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Old handcuffs and a key in a museum display caseस्वाधीनता

फ़ोटो: Battlesnake1, Wikimedia Commons, CC0. सांकेतिक चित्र.

निवारक निरोध: अनुच्छेद 22 के सुरक्षा उपाय और इससे कैसे लड़ें

न्याय पाठशाला7 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

NSA या राज्य के गुंडा एक्ट में बिना मुक़दमे हिरासत? आधार, प्रतिवेदन और सलाहकार बोर्ड के अधिकार, NSA की समय-सीमाएँ, और बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका।

क़ानून: अनुच्छेद 21 और 22, भारत का संविधान · धारा 3, 8, 10, 11 और 13, राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 · A.K. Roy v. Union of India (1982)

संक्षेप में

  • निवारक निरोध (preventive detention) बिना आरोप या मुक़दमे की हिरासत है, ताकि व्यक्ति वह न कर सके जिसका सरकार को डर है। अनुच्छेद 22(3) इसकी इजाज़त देता है, लेकिन सख़्त सुरक्षा उपायों के साथ।
  • बंदी को निरोध के आधार (grounds) लिखित में, उसकी समझ की भाषा में, और आदेश के ख़िलाफ़ प्रतिवेदन (representation, यानी लिखित आपत्ति) का जल्द से जल्द मौक़ा मिलना चाहिए (अनुच्छेद 22(5))।
  • NSA में आधार 5 दिन (असाधारण मामलों में 10) में मिलने चाहिए, मामला 3 हफ़्ते में सलाहकार बोर्ड (Advisory Board) के पास जाना चाहिए, बोर्ड को 7 हफ़्ते में रिपोर्ट देनी होगी, और निरोध 12 महीने से ज़्यादा नहीं हो सकता।
  • अदालतें देर से या अस्पष्ट आधार, प्रतिवेदन के फ़ैसले में देरी, या जहाँ सामान्य ज़मानत क़ानून काफ़ी था वहाँ निरोध के इस्तेमाल पर आदेश रद्द करती हैं।
  • तुरंत हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) याचिका दायर करें (अनुच्छेद 226)। मुफ़्त क़ानूनी सहायता: 15100।

आम तौर पर राज्य आपकी आज़ादी तभी छीन सकता है जब आप पर अपराध का आरोप हो, और वह भी ऐसी प्रक्रिया से जो मुक़दमे पर ख़त्म हो। निवारक निरोध अलग है। यह सरकार को किसी व्यक्ति को बिना मुक़दमे रोककर रखने देता है, क्योंकि उसे लगता है कि वह भविष्य में सार्वजनिक व्यवस्था या राज्य की सुरक्षा के ख़िलाफ़ कुछ कर सकता है। यह राज्य की सबसे ताक़तवर शक्तियों में से एक है, और दुरुपयोग की आशंका की वजह से संविधान और अदालतों ने इसे सुरक्षा उपायों से घेरा है। इन्हें जानना, और कुछ दिनों के भीतर इन पर अमल करना, लंबे निरोध और जल्दी रिहाई के बीच का फ़र्क़ बन सकता है।

यह गिरफ़्तारी से कैसे अलग है

गिरफ़्तारी उस काम के लिए होती है जो व्यक्ति ने किया बताया जाता है; मक़सद जाँच और मुक़दमा है। निवारक निरोध उसके लिए होता है जो सरकार को डर है कि व्यक्ति कर सकता है। न FIR, न आरोप, न मुक़दमा। व्यक्ति को ज़िला मजिस्ट्रेट, पुलिस आयुक्त या राज्य सरकार के दस्तख़त वाले आदेश पर, आमतौर पर जेल में, बस रोक लिया जाता है।

संसद का मुख्य क़ानून राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 (NSA) है। बाक़ी तस्करी, विदेशी मुद्रा और नशीले पदार्थों की तस्करी पर हैं। ज़्यादातर राज्यों के अपने क़ानून भी हैं, जिन्हें अक्सर "गुंडा एक्ट" या असामाजिक गतिविधि अधिनियम कहा जाता है (जैसे गुजरात का PASA या केरल का KAAPA)। समय-सीमाएँ अलग हैं; सबसे पहले यह पता करें कि आदेश में कौन-सा क़ानून लिखा है।

अनुच्छेद 22 के सुरक्षा उपाय

अनुच्छेद 22(1) और 22(2) के आम गिरफ़्तारी अधिकार, जैसे 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेशी, निवारक निरोध पर लागू नहीं होते। इसके बजाय:

  • सलाहकार बोर्ड। अनुच्छेद 22(4) के तहत किसी को तीन महीने से ज़्यादा तब तक नहीं रोका जा सकता जब तक हाई कोर्ट जज बनने योग्य व्यक्तियों का सलाहकार बोर्ड तीन महीने पूरे होने से पहले रिपोर्ट न दे कि पर्याप्त कारण है। (44वें संशोधन, 1978 ने इसे दो महीने करना चाहा था, लेकिन वह बदलाव कभी लागू नहीं किया गया।)
  • आधार। अनुच्छेद 22(5) के तहत प्राधिकारी को निरोध के आधार "जितनी जल्दी हो सके", भरोसा किए गए दस्तावेज़ों के साथ, बंदी की समझ की भाषा में बताने होंगे।
  • प्रतिवेदन। यही खंड आदेश के ख़िलाफ़ प्रतिवेदन का जल्द से जल्द मौक़ा देता है, जिस पर सरकार को तुरंत और स्वतंत्र रूप से विचार करना होगा।
  • सीमित गोपनीयता। अनुच्छेद 22(6) के तहत जनहित के ख़िलाफ़ तथ्य रोके जा सकते हैं, लेकिन आधार ख़ुद देने ही होंगे।

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम की समय-सीमाएँ

  • ज़िला मजिस्ट्रेट या पुलिस आयुक्त का आदेश तुरंत राज्य सरकार को रिपोर्ट करना होगा और मंज़ूरी न मिले तो वह 12 दिन बाद ख़त्म हो जाता है (धारा 3(4) NSA)।
  • आधार आमतौर पर 5 दिन में, और असाधारण मामलों में कारण दर्ज करके 10 दिन में देने होंगे (धारा 8 NSA)। बंदी को बताना होगा कि वह प्रतिवेदन दे सकता है।
  • सरकार को निरोध के 3 हफ़्ते में मामला सलाहकार बोर्ड के सामने रखना होगा (धारा 10 NSA); बोर्ड को 7 हफ़्ते में रिपोर्ट देनी होगी (धारा 11 NSA)। बोर्ड को पर्याप्त कारण न मिले तो व्यक्ति को तुरंत छोड़ना होगा।
  • निरोध की अधिकतम अवधि 12 महीने है (धारा 13 NSA)। सरकार आदेश पहले भी रद्द कर सकती है।

राज्य के क़ानूनों की अपनी, अक्सर छोटी, समय-सीमाएँ हैं। व्यक्ति सलाहकार बोर्ड के सामने ख़ुद पेश हो सकता है; NSA वहाँ वकील का अधिकार नहीं देता, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने A.K. Roy में किसी मित्र की सहायता की इजाज़त दी और कहा कि सरकार वकील रखे तो बंदी को भी वकील की इजाज़त देनी होगी।

अदालतों ने क्या कहा है

A.K. Roy v. Union of India (1982) में सुप्रीम कोर्ट ने NSA को वैध ठहराया लेकिन ज़ोर दिया कि इसके सुरक्षा उपायों का सख़्ती से पालन हो। सालों में अदालतों ने ऐसे निरोध आदेश रद्द किए हैं जहाँ आधार अस्पष्ट थे या देर से दिए गए, व्यक्ति की समझ की भाषा में नहीं थे, प्रतिवेदन पर बिना कारण देरी से फ़ैसला हुआ, या प्राधिकारी को यह पता ही नहीं था कि व्यक्ति पहले से हिरासत में या ज़मानत पर है। Dhanya M v. State of Kerala (2025) में कोर्ट ने केरल के KAAPA के तहत निरोध रद्द करते हुए कहा कि निवारक निरोध अनुच्छेद 21 का अपवाद है, "सार्वजनिक व्यवस्था" (public order) को ख़तरे का मतलब पूरे समुदाय को नुकसान है, कुछ व्यक्तियों को प्रभावित करने वाला सामान्य "क़ानून-व्यवस्था" (law and order) का मामला नहीं, और निरोध ज़मानत रद्द कराने की अर्ज़ी का विकल्प नहीं हो सकता।

क़दम दर क़दम: निरोध को चुनौती कैसे दें

  1. आदेश और आधार लें। जेल से निरोध आदेश, आधार और भरोसा किया गया हर दस्तावेज़, व्यक्ति की भाषा में, माँगें। हर काग़ज़ मिलने की तारीख़ नोट करें; देरी रद्द कराने का आधार है।
  2. कुछ दिनों के भीतर प्रतिवेदन दें। निरोध प्राधिकारी और राज्य सरकार (और जहाँ क़ानून इजाज़त दे, केंद्र सरकार) को लिखें, हर आधार का जवाब दें और किसी ज़मानत आदेश या लंबित मामले की ओर ध्यान दिलाएँ। जेल अधीक्षक के ज़रिए भेजें और तारीख़ वाली कॉपी रखें; जेल को इसे तुरंत आगे भेजना होगा।
  3. सलाहकार बोर्ड के सामने पेश होने और ख़ुद सुने जाने की माँग करें, किसी मित्र की सहायता के साथ।
  4. बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करें। बंदी प्रत्यक्षीकरण ("शरीर को पेश करो") अदालत से कहती है कि वह जाँचे कि निरोध क़ानूनी है या नहीं। वकील इसे अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में (या अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में) दायर करता है। प्रतिवेदन लंबित रहते भी यह दायर हो सकती है, और हाई कोर्ट इन्हें तत्काल सुनते हैं।
  5. क़ानूनी मदद लें। 15100 पर कॉल करें या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण जाएँ।
उदाहरण

कानपुर का कबाड़ी रफ़ीक़ चोरी के दो मामलों में ज़मानत पर है, जब ज़िला मजिस्ट्रेट उसे "सार्वजनिक व्यवस्था" के लिए ख़तरा बताकर NSA में निरुद्ध कर देते हैं। उसकी पत्नी नसरीन छठे दिन जेल से आधार लेती है और तारीख़ नोट करती है। क़ानूनी सहायता वकील के साथ वह तीन दिन के भीतर प्रतिवेदन दायर करती है, जिसमें बताती है कि दोनों मामले निजी झगड़ों के हैं, ज़मानत को कभी चुनौती नहीं दी गई, और आधार FIR दोहराते हैं पर यह नहीं बताते कि सार्वजनिक व्यवस्था कैसे प्रभावित हुई। बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका सुनते हुए हाई कोर्ट पाता है कि आधार ज़्यादा से ज़्यादा क़ानून-व्यवस्था का मामला दिखाते हैं और प्रतिवेदन 25 दिन बिना फ़ैसले पड़ा रहा, और निरोध रद्द कर देता है।

ये तैयार रखें

  • निरोध आदेश, आधार और भरोसा किए गए सभी दस्तावेज़, हर एक के मिलने की तारीख़ के साथ
  • लंबित मामलों के ज़मानत आदेश, FIR की कॉपियाँ और केस स्टेटस
  • प्रतिवेदन, जेल की रसीद और भेजने की तारीख़ के डाक सबूत के साथ
  • व्यक्ति की भाषा और शिक्षा का सबूत, अगर आधार उसकी समझ की भाषा में नहीं थे
  • मेडिकल रिकॉर्ड, अगर व्यक्ति निरोध में बीमार है
सावधान

आपत्तियाँ उठाने के लिए सलाहकार बोर्ड की सुनवाई का इंतज़ार न करें। प्रतिवेदन देने में आपकी हर दिन की देरी मामला कमज़ोर करती है, जबकि उस पर फ़ैसले में सरकार की हर दिन की बिना कारण देरी उसे मज़बूत करती है। कुछ दिनों में प्रतिवेदन भेजें, तारीख़ का सबूत रखें, और साथ-साथ बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करें।

कहाँ जाएँ

  • जेल अधीक्षक, आदेश और आधार के लिए और प्रतिवेदन आगे भेजने के लिए
  • निरोध प्राधिकारी (ज़िला मजिस्ट्रेट या पुलिस आयुक्त) और राज्य गृह विभाग, प्रतिवेदन के लिए; जहाँ क़ानून इजाज़त दे, केंद्र सरकार
  • सलाहकार बोर्ड, राज्य सरकार के ज़रिए, व्यक्तिगत सुनवाई के लिए
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण के लिए अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट; अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट
  • ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण या NALSA हेल्पलाइन 15100; दुर्व्यवहार के लिए राज्य मानवाधिकार आयोग या NHRC

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम में किसी को कितने समय तक रखा जा सकता है?

निरोध की तारीख़ से 12 महीने तक (धारा 13 NSA), लेकिन सिर्फ़ तब जब सलाहकार बोर्ड 7 हफ़्ते में रिपोर्ट दे कि पर्याप्त कारण है और सरकार आदेश की पुष्टि करे। सरकार कभी भी आदेश रद्द कर सकती है, और सुरक्षा उपायों के उल्लंघन पर अदालत उसे पहले रद्द कर सकती है।

क्या ज़मानत पर छूटे व्यक्ति को निवारक निरोध में लिया जा सकता है?

सिर्फ़ तब जब निरोध प्राधिकारी को ज़मानत की जानकारी हो और वह दर्ज करे कि ख़तरे से निपटने के लिए सामान्य आपराधिक क़ानून काफ़ी क्यों नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने Dhanya M (2025) में कहा कि निवारक निरोध ज़मानत रद्द कराने की अर्ज़ी का विकल्प नहीं हो सकता, और कुछ व्यक्तियों को प्रभावित करने वाला झगड़ा क़ानून-व्यवस्था का मामला है, सार्वजनिक व्यवस्था को ख़तरा नहीं।

क्या बंदी को सलाहकार बोर्ड के सामने वकील मिलता है?

NSA बोर्ड के सामने वकील का अधिकार नहीं देता, और A.K. Roy (1982) ने इसे वैध ठहराया। लेकिन कोर्ट ने बंदी को ऐसे मित्र की सहायता की इजाज़त दी जो वकील न हो, और कहा कि सरकार वकील के ज़रिए पेश हो तो बंदी को भी वकील की इजाज़त देनी होगी। दोनों की माँग लिखित में करें।

बंदी प्रत्यक्षीकरण क्या है और कौन दायर कर सकता है?

बंदी प्रत्यक्षीकरण एक रिट है जो अदालत से कहती है कि वह जाँचे कि किसी व्यक्ति का निरोध क़ानूनी है या नहीं, और न हो तो रिहाई का आदेश दे। कोई भी रिश्तेदार या मित्र बंदी की ओर से इसे अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में या अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट में दायर कर सकता है। हाई कोर्ट इन याचिकाओं को तत्काल मानते हैं।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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