भारत में गवाह सुरक्षा: धमकी मिले तो अर्ज़ी कैसे दें
गवाह होने पर धमकी मिल रही है? गवाह संरक्षण योजना 2018 और धारा 398 BNSS कैसे काम करती हैं, किसे अर्ज़ी दें, 5 दिन की समय-सीमा, और कौन-सी सुरक्षा मिलती है।
संक्षेप में
- गवाह को झूठी गवाही देने के लिए धमकाना अपराध है, जिसमें सात साल तक की सज़ा है (धारा 232 BNS)। हर धमकी की लिखित शिकायत करें।
- गवाह संरक्षण योजना (Witness Protection Scheme), 2018, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने Mahender Chawla (2018) में मंज़ूरी दी, पूरे भारत में लागू है, और धारा 398 BNSS हर राज्य से अपनी योजना अधिसूचित करने को कहती है।
- अपने ज़िले के सक्षम प्राधिकारी (Competent Authority) को अर्ज़ी दें, जिसके अध्यक्ष ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश हैं, बेहतर हो तो लोक अभियोजक के ज़रिए। ज़रूरी मामलों में उसी दिन अंतरिम सुरक्षा का आदेश हो सकता है।
- सुरक्षा में पुलिस एस्कॉर्ट और बदले फ़ोन नंबर से लेकर बंद कमरे में गवाही, पहचान छिपाना और स्थानांतरण तक शामिल है, जिसका ख़र्च गवाह संरक्षण कोष से होता है।
- तत्काल ख़तरे में 112 पर कॉल करें। मुफ़्त क़ानूनी मदद: 15100।
कई आपराधिक मामले आम लोगों के देखे या सुने पर टिके होते हैं। हमला देखने वाला दुकानदार, झगड़ा सुनने वाला पड़ोसी, या धोखाधड़ी भाँपने वाला कर्मचारी अपराध और सच के बीच की अकेली कड़ी हो सकता है। जब ऐसे लोगों को धमकाया, ख़रीदा या पीटा जाता है, तो मामले बिखर जाते हैं और दोषी छूट जाते हैं। गवाह सुरक्षा इसलिए है कि अदालत में सच बोलने की क़ीमत आपकी सुरक्षा न हो।
गवाह "पक्षद्रोही" क्यों हो जाते हैं
गवाह को पक्षद्रोही (hostile) तब कहा जाता है जब वह अदालत में पुलिस को बताई बात से मुकर जाए। कभी पहला बयान ग़लत होता है। लेकिन अक्सर वजह डर होता है: लंबे मुक़दमे आरोपी और उसके समर्थकों को उसी गली में रहने वाले गवाह पर दबाव डालने के लिए सालों दे देते हैं। अदालतें बार-बार कह चुकी हैं कि गवाह खुलकर न बोल सकें तो निष्पक्ष सुनवाई नामुमकिन है।
क़ानून क्या कहता है
दशकों तक भारत में गवाह सुरक्षा पर कोई सामान्य क़ानून नहीं था। Mahender Chawla v. Union of India (2018) में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार की बनाई गवाह संरक्षण योजना, 2018 को मंज़ूरी दी और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि संसद या राज्य अपना क़ानून बनाने तक इसे लागू करें। कोर्ट ने कहा कि यह योजना अनुच्छेद 141 और अनुच्छेद 142 के तहत क़ानून मानी जाएगी।
BNSS ने अब इसे वैधानिक आधार दिया है। धारा 398 BNSS कहती है कि हर राज्य सरकार राज्य के लिए गवाह संरक्षण योजना तैयार करके अधिसूचित करेगी। कई राज्यों ने 2018 की योजना की तर्ज़ पर योजनाएँ अधिसूचित की हैं; जहाँ नहीं की, वहाँ 2018 की योजना लागू रहती है। अलग से, धारा 232 BNS (पहले धारा 195A IPC) किसी व्यक्ति को झूठी गवाही देने के लिए उसके शरीर, प्रतिष्ठा या संपत्ति को नुकसान की धमकी देने पर सात साल तक की सज़ा देती है, और अगर झूठी गवाही से किसी निर्दोष को मौत या सात साल से ज़्यादा की सज़ा हो जाए तो धमकाने वाले को वही सज़ा।
2018 की योजना कैसे काम करती है
- ख़तरे की तीन श्रेणियाँ। श्रेणी A: ख़तरा गवाह या परिवार की जान तक है। श्रेणी B: उनकी सुरक्षा, प्रतिष्ठा या संपत्ति तक। श्रेणी C: परेशान करने या डराने जैसे मध्यम ख़तरे।
- फ़ैसला कौन करता है। हर ज़िले में एक सक्षम प्राधिकारी: एक स्थायी समिति, जिसके अध्यक्ष ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश, सदस्य ज़िले के पुलिस प्रमुख और सदस्य सचिव ज़िले के अभियोजन प्रमुख हैं।
- अर्ज़ी कौन दे सकता है। गवाह, परिवार का सदस्य, उसका वकील, या जाँच अधिकारी, SHO या जेल अधीक्षक, उस ज़िले में जहाँ अपराध हुआ। अर्ज़ी बेहतर हो तो लोक अभियोजक के ज़रिए, सहायक दस्तावेज़ों के साथ, दी जाए।
- समय-सीमा। प्राधिकारी ज़िला पुलिस से ख़तरा विश्लेषण रिपोर्ट (Threat Analysis Report) माँगता है, जो पाँच कार्य-दिवस में देनी होती है। रिपोर्ट मिलने के पाँच कार्य-दिवस के भीतर, गवाह को बंद कमरे में सुनकर, उसे अर्ज़ी पर फ़ैसला करना होता है। ज़रूरी मामलों में वह अर्ज़ी लंबित रहते अंतरिम सुरक्षा का आदेश दे सकता है।
- ख़र्च। ख़र्च राज्य के गवाह संरक्षण कोष से होता है, गवाह से नहीं।
सुरक्षा में क्या शामिल हो सकता है
- जाँच या मुक़दमे के दौरान गवाह और आरोपी का आमना-सामना न होना
- कॉल और डाक की निगरानी, और अनलिस्टेड या बदला हुआ फ़ोन नंबर
- गवाह के घर पर CCTV, अलार्म और बाड़ जैसे सुरक्षा उपकरण
- निकट सुरक्षा, नियमित गश्त, और अदालत आने-जाने के लिए राज्य के ख़र्च पर पुलिस एस्कॉर्ट
- अदालती रिकॉर्ड में पहचान छिपाना (बदला नाम या नाम की जगह अक्षर), बंद कमरे में सुनवाई, और संवेदनशील गवाह कक्ष में आवाज़ या चेहरा बदलकर वीडियो लिंक से गवाही
- गवाह की गवाही रोज़ाना सुनवाई करके जल्दी दर्ज करना, और बयान के समय एक सहायक व्यक्ति
- अस्थायी स्थानांतरण, और दुर्लभ मामलों में पहचान बदलना, समय-समय पर आर्थिक मदद के साथ
हर सुरक्षा आदेश एक बार में तीन महीने तक चलता है और सक्षम प्राधिकारी हर तिमाही उसकी समीक्षा करता है, जो उसे बढ़ा, बदल या ख़त्म कर सकता है। कार्यवाही गोपनीय रहती है। झूठी शिकायत पर सुरक्षा लेने वाले गवाह से ख़र्च वसूला जा सकता है।
क़दम दर क़दम: धमकी मिले तो
- तत्काल ख़तरे में 112 पर कॉल करें। हो सके तो किसी रिश्तेदार के घर चले जाएँ।
- धमकी दर्ज करें। लिखें कि किसने, कब, कहाँ, क्या कहा। स्क्रीनशॉट, वॉइस नोट और कॉल लॉग सँभालें; कुछ भी डिलीट न करें।
- पुलिस को लिखित शिकायत दें। थाने में धारा 232 BNS का हवाला देते हुए लिखित शिकायत दें, रसीद या FIR की कॉपी लें। एक कॉपी पुलिस अधीक्षक को भेजें।
- लोक अभियोजक और ट्रायल कोर्ट को बताएँ। अदालत वीडियो से गवाही, पहचान की सुरक्षा या आपकी गवाही क्रम से पहले दर्ज करने जैसे तुरंत क़दम उठा सकती है।
- गवाह सुरक्षा की अर्ज़ी दें। लोक अभियोजक या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) से सक्षम प्राधिकारी (ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश) के लिए अर्ज़ी तैयार कराएँ। अपनी शिकायत, FIR की कॉपी और धमकियों के सबूत लगाएँ, और अंतरिम सुरक्षा माँगें।
- हर नई धमकी की जानकारी वकील को दें। समीक्षा में आदेश को मज़बूत किया जा सकता है।
पटना की दर्ज़ी सुनीता ने अपनी दुकान के बाहर पड़ोसी के बेटे को एक आदमी पर चाकू चलाते देखा और पुलिस को बयान दिया। तीन महीने बाद आरोपी के रिश्तेदार उसकी दुकान के बाहर खड़े रहने लगते हैं और संदेश भेजते हैं: "जो देखा, भूल जाओ।" वह उनकी तस्वीर लेती है, संदेश सँभालती है, और थाने में धारा 232 BNS के तहत लिखित शिकायत देती है। उसका DLSA वकील लोक अभियोजक के ज़रिए गवाह सुरक्षा की अर्ज़ी देता है। सत्र न्यायाधीश उसी दिन अंतरिम पुलिस गश्त का आदेश देते हैं, ख़तरा विश्लेषण रिपोर्ट माँगते हैं, और दो हफ़्ते के भीतर आदेश देते हैं कि उसकी गवाही वीडियो लिंक से जल्दी दर्ज हो, अदालत तक एस्कॉर्ट के साथ।
ये तैयार रखें
- मुख्य मामले की FIR या शिकायत की कॉपी, और केस नंबर
- धमकी की आपकी लिखित शिकायत और उसकी रसीद या FIR नंबर
- धमकियों के स्क्रीनशॉट, कॉल लॉग, वॉइस नोट और तस्वीरें, तारीख़ के साथ
- धमकी देखने-सुनने वालों के नाम और नंबर
- आपका पहचान पत्र और पते का सबूत, और लोक अभियोजक का संपर्क
आरोपी के परिवार से निजी तौर पर बात न करें, न "भूल जाने" के पैसे लें। इससे आप पर झूठी गवाही का आरोप लग सकता है, और बयान बदलते ही क़ानून की सुरक्षा कमज़ोर पड़ जाती है। इसके बजाय ऐसी पेशकश की शिकायत करें; चुप्पी ख़रीदने की कोशिश ख़ुद गवाह को प्रभावित करने का सबूत है।
कहाँ जाएँ
- आपात स्थिति में 112; धारा 232 BNS के तहत लिखित शिकायत के लिए स्थानीय थाना; अनदेखी हो तो पुलिस अधीक्षक
- ट्रायल कोर्ट से जुड़े लोक अभियोजक, सुरक्षा की अर्ज़ी आगे बढ़ाने के लिए
- सक्षम प्राधिकारी: ज़िला अदालत परिसर में ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश का कार्यालय
- ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण या NALSA हेल्पलाइन 15100, अर्ज़ी बनाने के लिए मुफ़्त वकील; महिलाओं के लिए 181; बाल गवाह के लिए 1098
- प्राधिकारी या पुलिस कार्रवाई न करे तो अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
गवाह सुरक्षा की अर्ज़ी कौन और कहाँ दे सकता है?
गवाह, परिवार का सदस्य, उसका वकील, या जाँच अधिकारी, SHO या जेल अधीक्षक उस ज़िले के सक्षम प्राधिकारी को अर्ज़ी दे सकते हैं जहाँ अपराध हुआ, जिसके अध्यक्ष ज़िला एवं सत्र न्यायाधीश हैं। अर्ज़ी आमतौर पर लोक अभियोजक के ज़रिए जाती है; ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण इसे मुफ़्त बनाने में मदद कर सकता है।
गवाह सुरक्षा की अर्ज़ी पर कितनी जल्दी फ़ैसला होता है?
2018 की योजना के तहत पुलिस को पाँच कार्य-दिवस में ख़तरा विश्लेषण रिपोर्ट देनी होती है, और प्राधिकारी को रिपोर्ट मिलने के पाँच कार्य-दिवस में फ़ैसला करना होता है। ज़रूरी मामलों में प्राधिकारी रिपोर्ट आने से पहले ही तुरंत अंतरिम सुरक्षा का आदेश दे सकता है।
क्या गवाह को धमकाना अपने आप में अपराध है?
हाँ। धारा 232 BNS किसी व्यक्ति को झूठी गवाही देने के लिए उसके शरीर, प्रतिष्ठा या संपत्ति को नुकसान की धमकी देने पर सात साल तक की सज़ा देती है, आपराधिक धमकी या मारपीट जैसे किसी अन्य अपराध के अलावा। लिखित शिकायत दें और रसीद रखें।
क्या मेरी पहचान आरोपी से छिपाई जा सकती है?
उपयुक्त मामलों में हाँ। सक्षम प्राधिकारी या ट्रायल कोर्ट आदेश दे सकता है कि रिकॉर्ड में आपका नाम और पता छिपाया जाए, आपको कोड से बुलाया जाए, गवाही बंद कमरे में या आवाज़ और चेहरा बदलकर वीडियो लिंक से हो, और आरोपी आपके सामने न आए। पूरी गुमनामी दुर्लभ है क्योंकि आरोपी को जिरह का अधिकार है।
क्या गवाह सुरक्षा हर राज्य में लागू है?
हाँ। सुप्रीम कोर्ट ने Mahender Chawla (2018) में सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को 2018 की योजना लागू करने का निर्देश दिया, और धारा 398 BNSS हर राज्य से अपनी योजना अधिसूचित करने को कहती है। कई राज्यों ने ऐसा किया है; जहाँ राज्य की योजना है, उसके तहत अर्ज़ी दें। प्रक्रिया मोटे तौर पर एक जैसी है।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।
