घरेलू हिंसा से सुरक्षा
घरेलू हिंसा में क्या आता है, किसे सुरक्षा मिलती है, मजिस्ट्रेट कौन-से आदेश दे सकते हैं (सुरक्षा, निवास, भरण-पोषण) और सही क़दम: 181, संरक्षण अधिकारी, धारा 12।
संक्षेप में
- घरेलू हिंसा सिर्फ़ मारपीट नहीं है। धमकी, अपमान, ज़बरदस्ती यौन संबंध, आपकी तनख़्वाह छीनना या खाने-दवा के पैसे न देना, सब इसमें आते हैं धारा 3 PWDVA।
- घरेलू रिश्ते में रहने वाली हर महिला सुरक्षित है: पत्नी, लिव-इन साथी, माँ, बहन, बेटी, विधवा।
- साझा घर से आपको निकाला नहीं जा सकता, मालिक कोई भी हो धारा 17 PWDVA। मजिस्ट्रेट सुरक्षा, निवास, भरण-पोषण, अभिरक्षा और मुआवज़े का आदेश दे सकते हैं, अक्सर कुछ दिनों में।
- ख़तरे में हों: 112 या 181 पर कॉल करें। वरना संरक्षण अधिकारी (Protection Officer), वन स्टॉप सेंटर, पुलिस या सीधे मजिस्ट्रेट के पास जाएँ धारा 12 PWDVA। न वकील ज़रूरी, न फ़ीस।
घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 (PWDVA) एक सिविल क़ानून है। इसका मक़सद मुख्य रूप से अत्याचारी को जेल भेजना नहीं, बल्कि हिंसा रुकवाना और आपको सुरक्षित, घर में और आर्थिक सहारे के साथ रखना है, जब तक आप आगे का फ़ैसला करें। यह क्रूरता के आपराधिक क़ानून धारा 85 BNS (पहले धारा 498A IPC) के साथ-साथ चलता है, जिसे आप इसके साथ या इसके बदले इस्तेमाल कर सकती हैं।
घरेलू हिंसा में क्या-क्या आता है
धारा 3 PWDVA चार तरह के शोषण को, और उनकी धमकी को भी, शामिल करती है:
- शारीरिक: मारना, धक्का देना, जलाना, खाना या इलाज न देना।
- यौन: ज़बरदस्ती संबंध, अपमान या आपकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ कोई भी यौन कृत्य, शादी के भीतर भी।
- मौखिक और भावनात्मक: गालियाँ, बच्चा या बेटा न होने पर ताने, आपको या आपके अपनों को नुक़सान की धमकी, परिवार से अलग-थलग करना।
- आर्थिक: तनख़्वाह या गहने छीनना, घर या बच्चों की पढ़ाई का ख़र्च न देना, काम करने से रोकना, घर से निकालना।
दहेज के लिए परेशान करना, और दहेज की माँग पूरी कराने के लिए आपको या आपके रिश्तेदारों को नुक़सान पहुँचाना, साफ़ तौर पर शामिल है।
किसे सुरक्षा मिलती है, और किसके ख़िलाफ़
"पीड़ित व्यक्ति" वह कोई भी महिला है जो प्रतिवादी (respondent) के साथ घरेलू रिश्ते में है या रही है और घरेलू हिंसा का आरोप लगाती है धारा 2(a) PWDVA। घरेलू रिश्ता मतलब साझा घर में, अभी या पहले, साथ रहना, शादी, "शादी जैसे रिश्ते" (लिव-इन), ख़ून, गोद या संयुक्त परिवार के नाते धारा 2(f)। यानी बेटी पिता के ख़िलाफ़, माँ बेटे के ख़िलाफ़, बहन भाई के ख़िलाफ़, विधवा ससुराल वालों के ख़िलाफ़ अर्ज़ी दे सकती है।
प्रतिवादी कोई भी वयस्क हो सकता है जो आपके साथ घरेलू रिश्ते में रहा हो। सुप्रीम कोर्ट के हीरल पी. हरसोरा बनाम कुसुम हरसोरा (2016) फ़ैसले के बाद सास या ननद जैसी महिला रिश्तेदार भी प्रतिवादी हो सकती हैं।
मजिस्ट्रेट क्या आदेश दे सकते हैं
- सुरक्षा आदेश (protection order) धारा 18: हिंसा बंद, आपसे संपर्क बंद, आपके दफ़्तर या बच्चों के स्कूल से दूर रहना, संयुक्त खाते न चलाना।
- निवास आदेश (residence order) धारा 19: साझा घर से बेदख़ली नहीं; प्रतिवादी को घर छोड़ने या उसी स्तर का वैकल्पिक आवास देने का निर्देश हो सकता है। आपका रहने का अधिकार धारा 17 इस पर निर्भर नहीं कि घर आपका है या किराया-नामे पर आपका नाम है। सतीश चंद्र आहूजा बनाम स्नेहा आहूजा (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ससुराल वालों का घर भी साझा घर है अगर आप वहाँ परिवार की तरह रहीं।
- आर्थिक राहत धारा 20: आपका और बच्चों का भरण-पोषण, छूटी कमाई, इलाज का ख़र्च, और नुक़सान या छीनी गई संपत्ति का मुआवज़ा।
- अभिरक्षा आदेश (custody) धारा 21 बच्चों के लिए, मुलाक़ात के साथ या बिना।
- मुआवज़ा धारा 22 चोटों और मानसिक यातना के लिए।
- अंतरिम और एकपक्षीय आदेश धारा 23: तत्काल ख़तरा हो तो पहली सुनवाई पर, प्रतिवादी को सुने बिना भी, फ़ौरी आदेश।
मजिस्ट्रेट को आपकी अर्ज़ी के 3 दिन के अंदर पहली सुनवाई तय करनी चाहिए और 60 दिन में निपटाने की कोशिश करनी चाहिए धारा 12(5); व्यवहार में ज़्यादा समय लगता है, पर अंतरिम आदेश जल्दी मिल सकते हैं। सुरक्षा आदेश तोड़ना आपराधिक अपराध है, जिसमें एक साल तक की क़ैद, ₹20,000 तक जुर्माना या दोनों हो सकते हैं धारा 31, और पुलिस इसके लिए गिरफ़्तार कर सकती है। कोई भी पक्ष 30 दिन में सत्र न्यायालय में अपील कर सकता है धारा 29।
क़दम दर क़दम
- अभी ख़तरे में हैं तो 112 या 181 पर कॉल करें, या नज़दीकी थाने जाएँ। पुलिस को आपकी सूचना दर्ज करनी होगी और आपको इस अधिनियम के अधिकार, संरक्षण अधिकारी और मुफ़्त क़ानूनी सहायता के बारे में बताना होगा धारा 5। शारीरिक या यौन हिंसा हुई हो तो BNS के तहत एफ़आईआर तुरंत दर्ज हो सकती है।
- इलाज कराएँ और काग़ज़ संभालें। सरकारी अस्पताल को मेडिकल रिपोर्ट देनी होगी; संरक्षण अधिकारी इसका निर्देश दे सकते हैं।
- अपने ज़िले के संरक्षण अधिकारी (PO) से संपर्क करें, जो धारा 8 के तहत नियुक्त होते हैं, या वन स्टॉप सेंटर (सखी) से, जो आम तौर पर ज़िला अस्पताल में होता है। PO घरेलू घटना रिपोर्ट (DIR) दर्ज करते हैं, अर्ज़ी तैयार करने में मदद करते हैं, आश्रय और इलाज का इंतज़ाम करते हैं, और आपकी ओर से अदालत में दाख़िल करते हैं धारा 9। पंजीकृत NGO ("सेवा प्रदाता") भी DIR दर्ज कर सकते हैं धारा 10।
- अर्ज़ी दाख़िल करें धारा 12 के तहत उस इलाक़े के न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने जहाँ आप रहती या काम करती हैं, जहाँ प्रतिवादी रहता है, या जहाँ हिंसा हुई। आप ख़ुद, PO के ज़रिए या वकील के ज़रिए कर सकती हैं; हर महिला को, आय चाहे जो हो, मुफ़्त क़ानूनी सहायता मिलती है (15100)।
- पहली सुनवाई पर अंतरिम आदेश माँगें: सुरक्षा, निवास और भरण-पोषण। सबूतों की सूची साथ रखें।
- सुनवाइयों में जाएँ या पक्का करें कि वकील जाए। प्रतिवादी आदेश तोड़े तो तुरंत PO और पुलिस को बताएँ; यह गिरफ़्तारी योग्य अपराध है।
- लंबे समय का फ़ैसला अपने समय पर करें: परामर्श धारा 14, धारा 85 BNS में आपराधिक शिकायत, तलाक़ या न्यायिक अलगाव, या अपनी शर्तों पर सुलह। DV का मामला इनमें से किसी के साथ चल सकता है धारा 26।
29 साल की पूजा लखनऊ में पति और सास-ससुर के साथ रहती हैं। दो साल से पति उनकी तनख़्वाह ले लेता है, और विरोध करने पर मारने लगा; सास ने धमकी दी कि "ख़ाली हाथ" घर से निकाल देंगे। एक शाम पिटाई के बाद वे 181 पर कॉल करती हैं, उन्हें ज़िला अस्पताल के वन स्टॉप सेंटर ले जाया जाता है, मेडिकल रिपोर्ट बनती है और संरक्षण अधिकारी से मुलाक़ात होती है। PO DIR और धारा 12 की अर्ज़ी दाख़िल करते हैं। पहली सुनवाई पर मजिस्ट्रेट अंतरिम सुरक्षा आदेश, घर में रहने का निवास आदेश और ₹12,000 महीने का अंतरिम भरण-पोषण देते हैं। अगले हफ़्ते पति उन्हें बाहर ताला लगाकर रोकने की कोशिश करता है और धारा 31 में गिरफ़्तार होता है।
ये तैयार रखें
- आपका पहचान और पते का प्रमाण; रिश्ते का सबूत (विवाह प्रमाणपत्र, शादी की तस्वीरें, बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र, या साथ रहने का सबूत)।
- मेडिकल रिपोर्ट, तारीख़ के साथ चोटों की तस्वीरें, फटे कपड़े या टूटा सामान।
- संदेश, कॉल रिकॉर्डिंग, ईमेल, तारीख़ वाली डायरी; उन पड़ोसियों या रिश्तेदारों के नाम जिन्होंने देखा या सुना।
- आय और ख़र्च का सबूत: वेतन पर्ची (आपकी और उसकी, मिले तो), किराया, स्कूल फ़ीस, बैंक स्टेटमेंट।
- पहले की कोई शिकायत, DIR, एफ़आईआर या अदालती आदेश।
"पहले घर छोड़ो, फिर शिकायत करो" सबसे आम ग़लती है। दबाव में घर छोड़ देने के बाद साझा घर में वापस जाने में ज़्यादा समय लगता है, हालाँकि क़ानून आपको इसका हक़ देता है। सुरक्षा के लिए निकलना ही पड़े तो उसी दिन संरक्षण अधिकारी या पुलिस को बताएँ, ताकि रिकॉर्ड में रहे कि आपको निकाला गया, आपने घर नहीं छोड़ा।
कहाँ जाएँ
- आपातकाल: 112; महिला हेल्पलाइन 181; बच्चा शामिल हो तो 1098।
- अपने ज़िले के संरक्षण अधिकारी (सूची राज्य महिला एवं बाल विकास विभाग की वेबसाइट पर) और नज़दीकी वन स्टॉप सेंटर (सखी)।
- पुलिस: स्थानीय थाना या महिला थाना, DIR के लिए और हिंसा हुई हो तो धारा 85 BNS में एफ़आईआर के लिए।
- अदालत: अपने इलाक़े के प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट या महानगर मजिस्ट्रेट, धारा 12 PWDVA के तहत। मुफ़्त वकील: 15100 या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (nalsa.gov.in)।
- अन्य मदद: राष्ट्रीय महिला आयोग (ncw.gov.in); मानसिक स्वास्थ्य सहायता, टेली-मानस 14416।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या यह क़ानून लिव-इन रिश्ते में रहने वाली महिलाओं को बचाता है?
हाँ। "शादी जैसा रिश्ता" धारा 2(f) PWDVA के तहत घरेलू रिश्ता है। सुप्रीम कोर्ट ने डी. वेलुसामी बनाम डी. पचैअम्मल (2010) में कहा कि इसका मतलब कुछ स्थायित्व वाला रिश्ता है जिसमें जोड़ा साथ रहा और ख़ुद को पति-पत्नी की तरह पेश किया, न कि कोई अस्थायी संबंध। लिव-इन साथी सुरक्षा, निवास और आर्थिक आदेश पा सकती है।
क्या पति मुझे उस घर से निकाल सकता है जो उसके माता-पिता का है?
नहीं। धारा 17 PWDVA आपको साझा घर में रहने का अधिकार देती है, मालिक कोई भी हो, और सुप्रीम कोर्ट ने सतीश चंद्र आहूजा (2020) में पुष्टि की कि ससुराल वालों का घर जहाँ आप परिवार की तरह रहीं, इसमें आता है। अदालत बेदख़ली रोक सकती है या उसी स्तर का वैकल्पिक आवास दिलवा सकती है। मालिक अलग सिविल उपाय अपना सकता है, पर आपको यूँ ही बाहर ताला नहीं लगाया जा सकता।
DV केस करने पर क्या मेरा पति जेल जाएगा?
DV अर्ज़ी से ख़ुद नहीं; यह सुरक्षा, निवास और पैसे के लिए सिविल कार्यवाही है, और दाख़िल करने पर कोई गिरफ़्तारी नहीं होती। जेल तभी संभव है जब वह सुरक्षा आदेश तोड़े (धारा 31, एक साल तक), या आप धारा 85 BNS में क्रूरता या मारपीट का आपराधिक केस भी करें। कई महिलाएँ DV अधिनियम इसीलिए चुनती हैं कि यह बिना आपराधिक मुक़दमे के हिंसा रोकता है।
भरण-पोषण कितनी जल्दी मिल सकता है?
आप पहली ही सुनवाई पर धारा 23 के तहत अंतरिम भरण-पोषण माँग सकती हैं, और मजिस्ट्रेट उसकी आय और आपकी ज़रूरतों के आधार पर आम तौर पर हफ़्तों में दे देते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने रजनेश बनाम नेहा (2020) में दोनों पक्षों से संपत्ति और आय का शपथपत्र दाख़िल करवाना ज़रूरी किया, जिससे फ़ैसला तेज़ होता है। यह भरण-पोषण BNSS के तहत मिलने वाले भरण-पोषण के अलावा माँगा जा सकता है।
क्या पुरुष घरेलू हिंसा अधिनियम में अर्ज़ी दे सकता है?
नहीं। PWDVA में सिर्फ़ महिला पीड़ित व्यक्ति हो सकती है। घर में हिंसा झेल रहा पुरुष BNS के तहत मारपीट या आपराधिक धमकी की पुलिस शिकायत कर सकता है, सिविल निषेधाज्ञा माँग सकता है या मजिस्ट्रेट के पास जा सकता है, और पात्र हो तो मुफ़्त क़ानूनी सहायता पा सकता है।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।