गिरफ़्तार होने पर आपके अधिकार
लिखित आधार, गिरफ़्तारी मेमो, परिवार को सूचना, वकील, मेडिकल जाँच, 24 घंटे का नियम, पुलिस कब गिरफ़्तार न करे (धारा 35 BNSS) और ज़मानत कैसे मिले।
संक्षेप में
- आपको बताया जाना चाहिए कि गिरफ़्तारी क्यों हो रही है और क्या आपको ज़मानत (bail) मिल सकती है अनुच्छेद 22(1) धारा 47 BNSS।
- पुलिस को तारीख़ और समय वाला गिरफ़्तारी मेमो (arrest memo) बनाना होगा, जिस पर एक गवाह और आपके दस्तख़त हों, और आपके बताए रिश्तेदार या दोस्त को सूचना देनी होगी धाराएँ 36, 48 BNSS।
- आपको 24 घंटे के अंदर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना ज़रूरी है अनुच्छेद 22(2) धारा 58 BNSS।
- आप वकील से मिल सकते हैं, और फ़ीस नहीं दे सकते तो सरकार को मुफ़्त वकील देना होगा: 15100 पर कॉल करें।
- 7 साल तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस को आम तौर पर गिरफ़्तारी की जगह पेश होने का नोटिस देना चाहिए (धारा 35 BNSS; अरनेश कुमार, 2014)।
गिरफ़्तारी डरावनी होती है, उसके लिए भी जिसे ले जाया गया और उस परिवार के लिए भी जो थाने के बाहर इंतज़ार कर रहा है। संविधान और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), जो 1 जुलाई 2024 से लागू आपराधिक प्रक्रिया क़ानून है, हर गिरफ़्तार व्यक्ति को कुछ अधिकार देते हैं जो दोषी या निर्दोष होने पर निर्भर नहीं करते। इन्हें जानना और शांति से माँगना ज़्यादती से बचने का सबसे अच्छा उपाय है।
पुलिस बिना वारंट कब गिरफ़्तार कर सकती है?
संज्ञेय अपराध (cognizable offence, यानी गंभीर अपराध जिसमें वारंट की ज़रूरत नहीं) में पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है। लेकिन धारा 35 BNSS (पहले धाराएँ 41 और 41A CrPC) एक अहम लकीर खींचती है:
- 7 साल तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस तभी गिरफ़्तार कर सकती है जब उसके पास भरोसेमंद सूचना हो और वह लिखित में दर्ज करे कि गिरफ़्तारी क्यों ज़रूरी है: जैसे आगे अपराध रोकने, सबूतों से छेड़छाड़ या गवाहों को धमकाने से रोकने, या इसलिए कि आप वरना अदालत में हाज़िर नहीं होंगे। आम तौर पर उसे इसके बजाय अधिकारी के सामने पेश होने का नोटिस (notice to appear) देना चाहिए। नोटिस मानने पर अधिकारी कारण दर्ज किए बिना आपको गिरफ़्तार नहीं कर सकता।
- 60 साल से ऊपर या अशक्त व्यक्ति को, 3 साल से कम सज़ा वाले अपराध में, गिरफ़्तार करने के लिए पुलिस उपाधीक्षक (DSP) या उससे ऊपर के अधिकारी की पहले से अनुमति चाहिए।
- अरनेश कुमार बनाम बिहार राज्य (2014) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में पुलिस यंत्रवत गिरफ़्तारी न करे और मजिस्ट्रेट हिरासत मंज़ूर करने से पहले दर्ज कारण जाँचें। इसे नज़रअंदाज़ करने वाले अधिकारियों पर विभागीय कार्रवाई और अवमानना हो सकती है।
गिरफ़्तारी के समय आपके अधिकार
- वजह जानने का हक़। आपको गिरफ़्तारी के आधार और अपराध का पूरा ब्योरा तुरंत बताया जाना चाहिए अनुच्छेद 22(1) धारा 47 BNSS। अपराध ज़मानती हो तो आपको बताना होगा कि आप ज़मानत के हक़दार हैं और ज़मानतदार (surety) ला सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने (पंकज बंसल, 2023; प्रबीर पुरकायस्थ, 2024) कहा है कि गिरफ़्तारी के आधार लिखित में दिए जाने चाहिए; 2026 तक कुछ पीठों ने इस पर अलग राय दी है कि लिखित देना हर बार अनिवार्य है या नहीं, और सवाल बड़ी पीठ के पास जा सकता है। फिर भी लिखित में ज़रूर माँगें।
- गिरफ़्तारी मेमो। अधिकारी को दिखने वाला नाम-पट्ट पहनना होगा, तारीख़ और समय वाला गिरफ़्तारी ज्ञापन (memorandum of arrest) बनाना होगा, उस पर परिवार के किसी सदस्य या मोहल्ले के प्रतिष्ठित व्यक्ति से गवाही करानी होगी और आपके भी दस्तख़त लेने होंगे धारा 36 BNSS। यही रिकॉर्ड तय करता है कि हिरासत कब शुरू हुई।
- किसी को ख़बर करने का हक़। पुलिस को आपके बताए दोस्त, रिश्तेदार या व्यक्ति को गिरफ़्तारी और हिरासत की जगह बतानी होगी और थाने के रजिस्टर में दर्ज करना होगा धारा 48 BNSS। गिरफ़्तार लोगों के नाम थाने और ज़िला नियंत्रण कक्ष में प्रदर्शित होने चाहिए धारा 37 BNSS।
- बेवजह बल या हथकड़ी नहीं। पुलिस भागने से रोकने के लिए ज़रूरी से ज़्यादा बल नहीं लगा सकती। हथकड़ी सिर्फ़ गिनी-चुनी स्थितियों में, जैसे आदतन अपराधी, फ़रार व्यक्ति, या आतंकवाद, हत्या, बलात्कार जैसे गंभीर अपराधों में लगाई जा सकती है धारा 43 BNSS।
- वकील से मिलने का हक़। आप अपनी पसंद के वकील से सलाह ले सकते हैं और पूछताछ के दौरान उनसे मिल सकते हैं, हालाँकि पूरी पूछताछ के दौरान नहीं अनुच्छेद 22(1) धारा 38 BNSS। फ़ीस नहीं दे सकते तो सरकार को मुफ़्त वकील देना होगा (अनुच्छेद 39A; विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987)।
- मेडिकल जाँच। गिरफ़्तारी के तुरंत बाद सरकारी डॉक्टर (या पंजीकृत डॉक्टर) को आपकी जाँच करके चोटें दर्ज करनी होंगी; महिला की जाँच महिला डॉक्टर करेगी या उसकी निगरानी में होगी। रिपोर्ट की कॉपी आपको या आपके बताए व्यक्ति को मिलनी चाहिए धारा 53 BNSS। हिरासत में चोट लगे तो यही आपका बचाव है।
- 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने। सफ़र का समय छोड़कर, मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना आपको 24 घंटे से ज़्यादा पुलिस हिरासत में नहीं रखा जा सकता अनुच्छेद 22(2) धाराएँ 57, 58 BNSS। मजिस्ट्रेट को मारपीट या धमकी के बारे में बताएँ; मजिस्ट्रेट को यह भी देखना होता है कि धारा 48 का पालन हुआ या नहीं।
ये सुरक्षाएँ डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) से निकली हैं, जहाँ हिरासत में मौतों की घटनाओं के बाद सुप्रीम कोर्ट ने गिरफ़्तारी के दिशानिर्देश तय किए। इनमें से ज़्यादातर अब BNSS में लिखे हैं।
महिलाओं को विशेष सुरक्षा
जब तक परिस्थितियाँ कुछ और न माँगें, महिला को महिला पुलिस अधिकारी ही गिरफ़्तार करेगी और पुरुष अधिकारी उसे छू नहीं सकता। आम तौर पर महिला को सूर्यास्त के बाद और सूर्योदय से पहले गिरफ़्तार नहीं किया जाता। असाधारण मामले में महिला अधिकारी को पहले क्षेत्र के न्यायिक मजिस्ट्रेट की लिखित अनुमति लेनी होगी धारा 43(5) BNSS। महिला के घर की तलाशी तभी हो सकती है जब उसे वहाँ से हटने का मौक़ा दिया गया हो।
ज़मानत: बुनियादी बातें
ज़मानती अपराध (bailable offence) में ज़मानत आपका हक़ है। बॉन्ड या ज़मानतदार पेश करने पर थाना प्रभारी को आपको ज़मानत पर छोड़ना होगा धारा 480 BNSS (पहले धारा 436 CrPC)। जो ग़रीब व्यक्ति एक हफ़्ते में ज़मानतदार नहीं ला पाता, उसे निर्धन मानकर निजी बॉन्ड पर छोड़ा जा सकता है। ग़ैर-ज़मानती अपराध में ज़मानत अदालत के विवेक पर है; वकील मजिस्ट्रेट या सत्र न्यायालय में अर्ज़ी देता है। ग़ैर-ज़मानती मामले में गिरफ़्तारी का डर हो तो सत्र न्यायालय या हाई कोर्ट से अग्रिम ज़मानत (anticipatory bail) माँगी जा सकती है धारा 482 BNSS।
क़दम दर क़दम: क्या करें
- शांत रहें। विरोध या भागने की कोशिश न करें। गिरफ़्तारी का विरोध अलग अपराध है और सब कुछ बिगाड़ देता है।
- पूछें: "मुझे किस बात के लिए गिरफ़्तार किया जा रहा है? कौन-सी धारा?" आधार लिखित में माँगें और पूछें कि अपराध ज़मानती है या नहीं।
- सूचना के लिए एक व्यक्ति का नाम और फ़ोन नंबर दें। देखें कि गिरफ़्तारी मेमो में सही तारीख़ और समय लिखा हो, और दस्तख़त से पहले पढ़ें।
- कहें कि आप वकील चाहते हैं। वकील के आने तक आप सवालों के जवाब देने से मना कर सकते हैं। आपसे ज़बरदस्ती इक़बालिया बयान नहीं लिया जा सकता; पुलिस अधिकारी के सामने दिया गया इक़बालिया बयान अदालत में मान्य नहीं होता।
- ख़ाली काग़ज़ों या बिना पढ़े बयानों पर दस्तख़त न करें। दबाव हो तो "विरोध के साथ हस्ताक्षरित" लिखें।
- मेडिकल जाँच माँगें और डॉक्टर को हर चोट, पुरानी या नई, बताएँ।
- 24 घंटे वाली पेशी पर मजिस्ट्रेट को मारपीट, धमकी या ग़ैर-क़ानूनी हिरासत के बारे में बताएँ, और वकील न हो तो मुफ़्त क़ानूनी सहायता का वकील माँगें।
कानपुर के 58 वर्षीय दुकानदार सुरेश को सुबह 6 बजे चेक बाउंस के एक झगड़े में उठा लिया जाता है, जिसे पड़ोसी ने "ठगी" बताकर रिपोर्ट किया है। वे सब-इंस्पेक्टर से गिरफ़्तारी का आधार लिखित में और धारा पूछते हैं। अपराध में 7 साल से कम सज़ा है। वे विनम्रता से कहते हैं कि धारा 35 BNSS और अरनेश कुमार के मुताबिक़ उन्हें गिरफ़्तार करने के बजाय पेश होने का नोटिस मिलना चाहिए, और अपने बेटे को सूचना देने को कहते हैं। अधिकारी गिरफ़्तारी मेमो बनाता है, बेटा 15100 पर कॉल करता है, और उसी दोपहर मजिस्ट्रेट की अदालत में विधिक सहायता का वकील बताता है कि गिरफ़्तारी के दर्ज कारण हैं ही नहीं। सुरेश उसी दिन ज़मानत पर छूट जाते हैं।
ये तैयार रखें
- एफ़आईआर नंबर, थाना, लगाई गई धाराएँ, और गिरफ़्तार करने वाले अधिकारी का नाम व पद।
- गिरफ़्तारी मेमो की कॉपी, और गिरफ़्तारी का सही समय।
- वकील या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण का नाम-नंबर; ज़मानतदार बनने को तैयार दो लोगों के पहचान पत्र।
- कोई मेडिकल रिपोर्ट, और चोटों की तारीख़ वाली तस्वीरें।
"पूछताछ के लिए थाने आ जाओ, गिरफ़्तारी नहीं है" घंटों की अनौपचारिक हिरासत बन सकती है, जिसमें न मेमो होता है न घड़ी चलती है। अगर आप जाने के लिए आज़ाद नहीं हैं, तो आप हिरासत में हैं और ऊपर के सारे अधिकार लागू हैं। साफ़ पूछें: "क्या मैं गिरफ़्तार हूँ? क्या मैं जा सकता हूँ?" और पक्का करें कि बाहर किसी को पता हो कि आप कहाँ हैं।
कहाँ जाएँ
- मुफ़्त वकील, किसी भी समय: NALSA हेल्पलाइन 15100; ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण या मजिस्ट्रेट की अदालत में ड्यूटी पर मौजूद विधिक सहायता वकील; nalsa.gov.in।
- 24 घंटे से ज़्यादा की ग़ैर-क़ानूनी हिरासत: न्यायिक मजिस्ट्रेट; हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus, यानी व्यक्ति को पेश करने का आदेश) याचिका, जिसकी सुनवाई तुरंत हो सकती है।
- हिरासत में हिंसा: पेशी के समय मजिस्ट्रेट, पुलिस अधीक्षक, राज्य मानवाधिकार आयोग, NHRC हेल्पलाइन 14433, और राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण।
- आपातकाल: 112।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या पुलिस मुझे बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है?
हाँ, संज्ञेय अपराध में। लेकिन 7 साल तक की सज़ा वाले अपराधों में धारा 35 BNSS के तहत अधिकारी को लिखना होगा कि गिरफ़्तारी क्यों ज़रूरी है, और आम तौर पर इसके बजाय पेश होने का नोटिस देना चाहिए। असंज्ञेय (छोटे) अपराधों में वारंट या मजिस्ट्रेट का आदेश चाहिए। हमेशा धारा पूछें और यह भी कि अपराध ज़मानती है या नहीं।
क्या मुझे पुलिस के सवालों के जवाब देने ही होंगे?
अपना सही नाम और पता बताना ज़रूरी है। इसके आगे, आपको ख़ुद के ख़िलाफ़ गवाही न देने का संवैधानिक अधिकार है (अनुच्छेद 20(3)) और आप कह सकते हैं कि जवाब वकील की मौजूदगी में देंगे। पुलिस अधिकारी के सामने दिया इक़बालिया बयान अदालत में आपके ख़िलाफ़ इस्तेमाल नहीं हो सकता; सिर्फ़ मजिस्ट्रेट के सामने दर्ज बयान हो सकता है।
पुलिस मुझे बिना ज़मानत कितनी देर रख सकती है?
सफ़र का समय छोड़कर, मजिस्ट्रेट के सामने पेश किए बिना 24 घंटे से ज़्यादा नहीं। उसके बाद मजिस्ट्रेट पुलिस या न्यायिक हिरासत तय करते हैं। ज़मानती अपराध में धारा 480 BNSS के तहत आपको थाने से ही ज़मानत का हक़ है। धारा 479 BNSS के तहत जो विचाराधीन क़ैदी अधिकतम सज़ा का आधा समय (पहली बार के अभियुक्त के लिए एक-तिहाई) हिरासत में बिता चुका है, उसे आम तौर पर बॉन्ड पर छोड़ा जाना चाहिए।
अगर पुलिस ने ग़लत आदमी को पकड़ लिया हो तो?
पहले मौक़े पर और फिर मजिस्ट्रेट के सामने साफ़ कहें, पहचान या उस समय कहीं और होने (alibi) का जो सबूत हो, दें। विधिक सहायता वकील से तुरंत ज़मानत की अर्ज़ी लगवाएँ। ग़लत गिरफ़्तारी को बाद में हाई कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है, और रिट याचिका या मानवाधिकार आयोग के ज़रिए मुआवज़ा माँगा जा सकता है।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।