Englishफ़ॉलो करें:
Stacks of files in a government office in Indiaस्वाधीनता

फ़ोटो: Ganesh Dhamodkar, Wikimedia Commons, CC BY 2.0. सांकेतिक चित्र.

डिफ़ॉल्ट ज़मानत: पुलिस 60 या 90 दिन में चार्जशीट न दे तो

न्याय पाठशाला8 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

धारा 187 BNSS जाँच के दौरान हिरासत को कैसे सीमित करती है, 60/90 दिन कैसे गिनें, अधिकार कब बनता है, खोने से पहले कैसे माँगें, और अदालतों ने क्या कहा है।

क़ानून: अनुच्छेद 21, भारत का संविधान · धारा 187 BNSS (पहले धारा 167 CrPC) · M. Ravindran v. Intelligence Officer, DRI (2020)

संक्षेप में

  • पहली रिमांड से 60 दिन (ज़्यादातर अपराध) या 90 दिन (मौत, उम्रक़ैद या दस साल या उससे ज़्यादा की सज़ा वाले अपराध) में पुलिस चार्जशीट दाख़िल न करे, तो आपको ज़मानत का अधिकार है। यह धारा 187(3) BNSS के तहत "डिफ़ॉल्ट ज़मानत" (default bail) है।
  • अदालत इसे केस की मज़बूती देखकर मना नहीं कर सकती। पर आपको अर्ज़ी देनी होगी और ज़मानत भरने को तैयार रहना होगा। अर्ज़ी से पहले चार्जशीट आ गई तो अधिकार चला जाता है।
  • उस दिन से गिनें जब मजिस्ट्रेट ने पहली बार हिरासत में भेजा; वह दिन भी गिना जाता है। 61वें या 91वें दिन अर्ज़ी दें, मौखिक ही सही, और उसे दर्ज करवाएँ।
  • विशेष क़ानूनों (UAPA, NDPS) में अवधि लंबी हो सकती है। वकील से पूछें कि कौन-सी समय-सीमा लागू है। मुफ़्त क़ानूनी सहायता: 15100।

गिरफ़्तारी के बाद पुलिस जाँच करती है और फिर चार्जशीट दाख़िल करती है, यानी वह रिपोर्ट जिसमें सबूत और आरोपियों के नाम होते हैं। लेकिन पुलिस बहुत देर करे तो? क्या "जाँच" के नाम पर किसी को अनिश्चित काल तक जेल में रखा जा सकता है?

नहीं। क़ानून समय-सीमा तय करता है। पुलिस चूक जाए तो आरोपी को ज़मानत का अधिकार मिल जाता है। इसे डिफ़ॉल्ट ज़मानत या वैधानिक ज़मानत (statutory bail) कहते हैं, क्योंकि यह राज्य की चूक से पैदा होती है, केस की मज़बूती या कमज़ोरी से नहीं।

क़ानून क्या कहता है

यह नियम भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 187 BNSS में है, जिसने 1 जुलाई 2024 से पहले की CrPC की धारा 167 की जगह ली। मजिस्ट्रेट जाँच के दौरान हिरासत मंज़ूर कर सकता है, पर धारा 187(3) के तहत कुल मिलाकर सिर्फ़:

  • 90 दिन, जहाँ अपराध मौत, उम्रक़ैद, या दस साल या उससे ज़्यादा की क़ैद से दंडनीय हो;
  • 60 दिन, किसी भी दूसरे अपराध में।

यह अवधि ख़त्म हो जाए और चार्जशीट दाख़िल न हुई हो, तो आरोपी को, अगर वह ज़मानत देने को तैयार है और देता है, "ज़मानत पर रिहा किया जाएगा"। अदालत यह कहकर मना नहीं कर सकती कि आरोप गंभीर है या सबूत मज़बूत हैं। सुप्रीम कोर्ट इसे अनुच्छेद 21 की निजी स्वतंत्रता का हिस्सा मानता है; Bikramjit Singh v. State of Punjab (2020) में उसने इसे "अपराजेय अधिकार" (indefeasible right) कहा, जो एक बार बन जाए तो छीना नहीं जा सकता, बशर्ते आरोपी इसे समय पर माँगे।

विशेष क़ानून घड़ी को आगे खींचते हैं। ग़ैरक़ानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) में अदालत अवधि 180 दिन तक और NDPS Act में एक साल तक बढ़ा सकती है, अगर सरकारी वकील प्रगति और ख़ास कारण बताती रिपोर्ट दे। ऐसे क़ानून में आरोप हो तो वकील से पूछें कि आप पर कौन-सी समय-सीमा लागू है।

60 दिन या 90 दिन, कौन-सी सीमा?

90 दिन की सीमा सिर्फ़ वहाँ लागू है जहाँ अपराध मौत, उम्रक़ैद या "दस साल या उससे ज़्यादा" की सज़ा वाला हो। जिस अपराध की अधिकतम सज़ा दस साल है पर कम भी हो सकती है, उसके लिए पुरानी CrPC के तहत सुप्रीम कोर्ट ने Rakesh Kumar Paul v. State of Assam (2017) में 60 दिन की सीमा लागू की। BNSS के शब्द थोड़े बदले, और State of Karnataka v. Kalandar Shafi (2024) में कर्नाटक हाई कोर्ट ने "दस साल या उससे ज़्यादा" को उसी तरह, यानी न्यूनतम दस साल, पढ़ा, जिससे दस साल तक की सज़ा वाले अपराध 60 दिन की श्रेणी में आते हैं। दूसरे हाई कोर्ट अलग पढ़ सकते हैं, इसलिए देखें कि आपके हाई कोर्ट ने क्या कहा है।

दिन कैसे गिने जाते हैं

घड़ी उस तारीख़ से चलती है जब मजिस्ट्रेट ने पहली बार आरोपी को हिरासत में भेजा (पहला रिमांड आदेश), गिरफ़्तारी की तारीख़ से नहीं। Enforcement Directorate v. Kapil Wadhawan (2023) में तीन जजों की पीठ ने कहा कि रिमांड का दिन भी गिना जाता है। यानी 60वें या 90वें दिन के अंत तक चार्जशीट न आए, तो अधिकार 61वें या 91वें दिन बन जाता है। पुलिस हिरासत और न्यायिक हिरासत दोनों के दिन गिने जाते हैं। अंतरिम ज़मानत या किसी और वजह से हिरासत के बाहर बिताए दिन आम तौर पर नहीं गिने जाते।

अधिकार कब खोता है, और कब नहीं

अधिकार चार्जशीट दाख़िल होने से पहले माँगना ज़रूरी है। समय-सीमा निकल जाए, कोई अर्ज़ी न दे, और फिर पुलिस चार्जशीट दे दे, तो अधिकार आम तौर पर चला जाता है और आप फिर गुण-दोष पर सामान्य ज़मानत पर आ जाते हैं। पर M. Ravindran v. Intelligence Officer, DRI (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि समय-सीमा के बाद आपने अर्ज़ी दे दी, तो अदालत के फ़ैसले से पहले जल्दबाज़ी में चार्जशीट दाख़िल करके पुलिस आपका अधिकार नहीं छीन सकती। सही दिन अदालत में किया गया और दर्ज हुआ मौखिक अनुरोध भी माना गया है।

अगर पुलिस घड़ी रोकने के लिए अधूरी रिपोर्ट दाख़िल कर दे तो? सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि जाँच पूरी किए बिना दाख़िल रिपोर्ट अधिकार को नहीं हराती, पर "अधूरी" किसे माना जाए, इस पर क़ानून आगे-पीछे हुआ है और अभी तय हो रहा है। इसे वकील के ज़रिए उठाएँ।

क़दम दर क़दम

  1. पहली रिमांड की तारीख़ लिख लें। रिमांड आदेश या अदालत के रिकॉर्ड से लें। उस दिन को मिलाकर 60 या 90 दिन गिनें।
  2. अपराध और उनकी अधिकतम सज़ा नोट करें। इसी से तय होता है कि कौन-सी सीमा लागू है और विशेष क़ानून तो नहीं।
  3. आख़िरी दिन अदालत का रिकॉर्ड देखें। आपका वकील, या जेल का लीगल एड क्लिनिक, देखे कि चार्जशीट आई या नहीं।
  4. अगले ही दिन अर्ज़ी दें। धारा 187(3) BNSS के तहत छोटी-सी लिखित अर्ज़ी दें जिसमें रिमांड की तारीख़, बीते दिन, यह कि चार्जशीट नहीं आई, और यह कि आप ज़मानत देने को तैयार हैं, लिखा हो। वकील न हो तो पेशी पर मजिस्ट्रेट से ख़ुद कहें और दर्ज करवाने की माँग करें।
  5. उसी दिन ज़मानत के लिए तैयार रहें। ज़मानती और दस्तावेज़ पहले से जुटा लें। न हो सके तो अदालत को बताएँ और निजी मुचलके या कम रक़म की माँग करें।
  6. मुफ़्त मदद लें। हिरासत में हर व्यक्ति लीगल एड वकील का हक़दार है। मजिस्ट्रेट से माँगें, 15100 पर कॉल करें, या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण से संपर्क करें। जेलों में इसी काम के लिए लीगल एड क्लिनिक होते हैं।
उदाहरण

सुरेश चोरी के एक मामले में गिरफ़्तार हुआ और मजिस्ट्रेट ने उसे पहली बार 2 मार्च को हिरासत में भेजा। अधिकतम सज़ा दस साल से कम है, इसलिए 60 दिन की सीमा लागू है जो 30 अप्रैल को ख़त्म होती है। उसका भाई कैलेंडर रखता है और अप्रैल के आख़िरी हफ़्ते में जेल के लीगल एड क्लिनिक जाता है। 1 मई को लीगल एड वकील रिकॉर्ड देखती है: चार्जशीट नहीं आई। वह उसी सुबह डिफ़ॉल्ट ज़मानत की एक पन्ने की अर्ज़ी दाख़िल करती है और अदालत को बताती है कि सुरेश के चाचा ज़मानती के रूप में मौजूद हैं। पुलिस उसी दोपहर चार्जशीट दाख़िल करती है, पर M. Ravindran के अनुसार इससे फ़र्क़ नहीं पड़ता, क्योंकि अर्ज़ी पहले से रिकॉर्ड पर थी। सुरेश अगले दिन ज़मानत पर रिहा हो जाता है।

ये तैयार रखें

  • पहले रिमांड आदेश की प्रति, या कम से कम उसकी तारीख़, और FIR नंबर।
  • लगाए गए अपराधों की सूची और उनकी अधिकतम सज़ा।
  • 60 या 90 दिनों की कैलेंडर पर गिनती।
  • समय-सीमा से पहले ही ज़मानती की पहचान, पते और आय या संपत्ति का सबूत।
  • अधिकार बनने के दिन दाख़िल करने को तैयार लिखित अर्ज़ी (एक पन्ने की भी चलेगी)।
सावधान

परिवार अक्सर "वकील के आने" का इंतज़ार करते हैं और एक दिन की देरी से अधिकार खो देते हैं। समय-सीमा इंतज़ार नहीं करती, और चार्जशीट आते ही डिफ़ॉल्ट ज़मानत ख़त्म। साथ ही, रिमांड की तारीख़ के बजाय गिरफ़्तारी की तारीख़ से, या ग़लत अपराध से गिनना सबसे आम ग़लती है।

सुझावडिफ़ॉल्ट ज़मानत नामंज़ूर हो या छूट जाए, तब भी आप गुण-दोष पर नियमित ज़मानत माँग सकते हैं, और मुक़दमे में लंबी देरी ख़ुद एक आधार है। दोनों साथ-साथ आज़माने से कोई नहीं रोकता।

कहाँ जाएँ

  • जिस मजिस्ट्रेट की अदालत ने रिमांड दिया (या विशेष क़ानून में विशेष अदालत)। ग़लत तरीक़े से मना हो तो सेशन कोर्ट और फिर हाई कोर्ट।
  • मुफ़्त वकील और ज़मानती में मदद के लिए जेल का लीगल एड क्लिनिक, ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण, या NALSA हेल्पलाइन 15100।
  • व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के सामने पेश ही न किया गया हो तो वकील हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका दे सकता है; आपात स्थिति में 112।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

डिफ़ॉल्ट ज़मानत सरल शब्दों में क्या है?

पहली रिमांड से 60 या 90 दिन में पुलिस चार्जशीट दाख़िल न करे, तो अर्ज़ी देने और ज़मानत भरने पर अदालत को आपको रिहा करना ही होगा। इसे डिफ़ॉल्ट ज़मानत इसलिए कहते हैं कि यह पुलिस की चूक से मिलती है, अदालत के आपको निर्दोष मानने से नहीं।

क्या डिफ़ॉल्ट ज़मानत का मतलब केस बंद?

नहीं। जाँच और मुक़दमा चलते रहते हैं। हर पेशी पर जाना और ज़मानत की शर्तें माननी होंगी, और चार्जशीट बाद में भी दाख़िल हो सकती है।

चार्जशीट आने पर क्या डिफ़ॉल्ट ज़मानत रद्द हो सकती है?

सिर्फ़ चार्जशीट दाख़िल होने से नहीं। यह सामान्य क़ानून के तहत उचित कारणों से ही रद्द हो सकती है, जैसे गवाहों को धमकाना, नया अपराध करना या पेशियों पर न जाना।

60/90 दिन गिरफ़्तारी से गिनें या रिमांड से?

उस तारीख़ से जब मजिस्ट्रेट ने पहली बार आपको हिरासत में भेजा, और वह दिन भी गिना जाता है (Kapil Wadhawan, 2023)। गिरफ़्तारी और पहली पेशी के बीच के घंटे गिनती में नहीं आते।

उस दिन ज़मानती न जुटा पाऊँ तो?

अर्ज़ी लंबित रहने तक अधिकार ज़िंदा रहता है, पर रिहाई के लिए ज़मानत वास्तव में भरनी होगी। अदालत को बताएँ कि आप ग़रीब हैं; वह निजी मुचलका मान सकती है या रक़म घटा सकती है। ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण रास्ता निकालने में मदद कर सकता है।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

क्या यह लेख उपयोगी था?कोई ग़लती दिखी? हमें बताएँ

हर हफ़्ते एक सरल क़ानूनी लेख पाएँ

आपके अधिकारों पर नए लेख, सीधे आपके ईमेल पर। कोई स्पैम नहीं।