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फ़ोटो: Monito, Wikimedia Commons, CC BY 2.0. सांकेतिक चित्र.

ग्रेच्युटी: किसे मिलती है, कितनी, और दावा कैसे करें

न्याय पाठशाला8 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

पाँच साल की सेवा (फ़िक्स्ड-टर्म में एक साल), हर साल 15 दिन की मज़दूरी, 30 दिन में भुगतान, और नियोक्ता मना करे तो क्या करें।

क़ानून: धारा 53, 55 और 56, सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020

संक्षेप में

  • लगातार 5 साल की सेवा के बाद नौकरी छोड़ने पर ग्रेच्युटी मिलती है, चाहे रिटायरमेंट हो, इस्तीफ़ा, बर्ख़ास्तगी या छँटनी धारा 53(1), सामाजिक सुरक्षा संहिता।
  • फ़िक्स्ड-टर्म कर्मचारी को एक साल बाद आनुपातिक ग्रेच्युटी मिलती है। मृत्यु या विकलांगता में कोई न्यूनतम सेवा ज़रूरी नहीं।
  • रकम: हर पूरे साल के लिए 15 दिन की मज़दूरी धारा 53(2)। मासिक फ़ॉर्मूला: आख़िरी मज़दूरी × 15 × साल ÷ 26।
  • नियोक्ता को 30 दिन में भुगतान करना होगा, वरना देरी का साधारण ब्याज देना होगा धारा 56(3), 56(4)।
  • मना करे? ग्रेच्युटी के सक्षम प्राधिकारी (श्रम अधिकारी) के पास जाएँ। मुफ़्त क़ानूनी मदद: 15100।

आप कई साल बाद नौकरी छोड़ रहे हैं और जानना चाहते हैं कि ग्रेच्युटी मिलेगी या नहीं, कितनी मिलेगी, और अगर एचआर कहे "आप हक़दार नहीं" या "कंपनी पॉलिसी में नहीं है" तो क्या करें। यह लेख आज लागू क़ानून के हिसाब से इन सवालों का जवाब देता है।

ग्रेच्युटी क्या है

ग्रेच्युटी वह एकमुश्त रकम है जो लंबी सेवा के बाद नौकरी ख़त्म होने पर नियोक्ता को देनी ही होती है। यह तोहफ़ा या बोनस नहीं, आपका क़ानूनी हक़ है। नियोक्ता इसे किसी अनुबंध, नियुक्ति-पत्र या "पॉलिसी" से कम नहीं कर सकता। अगर अनुबंध में ज़्यादा लिखा है, तो आपको ज़्यादा रकम मिलेगी।

21 नवंबर 2025 से ग्रेच्युटी सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के अध्याय V के तहत आती है, जिसने ग्रेच्युटी भुगतान अधिनियम, 1972 की जगह ली है। पुराने ज़्यादातर नियम वैसे ही हैं, कुछ सुधार के साथ।

किन पर लागू है

यह क़ानून फ़ैक्टरियों, खदानों, बागानों, बंदरगाहों, रेलवे कंपनियों और उन दुकानों या प्रतिष्ठानों पर लागू है जिनमें पिछले 12 महीनों में किसी भी दिन 10 या ज़्यादा लोग काम करते थे। एक बार दायरे में आने के बाद, कर्मचारी कम हो जाएँ तब भी प्रतिष्ठान दायरे में रहता है। सरकार अधिसूचना से इसे दूसरे प्रतिष्ठानों तक बढ़ा सकती है।

यह वहाँ के सभी कर्मचारियों पर लागू है, वेतन या पद चाहे जो हो: मज़दूर, क्लर्क, सुपरवाइज़र और मैनेजर।

कब हक़दार हैं

धारा 53(1), सामाजिक सुरक्षा संहिता के तहत, कम से कम लगातार पाँच साल की सेवा के बाद नौकरी ख़त्म होने पर ग्रेच्युटी देय है। नौकरी सेवानिवृत्ति की उम्र (superannuation), रिटायरमेंट, इस्तीफ़े, बर्ख़ास्तगी या छँटनी, किसी भी वजह से ख़त्म हो, फ़र्क़ नहीं पड़ता।

इन मामलों में पाँच साल की शर्त लागू नहीं होती:

  • मृत्यु या विकलांगता। अगर कर्मचारी की मृत्यु हो जाए या दुर्घटना या बीमारी से वह विकलांग हो जाए, तो सेवा कितनी भी कम हो, ग्रेच्युटी देनी होगी। मृत्यु पर यह नामिनी को, और नामिनी न हो तो क़ानूनी वारिसों को मिलती है।
  • फ़िक्स्ड-टर्म कर्मचारी। अगर आपको तय अवधि के लिए रखा गया था, तो एक साल की सेवा पूरी होने पर आप आनुपातिक (pro rata) ग्रेच्युटी के हक़दार हैं। संहिता का यह सबसे बड़ा बदलाव है।
  • कार्यरत पत्रकार तीन साल बाद हक़दार होते हैं।

"लगातार सेवा" में बीमारी, दुर्घटना, मंज़ूर छुट्टी, क़ानूनी हड़ताल या आपकी ग़लती के बिना हुई ले-ऑफ़ की अवधि भी गिनी जाती है। पुराने अधिनियम के तहत कई हाई कोर्ट ने चार साल और पाँचवें साल में 240 दिन काम को पाँच साल पूरा माना था। संहिता के तहत यही राय लागू होगी या नहीं, यह अभी तय नहीं है, इसलिए अगर आप इस सीमा के क़रीब हैं तो इस्तीफ़े से पहले सलाह ले लें।

कितनी रकम मिलनी चाहिए

ग्रेच्युटी आपकी आख़िरी मज़दूरी के आधार पर हर पूरे साल के लिए 15 दिन की मज़दूरी है धारा 53(2)। साल का छह महीने से ज़्यादा हिस्सा पूरा साल गिना जाता है। मासिक वेतन वालों के लिए महीने को 26 कामकाजी दिन माना जाता है, इसलिए फ़ॉर्मूला है:

आख़िरी मासिक मज़दूरी × 15 × सेवा के साल ÷ 26

मसलन, अगर आपका आख़िरी बेसिक पे और महँगाई भत्ता (DA) ₹26,000 था और आपने 7 साल 8 महीने काम किया, तो 8 साल गिने जाएँगे। ग्रेच्युटी = 26,000 × 15 × 8 ÷ 26 = ₹1,20,000।

यहाँ "मज़दूरी" का मतलब है बेसिक पे, महँगाई भत्ता और रिटेनिंग अलाउंस। संहिता के तहत अगर एचआरए या कन्वेयंस जैसे भत्ते कुल वेतन के आधे से ज़्यादा हैं, तो अतिरिक्त हिस्सा मज़दूरी में जोड़ा जाता है। इससे नियोक्ता बेसिक पे कम रखकर ग्रेच्युटी नहीं घटा सकता।

केंद्र सरकार अधिसूचना से ग्रेच्युटी की अधिकतम सीमा (ceiling) तय कर सकती है। पुराने अधिनियम में यह ₹20 लाख थी। बड़ी रकम का हिसाब लगाने से पहले मौजूदा अधिसूचित सीमा जाँच लें। नियोक्ता सीमा से ज़्यादा भी दे सकता है, और आयकर क़ानून की तय सीमा तक ग्रेच्युटी आम तौर पर कर-मुक्त होती है।

ग्रेच्युटी कब रोकी जा सकती है

ग्रेच्युटी सिर्फ़ क़ानून में लिखे आधारों पर, और तभी काटी या ज़ब्त की जा सकती है जब आपको उस आचरण के लिए बर्ख़ास्त किया गया हो:

  • अगर नियोक्ता की संपत्ति को जानबूझकर नुक़सान पहुँचाने के लिए बर्ख़ास्त किया गया, तो उतने नुक़सान तक रकम काटी जा सकती है।
  • दंगाई या हिंसक आचरण, या नैतिक अधमता (moral turpitude, जैसे धोखाधड़ी या चोरी जैसा गंभीर बेईमान काम) वाले अपराध के लिए बर्ख़ास्तगी पर यह पूरी या आंशिक रूप से ज़ब्त हो सकती है।

नोटिस पीरियड पूरा न करने, प्रतिद्वंद्वी कंपनी में जाने, ठीक से "हैंडओवर" न करने या किसी और विवाद के कारण नियोक्ता ग्रेच्युटी नहीं रोक सकता। वे अलग मामले हैं और अलग से सुलझाए जाने चाहिए।

क़दम दर क़दम: ग्रेच्युटी का दावा

  1. नामांकन जाँचें। नौकरी में रहते हुए ही नियोक्ता के पास ग्रेच्युटी का नामांकन (nomination) भरें या अपडेट करें। इससे कुछ होने पर परिवार जल्दी दावा कर पाता है।
  2. लिखित आवेदन दें। ग्रेच्युटी देय होते ही नियमों में तय फ़ॉर्म में नियोक्ता को लिखित आवेदन दें (एचआर के पास आम तौर पर होता है)। जॉइनिंग की तारीख़, आख़िरी दिन, आख़िरी मज़दूरी और आपके हिसाब से रकम लिखें। ईमेल और रजिस्टर्ड डाक दोनों से भेजें, और पावती रखें।
  3. 30 दिन इंतज़ार करें। नियोक्ता को रकम तय करके, आपको बताकर, देय तारीख़ से 30 दिन में भुगतान करना है धारा 56(3)। देर होने पर उसे अधिसूचित दर से देरी का साधारण ब्याज देना होगा धारा 56(4)।
  4. सक्षम प्राधिकारी के पास जाएँ। अगर नियोक्ता मना करे, कम दे या आपकी पात्रता पर विवाद करे, तो ग्रेच्युटी के सक्षम प्राधिकारी (competent authority), आम तौर पर राज्य या केंद्रीय श्रम विभाग के श्रम अधिकारी, को आवेदन दें। प्राधिकारी दोनों पक्षों को सुनकर रकम तय करता है और नियोक्ता से वसूली का आदेश दे सकता है।
  5. ज़रूरत हो तो अपील करें। दोनों में से कोई भी पक्ष आदेश के ख़िलाफ़ अपीलीय प्राधिकारी के पास आम तौर पर 60 दिन में अपील कर सकता है। अपील करने वाले नियोक्ता को पहले आदेशित रकम जमा करनी होती है।
उदाहरण

रमेश पुणे की एक ट्रेडिंग फ़र्म में 6 साल 9 महीने अकाउंटेंट रहे और बेहतर नौकरी के लिए इस्तीफ़ा दिया। एचआर ने कहा ग्रेच्युटी "सिर्फ़ रिटायर होने वालों को" मिलती है। रमेश ने ईमेल और डाक से लिखित दावा भेजा: आख़िरी बेसिक और DA ₹30,000, 7 साल गिने गए, यानी 30,000 × 15 × 7 ÷ 26 = ₹1,21,154। 30 दिन में भुगतान न होने पर उन्होंने नियुक्ति-पत्र, सैलरी स्लिप और रिलीविंग लेटर के साथ श्रम अधिकारी को आवेदन दिया। पहली ही सुनवाई में फ़र्म ने पूरी रकम देरी के ब्याज सहित चुका दी।

ये तैयार रखें

  • नियुक्ति-पत्र और रिलीविंग या बर्ख़ास्तगी पत्र (सेवा की तारीख़ें साबित करने के लिए)।
  • आख़िरी कुछ सैलरी स्लिप, जिनमें बेसिक पे और DA दिखे।
  • आपका लिखित दावा और उसके पहुँचने का सबूत (डाक रसीद, ईमेल)।
  • नियोक्ता का कोई जवाब, और रकम का आपका हिसाब।
  • मृत्यु के दावे में: मृत्यु प्रमाणपत्र, नामांकन फ़ॉर्म, नामिनी या वारिसों का पहचान-पत्र और बैंक विवरण।
सावधान

अगर ग्रेच्युटी मिली नहीं है, तो ऐसे "फ़ुल एंड फ़ाइनल सेटलमेंट" पर दस्तख़त न करें जिसमें लिखा हो कि ग्रेच्युटी समेत सारा बकाया मिल गया। जल्दबाज़ी में किया गया दस्तख़त विवाद को मुश्किल बना देता है। यह भी देखें कि उसी नियोक्ता के यहाँ ट्रेनी या कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी के रूप में वही काम करने की अवधि "सेवा के साल" में गिनी गई है।

कहाँ जाएँ

  • पहले: नियोक्ता का एचआर या अकाउंट्स विभाग, लिखित दावे के साथ।
  • फिर: ग्रेच्युटी का सक्षम प्राधिकारी, आम तौर पर आपके ज़िले के सहायक श्रम आयुक्त या श्रम अधिकारी। केंद्रीय क्षेत्र के प्रतिष्ठानों (बैंक, रेलवे, खदानें, केंद्रीय सार्वजनिक उपक्रम) के लिए क्षेत्रीय श्रम आयुक्त (केंद्रीय)। कई शिकायतें samadhan.labour.gov.in पर भी दर्ज हो सकती हैं।
  • अपील: आदेश में बताया गया अपीलीय प्राधिकारी।
  • मुफ़्त क़ानूनी मदद: 15100 या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (nalsa.gov.in)। ट्रेड यूनियन भी आपकी ओर से आवेदन कर सकती है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या 5 साल से पहले इस्तीफ़ा देने पर ग्रेच्युटी मिलती है?

आम तौर पर नहीं, जब तक आप फ़िक्स्ड-टर्म कर्मचारी न हों (एक साल बाद आनुपातिक), या नौकरी मृत्यु या विकलांगता से ख़त्म न हुई हो। अगर कुछ महीने कम पड़ रहे हैं, तो इस्तीफ़े से पहले देख लें कि सेवा कैसे गिनी जा रही है, क्योंकि छुट्टी और ले-ऑफ़ की अवधि भी लगातार सेवा में गिनी जा सकती है।

ग्रेच्युटी का हिसाब कैसे लगता है?

मासिक वेतन वालों के लिए: आख़िरी मासिक मज़दूरी (बेसिक और DA) × 15 × पूरे साल ÷ 26। साल का छह महीने से ज़्यादा हिस्सा पूरा साल गिना जाता है। अगर भत्ते कुल वेतन के आधे से ज़्यादा हैं, तो संहिता के तहत अतिरिक्त हिस्सा मज़दूरी में जुड़ता है।

नियोक्ता ग्रेच्युटी देने में कितना समय ले सकता है?

सामाजिक सुरक्षा संहिता की धारा 56(3) के तहत नियोक्ता को देय तारीख़ से 30 दिन में भुगतान करना होता है। देर होने पर धारा 56(4) के तहत देरी की अवधि का साधारण ब्याज देना होता है।

नोटिस पीरियड पूरा न करने पर क्या ग्रेच्युटी रोकी जा सकती है?

नहीं। ग्रेच्युटी सिर्फ़ तभी काटी या ज़ब्त हो सकती है जब आपको संपत्ति को नुक़सान, दंगाई या हिंसक आचरण, या नैतिक अधमता वाले अपराध के लिए बर्ख़ास्त किया गया हो। नोटिस या दूसरे विवाद अलग से सुलझाए जाने चाहिए।

कर्मचारी की मृत्यु पर ग्रेच्युटी किसे मिलती है?

नामिनी को। नामिनी न हो तो क़ानूनी वारिसों को। मृत्यु के मामले में न्यूनतम सेवा की शर्त नहीं है, इसलिए परिवार नियोक्ता से दावा करे, और भुगतान न हो तो सक्षम प्राधिकारी के पास जाए।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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