विचाराधीन क़ैदी: जेल में अधिकार और धारा 479 BNSS में रिहाई
विचाराधीन क़ैदी कौन है, जेल में कौन-से अधिकार बने रहते हैं, धारा 479 BNSS के आधे और एक-तिहाई नियम कैसे काम करते हैं, और परिवार रिहाई कैसे करवाए।
संक्षेप में
- विचाराधीन क़ैदी (undertrial) वह है जो जेल में है और जिसका केस अभी जाँच या मुक़दमे में है। वह निर्दोष माना जाता है और वकील, इलाज, परिवार से संपर्क और सम्मान के अधिकार उसके पास बने रहते हैं।
- धारा 479 BNSS: अधिकतम सज़ा का आधा हिरासत में बीत जाए तो अदालत को ज़मानत पर रिहा करना ही होगा; पहली बार का अपराधी एक-तिहाई के बाद मुचलके पर रिहा होगा। मौत या उम्रक़ैद की सज़ा वाले अपराधों में नहीं, और एक से ज़्यादा केस हों तो भी नहीं।
- निशान पर पहुँचते ही जेल अधीक्षक को आपके लिए अदालत में अर्ज़ी देनी होगी। अपने वकील का इंतज़ार ज़रूरी नहीं।
- हर क़ैदी, चाहे आय कितनी भी हो, मुफ़्त लीगल एड वकील का हक़दार है। 15100 पर कॉल करें या जेल के लीगल एड क्लिनिक से कहें।
भारतीय जेलों में ज़्यादातर लोग किसी अपराध में दोषी साबित नहीं हुए हैं। वे विचाराधीन क़ैदी हैं: अपराध के आरोपी, जो जाँच या मुक़दमे के दौरान हिरासत में हैं। बहुत से ग़रीब हैं, बहुतों के पास शुरू में वकील नहीं था, और कुछ ने मुक़दमा शुरू होने के लिए सालों इंतज़ार किया है। विचाराधीन क़ैदी निर्दोष माना जाता है। इसलिए क़ानून उसे जेल के भीतर अधिकार देता है, और हिरासत बहुत लंबी खिंचे तो बाहर निकलने का रास्ता भी।
जेल में भी जो अधिकार बने रहते हैं
हिरासत में होने से मौलिक अधिकार ख़त्म नहीं होते। अदालतों ने कहा है कि विचाराधीन क़ैदियों का अनुच्छेद 21 का जीवन और सम्मान का अधिकार बना रहता है। व्यवहार में इसका मतलब:
- मुफ़्त वकील। अनुच्छेद 39A राज्य को मुफ़्त क़ानूनी सहायता देने का निर्देश देता है, और विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत हिरासत में हर व्यक्ति, आय चाहे जो हो, इसका पात्र है। Hussainara Khatoon v. State of Bihar (1979) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ग़रीब आरोपी को सरकारी ख़र्च पर वकील मिलना चाहिए। हर जेल में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) का लीगल एड क्लिनिक है, जहाँ पैरा-लीगल वॉलंटियर अर्ज़ियाँ बना सकते हैं।
- अदालत में पेशी। हर रिमांड तारीख़ पर, ख़ुद या वीडियो लिंक से, आपकी पेशी होनी चाहिए और अदालत को हर बार हिरासत बढ़ानी होगी। चालू आदेश के बिना हिरासत ग़ैरक़ानूनी है।
- किसी भी चरण पर ज़मानत। आप नियमित ज़मानत, चार्जशीट देर हो तो डिफ़ॉल्ट ज़मानत, और धारा 479 BNSS में रिहाई माँग सकते हैं।
- मानवीय व्यवहार। अपने राज्य के जेल मैनुअल के तहत भोजन, इलाज, परिवार और वकील से चिट्ठी और मुलाक़ात, और हिंसा से सुरक्षा। विचाराधीन क़ैदी आम तौर पर दोषसिद्ध क़ैदियों से अलग रखे जाते हैं।
- शिकायत। आप अधीक्षक, दौरा करने वाले मजिस्ट्रेट या जज, DLSA और राज्य मानवाधिकार आयोग को लिख सकते हैं। जेल स्टाफ़ को ऐसी चिट्ठियाँ आगे भेजनी होती हैं।
लंबी हिरासत के बाद रिहाई: धारा 479 BNSS
धारा 479 BNSS ने 1 जुलाई 2024 को पहले की CrPC की धारा 436A की जगह ली और यह पुराने नियम से ज़्यादा मज़बूत है। यह कहती है:
- अधिकतम का आधा। जाँच, पूछताछ या मुक़दमे के दौरान आपने उस अपराध की अधिकतम सज़ा का आधा हिरासत में बिता लिया हो, तो अदालत आपको ज़मानत पर रिहा करेगी।
- पहली बार के अपराधी के लिए एक-तिहाई। आप पहले कभी किसी अपराध में दोषी न ठहराए गए हों, तो अधिकतम सज़ा का एक-तिहाई हिरासत में बीतते ही आपको मुचलके पर रिहा किया जाएगा।
- अधिकतम से आगे कभी नहीं। किसी भी हालत में विचाराधीन क़ैदी को अपराध की अधिकतम सज़ा से ज़्यादा हिरासत में नहीं रखा जा सकता।
- जेल को क़दम उठाना होगा। धारा 479(3) के तहत क़ैदी के आधा या एक-तिहाई समय पूरा करते ही जेल अधीक्षक को अदालत में लिखित अर्ज़ी देनी होगी।
सीमाएँ हैं। यह धारा उन अपराधों पर लागू नहीं जिनमें मौत या उम्रक़ैद एक निर्धारित सज़ा है। धारा 479(2) के तहत यह वहाँ लागू नहीं जहाँ आपके ख़िलाफ़ एक से ज़्यादा अपराध या कई मामलों में जाँच, पूछताछ या मुक़दमा लंबित हो। अदालत सरकारी वकील को सुनकर और लिखित कारणों से आधे निशान के बाद भी हिरासत जारी रख सकती है या मुचलके के बजाय ज़मानत-बंधपत्र माँग सकती है। आपकी वजह से हुई देरी गिनती में नहीं आती।
अगस्त 2024 में In Re: Inhuman Conditions in 1382 Prisons में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पहली बार के अपराधी वाला लाभ उन विचाराधीन क़ैदियों पर भी लागू है जिनके केस 1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज हुए, और देश भर के जेल अधीक्षकों को पात्र क़ैदियों की पहचान कर अदालत जाने का निर्देश दिया।
निगरानी किसकी ज़िम्मेदारी है
हर ज़िले में विचाराधीन समीक्षा समिति (Undertrial Review Committee) है, जिसकी अध्यक्षता ज़िला जज करते हैं और जिसमें ज़िलाधिकारी, पुलिस अधीक्षक, जेल अधीक्षक और DLSA सचिव होते हैं। यह समय-समय पर बैठकर धारा 479 में रिहाई के पात्र क़ैदियों, ज़मानत मिलने पर भी ज़मानती न जुटा पाने वालों, और ऐसे दूसरे लोगों की पहचान करती है जिन्हें जेल में नहीं होना चाहिए। Bhim Singh v. Union of India (2014) में सुप्रीम कोर्ट ने जजों को जेलों में बैठकर ऐसे क़ैदियों की पहचान करने का निर्देश दिया था, और ये समितियाँ उसी से निकलीं। परिवार DLSA सचिव को लिखकर क़ैदी का मामला समिति के सामने रखने की माँग कर सकते हैं।
क़दम दर क़दम: परिवार क्या करे
- बुनियादी जानकारी जुटाएँ: FIR नंबर, थाना, लगाई गई धाराएँ, गिरफ़्तारी और पहले रिमांड की तारीख़, जिस अदालत में केस लंबित है, और जेल व वार्ड।
- निशान निकालें। सबसे गंभीर अपराध की अधिकतम सज़ा पता करें। उसका आधा धारा 479 का रिहाई-बिंदु है; पहले कोई दोषसिद्धि न हो तो एक-तिहाई। पहली हिरासत की तारीख़ से गिनें।
- उसी हफ़्ते वकील करें। 15100 पर कॉल करें, ज़िला अदालत में DLSA दफ़्तर जाएँ, या जेल के लीगल एड क्लिनिक से वकील देने को कहें।
- निशान पार हो गया हो, तो जेल अधीक्षक से लिखित में पूछें कि क्या उसने धारा 479(3) में अर्ज़ी दी, और वकील से उसी दिन निचली अदालत में क़ैदी की अपनी अर्ज़ी दाख़िल करवाएँ।
- ज़मानत मिल गई पर क़ैदी भर नहीं सकता, तो अदालत को बताएँ। वह रक़म घटा सकती है या निजी मुचलका मान सकती है। In Re: Policy Strategy for Grant of Bail (2023) में सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के तहत ज़मानत आदेश के सात दिन में रिहाई न हो तो जेल को DLSA को सूचित करना होगा। ग़रीब क़ैदियों को ज़मानत राशि में मदद देने वाली सरकारी योजनाओं के बारे में DLSA से पूछें।
- मुक़दमे पर दबाव बनाए रखें। वकील से स्थगन पर आपत्ति करने को कहें और केस सालों से अटका हो तो देरी के आधार पर ज़मानत या हाई कोर्ट से निर्देश माँगें।
30 साल का राजमिस्त्री राजेश, जिस पर पहले कोई केस नहीं था, सेंधमारी के एक मामले में गिरफ़्तार हुआ जिसमें अधिकतम सज़ा सात साल है। गवाहों के बार-बार न आने से 30 महीने बाद भी मुक़दमा शुरू नहीं हुआ। उसकी माँ FIR की प्रति लेकर जेल के लीगल एड क्लिनिक जाती है। पैरा-लीगल वॉलंटियर हिसाब लगाता है: सात साल का एक-तिहाई 28 महीने है, और राजेश उसे दो महीने पहले पार कर चुका है। वह धारा 479 BNSS में एक पन्ने की अर्ज़ी बनाती है, और लीगल एड वकील अगली सुबह उसे दाख़िल करता है, यह बताते हुए कि अधीक्षक को पहले ही अर्ज़ी देनी चाहिए थी। मजिस्ट्रेट सरकारी वकील को सुनता है, कोई पुरानी दोषसिद्धि और कोई दूसरा लंबित केस न पाकर, राजेश को निजी मुचलके पर रिहा करने का आदेश देता है।
ये तैयार रखें
- FIR की प्रति, धाराओं की सूची, और हर एक की अधिकतम सज़ा।
- गिरफ़्तारी और पहले रिमांड आदेश की तारीख़; रिमांड और ज़मानत आदेशों की प्रतियाँ।
- हो सके तो सबूत कि क़ैदी की कोई पुरानी दोषसिद्धि नहीं (अदालत अपने रिकॉर्ड भी देखेगी)।
- क़ैदी और संभावित ज़मानती की पहचान और पते का सबूत।
- क़ैदी के मेडिकल काग़ज़, और जेल या अदालत को भेजी गई शिकायत की चिट्ठियाँ।
परिवार अक्सर मान लेते हैं कि जेल अपने-आप क़दम उठाएगी। अधीक्षक की ज़िम्मेदारी असली है, पर व्यवहार में अर्ज़ियाँ छूट जाती हैं। दिन ख़ुद गिनें और निशान पार होते ही क़ैदी की अपनी अर्ज़ी दाख़िल करें। रोक भी याद रखें: क़ैदी पर दूसरा केस लंबित हो तो धारा 479 लागू नहीं होगी, और रास्ता देरी के आधार पर नियमित ज़मानत है।
कहाँ जाएँ
- जेल का लीगल एड क्लिनिक और जेल अधीक्षक (धारा 479(3) की अर्ज़ी के लिए)।
- वकील, ज़मानती में मदद और विचाराधीन समीक्षा समिति के लिए ज़िला अदालत में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण, या NALSA हेल्पलाइन 15100।
- ज़मानत और धारा 479 में रिहाई के लिए निचली अदालत; देरी-आधारित राहत या बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) के लिए हाई कोर्ट।
- हिरासत में दुर्व्यवहार के लिए राज्य मानवाधिकार आयोग या NHRC; आपातकाल 112।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
विचाराधीन क़ैदियों के लिए आधी सज़ा का नियम क्या है?
धारा 479 BNSS के तहत अपराध की अधिकतम संभावित सज़ा का आधा हिरासत में बीत जाए तो अदालत को ज़मानत पर रिहा करना ही होगा। पहली बार का अपराधी एक-तिहाई के बाद मुचलके पर रिहा होता है। यह मौत या उम्रक़ैद की सज़ा वाले अपराधों में, या एक से ज़्यादा केस होने पर लागू नहीं।
क्या धारा 479 जुलाई 2024 से पहले के केसों पर लागू है?
हाँ। अगस्त 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह लाभ, पहली बार के अपराधी वाले एक-तिहाई नियम समेत, उन विचाराधीन क़ैदियों पर भी लागू है जिनके केस BNSS लागू होने से पहले दर्ज हुए, और जेलों को पात्र क़ैदियों की पहचान का निर्देश दिया।
क्या विचाराधीन क़ैदी को अधिकतम सज़ा से ज़्यादा जेल में रखा जा सकता है?
नहीं। धारा 479 BNSS कहती है कि किसी भी हालत में जाँच, पूछताछ या मुक़दमे के दौरान व्यक्ति को अपराध की अधिकतम सज़ा से ज़्यादा हिरासत में नहीं रखा जा सकता। ऐसा हुआ हो तो तुरंत अदालत में अर्ज़ी दें; यह बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका का भी आधार है।
ग़रीब क़ैदी के वकील का ख़र्च कौन देता है?
राज्य। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत हिरासत में हर व्यक्ति, आय चाहे जो हो, मुफ़्त क़ानूनी सहायता का हक़दार है। अदालत, जेल के लीगल एड क्लिनिक या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण से कहें, या 15100 पर कॉल करें।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।
