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Horn loudspeakers mounted on a pole during a festivalस्वतंत्रता

फ़ोटो: A.D.Balasubramaniyan, Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0. सांकेतिक चित्र.

नफ़रती भाषण का क़ानून: BNS की धाराएँ और शिकायत कैसे करें

न्याय पाठशाला8 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

धारा 196, 197, 299, 302 और 353 BNS में नफ़रती भाषण (hate speech) क्या है, आलोचना कहाँ ख़त्म और अपराध कहाँ शुरू होता है, और ऑफ़लाइन-ऑनलाइन शिकायत का सही तरीक़ा।

क़ानून: अनुच्छेद 19(2), भारत का संविधान · धारा 196, 197, 299, 302 और 353 BNS (पहले धारा 153A, 153B, 295A, 298 और 505 IPC)

संक्षेप में

  • भारत में "नफ़रती भाषण" (hate speech) का कोई एक अपराध नहीं है। मुख्य प्रावधान धारा 196, 197, 299, 302 और 353 BNS हैं: समूहों के बीच वैमनस्य फैलाना, धर्म का अपमान, और नफ़रत पैदा करने वाली अफ़वाहें।
  • विचारों, नेताओं या नीतियों की आलोचना बोलने की आज़ादी है। लोगों पर उनकी पहचान के कारण हमला करना, उन्हें दुश्मन बताना या दूसरों को उन्हें नुकसान पहुँचाने या बहिष्कार के लिए उकसाना अपराध हो सकता है।
  • इनमें से ज़्यादातर अपराध संज्ञेय (cognizable, यानी पुलिस FIR दर्ज करके जाँच कर सकती है) हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया है कि शिकायत का इंतज़ार किए बिना ख़ुद FIR दर्ज करे।
  • स्क्रीनशॉट के साथ पुलिस, cybercrime.gov.in और प्लेटफ़ॉर्म पर शिकायत करें। हिंसा का डर हो तो 112 पर कॉल करें।

रैली का भाषण, सोशल मीडिया की पोस्ट या ग्रुप चैट का संदेश पड़ोसियों को एक-दूसरे के ख़िलाफ़ खड़ा कर सकता है। किसी समुदाय के ख़िलाफ़ हिंसा अक्सर उन शब्दों से शुरू होती है जो उसके लोगों को ख़तरनाक, ग़द्दार या इंसान से कम बताते हैं। भारत बोलने की आज़ादी की मज़बूती से रक्षा करता है, और समूहों के बीच नफ़रत फैलाने वाले भाषण को दंडित भी करता है। यह गाइड बताती है कि वह रेखा कहाँ है, धाराएँ क्या कहती हैं, और शिकायत कैसे करें कि सचमुच कार्रवाई हो।

संविधान क्या इजाज़त देता है

अनुच्छेद 19(1)(a) बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी की गारंटी देता है। अनुच्छेद 19(2) दूसरी बातों के अलावा सार्वजनिक व्यवस्था, शालीनता या नैतिकता, और अपराध के लिए उकसावे के हित में उचित पाबंदियों की इजाज़त देता है। नफ़रती भाषण के क़ानून इन्हीं आधारों पर टिके हैं।

मुख्य अपराध

  • धारा 196 BNS (पहले IPC की धारा 153A): धर्म, नस्ल, जन्म-स्थान, निवास, भाषा, जाति या समुदाय के आधार पर समूहों के बीच वैमनस्य फैलाना, शब्दों, संकेतों या इलेक्ट्रॉनिक संचार से, या सद्भाव के ख़िलाफ़ काम करना। तीन साल तक, या जुर्माना, या दोनों; पूजा-स्थल या धार्मिक सभा में किया हो तो पाँच साल तक और जुर्माना।
  • धारा 197 BNS (पहले धारा 153B): यह कहना कि कोई वर्ग अपने धर्म, नस्ल, भाषा, जाति या समुदाय के कारण संविधान के प्रति वफ़ादार नहीं हो सकता या उसे नागरिक अधिकारों से वंचित किया जाए। इसमें भारत की संप्रभुता, एकता, अखंडता या सुरक्षा को ख़तरे में डालने वाली झूठी या भ्रामक जानकारी प्रकाशित करना भी शामिल है। तीन साल तक, या जुर्माना, या दोनों; पूजा-स्थल में पाँच साल।
  • धारा 299 BNS (पहले धारा 295A): किसी वर्ग की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के इरादे से, जानबूझकर और दुर्भावना से, उसके धर्म या आस्था का अपमान। तीन साल तक, या जुर्माना, या दोनों।
  • धारा 302 BNS (पहले धारा 298): किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाने के जानबूझे इरादे से कहे गए शब्द, आवाज़ें या इशारे। एक साल तक, या जुर्माना, या दोनों।
  • धारा 353 BNS (पहले धारा 505): ऐसे बयान, अफ़वाहें या डराने वाली ख़बरें बनाना या फैलाना, इलेक्ट्रॉनिक रूप से भी, जो ऐसा डर या घबराहट पैदा करें जिससे अपराध हो सकता हो, या समूहों के बीच वैमनस्य, नफ़रत या दुर्भावना पैदा करें। तीन साल तक, या जुर्माना, या दोनों; पूजा-स्थल में पाँच साल। अगर व्यक्ति को बयान के सच होने का उचित आधार था और उसने नेकनीयती से साझा किया, तो अपराध नहीं है।

दो और नियम अहम हैं। धर्म, नस्ल, जाति, समुदाय या भाषा के आधार पर वैमनस्य फैलाकर वोट माँगना जन प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 में भ्रष्ट आचरण और अपराध है। और धारा 196, 197 और 299 BNS के मामले में अदालत सरकार की पूर्व मंज़ूरी (sanction) के बिना मामला नहीं ले सकती (धारा 217 BNSS), जो FIR के बाद भी मुकदमे धीमे चलने की एक वजह है।

बोलने की आज़ादी कहाँ ख़त्म होती है

  • Ramji Lal Modi v. State of U.P. (1957) में सुप्रीम कोर्ट ने पुरानी धारा 295A को सही ठहराया क्योंकि वह सिर्फ़ जानबूझे और दुर्भावनापूर्ण अपमान को दंडित करती है, हर उस टिप्पणी को नहीं जो चुभती है।
  • Bilal Ahmed Kaloo v. State of A.P. (1997) में अदालत ने कहा कि "वैमनस्य फैलाने" के लिए कम से कम दो समूह चाहिए। एक समूह या एक व्यक्ति की आलोचना, चाहे कितनी कड़ी हो, अपने आप काफ़ी नहीं।
  • Pravasi Bhalai Sangathan v. Union of India (2014) में अदालत ने बताया कि नफ़रती भाषण किसी समूह को हाशिये पर धकेलता है और समाज में उसकी हैसियत गिराता है, और विधि आयोग से क़ानून का अध्ययन करने को कहा।
  • Shaheen Abdulla v. Union of India (2022 और 2023) में अदालत ने सभी राज्यों की पुलिस को निर्देश दिया कि नफ़रती भाषण पर शिकायत का इंतज़ार किए बिना, वक्ता का धर्म चाहे जो हो, ख़ुद FIR दर्ज करे, और चेतावनी दी कि ऐसा न करना अदालत की अवमानना होगी।
सुझावएक आसान कसौटी: शब्द किसी विचार पर हैं या लोगों पर? "यह मान्यता ग़लत है" तर्क है। "ये लोग ग़द्दार हैं, इनका बहिष्कार करो, इन्हें भगाओ" लोगों को उनकी पहचान के लिए निशाना बनाता है और नुकसान के लिए उकसाता है। क़ानून दूसरे को दंडित करता है।

व्यवहार में यह कैसे चलता है

संज्ञेय अपराध में पुलिस को FIR दर्ज करनी ही होती है (धारा 173 BNSS)। व्यवहार में, वक्ता ताक़तवर हो तो थाने कभी-कभी हिचकते हैं। तीन चीज़ें आपकी संभावना बढ़ाती हैं: तारीख़ सहित साफ़ सबूत, ऐसी लिखित शिकायत जो सटीक शब्द उद्धृत करे और धारा का नाम ले, और Shaheen Abdulla के निर्देशों का हवाला। ऑनलाइन सामग्री के लिए, IT नियम, 2021 (2026 के संशोधन के बाद) में प्लेटफ़ॉर्म को अदालत या अधिकृत सरकारी आदेश के तीन घंटे के भीतर ग़ैरक़ानूनी सामग्री हटानी होती है; शिकायत अधिकारी (grievance officer) को उपयोगकर्ता की शिकायत धीमी है पर रिकॉर्ड बनाती है और हटवाने तक ले जा सकती है।

क़दम दर क़दम: शिकायत कैसे करें

  1. सबूत दर्ज करें। तारीख़, समय, अकाउंट नाम और लिंक दिखाते स्क्रीनशॉट या रिकॉर्डिंग। भाषण हो तो जगह, समय, वक्ता और गवाह नोट करें। सामग्री आगे फ़ॉरवर्ड न करें; निजी तौर पर सेव करें।
  2. शिकायत लिखें। एक पन्ना: क्या कहा गया (उद्धृत करें), कहाँ और कब, किन समूहों को निशाना बनाया, और धाराएँ (धारा 196, 299 या 353 BNS)। सबूत संलग्न करें। दस्तख़त और तारीख़ डालें।
  3. थाने जाएँ, उस इलाक़े के जहाँ भाषण हुआ या जहाँ आपने पोस्ट देखी। FIR की मुफ़्त प्रति माँगें। थाना मना करे तो शिकायत पुलिस अधीक्षक (SP) को रजिस्टर्ड डाक या ईमेल से भेजें (धारा 173(4) BNSS)। फिर भी कुछ न हो तो धारा 175(3) BNSS में न्यायिक मजिस्ट्रेट से FIR दर्ज कराने का निर्देश माँगें।
  4. ऑनलाइन सामग्री की शिकायत cybercrime.gov.in पर और प्लेटफ़ॉर्म के शिकायत अधिकारी से करें। प्लेटफ़ॉर्म कार्रवाई न करे तो 30 दिन के भीतर gac.gov.in पर शिकायत अपीलीय समिति (Grievance Appellate Committee) में अपील करें।
  5. ख़तरा: हिंसा की धमकी हो तो 112 पर कॉल करें। क़ानूनी मदद के लिए 15100।
उदाहरण

इमरान को स्थानीय व्हाट्सऐप ग्रुप में एक वीडियो दिखता है जिसमें एक सार्वजनिक सभा का वक्ता उनके समुदाय के लोगों को "ग़द्दार" कहता है और भीड़ से उनकी दुकानों से ख़रीदारी बंद करने को कहता है। वे वीडियो तारीख़ सहित सेव करते हैं, जगह और सभा में मौजूद दो लोगों के नाम नोट करते हैं, और शब्दों को उद्धृत करते हुए धारा 196 और 353 BNS का हवाला देकर एक पन्ने की शिकायत लिखते हैं। थाना धीमा है, तो वे Shaheen Abdulla आदेश संलग्न करके पुलिस अधीक्षक को ईमेल करते हैं। हफ़्ते भर में FIR दर्ज होती है। वे वीडियो की शिकायत cybercrime.gov.in पर भी करते हैं, और आदेश के बाद प्लेटफ़ॉर्म उसे हटा देता है।

अगर आप पर आरोप है

FIR दोषसिद्धि नहीं है। FIR की प्रति माँगें, कोई बयान देने से पहले वकील से सलाह लें, और बिना सलाह जल्दबाज़ी में पोस्ट न हटाएँ, क्योंकि हटाने को सबूत मिटाना समझा जा सकता है। अदालतें पूरा भाषण, उसका संदर्भ, वक्ता का इरादा और एक समझदार व्यक्ति पर उसका संभावित असर देखती हैं, संदर्भ से काटे गए कुछ शब्द नहीं। व्यंग्य, अकादमिक बहस और किसी धर्म की प्रथाओं की बिना दुर्भावना की आलोचना को अदालतों ने संरक्षण दिया है। पुलिस आलोचना दबाने के लिए क़ानून का दुरुपयोग कर रही हो तो अग्रिम ज़मानत (anticipatory bail) और हाई कोर्ट में FIR रद्द कराना उपलब्ध उपाय हैं।

ये तैयार रखें

  • तारीख़, समय, अकाउंट नाम और URL सहित स्क्रीनशॉट या रिकॉर्डिंग; मूल फ़ाइल।
  • सटीक शब्दों की लिखित प्रति, ज़रूरत हो तो अनुवाद के साथ।
  • भाषण या सभा के गवाहों के नाम और संपर्क।
  • आपकी लिखित शिकायत, पुलिस की पावती या डाक रसीद के साथ।
  • प्लेटफ़ॉर्म शिकायत संख्या और शिकायत अधिकारी का कोई जवाब।
सावधान

नफ़रती वीडियो "बेनक़ाब करने के लिए" फ़ॉरवर्ड करना उसे और फैलाता है और ख़ुद धारा 353 BNS में आ सकता है। सेव करें, शिकायत करें, और फैलाएँ नहीं। साथ ही, सिर्फ़ भावनाएँ आहत होने से अपराध नहीं बनता: क़ानून को जानबूझा, दुर्भावनापूर्ण इरादा या समूहों के बीच वैमनस्य का असली ख़तरा चाहिए।

कहाँ जाएँ

  • स्थानीय थाना (FIR); फिर पुलिस अधीक्षक; फिर धारा 175(3) BNSS में न्यायिक मजिस्ट्रेट।
  • ऑनलाइन सामग्री के लिए cybercrime.gov.in या हेल्पलाइन 1930; प्लेटफ़ॉर्म शिकायत अधिकारी; अपील के लिए gac.gov.in।
  • चुनाव के दौरान ज़िला निर्वाचन अधिकारी; अधिकारियों की निष्क्रियता पर राष्ट्रीय या राज्य मानवाधिकार आयोग या अल्पसंख्यक आयोग।
  • आपातकाल 112; मुफ़्त क़ानूनी सहायता 15100 (NALSA)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या किसी धर्म की आलोचना नफ़रती भाषण है?

अपने आप में नहीं। धारा 299 BNS सिर्फ़ धार्मिक भावनाएँ भड़काने के इरादे से किए गए जानबूझे और दुर्भावनापूर्ण अपमान को दंडित करती है। धार्मिक प्रथाओं की ईमानदार आलोचना, अकादमिक चर्चा या बिना दुर्भावना का व्यंग्य संरक्षित भाषण है। अदालतें इरादा, संदर्भ और समझदार व्यक्ति पर संभावित असर देखती हैं।

क्या पुलिस बिना शिकायत के नफ़रती भाषण पर FIR दर्ज कर सकती है?

हाँ। धारा 196, 299 और 353 BNS के अपराध संज्ञेय हैं, और Shaheen Abdulla v. Union of India (2022–23) में सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों की पुलिस को निर्देश दिया कि नफ़रती भाषण की जानकारी मिलते ही, वक्ता का धर्म चाहे जो हो, ख़ुद FIR दर्ज करे। थाना कार्रवाई से मना करे तो आप इसका हवाला दे सकते हैं।

भारत में नफ़रती भाषण की सज़ा क्या है?

धारा 196, 197, 299 और 353 BNS में तीन साल तक की कैद, या जुर्माना, या दोनों; पूजा-स्थल या धार्मिक सभा में अपराध हो तो पाँच साल तक और जुर्माना। धारा 302 BNS (किसी व्यक्ति की धार्मिक भावनाओं को चोट) में एक साल तक। धारा 196, 197 और 299 में मुकदमे के लिए सरकार की मंज़ूरी चाहिए।

क्या व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड या कमेंट पर भी आरोप लग सकता है?

लग सकता है। धाराएँ "इलेक्ट्रॉनिक संचार" को शामिल करती हैं, और अदालतों ने ग्रुप संदेशों और सार्वजनिक कमेंट को प्रकाशन माना है। धारा 353 BNS उसे छूट देती है जिसे संदेश के सच होने का उचित विश्वास था और जिसने नेकनीयती से साझा किया, पर यह साफ़ तौर पर नफ़रती सामग्री को नहीं बचाता। किसी समुदाय को निशाना बनाने वाली सामग्री फ़ॉरवर्ड न करें।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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