BNSS में प्ली बार्गेनिंग: पात्रता, 30 दिन का नियम, सज़ा
कौन-से मामले प्ली बार्गेनिंग के योग्य हैं, आरोप तय होने से 30 दिन की समय-सीमा, अदालत स्वैच्छिकता कैसे जाँचती है, सज़ा कितनी घटती है, और जोखिम क्या हैं।
संक्षेप में
- प्ली बार्गेनिंग (plea bargaining) में आरोपी दोष मानता है, पीड़ित को मुआवज़ा देता है और काफ़ी हल्की सज़ा पाकर मामला जल्दी ख़त्म करता है (धारा 289 से 300 BNSS)।
- सिर्फ़ सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में; महिला या 14 साल से कम उम्र के बच्चे के ख़िलाफ़ अपराध, अधिसूचित सामाजिक-आर्थिक अपराध, और उसी अपराध में पहले दोषी व्यक्ति के लिए नहीं।
- ट्रायल कोर्ट में आरोप तय होने के 30 दिन के भीतर अर्ज़ी दें (धारा 290 BNSS), इस हलफ़नामे के साथ कि आप स्वेच्छा से अर्ज़ी दे रहे हैं।
- सज़ा न्यूनतम या अधिकतम की एक-चौथाई तक, और पहली बार के अपराधी के लिए छठे हिस्से तक घट सकती है (धारा 293 BNSS)। हिरासत में बिताया समय घटाया जाता है।
- यह फिर भी दोषसिद्धि है, और नियमित अपील नहीं होती। पहले वकील से बात करें; मुफ़्त क़ानूनी सहायता 15100 पर।
भारत में आपराधिक मुक़दमे सालों खिंच सकते हैं। कम गंभीर अपराध के आरोपी के लिए इंतज़ार सज़ा से भी भारी हो सकता है। प्ली बार्गेनिंग मामला जल्दी ख़त्म करने का रास्ता देती है: आरोपी दोष मानता है, पीड़ित को मुआवज़ा मिलता है, और अदालत हल्की सज़ा देती है। यह हर किसी के लिए सही नहीं, और हर मामले में उपलब्ध नहीं। यह गाइड बताती है कि कौन इसका इस्तेमाल कर सकता है, समय-सीमा क्या है, और फ़ैसले से पहले क्या तौलें।
प्ली बार्गेनिंग का मतलब
प्ली बार्गेनिंग अदालत की निगरानी में होने वाली प्रक्रिया है जिसमें आरोपी, अभियोजक, जाँच अधिकारी और पीड़ित मामले का "आपसी तौर पर संतोषजनक निपटारा" निकालते हैं, जिसका मतलब आमतौर पर दोष स्वीकार करना, पीड़ित को मुआवज़ा, और कम सज़ा है। इसे 2006 में पुरानी संहिता के अध्याय XXIA के रूप में जोड़ा गया था और अब यह भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता का अध्याय XXIII है, धारा 289 से 300 BNSS। कुछ देशों के उलट, यहाँ आरोप पर मोलभाव नहीं होता; सिर्फ़ सज़ा और मुआवज़े पर बातचीत होती है, और नियंत्रण जज के हाथ में रहता है।
कौन-से मामले योग्य हैं
धारा 289 BNSS के तहत प्ली बार्गेनिंग आरोपी को तब उपलब्ध है जब:
- अपराध की सज़ा सात साल तक की जेल हो, मौत या उम्रक़ैद नहीं;
- चार्जशीट दाख़िल हो चुकी हो (पुलिस मामला) या मजिस्ट्रेट ने शिकायत पर संज्ञान लेकर समन जारी कर दिया हो;
- अपराध केंद्र सरकार द्वारा देश की सामाजिक-आर्थिक स्थिति को प्रभावित करने वाला अधिसूचित न हो, और किसी महिला या चौदह साल से कम उम्र के बच्चे के ख़िलाफ़ न हो।
धारा 300 BNSS के तहत यह अध्याय किशोर न्याय अधिनियम के तहत आने वाले बच्चे पर लागू नहीं होता। उसी अपराध में पहले दोषी ठहराया व्यक्ति इसका इस्तेमाल नहीं कर सकता। आम उम्मीदवार हैं: चोरी, छोटी रक़म की धोखाधड़ी, साधारण चोट, आपराधिक अतिचार, लापरवाही के मामले और चेक बाउंस के मामले (जहाँ शिकायतकर्ता, आमतौर पर पाने वाला, पीड़ित है)।
प्रक्रिया कैसे चलती है
- 30 दिन में अर्ज़ी। धारा 290 BNSS के तहत आरोपी उस अदालत में, जहाँ मामला लंबित है, आरोप तय होने की तारीख़ से तीस दिन के भीतर अर्ज़ी देता है। यह समय-सीमा BNSS में नई है। अर्ज़ी में मामले का संक्षिप्त विवरण होता है और साथ में हलफ़नामा (affidavit) कि आरोपी स्वेच्छा से अर्ज़ी दे रहा है, अपराध की सज़ा समझता है, और उसी अपराध में पहले दोषी नहीं ठहराया गया।
- नोटिस और बंद कमरे में पूछताछ। अदालत अभियोजक या शिकायतकर्ता और आरोपी को नोटिस देती है, फिर आरोपी से बंद कमरे में (in camera, दूसरे पक्ष के बिना) पूछती है ताकि तसल्ली हो कि अर्ज़ी स्वैच्छिक है। दबाव दिखे, या उसी अपराध में पहले की दोषसिद्धि हो, तो अदालत अर्ज़ी ख़ारिज कर देती है और मुक़दमा ऐसे चलता है जैसे अर्ज़ी दी ही न गई हो।
- निपटारा तय करना। संतुष्ट होने पर अदालत अभियोजक, जाँच अधिकारी, पीड़ित और आरोपी (शिकायत मामले में शिकायतकर्ता और आरोपी) की बैठक के लिए समय देती है। आरोपी और पीड़ित दोनों अपना वकील ला सकते हैं। अदालत को सुनिश्चित करना होगा कि प्रक्रिया स्वैच्छिक है (धारा 291 BNSS)।
- रिपोर्ट और सज़ा। समझौता हो जाए तो अदालत सभी प्रतिभागियों के दस्तख़त वाली रिपोर्ट दर्ज करती है (धारा 292 BNSS), पीड़ित को तय मुआवज़ा दिलाती है, सज़ा पर पक्षों को सुनती है, और खुली अदालत में फ़ैसला सुनाती है (धारा 293 से 294 BNSS)। समझौता न हो तो मामला उसी चरण पर लौट जाता है जहाँ अर्ज़ी दी गई थी।
सज़ा कितनी घटती है
धारा 293 BNSS अदालत को इसी क्रम में चार विकल्प देती है:
- जहाँ अपराधी परिवीक्षा अधिनियम या धारा 401 BNSS इजाज़त दे, सदाचार की परिवीक्षा (probation) पर या चेतावनी देकर रिहाई;
- अपराध में न्यूनतम सज़ा हो तो उसका आधा, और पहली बार के अपराधी के लिए न्यूनतम का एक-चौथाई;
- न्यूनतम न हो तो अधिकतम सज़ा का एक-चौथाई, और पहली बार के अपराधी के लिए छठा हिस्सा।
हिरासत में पहले बिताया समय सज़ा में से घटाया जाता है (धारा 297 BNSS)। इसलिए जो विचाराधीन क़ैदी घटी हुई अवधि पहले ही काट चुका है, वह उसी दिन छूट सकता है।
फ़ायदे और जोखिम
- अंतिम फ़ैसला। धारा 295 BNSS के तहत फ़ैसले के ख़िलाफ़ कोई अपील नहीं, सिवाय सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका या हाई कोर्ट में रिट याचिका के।
- आपके बयान सुरक्षित हैं। धारा 299 BNSS के तहत प्ली बार्गेनिंग की अर्ज़ी या बैठक में कही बात किसी और मक़सद से इस्तेमाल नहीं हो सकती। बातचीत नाकाम हो तो मुक़दमा वहीं से चलता है।
- यह फिर भी दोषसिद्धि है। यह सरकारी नौकरी, वीज़ा, लाइसेंस और कुछ पेशों पर असर डाल सकती है। अर्ज़ी से पहले वकील से पूछें कि इस ख़ास अपराध में दोषसिद्धि का आप पर क्या असर होगा।
- पीड़ित इसका हिस्सा है। पीड़ित की सहमति ज़रूरी है और उसे समझौते में तय मुआवज़ा मिलता है। पीड़ित को मानने के लिए कोई मजबूर नहीं कर सकता।
पुणे का 26 साल का डिलीवरी राइडर अनिल क़रीब 40,000 रुपये का सामान न लौटाने पर धोखाधड़ी के आरोप में है, जिसमें सात साल तक की सज़ा है। उसका कोई पुराना रिकॉर्ड नहीं, और ज़मानत से पहले वह 40 दिन हिरासत में रहा। 3 जून को आरोप तय होते हैं। उसका क़ानूनी सहायता वकील 20 जून को, 30 दिन की अवधि के भीतर, हलफ़नामे के साथ प्ली बार्गेनिंग की अर्ज़ी देता है। मजिस्ट्रेट बंद कमरे में अनिल से पूछताछ करते हैं, फिर अभियोजक, जाँच अधिकारी और दुकान मालिक की बैठक बुलाते हैं। दो किस्तों में 40,000 रुपये लौटाने पर सहमति बनती है। अदालत पहली बार के अपराधी के तौर पर अनिल को उतनी सज़ा देती है जितनी उसकी हिरासत में पहले ही पूरी हो चुकी है, और मामला मुक़दमे से दो साल पहले ख़त्म हो जाता है।
ये तैयार रखें
- चार्जशीट या शिकायत, और आरोप तय करने का आदेश (30 दिन गिनने और अधिकतम सज़ा पक्की करने के लिए)
- उसी अपराध में पहले दोषी न होने का सबूत (वकील रिकॉर्ड जाँच करवा सकता है)
- हिरासत प्रमाणपत्र या रिमांड आदेश, धारा 297 के तहत समय घटाने के लिए
- मुआवज़ा देने का साधन, या किस्तों का व्यावहारिक प्रस्ताव
- नौकरी, वीज़ा या लाइसेंस पर दोषसिद्धि के असर से जुड़े काग़ज़
30 दिन की गिनती उस दिन से शुरू होती है जब अदालत आरोप तय करती है, गिरफ़्तारी या चार्जशीट से नहीं। चूक गए तो उस मामले में प्ली बार्गेनिंग ख़त्म। आरोप की सुनवाई से पहले वकील से बात करें, और किसी दलाल, पुलिसवाले या किसी और के "यह जल्दी होता है" कहने पर कभी दोष न मानें; जज आपसे अकेले में पूछेंगे कि किसी ने दबाव तो नहीं डाला, और आपको सच बताना चाहिए।
कहाँ जाएँ
- वह ट्रायल कोर्ट जहाँ आपका मामला लंबित है, अपने वकील के ज़रिए, धारा 290 की अर्ज़ी के लिए
- ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (ज़िला अदालत परिसर) या NALSA हेल्पलाइन 15100, सलाह और अर्ज़ी के लिए मुफ़्त वकील
- लोक अभियोजक या शिकायतकर्ता, अदालत के ज़रिए, समझौते की बैठक के लिए
- हाई कोर्ट (रिट) या सुप्रीम कोर्ट (विशेष अनुमति) सिर्फ़ तब जब प्रक्रिया में कुछ गंभीर ग़लत हुआ हो
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
प्ली बार्गेनिंग कौन इस्तेमाल नहीं कर सकता?
यह उपलब्ध नहीं है जहाँ अपराध की सज़ा मौत, उम्रक़ैद या सात साल से ज़्यादा हो; जहाँ अपराध महिला या 14 साल से कम उम्र के बच्चे के ख़िलाफ़ हुआ हो; केंद्र सरकार के अधिसूचित सामाजिक-आर्थिक अपराधों में; उसी अपराध में पहले दोषी ठहराए व्यक्ति के लिए; और किशोर न्याय अधिनियम के तहत बच्चों के लिए (धारा 289 और 300 BNSS)।
प्ली बार्गेनिंग की अर्ज़ी की समय-सीमा क्या है?
मुक़दमा चलाने वाली अदालत में आरोप तय होने की तारीख़ से तीस दिन (धारा 290 BNSS)। यह BNSS की नई समय-सीमा है; पुरानी संहिता में कोई नहीं थी। आरोप की सुनवाई से पहले वकील से इस विकल्प पर बात करें ताकि अर्ज़ी तैयार रहे।
क्या प्ली बार्गेन के बाद अपील हो सकती है?
प्ली बार्गेन पर दिए फ़ैसले के ख़िलाफ़ कोई नियमित अपील नहीं होती (धारा 295 BNSS)। सिर्फ़ अनुच्छेद 136 के तहत सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका या अनुच्छेद 226 और 227 के तहत हाई कोर्ट में रिट याचिका बचती है, जो दबाव से लिए गए प्ली जैसे दुर्लभ मामलों में ही सफल होती है।
पीड़ित सहमत न हो तो क्या होगा?
तब कोई आपसी संतोषजनक निपटारा नहीं होता और अदालत यह बात दर्ज करती है। मामला उसी चरण पर लौट जाता है जहाँ अर्ज़ी दी गई थी और मुक़दमा चलता है। प्ली बार्गेनिंग प्रक्रिया में आपने जो कहा, वह आपके ख़िलाफ़ इस्तेमाल नहीं हो सकता (धारा 299 BNSS)।
क्या प्ली बार्गेनिंग और मामले का समझौता (compounding) एक ही चीज़ है?
नहीं। धारा 359 BNSS के तहत समझौता पीड़ित और आरोपी के बीच सूचीबद्ध छोटे अपराधों में होता है और बरी होने पर ख़त्म होता है, बिना दोषसिद्धि के। प्ली बार्गेनिंग कम सज़ा के साथ दोषसिद्धि पर ख़त्म होती है और सात साल तक के ज़्यादा अपराधों में उपलब्ध है। आपका अपराध समझौता योग्य हो तो आमतौर पर समझौता बेहतर रास्ता है।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।
