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फ़ोटो: Monito, Wikimedia Commons, CC BY 2.0. सांकेतिक चित्र.

राज्य आपके अधिकार तोड़े, तो मुआवज़ा

न्याय पाठशाला8 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

हिरासत में मौत, यातना, ग़ैरक़ानूनी हिरासत या झूठे मुक़दमे पर राज्य से मुआवज़ा कैसे माँगें: रिट याचिका, NHRC, BNSS के उपाय और ऐतिहासिक मामले।

क़ानून: अनुच्छेद 21, 32 और 226, भारत का संविधान · धारा 196, 396 और 399 BNSS · मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 · Rudul Sah v. State of Bihar (1983) · Nilabati Behera v. State of Orissa (1993)

संक्षेप में

  • पुलिस या अधिकारी आपके मौलिक अधिकार तोड़ें, तो हाई कोर्ट (अनुच्छेद 226) या सुप्रीम कोर्ट (अनुच्छेद 32) राज्य को आपको मुआवज़ा (compensation) देने का आदेश दे सकता है। राज्य "संप्रभु उन्मुक्ति" (sovereign immunity) की आड़ नहीं ले सकता (Nilabati Behera, 1993)।
  • यह उपाय साफ़ और गंभीर उल्लंघनों में सबसे अच्छा काम करता है: हिरासत में मौत या यातना, ग़ैरक़ानूनी हिरासत, फ़र्ज़ी मुठभेड़, बदनीयत मुक़दमा।
  • मानवाधिकार आयोग बिना फ़ीस जाँच कर सकते हैं और मुआवज़े की सिफ़ारिश कर सकते हैं, अगर आप एक साल के भीतर शिकायत करें।
  • हिरासत में मौत या बलात्कार में न्यायिक मजिस्ट्रेट की जाँच अनिवार्य है धारा 196 BNSS; लिखित में माँग करें।
  • सबूत जल्दी जुटाएँ: मेडिकल और पोस्टमार्टम रिपोर्ट, गिरफ़्तारी मेमो, जेल रिकॉर्ड, गवाह। मुफ़्त वकील: 15100।

कभी-कभी जिन पर आपकी हिफ़ाज़त की ज़िम्मेदारी है, वही नुक़सान पहुँचाते हैं। कोई आदमी रिहा होने के बरसों बाद तक जेल में पड़ा रहता है। कोई नौजवान पुलिस लॉक-अप में मर जाता है। किसी बेगुनाह को झूठा फँसाकर उसकी ज़िंदगी के साल छीन लिए जाते हैं। अफ़सर को सज़ा दिलाना एक बात है; पीड़ित और परिवार के नुक़सान की भरपाई दूसरी। भारतीय अदालतों ने दूसरी के लिए उपाय बनाया है: राज्य आपके मौलिक अधिकार तोड़े, तो उसे भुगतान का आदेश दिया जा सकता है।

यह उपाय कैसे बना

संविधान में अधिकारों के उल्लंघन पर पैसे के मुआवज़े का साफ़ ज़िक्र नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे एक-एक मामले से विकसित किया।

  • Rudul Sah v. State of Bihar (1983)। रुदुल साह बरी होने के बाद चौदह साल जेल में रहे। कोर्ट ने राज्य को भुगतान का आदेश दिया और कहा कि अनुच्छेद 21 का जीवन और स्वतंत्रता का अधिकार खोखला होगा अगर अदालत सिर्फ़ रिहाई का आदेश दे सके और नुक़सान की भरपाई न करा सके।
  • Bhim Singh v. State of J&K (1985)। विधानसभा में जाने से रोकने के लिए ग़ैरक़ानूनी हिरासत में रखे गए एक विधायक को उनकी स्वतंत्रता के "शरारतपूर्ण" उल्लंघन पर मुआवज़ा मिला।
  • Nilabati Behera v. State of Orissa (1993)। 22 साल के युवक की पुलिस हिरासत में मौत हुई। कोर्ट ने कहा कि मौलिक अधिकारों के उल्लंघन का मुआवज़ा सार्वजनिक क़ानून (public law) का उपाय है जो राज्य की सख़्त ज़िम्मेदारी पर टिका है, और आम दीवानी मुक़दमे में उपलब्ध संप्रभु उन्मुक्ति की दलील की यहाँ कोई जगह नहीं।
  • D.K. Basu v. State of West Bengal (1997)। गिरफ़्तारी और हिरासत के सुरक्षा नियम तय किए, और पुष्टि की कि हिरासत में हिंसा और मौत का उचित उपाय पैसे का मुआवज़ा है।
  • S. Nambi Narayanan v. Siby Mathews (2018)। जासूसी के झूठे मामले में फँसाए गए इसरो वैज्ञानिक को सुप्रीम कोर्ट ने अपमान और पीड़ा के लिए मुआवज़ा दिलाया।

आप कब दावा कर सकते हैं

यह उपाय राज्य या उसके अधिकारियों द्वारा मौलिक अधिकारों, मुख्यतः अनुच्छेद 21 (जीवन और स्वतंत्रता) और अनुच्छेद 22 (गिरफ़्तारी के सुरक्षा उपाय), के उल्लंघन के लिए है। आम स्थितियाँ:

  • ग़ैरक़ानूनी हिरासत, या क़ानूनी अवधि से ज़्यादा हिरासत (जैसे 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश न करना, या ज़मानत या बरी होने के बाद भी जेल में रखना);
  • पुलिस या न्यायिक हिरासत में यातना, चोट या मौत;
  • फ़र्ज़ी मुठभेड़ या अनुपात से ज़्यादा बल प्रयोग;
  • सरकारी अस्पताल, जेल, आश्रय गृह या स्कूल की घोर लापरवाही से मौत या गंभीर चोट;
  • अधिकारियों द्वारा बदनीयत या गढ़ा हुआ मुक़दमा।

रिट अदालतें मुआवज़ा वहाँ देती हैं जहाँ तथ्य साफ़ या ज़्यादातर निर्विवाद हों, अक्सर जाँच रिपोर्ट, पोस्टमार्टम या सरकारी रिकॉर्ड से। तथ्यों पर भारी विवाद हो तो अदालत आपसे दीवानी मुक़दमे में उन्हें साबित करने को कह सकती है। रक़म आम तौर पर एकमुश्त होती है; राज्य उसे दोषी अधिकारियों से वसूल सकता है, और इससे उनके ख़िलाफ़ आपराधिक मामला नहीं रुकता।

सुझावमुआवज़ा उसी रिट याचिका में माँगें जिसमें रिहाई, जाँच या CBI जाँच माँगी गई हो। हिरासत में मौत के मामलों में अदालतों ने हफ़्तों में परिवार को अंतरिम मुआवज़ा दिलाया है, और अंतिम रक़म बाद में तय की है।

क़दम दर क़दम: उपलब्ध रास्ते

  1. रिट याचिका। हाई कोर्ट में अनुच्छेद 226 (या सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32) के तहत दायर करें, यह घोषणा माँगते हुए कि अधिकार का उल्लंघन हुआ, स्वतंत्र जाँच हो, अधिकारियों पर कार्रवाई हो और मुआवज़ा मिले। क़ानूनी सहायता वकील इसे बना सकता है; हाई कोर्ट अख़बार की ख़बरों पर हिरासत में मौत के मामले ख़ुद भी उठाते हैं।
  2. मानवाधिकार आयोग। मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग या अपने राज्य आयोग में शिकायत करें। कोई फ़ीस नहीं; शिकायत डाक, ईमेल या NHRC के ऑनलाइन पोर्टल से जाती है। आयोग रिकॉर्ड तलब कर सकता है, जाँच करा सकता है और तुरंत अंतरिम राहत और मुआवज़े की सिफ़ारिश कर सकता है धारा 18। घटना के एक साल के भीतर शिकायत करें धारा 36(2)। सिफ़ारिशें बाध्यकारी नहीं हैं, पर सरकारें आम तौर पर मानती हैं और अदालतें उन्हें लागू कराती हैं।
  3. मजिस्ट्रेट की जाँच। पुलिस या न्यायिक हिरासत में हर मौत, गुमशुदगी या बलात्कार में पुलिस जाँच के अलावा न्यायिक मजिस्ट्रेट को जाँच करनी होती है, और शव की 24 घंटे में डॉक्टर से जाँच करानी होती है धारा 196 BNSS (पहले धारा 176(1A) CrPC)। यह रिपोर्ट आपके मुआवज़े के दावे का मज़बूत सबूत है।
  4. बेबुनियाद गिरफ़्तारी। किसी ने बिना पर्याप्त आधार पुलिस से आपको गिरफ़्तार करवाया हो, तो मजिस्ट्रेट उस व्यक्ति को आपको मुआवज़ा देने का आदेश दे सकता है, पर सिर्फ़ 1,000 रुपये तक धारा 399 BNSS (पहले धारा 358 CrPC)। यह प्रतीकात्मक उपाय है।
  5. पीड़ित मुआवज़ा योजना। अपराध के पीड़ित, जिनमें सरकारी कर्मचारियों के अपराध भी शामिल हैं, राज्य की योजना के तहत ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण में आवेदन कर सकते हैं धारा 396 BNSS (पहले धारा 357A CrPC); अदालत जुर्माने में से मुआवज़े का आदेश भी दे सकती है धारा 395 BNSS।
  6. दीवानी मुक़दमा। राज्य और अधिकारियों के ख़िलाफ़ हर्जाने का मुक़दमा बड़ी रक़म दिला सकता है पर बरसों लेता है, और राज्य तकनीकी बचाव उठा सकता है। ज़्यादातर परिवार इसे तभी अपनाते हैं जब रिट अदालत ज़िम्मेदारी तय कर चुकी हो।
उदाहरण

उत्तर प्रदेश के एक क़स्बे में 28 साल के सुरेश को चोरी के मामले में उठाया जाता है और दो दिन बाद लॉक-अप में उसकी मौत हो जाती है; पुलिस कहती है वह "बीमार पड़ गया"। उसकी बहन मीना तब तक अंतिम संस्कार से मना करती है जब तक पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफ़ी न हो, और उसी दिन ज़िला मजिस्ट्रेट को लिखकर धारा 196 BNSS में न्यायिक मजिस्ट्रेट की जाँच माँगती है। क़ानूनी सहायता वकील के साथ वह इलाहाबाद हाई कोर्ट में CBI जाँच और मुआवज़े की रिट याचिका और NHRC में शिकायत दायर करती है। पोस्टमार्टम में चोटें मिलती हैं। हाई कोर्ट एक महीने में परिवार को अंतरिम मुआवज़े का आदेश देता है और अधिकारियों पर FIR दर्ज करने का निर्देश देता है।

ये तैयार रखें

  • गिरफ़्तारी मेमो, रिमांड आदेश, ज़मानत या बरी होने का आदेश, जेल से रिहाई के रिकॉर्ड
  • मेडिकल रिपोर्ट, चोटों की तस्वीरें, पोस्टमार्टम रिपोर्ट और वीडियो
  • अधिकारियों के नाम और बैज नंबर; साथ बंद लोगों और गवाहों के नाम
  • भेजी गई हर शिकायत (SP, DM, NHRC) की कॉपी और पावतियाँ
  • रक़म तय करने के लिए आय और आश्रितों का सबूत
सावधान

थाने में कोई "समझौता" स्वीकार न करें, न ऐसे बयान पर दस्तख़त करें कि मौत या चोट प्राकृतिक थी या ख़ुद लगाई थी। डॉक्टरों के पैनल से वीडियोग्राफ़ी वाले पोस्टमार्टम से पहले अंतिम संस्कार न होने दें। शव या रिकॉर्ड चले गए, तो दावा कहीं मुश्किल हो जाता है।

कहाँ जाएँ

  • न्यायिक मजिस्ट्रेट / ज़िला मजिस्ट्रेट: हिरासत में मौत या बलात्कार में धारा 196 BNSS की जाँच की लिखित माँग।
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (ऑनलाइन पोर्टल या डाक) या आपका राज्य मानवाधिकार आयोग, एक साल के भीतर।
  • हाई कोर्ट अनुच्छेद 226 में मुआवज़े और स्वतंत्र जाँच के लिए; सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 32 में।
  • ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण: मुफ़्त वकील (15100) और धारा 396 BNSS में पीड़ित मुआवज़ा।
  • आपातकाल 112; महिलाएँ 181; बच्चे 1098।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या भारत में ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तारी या हिरासत पर मुआवज़ा मिल सकता है?

हाँ। पुलिस ने बिना क़ानूनी अधिकार आपको हिरासत में रखा, या क़ानूनी अवधि से ज़्यादा रखा, तो आप Rudul Sah (1983) और Bhim Singh (1985) के आधार पर अनुच्छेद 21 और 22 के उल्लंघन पर मुआवज़े के लिए हाई कोर्ट में अनुच्छेद 226 या सुप्रीम कोर्ट में अनुच्छेद 32 के तहत रिट याचिका दायर कर सकते हैं। एक साल के भीतर मानवाधिकार आयोग में शिकायत भी कर सकते हैं।

हिरासत में मौत पर कितना मुआवज़ा मिलता है?

कोई तय पैमाना नहीं है। अदालतें और NHRC पीड़ित की उम्र, आय और आश्रितों और उल्लंघन की गंभीरता देखकर मामले-दर-मामले तय करते हैं; हाल के वर्षों में रक़म आम तौर पर कई लाख रुपये रही है, और अंतरिम राहत अक्सर जल्दी दी जाती है। राज्य यह रक़म दोषी अधिकारियों से वसूल सकता है, और उनके ख़िलाफ़ अलग आपराधिक मामला चल सकता है।

क्या सरकार मुआवज़े से बचने के लिए संप्रभु उन्मुक्ति का दावा कर सकती है?

मौलिक अधिकारों के उल्लंघन में नहीं। Nilabati Behera (1993) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 32 और 226 के तहत मुआवज़ा राज्य की सख़्त ज़िम्मेदारी पर आधारित सार्वजनिक क़ानून का उपाय है, और संप्रभु उन्मुक्ति, जो आम दीवानी हर्जाने के मुक़दमे में उठाई जा सकती है, इसके ख़िलाफ़ कोई बचाव नहीं है।

पुलिस हिरासत में मौत पर क्या मजिस्ट्रेट की जाँच अनिवार्य है?

हाँ। धारा 196 BNSS के तहत पुलिस या न्यायिक हिरासत में मौत, गुमशुदगी या बलात्कार के हर मामले में पुलिस जाँच के अलावा न्यायिक मजिस्ट्रेट को जाँच करनी होती है, और शव को 24 घंटे में डॉक्टर की जाँच के लिए भेजना होता है। परिवार को उसी दिन लिखित में इसकी माँग करनी चाहिए और जाँच रिपोर्ट माँगनी चाहिए।

NHRC शिकायत का क्या करता है, और क्या इसमें ख़र्च है?

कोई ख़र्च नहीं। राष्ट्रीय और राज्य मानवाधिकार आयोग डाक, ईमेल या ऑनलाइन शिकायत लेते हैं, पुलिस और सरकार से रिपोर्ट माँगते हैं, अपनी जाँच करा सकते हैं, और अंतरिम राहत, मुआवज़े और अधिकारियों पर मुक़दमे की सिफ़ारिश कर सकते हैं। घटना के एक साल के भीतर शिकायत करें; उसके बाद आयोग आम तौर पर मामला नहीं ले सकता।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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