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Old handcuffs and a key in a museum display caseस्वाधीनता

फ़ोटो: Battlesnake1, Wikimedia Commons, CC0. सांकेतिक चित्र.

हिरासत में हिंसा: आपके अधिकार और शिकायत कैसे करें

न्याय पाठशाला8 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

पुलिस हिरासत में मारपीट या धमकी? गिरफ़्तारी के समय के सुरक्षा उपाय, चोटें रिकॉर्ड कैसे कराएँ, मजिस्ट्रेट को क्या बताएँ, और शिकायत कहाँ करें, क़दम दर क़दम।

क़ानून: अनुच्छेद 21, भारत का संविधान · धारा 120 BNS · धारा 36, 38, 53, 58 और 196 BNSS · D.K. Basu v. State of West Bengal (1997)

संक्षेप में

  • हिरासत में हिंसा अपराध है। कबूलनामा निकलवाने के लिए चोट पहुँचाने पर सात साल तक, और गंभीर चोट पर दस साल तक की सज़ा है (धारा 120 BNS)।
  • हर गिरफ़्तार व्यक्ति की मेडिकल जाँच होनी चाहिए (धारा 53 BNSS) और 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेशी (धारा 58 BNSS)। यही दो मौक़े हैं जब चोटें रिकॉर्ड पर आती हैं।
  • पहली पेशी पर मजिस्ट्रेट को बताएँ कि आपको पीटा गया और नई मेडिकल जाँच माँगें। ज़ोर से कहें; लिखवाने को कहें।
  • पुलिस के सामने किया गया कबूलनामा अदालत में आपके ख़िलाफ़ इस्तेमाल नहीं हो सकता।
  • परिवार: पता करें कौन-सा थाना है, वकील के साथ वहाँ जाएँ, मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें, और SP व मानवाधिकार आयोग को लिखित शिकायत दें।

रात में किसी थाने में अकेले होना, और किसी को पता न होना कि आप कहाँ हैं, इससे डरावना कम ही कुछ होता है। हिरासत में हिंसा (custodial violence) का मतलब है पुलिस या किसी दूसरे प्राधिकारी की हिरासत में रहते हुए किसी व्यक्ति को पहुँचाया गया नुकसान: मारपीट, धमकी, यौन शोषण, या उससे भी बुरा। आरोप चाहे जो हो, यह अपराध है।

क़ानून क्या कहता है

अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में गरिमा के साथ जीने का अधिकार शामिल है, और सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि यह अधिकार थाने के दरवाज़े पर ख़त्म नहीं होता। D.K. Basu v. State of West Bengal (1997) में उसने हिरासत में यातना को मानवीय गरिमा का नंगा उल्लंघन कहा और हर गिरफ़्तारी के लिए नियम तय किए। उनमें से ज़्यादातर नियम अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) में लिखे हैं।

यातना एक अलग अपराध भी है। धारा 120 BNS (पहले IPC की धारा 330 और 331) के तहत, कबूलनामा या जानकारी निकलवाने के लिए जानबूझकर चोट पहुँचाने पर सात साल तक की जेल और जुर्माना है, और चोट गंभीर हो तो दस साल तक। ग़ैरक़ानूनी तरीक़े से बंद रखना, यौन अपराध और हत्या पुलिस अधिकारियों पर भी बाक़ी सबकी तरह लागू होते हैं।

ज़बरदस्ती निकलवाया कबूलनामा पुलिस के किसी काम का नहीं। पुलिस अधिकारी के सामने किया गया कबूलनामा आपके ख़िलाफ़ साबित नहीं किया जा सकता, और धमकी, लालच या वादे से कराया गया कबूलनामा अप्रासंगिक है (धारा 22 और 23 BSA, भारतीय साक्ष्य अधिनियम)। इसीलिए "बस दस्तख़त कर दो, छोड़ देंगे" एक जाल है: जो कबूलनामा आपने अपनी मर्ज़ी से नहीं किया, उस पर दस्तख़त न करें।

गिरफ़्तारी पर आप कौन-से सुरक्षा उपाय माँग सकते हैं

  • पहचान और गिरफ़्तारी मेमो। गिरफ़्तार करने वाले अधिकारी को साफ़ दिखने वाला नाम-पट्ट पहनना होगा और गिरफ़्तारी मेमो (arrest memo) बनाना होगा, जिसमें गिरफ़्तारी का समय और जगह हो, और जिस पर एक गवाह (परिवार का सदस्य या मोहल्ले का कोई प्रतिष्ठित व्यक्ति) और आपके दस्तख़त हों (धारा 36 BNSS)।
  • कारण और परिवार को सूचना। आपको बताना होगा कि गिरफ़्तारी क्यों हो रही है (धारा 47 BNSS), और पुलिस को आपके बताए रिश्तेदार या दोस्त को गिरफ़्तारी और हिरासत की जगह की सूचना देनी होगी (धारा 48 BNSS)। हर ज़िले में पुलिस कंट्रोल रूम पर गिरफ़्तार व्यक्तियों की जानकारी प्रदर्शित होनी चाहिए (धारा 37 BNSS)।
  • वकील। पूछताछ के दौरान आप अपनी पसंद के वकील से मिल सकते हैं, हालाँकि पूरी पूछताछ में नहीं (धारा 38 BNSS)।
  • मेडिकल जाँच। गिरफ़्तारी के तुरंत बाद डॉक्टर को आपकी जाँच करके हर चोट दर्ज करनी होगी, और रिपोर्ट की कॉपी आपको या आपके नामित व्यक्ति को देनी होगी (धारा 53 BNSS)। महिला की जाँच महिला डॉक्टर द्वारा या उसकी निगरानी में होगी।
  • 24 घंटे में मजिस्ट्रेट। मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना आपको 24 घंटे (यात्रा का समय छोड़कर) से ज़्यादा पुलिस हिरासत में नहीं रखा जा सकता (धारा 58 BNSS; अनुच्छेद 22(2))।
  • हथकड़ी रूटीन में नहीं। हथकड़ी सिर्फ़ तय स्थितियों में लगाई जा सकती है, जैसे आदतन अपराधी या गंभीर अपराध (धारा 43(3) BNSS)। महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले सिर्फ़ महिला अधिकारी, मजिस्ट्रेट की पहले से अनुमति लेकर, गिरफ़्तार कर सकती है (धारा 43(5) BNSS)।

Paramvir Singh Saini v. Baljit Singh (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि हर थाने में हवालात, गलियारों और पूछताछ कक्षों को कवर करते हुए CCTV कैमरे लगें और फ़ुटेज सुरक्षित रखी जाए। किसी भी शिकायत में माँगें कि संबंधित तारीख़ों की फ़ुटेज तुरंत सुरक्षित की जाए।

24 घंटे वाली पेशी: आपका सबसे अहम मौक़ा

जब आपको मजिस्ट्रेट के सामने लाया जाए, तो आप बोल सकते हैं। साफ़ कहें: "मुझे हिरासत में पीटा गया। मुझे मेडिकल जाँच चाहिए और यह बात दर्ज की जाए।" मजिस्ट्रेट को जाँचना होता है कि आपको समय पर पेश किया गया, और आगे हिरासत मंज़ूर करने से पहले वह दुर्व्यवहार के बारे में पूछ सकता है। चोटें दिखती हों तो दिखाएँ। वकील मौजूद हो तो वह उसी दिन छोटी-सी लिखित अर्ज़ी दे सकता है। इस चरण पर की गई शिकायत, मेडिकल रिपोर्ट के साथ, बाद में ख़ारिज करना बहुत मुश्किल होता है।

हिरासत में मौत, बलात्कार या ग़ायब होना

अगर पुलिस हिरासत में किसी की मौत हो जाए या वह ग़ायब हो जाए, या कोई महिला हिरासत में बलात्कार का आरोप लगाए, तो पुलिस जाँच के अलावा न्यायिक मजिस्ट्रेट को जाँच (inquiry) करनी होगी (धारा 196 BNSS, पहले धारा 176 CrPC)। शव को मौत के 24 घंटे के भीतर पोस्टमार्टम के लिए भेजना होगा, जब तक मजिस्ट्रेट कारण दर्ज न करे कि यह संभव क्यों नहीं। रिश्तेदारों को सूचना दी जानी चाहिए और जहाँ संभव हो, जाँच में शामिल होने दिया जाना चाहिए। पोस्टमार्टम की वीडियोग्राफ़ी माँगें, और पहली रिपोर्ट पर भरोसा न हो तो दूसरी राय माँगें।

क़दम दर क़दम: शिकायत कैसे करें

  1. मेडिकल रिकॉर्ड लें। सरकारी अस्पताल जाएँ, इलाज कराएँ, और हर चोट दर्ज करने वाला मेडिको-लीगल सर्टिफ़िकेट (MLC) माँगें। तारीख़ के साथ चोटों की तस्वीरें लें।
  2. मजिस्ट्रेट को बताएँ, पहली पेशी पर, या न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने लिखित शिकायत देकर मेडिकल जाँच, CCTV फ़ुटेज सुरक्षित रखने और FIR दर्ज करने की माँग करें।
  3. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को लिखें। पुलिस अधीक्षक या आयुक्त को तारीख़ सहित लिखित शिकायत दें, हाथों-हाथ रसीद लेकर या रजिस्टर्ड डाक से। संज्ञेय अपराध (cognizable offence, यानी जिसमें पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है) में पुलिस को FIR दर्ज करनी ही होगी, और यातना ऐसा ही अपराध है।
  4. मानवाधिकार आयोग में शिकायत करें। राष्ट्रीय और राज्य मानवाधिकार आयोग ऑनलाइन और डाक से शिकायतें लेते हैं। MLC और तस्वीरें लगाएँ। Prakash Singh v. Union of India (2006) के बाद कई राज्यों में पुलिस शिकायत प्राधिकरण (Police Complaints Authority) भी है।
  5. हाई कोर्ट। वकील अनुच्छेद 226 के तहत रिट याचिका दायर करके स्वतंत्र जाँच (अक्सर किसी दूसरी एजेंसी से), मुआवज़ा और सबूत सुरक्षित रखने की माँग कर सकता है। अगर किसी को ग़ैरक़ानूनी रूप से बंद रखा गया है या उसका पता नहीं चल रहा, तो बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका अदालत से कहती है कि पुलिस उस व्यक्ति को पेश करे।
उदाहरण

मेरठ के 24 साल के मैकेनिक इमरान को रात में चोरी के मामले में उठाया जाता है और "कबूल" करवाने के लिए थप्पड़ और बेल्ट से पीटा जाता है। उसके भाई आरिफ़ को अगली सुबह पता चलता है। वह DLSA के क़ानूनी सहायता वकील के साथ थाने जाता है और गिरफ़्तारी मेमो देखने पर ज़ोर देता है। उसी दोपहर मजिस्ट्रेट की अदालत में इमरान अपनी कमीज़ उठाकर बताता है कि उसे पीटा गया। वकील नई मेडिकल जाँच और CCTV फ़ुटेज सुरक्षित रखने की माँग करता है। मजिस्ट्रेट दोनों आदेश देता है और पुलिस हिरासत देने से मना कर देता है। आरिफ़ उसी हफ़्ते MLC लगाकर SP और राज्य मानवाधिकार आयोग को शिकायत भेजता है।

ये तैयार रखें

  • गिरफ़्तारी मेमो, या मेमो न मिला हो तो गिरफ़्तारी की तारीख़, समय, जगह और अधिकारियों के नामों का नोट
  • सरकारी अस्पताल का मेडिको-लीगल सर्टिफ़िकेट, तारीख़ सहित चोटों की तस्वीरें, डिस्चार्ज काग़ज़
  • जिसने गिरफ़्तारी या चोटें देखीं, उनके नाम और नंबर
  • भेजी गई हर शिकायत की कॉपी, रसीद या डाक ट्रैकिंग के साथ
  • पहली पेशी के अदालती आदेश, रिमांड आदेश सहित
सावधान

शिकायत के लिए व्यक्ति के छूटने का इंतज़ार न करें। चोटें भर जाती हैं, CCTV फ़ुटेज आमतौर पर कुछ हफ़्तों में मिट जाती है, और महीनों बाद की शिकायत को "बाद की सूझ" कहकर टालना आसान होता है। MLC लें और पहली पेशी पर मजिस्ट्रेट को बताएँ।

मुआवज़ा

Nilabati Behera v. State of Orissa (1993) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब राज्य हिरासत में जीवन के अधिकार का उल्लंघन करे, तो अदालतें अधिकारियों पर आपराधिक मुक़दमे के अलावा, राज्य को सीधे मुआवज़ा देने का आदेश दे सकती हैं। हाई कोर्ट और मानवाधिकार आयोग नियमित रूप से ऐसा मुआवज़ा देते या उसकी सिफ़ारिश करते हैं। पीड़ित ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण के ज़रिए राज्य की पीड़ित मुआवज़ा योजना में भी अर्ज़ी दे सकते हैं (धारा 396 BNSS)।

कहाँ जाएँ

  • आपात स्थिति में 112; महिलाओं के लिए 181; हिरासत में बच्चे के लिए 1098
  • ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (ज़िला अदालत परिसर में) या NALSA हेल्पलाइन 15100, मुफ़्त वकील के लिए जो पहली पेशी पर खड़ा हो सके
  • न्यायिक मजिस्ट्रेट, पहली पेशी पर या लिखित शिकायत से
  • पुलिस अधीक्षक या आयुक्त, लिखित में, रसीद के साथ
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग या आपके राज्य का मानवाधिकार आयोग; जहाँ हो, राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण
  • हाई कोर्ट (अनुच्छेद 226 के तहत रिट या बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका)

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या भारत में हिरासत में यातना अलग अपराध है?

2026 तक भारत में यातना के ख़िलाफ़ कोई अलग क़ानून नहीं है, जिस पर अदालतें और आयोग टिप्पणी कर चुके हैं। लेकिन धारा 120 BNS कबूलनामा या जानकारी निकलवाने के लिए चोट या गंभीर चोट पहुँचाने पर सात या दस साल तक की सज़ा देती है, और मारपीट, ग़ैरक़ानूनी बंदी, यौन हमला और हत्या जैसे सामान्य अपराध पुलिस अधिकारियों पर पूरी तरह लागू होते हैं।

पुलिस कहती है कि मेरा रिश्तेदार "यहाँ नहीं है"। मैं क्या करूँ?

ज़िला पुलिस कंट्रोल रूम में पूछें, जहाँ धारा 37 BNSS के तहत गिरफ़्तार व्यक्तियों की जानकारी प्रदर्शित होनी चाहिए, और उपलब्ध हो तो राज्य पुलिस की वेबसाइट पर गिरफ़्तारी की जानकारी देखें। फिर वकील के साथ पुलिस अधीक्षक के पास जाएँ। फिर भी पता न चले तो वकील हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर कर सकता है, जिस पर अदालत पुलिस को उस व्यक्ति को पेश करने का आदेश देती है।

पिटाई में दस्तख़त किया कबूलनामा क्या मेरे ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो सकता है?

नहीं। पुलिस अधिकारी के सामने किया गया कबूलनामा अदालत में आपके ख़िलाफ़ साबित नहीं किया जा सकता, और भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 22 और 23 के तहत धमकी, लालच या वादे से कराया गया कबूलनामा अप्रासंगिक है। जितनी जल्दी हो सके, वकील और मजिस्ट्रेट को बताएँ कि वह कैसे लिया गया।

पुलिस हिरासत में मौत की जाँच कौन करता है?

धारा 196 BNSS के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट को पुलिस जाँच से अलग जाँच करनी होगी, और पोस्टमार्टम 24 घंटे के भीतर होना चाहिए, जब तक कारण दर्ज न किए जाएँ। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को हिरासत में मौत की सूचना देना ज़रूरी है। परिवार हाई कोर्ट से किसी स्वतंत्र एजेंसी से जाँच की माँग कर सकता है।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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