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The old Parliament House, Sansad Bhavan, in New Delhiसंविधान

फ़ोटो: Nikhilb239, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0. सांकेतिक चित्र.

प्रस्तावना: यह क्या वादा करती है और आप इसे कैसे इस्तेमाल करें

न्याय पाठशाला7 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

प्रस्तावना के हर शब्द का सीधा मतलब, क्या यह अदालत में लागू हो सकती है, सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा है, और एक नागरिक इसे सचमुच कैसे काम में ला सकता है।

क़ानून: प्रस्तावना, भारत का संविधान · 42वाँ संशोधन, 1976 · Kesavananda Bharati v. State of Kerala (1973)

संक्षेप में

  • प्रस्तावना (Preamble) बताती है कि सत्ता किसके पास है (जनता), भारत कैसा राज्य है (संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य) और उसे क्या देना है (न्याय, स्वतंत्रता, समानता, बंधुता)।
  • यह संविधान का हिस्सा है (Kesavananda Bharati, 1973) और अदालतें हर दूसरे प्रावधान को समझने में इसका इस्तेमाल करती हैं, पर सिर्फ़ प्रस्तावना के आधार पर मुक़दमा नहीं हो सकता।
  • "समाजवादी", "पंथनिरपेक्ष" और "अखंडता" शब्द 1976 में जोड़े गए। नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इन्हें बरक़रार रखा।
  • इसके वादे मौलिक अधिकारों, ख़ासकर अनुच्छेद 14, 19 और 21, और रिट अदालतों के ज़रिए लागू होते हैं।
  • इन अधिकारों को लागू कराने के लिए मुफ़्त क़ानूनी मदद: 15100।

हममें से ज़्यादातर ने स्कूल की प्रार्थना सभा में प्रस्तावना दोहराई है। कम ही लोगों को बताया गया कि यह करती क्या है। ये कुछ पंक्तियाँ संविधान का उद्देश्य-कथन हैं: ये बताती हैं कि राज्य की ताक़त कहाँ से आती है, राज्य किसलिए है, और भारत में हर इंसान किस तरह की ज़िंदगी का हक़दार है। यह लेख हर शब्द को सीधी भाषा में समझाता है, बताता है कि अदालतों ने क्या कहा है, और एक आम नागरिक इसे कैसे काम में ला सकता है।

वादा किसने किया, और कब

प्रस्तावना "हम, भारत के लोग" से शुरू होती है। संविधान किसी राजा या औपनिवेशिक सरकार ने नहीं दिया। इसे संविधान सभा ने बनाया, 26 नवंबर 1949 को अपनाया (अब संविधान दिवस) और 26 जनवरी 1950 को लागू किया (गणतंत्र दिवस)। प्रस्तावना उस उद्देश्य प्रस्ताव (Objectives Resolution) से निकली जो जवाहरलाल नेहरू ने दिसंबर 1946 में सभा में रखा था।

"हम, भारत के लोग" का मतलब है कि भारत में सत्ता का आख़िरी स्रोत नागरिक है। मंत्री, जज, पुलिस अधिकारी और बाबू, सब आपकी ओर से सत्ता चलाते हैं और संविधान के प्रति जवाबदेह हैं।

भारत कैसा देश है

प्रस्तावना भारत को संप्रभु, समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य बताती है।

  • संप्रभु (Sovereign): भारत अपने क़ानून और फ़ैसले ख़ुद करता है; कोई बाहरी ताक़त उस पर नियंत्रण नहीं रखती।
  • समाजवादी (Socialist): राज्य को आय, दर्जे और अवसर की असमानता घटाने के लिए काम करना है। भारतीय अदालतें इसे कल्याणकारी राज्य की प्रतिबद्धता मानती हैं, निजी कारोबार पर रोक नहीं।
  • पंथनिरपेक्ष (Secular): राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है और उसे सभी धर्मों के, और किसी धर्म को न मानने वालों के साथ भी, बराबर बर्ताव करना है। सुप्रीम कोर्ट ने पंथनिरपेक्षता को संविधान के मूल ढाँचे (basic structure) का हिस्सा माना है (S.R. Bommai v. Union of India, 1994)।
  • लोकतंत्रात्मक (Democratic): सरकार स्वतंत्र, नियमित चुनावों में चुनी जाती है जिनमें हर वयस्क नागरिक का एक बराबर वोट है।
  • गणराज्य (Republic): राष्ट्राध्यक्ष, यानी राष्ट्रपति, चुना जाता है। कोई सार्वजनिक पद जन्म से नहीं मिलता।

"समाजवादी", "पंथनिरपेक्ष" और "अखंडता" शब्द ("राष्ट्र की एकता और अखंडता" में) 42वें संशोधन, 1976 से, आपातकाल के दौरान, जोड़े गए थे। दशकों बाद याचिकाओं में इन्हें चुनौती दी गई। 25 नवंबर 2024 को Dr. Balram Singh v. Union of India में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें ख़ारिज कर दिया और कहा कि संसद की संशोधन शक्ति प्रस्तावना तक जाती है और इन शब्दों के अर्थ भारत में अब स्थिर हो चुके हैं।

चार वादे

  • न्याय: सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक। सामाजिक न्याय का मतलब है कि जाति, लिंग, धर्म या विकलांगता की वजह से किसी को दबाया न जाए। आर्थिक न्याय का मतलब है इज़्ज़त की रोज़ी का उचित मौक़ा। राजनीतिक न्याय का मतलब है कि आप पर शासन कैसे हो, इसमें आपकी बराबर आवाज़ हो।
  • विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता। आप अपने विवेक के अनुसार सोच, बोल, लिख और पूजा कर सकते हैं, बस उन उचित सीमाओं में जिनकी इजाज़त संविधान ख़ुद देता है।
  • प्रतिष्ठा और अवसर की समानता। क़ानून लोगों को ऊँचा-नीचा नहीं ठहरा सकता, और स्कूल, नौकरी और सार्वजनिक जगहों के दरवाज़े सबके लिए खुले होने चाहिए।
  • बंधुता, जो व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करे। डॉ. आंबेडकर ने इस शब्द पर ज़ोर दिया था: देश की एकता हर इंसान के सम्मान पर टिकी होनी चाहिए, किसी को कुचलकर कभी नहीं।

यह क्रम सोच-समझकर रखा गया है। न्याय सबसे पहले आता है; बंधुता बाक़ी सबको व्यक्ति की गरिमा से जोड़ती है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार अनुच्छेद 21 में पढ़ा है।

क्या प्रस्तावना क़ानून है?

यहाँ दो सवाल अक्सर गड्डमड्ड हो जाते हैं।

क्या यह संविधान का हिस्सा है? हाँ। Berubari Union (1960) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि नहीं है। तेरह जजों की पीठ ने Kesavananda Bharati v. State of Kerala (1973) में इसे सुधारा: प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है, इसमें संशोधन हो सकता है, पर इसके मूल आदर्श मूल ढाँचे का हिस्सा हैं जिसे संसद संवैधानिक संशोधन से भी नष्ट नहीं कर सकती।

क्या आप इसे सीधे लागू करा सकते हैं? नहीं। प्रस्तावना अपने आप में ऐसा अधिकार नहीं बनाती जिसे अदालत किसी से मनवाए। आप सिर्फ़ यह कहकर रिट याचिका नहीं दायर कर सकते कि "प्रस्तावना समानता का वादा करती है"। आप यह कर सकते हैं कि भाग III के किसी मौलिक अधिकार की ओर इशारा करें, जैसे क़ानून के सामने समानता अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताएँ, भेदभाव पर रोक अनुच्छेद 15 या जीवन और दैहिक स्वतंत्रता अनुच्छेद 21, और अदालत से कहें कि वह उस अधिकार को प्रस्तावना की रोशनी में पढ़े। जज ठीक यही करते हैं: जब किसी क़ानून को दो तरह से पढ़ा जा सकता हो, तो वे वह पाठ चुनते हैं जो न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुता के काम आए।

सुझावप्रस्तावना को संविधान के हर दूसरे पन्ने को पढ़ने की चाबी समझिए। जब आप पूछें कि कोई नियम उचित है या नहीं, तो शुरुआत यह पूछकर करें कि वह चार वादों में से किसे पूरा करता है या किसे तोड़ता है।

एक नागरिक इसे कैसे इस्तेमाल करे

  1. अधिकार का नाम लें। प्रस्तावना के वादे को उस ख़ास अनुच्छेद में बदलें जो लागू होता है: समानता (अनुच्छेद 14, 15, 16), बोलने, इकट्ठा होने और आने-जाने की आज़ादी (अनुच्छेद 19), धर्म (अनुच्छेद 25), जीवन, गरिमा और निजता (अनुच्छेद 21), शिक्षा (अनुच्छेद 21A)।
  2. लिखकर दें। किसी सरकारी दफ़्तर में शिकायत करते समय लिखें कि क्या हुआ, यह किस अधिकार को तोड़ता है, और आप क्या चाहते हैं। एक छोटी लिखित शिकायत, जिसकी कॉपी आपके पास हो, दस चक्करों से ज़्यादा काम की है।
  3. शिकायत की सीढ़ी चढ़ें। विभाग प्रमुख, फिर ऑनलाइन लोक शिकायत पोर्टल, फिर अधिकारियों द्वारा उल्लंघन पर राज्य या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग।
  4. ज़रूरत हो तो रिट अदालत जाएँ। अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट और अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट मौलिक अधिकारों को सीधे लागू करा सकते हैं। महिलाओं, बच्चों, अनुसूचित जाति-जनजाति, विकलांग व्यक्तियों, हिरासत में बंद लोगों और आपके राज्य की तय आय-सीमा से नीचे के हर व्यक्ति के लिए क़ानूनी सहायता मुफ़्त है।
  5. सिखाएँ। अपने बच्चों के साथ प्रस्तावना पढ़ें और बात करें कि हर शब्द का क्या मतलब है। वादा उतना ही मज़बूत होता है जितने उसे याद रखने वाले लोग।
उदाहरण

सुनीता राजस्थान के एक गाँव की चुनी हुई सरपंच हैं और दलित महिला हैं। कुछ लोग कहते हैं कि गणतंत्र दिवस पर झंडा वे नहीं फहरा सकतीं; पुराने सरपंच फहराएँगे। वे उपखंड मजिस्ट्रेट (SDM) को एक पन्ने की शिकायत लिखती हैं: वे क़ानूनन चुनी हुई प्रमुख हैं, संविधान प्रतिष्ठा की समानता और हर व्यक्ति की गरिमा का वादा करता है, और उन्हें रोकना अनुच्छेद 15 और अनुच्छेद 17 के तहत जातिगत भेदभाव होगा। वे ज़िला कलेक्टर और ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण को कॉपी भेजती हैं। SDM समारोह में तहसीलदार और पुलिस भेजते हैं। सुनीता झंडा फहराती हैं।

सावधान

सिर्फ़ प्रस्तावना के भरोसे याचिका या शिकायत न करें; वह ख़ारिज हो जाएगी। अपनी शिकायत को हमेशा किसी ख़ास मौलिक अधिकार या क़ानून से जोड़ें, और प्रस्तावना का इस्तेमाल यह समझाने के लिए करें कि उस अधिकार को उदारता से क्यों पढ़ा जाना चाहिए।

कहाँ जाएँ

  • संबंधित दफ़्तर में लिखित शिकायत, जिस अधिकार पर आप टिके हैं उसका हवाला देते हुए; कॉपी रखें।
  • लोक शिकायत पोर्टल: pgportal.gov.in केंद्र और ज़्यादातर राज्य विभागों के लिए।
  • राज्य / राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग सरकारी कर्मचारियों द्वारा उल्लंघन पर।
  • ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (15100) मुफ़्त वकील और रिट याचिका बनाने में मदद के लिए।
  • हाई कोर्ट (अनुच्छेद 226) या सुप्रीम कोर्ट (अनुच्छेद 32) मौलिक अधिकार लागू कराने के लिए।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या प्रस्तावना भारत के संविधान का हिस्सा है?

हाँ। Kesavananda Bharati v. State of Kerala (1973) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रस्तावना संविधान का हिस्सा है और अदालतों को बाक़ी पाठ समझने में इसका इस्तेमाल करना चाहिए। इसने Berubari Union (1960) की पुरानी राय को पलट दिया। इसके मूल आदर्श उस मूल ढाँचे का हिस्सा हैं जिसे संसद नष्ट नहीं कर सकती।

क्या प्रस्तावना में संशोधन हो सकता है?

हाँ, अनुच्छेद 368 के तहत संवैधानिक संशोधन से, बशर्ते मूल ढाँचे को नुक़सान न पहुँचे। इसमें एक बार संशोधन हुआ है, 1976 के 42वें संशोधन से, जिसने "समाजवादी", "पंथनिरपेक्ष" और "अखंडता" जोड़े। नवंबर 2024 में सुप्रीम कोर्ट ने इन जोड़ों को चुनौती देने वाली याचिकाएँ ख़ारिज कर दीं।

क्या मैं प्रस्तावना के आधार पर अदालत में केस कर सकता हूँ?

सिर्फ़ प्रस्तावना के आधार पर नहीं। यह अपने आप में लागू कराने योग्य अधिकार नहीं है। आपको किसी ख़ास मौलिक अधिकार, जैसे अनुच्छेद 14, 19 या 21, या किसी क़ानून का सहारा लेना होगा, और अदालत से कहना होगा कि वह उस प्रावधान को प्रस्तावना के वादों की रोशनी में पढ़े। अदालतें नियमित रूप से ऐसा करती हैं।

भारतीय संविधान में "पंथनिरपेक्ष" और "समाजवादी" का क्या मतलब है?

"पंथनिरपेक्ष" का मतलब है कि राज्य का अपना कोई धर्म नहीं है और उसे सभी धर्मों के साथ बराबर बर्ताव करना है; सुप्रीम कोर्ट ने इसे मूल ढाँचे का हिस्सा माना है। "समाजवादी" का मतलब है कि राज्य असमानता घटाने और कल्याण की न्यूनतम सुरक्षा देने के लिए प्रतिबद्ध है; अदालतों ने साफ़ किया है कि यह निजी उद्यम या बाज़ार अर्थव्यवस्था पर रोक नहीं लगाता।

प्रस्तावना कब अपनाई गई और कब लागू हुई?

संविधान सभा ने प्रस्तावना समेत संविधान को 26 नवंबर 1949 को अपनाया, जिसे संविधान दिवस के रूप में मनाया जाता है। यह 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ, जिसे गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है। प्रस्तावना में अपनाने की तारीख़, 26 नवंबर 1949, दर्ज है।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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