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A weekly market in Balasore, Odishaधन

फ़ोटो: Subhashish Panigrahi, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0. सांकेतिक चित्र.

ख़राब सामान या ख़राब सेवा? उपभोक्ता शिकायत दर्ज करें

न्याय पाठशाला7 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

उपभोक्ता कौन है, 1915 हेल्पलाइन, कौन-सा आयोग, फ़ीस (₹5 लाख तक शून्य), ई-दाख़िल से केस, 2 साल की सीमा और आयोग क्या आदेश दे सकता है।

क़ानून: धाराएँ 2(7), 34, 35, 38, 39, 69 · उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019

संक्षेप में

  • अगर आपने सामान या सेवा के पैसे दिए (ऑनलाइन भी) और ख़राब सामान, घटिया सेवा, ज़्यादा दाम या झूठा वादा मिला, तो आप उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत शिकायत कर सकते हैं।
  • पहले विक्रेता को लिखित शिकायत करें, फिर 1915 (राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन) पर कॉल करें, फिर उपभोक्ता आयोग में केस करें, ऑनलाइन edaakhil.nic.in पर या काग़ज़ पर।
  • ₹5 लाख तक के दावों पर कोई फ़ीस नहीं। आप जहाँ रहते हैं वहाँ केस कर सकते हैं, और वकील ज़रूरी नहीं।
  • समस्या के 2 साल के अंदर केस करें धारा 69 CPA। बिल, स्क्रीनशॉट और हर जवाब संभालकर रखें।

महीने भर में बंद हो गया फ़ोन, दो साल लेट बिल्डर, आपका सामान खो देने वाली एयरलाइन, सही दावा ठुकराने वाली बीमा कंपनी: ये सब उपभोक्ता विवाद हैं, और भारत में इनके लिए अलग, सस्ती अदालत व्यवस्था है। यह लेख बताता है कि आप कब पात्र हैं, पहले क्या करें, और केस कैसे दर्ज करें।

उपभोक्ता कौन है?

आप उपभोक्ता (consumer) हैं अगर आपने क़ीमत देकर सामान ख़रीदा या सेवा ली, किस्तों या बाद में भुगतान पर भी, और ऑनलाइन, फ़ोन या टेलीशॉपिंग से की गई ख़रीद भी इसमें शामिल है धारा 2(7) CPA। सेवाओं में बैंकिंग, बीमा, टेलीकॉम, बिजली, परिवहन, मकान निर्माण, शिक्षा सेवाएँ, अस्पताल और मरम्मत आते हैं।

आप उपभोक्ता नहीं हैं अगर सामान दोबारा बेचने या व्यावसायिक मक़सद (बेकरी का ओवन ख़रीदना) से लिया, सिवाय इसके कि आप उससे स्वरोज़गार के ज़रिए अपनी रोज़ी कमाते हों। मुफ़्त सेवाएँ और नौकरी के अनुबंध वाली सेवाएँ भी अधिनियम से बाहर हैं।

किस बात की शिकायत कर सकते हैं

  • सामान में दोष (defect): गुणवत्ता, मात्रा, शुद्धता या मानक में कमी, या जो वादा था वैसा न होना।
  • सेवा में कमी (deficiency): गुणवत्ता या काम के तरीक़े में कोई कमी, लापरवाही और जानकारी छिपाना शामिल।
  • अनुचित व्यापार व्यवहार (unfair trade practice): झूठे दावे, भ्रामक विज्ञापन, बिल न देना, ख़राब सामान वापस लेने या तय समय में रिफ़ंड से मना करना धारा 2(47) CPA।
  • छपे MRP या तय दाम से ज़्यादा वसूली, और एकतरफ़ा जुर्माने जैसी अनुचित अनुबंध शर्तें।
  • उत्पाद दायित्व (product liability): ख़राब उत्पाद से हुआ नुक़सान, जिसका दावा निर्माता, विक्रेता या सेवा प्रदाता से किया जा सकता है।

क़ानून क्या कहता है

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 ने 1986 के क़ानून की जगह ली। इसने तीन स्तर के उपभोक्ता आयोग बनाए। आप किस आयोग में जाएँगे, यह सामान या सेवा की चुकाई गई क़ीमत पर निर्भर करता है (माँगे गए मुआवज़े पर नहीं), 2021 में अधिसूचित नियमों के मुताबिक़:

  • ज़िला आयोग: ₹50 लाख तक।
  • राज्य आयोग: ₹50 लाख से ऊपर और ₹2 करोड़ तक।
  • राष्ट्रीय आयोग (NCDRC): ₹2 करोड़ से ऊपर।

आप वहाँ केस कर सकते हैं जहाँ आप रहते या काम करते हैं, सिर्फ़ वहाँ नहीं जहाँ विक्रेता या उसकी शाखा है धारा 34 CPA। आयोग रिफ़ंड, बदली, मरम्मत, दोष दूर करने, नुक़सान या परेशानी के मुआवज़े, अनुचित व्यवहार बंद करने और ख़र्च का आदेश दे सकता है धारा 39 CPA। उसे दूसरे पक्ष को नोटिस मिलने के तीन महीने में, या सामान की जाँच ज़रूरी हो तो पाँच महीने में फ़ैसला करना चाहिए धारा 38 CPA; व्यवहार में अक्सर ज़्यादा समय लगता है। कोई पक्ष आदेश न माने तो आयोग क़ैद और जुर्माना लगा सकता है धारा 72 CPA।

फ़ीस (2020 के केंद्रीय नियम): ₹5 लाख तक के दावों पर शून्य; ₹5 से 10 लाख पर ₹200; ₹10 से 20 लाख पर ₹400; ₹20 से 50 लाख पर ₹1,000; ₹50 लाख से ₹1 करोड़ पर ₹2,000। फ़ीस डिमांड ड्राफ़्ट, पोस्टल ऑर्डर या ऑनलाइन दी जाती है।

ज़िला आयोग के आदेश के ख़िलाफ़ अपील राज्य आयोग में 45 दिन के अंदर होती है धारा 41 CPA; पैसे के आदेश के ख़िलाफ़ अपील करने वाले व्यापारी को पहले आधी रक़म जमा करनी होती है।

क़दम दर क़दम

  1. विक्रेता या सेवा प्रदाता को लिखें। कस्टमर केयर और शिकायत अधिकारी (grievance officer) को ईमेल या पत्र: क्या ग़लत हुआ, आप क्या चाहते हैं (रिफ़ंड, बदली, मरम्मत, मुआवज़ा) और 15 दिन की समय सीमा। भेजी गई कॉपी और हर जवाब संभालें।
  2. 1915 पर कॉल करें या consumerhelpline.gov.in पर दर्ज करें। राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन आपकी शिकायत कंपनी को भेजती है; कई ब्रांड "कन्वर्जेंस पार्टनर" हैं और इसी स्तर पर मामला निपटा देते हैं। इसका कोई ख़र्च नहीं और यह आपको आयोग जाने से नहीं रोकता।
  3. क़ानूनी नोटिस भेजें (वैकल्पिक, पर उपयोगी)। आपका या वकील का 15 दिन का सादा नोटिस अक्सर समझौता करा देता है और आपकी शिकायत में सबूत बनता है।
  4. शिकायत तैयार करें। आपका नाम-पता, विपक्षी पक्ष का नाम-पता, तारीख़वार तथ्य, जिन दस्तावेज़ों पर भरोसा है, और रक़म के साथ माँगी गई राहत। तथ्यों की पुष्टि का शपथपत्र (affidavit) जोड़ें। कोई ख़ास फ़ॉर्म ज़रूरी नहीं।
  5. दर्ज करें: ऑनलाइन edaakhil.nic.in पर (शिकायत, शपथपत्र और दस्तावेज़ों की PDF अपलोड करें, फ़ीस ऑनलाइन दें), या ज़िला आयोग में काग़ज़ पर ज़रूरी प्रतियों के साथ।
  6. सुनवाइयों में जाएँ। आयोग दूसरे पक्ष को नोटिस देता है; वे जवाब दाख़िल करते हैं; आप प्रत्युत्तर दे सकते हैं; फिर बहस। आपको धारा 37 CPA के तहत मध्यस्थता (mediation) का विकल्प मिल सकता है; वहाँ हुआ समझौता बाध्यकारी और तेज़ होता है। आप ख़ुद या किसी अधिकृत व्यक्ति के ज़रिए बहस कर सकते हैं।
  7. आदेश लागू कराएँ। व्यापारी तय समय में पालन न करे तो उसी आयोग में निष्पादन (execution) अर्ज़ी दें।
सुझाववही माँगें जो साबित कर सकें: चुकाई गई क़ीमत, दस्तावेज़ी अतिरिक्त ख़र्च, और मानसिक परेशानी व मुक़दमे के ख़र्च की वाजिब रक़म। बढ़ा-चढ़ाकर माँगे गए दावे केस धीमा करते हैं और सख़्त जाँच बुलाते हैं।
उदाहरण

भोपाल की शिक्षिका अंजलि ने ऑनलाइन ₹32,000 की वॉशिंग मशीन ख़रीदी। दूसरे हफ़्ते से उसमें रिसाव शुरू हो गया; विक्रेता के चैट सपोर्ट ने तीन टिकट "हल हो गया" कहकर बंद कर दिए। उन्होंने ब्रांड के शिकायत अधिकारी को फ़ोटो और 15 दिन की समय सीमा के साथ ईमेल किया, फिर 1915 पर शिकायत दर्ज की। रिफ़ंड नहीं आया। ई-दाख़िल से उन्होंने भोपाल ज़िला आयोग में बिना फ़ीस केस किया, इनवॉइस, चैट के स्क्रीनशॉट, अपने ईमेल और छोटा शपथपत्र लगाकर। दूसरी सुनवाई में कंपनी ने मध्यस्थता में पूरा रिफ़ंड और ₹5,000 ख़र्च देने की पेशकश की। उन्होंने मान लिया, और समझौता आदेश के रूप में दर्ज हुआ।

ये तैयार रखें

  • इनवॉइस या ऑर्डर की पुष्टि, भुगतान का सबूत, वारंटी या गारंटी कार्ड, डिलीवरी पर्ची।
  • उत्पाद पेज, विज्ञापन या ऑफ़र के स्क्रीनशॉट, और चैट व शिकायत टिकटों के।
  • विक्रेता को भेजे ईमेल-पत्र और सारे जवाब; 1915 का डॉकेट नंबर।
  • दोष की फ़ोटो या वीडियो; सर्विस या मरम्मत की जॉब शीट; हो तो तकनीशियन की रिपोर्ट।
  • आपका पहचान और पते का प्रमाण; विपक्षी का पंजीकृत पता (इनवॉइस, वेबसाइट या MCA रिकॉर्ड से)।
सावधान

कंपनी महीनों "एस्केलेट" करती रहे तो इंतज़ार में न बैठें: 2 साल की समय सीमा समस्या शुरू होने से चलती है, और आयोग देरी तभी माफ़ करता है जब आप ठोस वजह दिखाएँ। और सिर्फ़ ब्रांड के मार्केटिंग नाम के ख़िलाफ़ केस न करें; क़ानूनी इकाई (कंपनी) और इनवॉइस पर लिखे विक्रेता का नाम लिखें।

कहाँ जाएँ

  • पहले: विक्रेता का कस्टमर केयर और उसकी वेबसाइट पर नामित शिकायत अधिकारी (ई-कॉमर्स साइटों को एक नामित करना ज़रूरी है)।
  • फिर: राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन 1915, consumerhelpline.gov.in।
  • क्षेत्रीय नियामक बैंक और बीमा के लिए: RBI लोकपाल cms.rbi.org.in; बीमा के लिए bimabharosa.irdai.gov.in। ये मुफ़्त हैं और उपभोक्ता शिकायत का रास्ता बंद नहीं करते।
  • उपभोक्ता आयोग: edaakhil.nic.in पर या अपने ज़िला आयोग में; अपील राज्य और राष्ट्रीय आयोग में।
  • मुफ़्त क़ानूनी मदद: 15100 (NALSA)। महिलाएँ, SC/ST, दिव्यांग और कम आय वाले लोग पात्र हैं।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या उपभोक्ता शिकायत के लिए वकील ज़रूरी है?

नहीं। यह क़ानून इसलिए बना है कि उपभोक्ता ख़ुद पेश हो सकें, और फ़ॉर्म सरल हैं। मकान या चिकित्सकीय लापरवाही जैसे बड़े या तकनीकी मामलों में वकील मदद करता है। अगर आप मुफ़्त क़ानूनी सहायता के पात्र हैं (15100 पर कॉल करें), तो ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण वकील दे सकता है।

उपभोक्ता केस में कितना समय लगता है?

क़ानून कहता है नोटिस की तामील से तीन महीने, या जाँच ज़रूरी हो तो पाँच महीने (धारा 38 CPA)। असल समय आयोग के काम के बोझ पर निर्भर करता है; कई सरल मामले एक साल से कम में निपटते हैं, ख़ासकर मध्यस्थता से। 1915 के ज़रिए समझौते अक्सर कहीं तेज़ होते हैं।

क्या मैं ऑनलाइन मार्केटप्लेस के ख़िलाफ़ शिकायत कर सकता हूँ, या सिर्फ़ विक्रेता के?

दोनों को पक्ष बनाया जा सकता है। उपभोक्ता संरक्षण (ई-कॉमर्स) नियम, 2020 के तहत मार्केटप्लेस को विक्रेता का ब्योरा दिखाना, शिकायत अधिकारी नामित करना और 48 घंटे में शिकायत की पावती देना ज़रूरी है, और अपनी कमियों के लिए, जैसे वादा किया रिफ़ंड न देना, वे ज़िम्मेदार हो सकते हैं। इनवॉइस पर लिखे विक्रेता और प्लेटफ़ॉर्म, दोनों का नाम लिखें।

कंपनी आयोग का आदेश न माने तो?

उसी आयोग में निष्पादन अर्ज़ी दें। धारा 72 CPA के तहत आदेश न मानने पर एक महीने से तीन साल तक की क़ैद और जुर्माना हो सकता है, और आयोग रक़म अदालत की डिक्री की तरह वसूल भी करा सकता है। आदेश और उसकी तामील का सबूत साथ लगाएँ।

क्या सरकारी संस्था की सेवा, जैसे बिजली या अस्पताल, इसमें आती है?

हाँ, अगर आप उसके पैसे देते हैं। बिजली आपूर्ति, सरकारी अस्पताल में सशुल्क इलाज, रेलवे और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का बीमा, सब अधिनियम के तहत सेवाएँ हैं। मुफ़्त सेवाएँ, जैसे उस अस्पताल में इलाज जो किसी से कुछ नहीं लेता, इसमें नहीं आतीं।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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