क़ानून से टकराव में बच्चे: किशोर न्याय व्यवस्था
18 से कम उम्र के बच्चे पर अपराध का आरोप लगे तो: लॉक-अप नहीं, 24 घंटे में किशोर न्याय बोर्ड, ज़मानत नियम, 16–18 के जघन्य मामले, निजता और साफ़ रिकॉर्ड।
संक्षेप में
- अपराध की तारीख़ को 18 से कम उम्र का हर व्यक्ति बच्चा है और उसका मामला आम अदालत नहीं, किशोर न्याय बोर्ड (JJB) देखता है धारा 2(12), 2(13) JJ अधिनियम।
- बच्चे को "गिरफ़्तार" नहीं, "पकड़ा" (apprehend) जाता है, उसे पुलिस लॉक-अप या जेल में कभी नहीं रखा जा सकता, और 24 घंटे में बोर्ड के सामने पेश करना होता है धारा 10।
- ज़मानत नियम है, ग़ैर-ज़मानती अपराध में भी धारा 12। मना हो तो बच्चा जेल नहीं, निगरानी गृह (observation home) जाता है।
- सिर्फ़ जघन्य अपराध (heinous offence, यानी न्यूनतम सज़ा 7 साल या ज़्यादा) के आरोपी 16 साल या ज़्यादा उम्र के बच्चे पर, शुरुआती आकलन के बाद, बड़े की तरह मुक़दमा चल सकता है धारा 15; तब भी न मौत की सज़ा, न बिना रिहाई की उम्रक़ैद धारा 21।
- उम्र का सबूत साथ रखें। बच्चा लॉक-अप में हो तो 1098 (चाइल्डलाइन) या 112 पर कॉल करें, और मुफ़्त वकील के लिए 15100।
बच्चे पर क़ानून तोड़ने का आरोप लगे तो माँ-बाप को पुलिस लॉक-अप, बड़ों की जेल और ज़िंदगी भर पीछा करने वाला आपराधिक रिकॉर्ड दिखने लगता है। भारतीय क़ानून का नज़रिया अलग है। वह ग़लती करने वाले बच्चे को सिर्फ़ सज़ा की चीज़ नहीं, बल्कि सुधारकर समाज में लौटाने लायक इंसान मानता है। आपका बच्चा, या आपकी जान-पहचान का कोई बच्चा, किसी आपराधिक मामले में फँसा हो, तो यह लेख बताता है कि क्या होना चाहिए और आप किस पर अड़ सकते हैं।
क़ानून से टकराव में बच्चा कौन है
मुख्य क़ानून किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015, यानी "JJ अधिनियम" है, जिसमें 2021 में संशोधन हुआ। अठारह से कम उम्र का हर व्यक्ति बच्चा है। "क़ानून से टकराव में बच्चा" वह बच्चा है जिस पर अपराध का आरोप है या जिसने अपराध किया पाया गया और जो अपराध की तारीख़ को अठारह से कम था। गिरफ़्तारी या मुक़दमे के समय की उम्र मायने नहीं रखती। यह दावा कि आरोपी बच्चा था, किसी भी अदालत में किसी भी चरण पर, दोषसिद्धि के बाद भी, उठाया जा सकता है धारा 9।
उम्र पर विवाद हो तो बोर्ड धारा 94 के तहत इस क्रम में तय करता है: मैट्रिक या समकक्ष प्रमाणपत्र; पहले स्कूल या नगरपालिका या पंचायत का जन्म प्रमाणपत्र; और दोनों न हों तभी मेडिकल (ossification) जाँच। मेडिकल जाँच उम्र की सीमा बताए तो कम उम्र का लाभ बच्चे को मिलता है।
अपराध सज़ा के हिसाब से बँटे हैं: छोटे (petty, 3 साल तक), गंभीर (serious, 3 से 7 साल, और 2021 के संशोधन के बाद वे अपराध भी जिनकी अधिकतम सज़ा 7 साल से ज़्यादा है पर न्यूनतम 7 साल नहीं, Shilpa Mittal v. State (NCT of Delhi), 2020 के अनुसार) और जघन्य (heinous, न्यूनतम 7 साल या ज़्यादा)। यह वर्ग तय करता है कि 16 साल और ऊपर के बच्चों के साथ क्या होगा।
बच्चे को पकड़े जाने के बाद क्या होता है
- ख़ास पुलिस। बच्चे को विशेष किशोर पुलिस इकाई या थाने के बाल कल्याण पुलिस अधिकारी (Child Welfare Police Officer) के पास रखा जाता है, जो सादे कपड़ों में हो और तुरंत माँ-बाप और परिवीक्षा अधिकारी (Probation Officer) को सूचित करे धारा 13।
- न लॉक-अप, न हथकड़ी। बच्चे को पुलिस लॉक-अप या जेल में नहीं रखा जा सकता, न हथकड़ी लगाई जा सकती है धारा 10।
- 24 घंटे में बोर्ड के सामने, सफ़र का समय छोड़कर। बोर्ड में एक न्यायिक मजिस्ट्रेट और दो समाजसेवी होते हैं, जिनमें कम से कम एक महिला धारा 4। यह बच्चों के अनुकूल कमरे में बैठता है, बिना पुलिस वर्दी के, और माँ-बाप मौजूद रहते हैं।
- ज़मानत नियम है। धारा 12 के तहत बच्चे को ज़मानत पर, ज़मानती के साथ या बिना, छोड़ा जाएगा, या माँ-बाप या उपयुक्त व्यक्ति के पास रखा जाएगा, अपराध ज़मानती हो या नहीं। ज़मानत सिर्फ़ तब मना हो सकती है जब रिहाई से बच्चा जाने-माने अपराधियों के संपर्क में आए, ख़तरे में पड़े या न्याय का मक़सद विफल हो, और कारण लिखने होंगे। रिहा न हुआ बच्चा निगरानी गृह जाता है।
बोर्ड के सामने जाँच
बोर्ड मुक़दमा नहीं, जाँच (inquiry) करता है। यह पहली पेशी के चार महीने में पूरी होनी चाहिए, लिखित कारणों से दो महीने और बढ़ाई जा सकती है धारा 14। छोटे अपराधों में बढ़ी अवधि के बाद भी जाँच अधूरी रहे तो कार्यवाही ख़त्म हो जाती है। परिवीक्षा अधिकारी बच्चे के परिवार, स्कूल और हालात पर सामाजिक जाँच रिपोर्ट बनाता है; इसमें सहयोग करें, क्योंकि यही नतीजा तय करती है।
बोर्ड पाए कि बच्चे ने अपराध किया, तो वह धारा 18 के विकल्पों में से चुनता है: सलाह या चेतावनी देकर घर भेजना; सामूहिक काउंसलिंग; सामुदायिक सेवा; माँ-बाप द्वारा जुर्माना (बच्चा 14 से ऊपर और कमाता हो तो); माँ-बाप या उपयुक्त व्यक्ति की देखरेख में तीन साल तक अच्छे आचरण की परिवीक्षा पर रिहाई; या, आख़िरी उपाय के तौर पर, तीन साल तक विशेष गृह (special home) में रखना। बोर्ड स्कूल या व्यावसायिक कोर्स में हाज़िरी और नशामुक्ति इलाज का आदेश भी दे सकता है।
जघन्य अपराधों के आरोपी 16 से 18 साल के बच्चे
जो बच्चा जघन्य अपराध की तारीख़ को 16 या उससे बड़ा था, उसके लिए बोर्ड पहले धारा 15 में तीन महीने के भीतर शुरुआती आकलन (preliminary assessment) करता है: अपराध करने की मानसिक और शारीरिक क्षमता, नतीजे समझने की योग्यता और हालात। मनोवैज्ञानिक या मनो-सामाजिक विशेषज्ञ मदद करते हैं। यह दोष का मुक़दमा नहीं है। बोर्ड तय करे कि बड़े की तरह मुक़दमा चले, तो मामला बाल न्यायालय (Children's Court, यानी सत्र न्यायालय) जाता है, जो फिर भी बोर्ड के सुधारात्मक विकल्प चुन सकता है। दोनों तरह के आदेश की अपील 30 दिन में हो सकती है धारा 101।
बड़े की तरह मुक़दमा चलने पर भी किसी बच्चे को मौत की सज़ा या बिना रिहाई की संभावना वाली उम्रक़ैद नहीं दी जा सकती धारा 21। दोषी बच्चे को 21 साल की उम्र तक बड़ों की जेल में नहीं, सुरक्षित स्थान (place of safety) में रखा जाता है, जब अदालत आँकती है कि वह सुधर गया है और रिहा हो सकता है या बाक़ी सज़ा जेल में काटनी होगी धारा 19।
निजता और नई शुरुआत
- पहचान उजागर नहीं। कोई अख़बार, चैनल, वेबसाइट या सोशल मीडिया पोस्ट बच्चे का नाम, पता, स्कूल, फ़ोटो या पहचान करा सकने वाला कोई ब्योरा नहीं बता सकता धारा 74। उल्लंघन क़ैद और जुर्माने से दंडनीय अपराध है। यही सुरक्षा बाल पीड़ितों और गवाहों को भी है।
- कोई अयोग्यता नहीं। इस अधिनियम के तहत निपटाए गए बच्चे पर दोषसिद्धि से जुड़ी कोई अयोग्यता नहीं लगती, जैसे सरकारी नौकरी या पासपोर्ट से रोक, और बोर्ड के रिकॉर्ड नियमों में तय अवधि के बाद नष्ट कर दिए जाते हैं धारा 24। अपवाद वह बच्चा है जो 16 या उससे बड़ा था और बाल न्यायालय ने बड़े की तरह दोषी ठहराया।
क़दम दर क़दम: माँ-बाप और अभिभावकों के लिए
- तुरंत उम्र का सबूत लेकर थाने जाएँ, बाल कल्याण पुलिस अधिकारी को बुलाने को कहें, और बच्चे के साथ रहें।
- बच्चा लॉक-अप में, हथकड़ी में या बड़े बंदियों के साथ हो तो 1098 और 112 पर कॉल करें, और पहली पेशी पर बोर्ड को बताएँ।
- बोर्ड से क़ानूनी सहायता वकील माँगें; हर JJB का विधिक सेवा पैनल होता है। उसी दिन धारा 12 में ज़मानत की अर्ज़ी दें।
- परिवीक्षा अधिकारी से मिलें और सामाजिक जाँच रिपोर्ट के लिए स्कूल, परिवार और सेहत की सही जानकारी दें।
- मीडिया या कोई ऑनलाइन बच्चे की पहचान उजागर करे, तो धारा 74 के तहत बोर्ड और पुलिस को लिखित शिकायत दें।
नागपुर में पंद्रह साल के रवि को स्कूटर चोरी के बाद दो बड़े लड़कों के साथ पकड़ा जाता है। उसकी माँ सरिता जन्मतिथि दिखाता उसका 10वीं का एडमिट कार्ड लेकर थाने पहुँचती हैं। वे बाल कल्याण पुलिस अधिकारी को बुलाने को कहती हैं और शांति से कहती हैं कि JJ अधिनियम की धारा 10 के तहत रवि को लॉक-अप में नहीं रखा जा सकता और 24 घंटे में किशोर न्याय बोर्ड के सामने ले जाना होगा। अगली सुबह बोर्ड, क़ानूनी सहायता वकील के साथ, धारा 12 में रवि को उनकी देखरेख में ज़मानत पर छोड़ देता है और परिवीक्षा अधिकारी से सामाजिक जाँच रिपोर्ट माँगता है। तीन महीने बाद बोर्ड उसे काउंसलिंग और सामुदायिक सेवा के साथ घर भेज देता है, और उसका स्कूल रिकॉर्ड साफ़ रहता है।
ये तैयार रखें
- उम्र का सबूत: मैट्रिक या स्कूल का प्रमाणपत्र, या जन्म प्रमाणपत्र
- ज़मानत और सामाजिक जाँच रिपोर्ट के लिए माँ-बाप का पहचान और पते का सबूत
- पुलिस अधिकारियों के नाम और FIR नंबर
पुलिस कभी-कभी JJ अधिनियम से बचने के लिए बच्चे की उम्र 18 या ज़्यादा लिख देती है। इसे पहली ही सुनवाई में दस्तावेज़ों के साथ चुनौती दें; मुक़दमे का इंतज़ार न करें। और बच्चे को थाने में कोई "इक़बालिया बयान" (confession) न लिखने दें; पुलिस को दिए बयान सबूत नहीं हैं, और बोर्ड फ़ैसला जाँच पर करता है, दस्तख़त किए काग़ज़ पर नहीं।
कहाँ जाएँ
- थाने में बाल कल्याण पुलिस अधिकारी, फिर ज़िले का किशोर न्याय बोर्ड।
- चाइल्डलाइन 1098 (24 घंटे) लॉक-अप में, ख़तरे में या इन अधिकारों से वंचित किसी भी बच्चे के लिए; आपातकाल 112।
- ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (15100) मुफ़्त वकील के लिए; JJB का अपना विधिक सहायता पैनल भी होता है।
- बाल न्यायालय (सत्र न्यायालय) बोर्ड के आदेशों के ख़िलाफ़ 30 दिन में अपील के लिए।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या भारत में पुलिस नाबालिग को गिरफ़्तार करके जेल भेज सकती है?
18 से कम उम्र के बच्चे को आम तरीक़े से गिरफ़्तार नहीं, "पकड़ा" जाता है और बाल कल्याण पुलिस अधिकारी को सौंपा जाता है। JJ अधिनियम की धारा 10 के तहत बच्चे को पुलिस लॉक-अप या जेल में नहीं रखा जा सकता, न हथकड़ी लगाई जा सकती है, और 24 घंटे में किशोर न्याय बोर्ड के सामने पेश करना होता है। ज़मानत मना हो तो बच्चा निगरानी गृह में रहता है, जेल में कभी नहीं।
क्या किशोर को ज़मानत अपने आप मिलती है?
लगभग। धारा 12 के तहत बोर्ड बच्चे को ज़मानत पर छोड़ेगा, अपराध ज़मानती हो या नहीं, जब तक वह कारण दर्ज न करे कि रिहाई से बच्चा जाने-माने अपराधियों के संपर्क में आएगा, ख़तरे में पड़ेगा या न्याय का मक़सद विफल होगा। पहले ही दिन उम्र के सबूत और ज़िम्मेदारी लेने को तैयार माँ-बाप के साथ अर्ज़ी दें।
क्या 16 साल के बच्चे पर बड़े की तरह मुक़दमा चल सकता है?
सिर्फ़ जघन्य अपराध में, जिसकी न्यूनतम सज़ा सात साल या ज़्यादा हो, और सिर्फ़ तब जब धारा 15 में बोर्ड का शुरुआती आकलन कहे कि बच्चे में अपराध करने और नतीजे समझने की क्षमता थी। तब मुक़दमा बाल न्यायालय में चलता है, जो फिर भी सुधारात्मक विकल्प अपना सकता है। किसी बच्चे को मौत की सज़ा या बिना रिहाई की उम्रक़ैद नहीं हो सकती।
क्या किशोर रिकॉर्ड बाद में नौकरी या पासपोर्ट पर असर डालेगा?
नहीं। धारा 24 के तहत बोर्ड द्वारा निपटाए गए बच्चे पर दोषसिद्धि से जुड़ी कोई अयोग्यता नहीं लगती, और रिकॉर्ड तय अवधि के बाद नष्ट कर दिए जाते हैं। धारा 74 के तहत मीडिया बच्चे की पहचान नहीं छाप सकता। अकेला अपवाद वह बच्चा है जो 16 या उससे बड़ा था और बाल न्यायालय ने बड़े की तरह दोषी ठहराया।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।