होने के वचन के साथ वारंट वापसी की अर्ज़ी दिलवाएँ, और अगली तारीख़ पर ख़ुद हाज़िर हों। बार-बार तारीख़ चूकने पर ग़ैर-ज़मानती वारंट और फिर उद्घोषणा होती है।
क्या समन ईमेल या WhatsApp पर भेजा जा सकता है?
BNSS अदालतों को अदालत की मुहर या डिजिटल हस्ताक्षर के साथ एन्क्रिप्टेड इलेक्ट्रॉनिक रूप में समन जारी करने की इजाज़त देती है (धारा 70 BNSS), इसलिए अदालत से आया ईमेल समन वैध हो सकता है। इसे eCourts पर जाँचें। पैसे माँगने या वीडियो कॉल वाला WhatsApp संदेश ठगी है, समन नहीं।
उद्घोषित अपराधी (proclaimed offender) क्या होता है?
अगर वारंट वाला व्यक्ति उससे बचने के लिए छिप जाए, तो अदालत धारा 84 BNSS के तहत उद्घोषणा प्रकाशित करती है, जिसमें हाज़िर होने के लिए कम से कम 30 दिन दिए जाते हैं। गंभीर मामले में फिर भी हाज़िर न हो तो अदालत उसे उद्घोषित अपराधी घोषित कर सकती है, धारा 85 BNSS के तहत संपत्ति कुर्क कर सकती है, और हाज़िर न होना धारा 209 BNS के तहत अलग अपराध बन जाता है।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।
