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The old Parliament House, Sansad Bhavan, in New Delhiसंविधान

फ़ोटो: Nikhilb239, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0. सांकेतिक चित्र.

आपातकाल और आपके अधिकार: क्या कभी निलंबित नहीं हो सकता

न्याय पाठशाला7 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

राष्ट्रीय आपातकाल मौलिक अधिकारों पर कैसे असर डालता है, 1978 के सुरक्षा उपाय, अनुच्छेद 20 और 21 हमेशा लागू क्यों रहते हैं, और किसी की हिरासत पर क्या करें।

क़ानून: अनुच्छेद 352, 358 और 359, भारत का संविधान · 44वाँ संशोधन, 1978 · ADM Jabalpur v. Shivkant Shukla (1976)

संक्षेप में

  • राष्ट्रीय आपातकाल (अनुच्छेद 352) सिर्फ़ युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह पर, मंत्रिमंडल की लिखित सलाह से घोषित हो सकता है, और एक महीने में संसद की मंज़ूरी ज़रूरी है।
  • अनुच्छेद 19 की आज़ादियाँ अपने आप सिर्फ़ युद्ध या बाहरी आक्रमण वाले आपातकाल में निलंबित होती हैं (अनुच्छेद 358)। दूसरे अधिकार सिर्फ़ राष्ट्रपति के विशेष आदेश से निलंबित हो सकते हैं (अनुच्छेद 359)।
  • अनुच्छेद 20 और 21 कभी निलंबित नहीं हो सकते। आपातकाल में भी ग़ैर-क़ानूनी हिरासत को हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (habeas corpus) से चुनौती दी जा सकती है।
  • किसी को हिरासत में लिया जाए तो: पता करें कहाँ और क्यों, उसी दिन वकील करें (15100), लिखित अभ्यावेदन दें, और हिरासत उचित न हो तो बंदी प्रत्यक्षीकरण दायर करें।

जून 1975 से मार्च 1977 तक भारत ने राष्ट्रीय आपातकाल (Emergency) झेला। हज़ारों लोग बिना मुक़दमे हिरासत में रखे गए, अख़बारों पर सेंसर लगा, और सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अदालतें बंदियों की स्वतंत्रता की रक्षा नहीं कर सकतीं। कई परिवारों को पता ही नहीं था कि उनके लोग कहाँ हैं।

देश ने उस दौर से कड़े सबक़ सीखे, और संविधान बदला गया ताकि कुछ अधिकार फिर कभी न छीने जा सकें। इन सुरक्षाओं को जानना अपनी आज़ादी को जानना है।

राष्ट्रीय आपातकाल क्या है

अनुच्छेद 352 के तहत राष्ट्रपति राष्ट्रीय आपातकाल घोषित कर सकते हैं अगर उन्हें लगे कि युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह से भारत या उसके किसी हिस्से की सुरक्षा ख़तरे में है। भारत में तीन बार हुआ: 1962 (चीन युद्ध), 1971 (पाकिस्तान युद्ध) और 1975 ("आंतरिक अशांति" के आधार पर, जो आधार अब मौजूद नहीं)।

संविधान अनुच्छेद 356 के तहत राज्य में राष्ट्रपति शासन और अनुच्छेद 360 के तहत वित्तीय आपातकाल का भी प्रावधान करता है। इन दोनों से मौलिक अधिकार प्रभावित नहीं होते। यह लेख राष्ट्रीय आपातकाल पर है, क्योंकि अधिकार सिर्फ़ तभी निलंबित हो सकते हैं।

1977 के बाद जोड़े गए सुरक्षा उपाय

44वाँ संशोधन, 1978 इसलिए पारित हुआ ताकि 1975-77 दोहराया न जाए। इसके मुख्य सुरक्षा उपाय:

  • "आंतरिक अशांति" की जगह "सशस्त्र विद्रोह"। अब कोई अस्पष्ट आधार इस्तेमाल नहीं हो सकता।
  • मंत्रिमंडल का लिखित फ़ैसला। राष्ट्रपति तभी कार्रवाई कर सकते हैं जब केंद्रीय मंत्रिमंडल अपना फ़ैसला लिखित में भेजे। अकेले प्रधानमंत्री तय नहीं कर सकते।
  • विशेष बहुमत से मंज़ूरी। संसद के दोनों सदनों को एक महीने में उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई और कुल सदस्यता के बहुमत से उद्घोषणा मंज़ूर करनी होगी। मंज़ूरी छह महीने चलती है और दोबारा लेनी होती है।
  • लोकसभा इसे ख़त्म कर सकती है। एक-दसवाँ हिस्सा सदस्य विशेष बैठक की माँग कर सकते हैं, और साधारण बहुमत से अस्वीकृति का प्रस्ताव पारित हो तो राष्ट्रपति को आपातकाल वापस लेना होगा।

मौलिक अधिकारों का क्या होता है

अनुच्छेद 358: जब आपातकाल युद्ध या बाहरी आक्रमण के आधार पर घोषित हो, तो अनुच्छेद 19 की छह आज़ादियाँ (बोलने, इकट्ठा होने, संगठन, आने-जाने, बसने, पेशे की) उसकी अवधि के लिए निलंबित रहती हैं। सशस्त्र विद्रोह पर घोषित आपातकाल में ऐसा नहीं होता। तब भी सिर्फ़ वही क़ानून चुनौती से सुरक्षित हैं जो साफ़ कहते हैं कि वे आपातकाल से संबंधित हैं।

अनुच्छेद 359: राष्ट्रपति अलग आदेश से निर्दिष्ट मौलिक अधिकारों को लागू करवाने के लिए अदालत जाने का अधिकार निलंबित कर सकते हैं। अधिकार ख़ुद ख़त्म नहीं होते; सिर्फ़ अदालती उपाय रुकता है, और सिर्फ़ आदेश में नामित अधिकारों के लिए। आदेश संसद के सामने रखना होता है।

जो अधिकार कभी निलंबित नहीं हो सकते

44वें संशोधन के बाद अनुच्छेद 359 का कोई आदेश अनुच्छेद 20 या अनुच्छेद 21 को छू नहीं सकता।

  • अनुच्छेद 20: ऐसे क़ानून से सज़ा नहीं जो आपके कृत्य के समय मौजूद न था, एक अपराध के लिए दो बार मुक़दमा और सज़ा नहीं, और ख़ुद के ख़िलाफ़ गवाही के लिए मजबूर नहीं।
  • अनुच्छेद 21: क़ानून द्वारा स्थापित निष्पक्ष, न्यायसंगत और उचित प्रक्रिया के बिना जीवन या दैहिक स्वतंत्रता नहीं छीनी जा सकती।

इसलिए आपातकाल में भी, अगर आपको ग़ैर-क़ानूनी तरीक़े से रखा गया है, तो आप हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जा सकते हैं और अदालत बंदी प्रत्यक्षीकरण से रिहाई का आदेश दे सकती है। अनुच्छेद 22 और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के गिरफ़्तारी सुरक्षा उपाय, जैसे कारण बताया जाना और 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेशी, सामान्य गिरफ़्तारियों पर लागू रहते हैं।

सुझावराष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 जैसे निवारक निरोध (preventive detention) क़ानून सामान्य समय में भी हैं। अनुच्छेद 22 के तहत बंदी को आधार बताने होंगे, अभ्यावेदन का मौक़ा देना होगा, और जजों के सलाहकार बोर्ड की मंज़ूरी के बिना तीन महीने से ज़्यादा नहीं रखा जा सकता। ये आपके हथियार हैं, आपातकाल हो या न हो।

ADM Jabalpur का सबक़

ADM Jabalpur v. Shivkant Shukla (1976) में सुप्रीम कोर्ट के बहुमत ने कहा कि राष्ट्रपति का आदेश लागू रहते कोई भी हिरासत के ख़िलाफ़ अदालत नहीं जा सकता, ग़ैर-क़ानूनी हिरासत के ख़िलाफ़ भी नहीं। जस्टिस एच.आर. खन्ना ने असहमति जताई: जीवन और स्वतंत्रता संविधान के उपहार नहीं हैं, और राज्य इन्हें क़ानून के अधिकार के बिना नहीं छीन सकता। कुछ ही समय बाद उन्हें मुख्य न्यायाधीश बनने से रोक दिया गया।

Justice K.S. Puttaswamy v. Union of India (2017) में नौ जजों की पीठ ने ADM Jabalpur के बहुमत फ़ैसलों को गंभीर रूप से त्रुटिपूर्ण बताया और स्पष्ट रूप से पलट दिया। जस्टिस खन्ना का मत अब क़ानून है।

क़दम दर क़दम: किसी को हिरासत में लिया जाए तो

  1. पता करें कहाँ और किस क़ानून के तहत। थाने या ज़िला मजिस्ट्रेट कार्यालय से पूछें कि व्यक्ति सामान्य गिरफ़्तारी में है या निवारक निरोध आदेश के तहत, और आधार लिखित में लें। राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 के तहत आधार आम तौर पर पाँच दिन के भीतर, और किसी भी हाल में दस दिन से पहले देने होते हैं।
  2. उसी दिन वकील करें। 15100 पर कॉल करें या ज़िला अदालत में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) जाएँ। हिरासत में हर व्यक्ति मुफ़्त क़ानूनी सहायता का हक़दार है।
  3. लिखित अभ्यावेदन दें। अनुच्छेद 22(5) के तहत बंदी को सरकार और सलाहकार बोर्ड के सामने हिरासत के ख़िलाफ़ अभ्यावेदन (representation) का अधिकार है। आपका वकील इसे तैयार करता है; इस पर जल्द फ़ैसला होना चाहिए।
  4. बंदी प्रत्यक्षीकरण दायर करें। अगर व्यक्ति 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश न हो, आधार न दिए जाएँ, या निरोध आदेश अस्पष्ट या पुरानी घटनाओं पर आधारित हो, तो आपका वकील अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करता है। कोई भी रिश्तेदार या दोस्त दायर कर सकता है। ये याचिकाएँ प्राथमिकता से सुनी जाती हैं।
  5. मानवाधिकार आयोग में शिकायत करें। अधिकारियों द्वारा ग़ैर-क़ानूनी हिरासत या दुर्व्यवहार पर एक साल के भीतर NHRC (14433, hrcnet.nic.in) या राज्य मानवाधिकार आयोग में शिकायत करें।
  6. रिकॉर्ड रखें। हर आदेश, नोटिस, रसीद और जिन अधिकारियों से बात हुई उनके नाम। गिरफ़्तारी का समय, मजिस्ट्रेट के सामने पेशी का समय और कोई भी चोट नोट करें।
उदाहरण

उत्तर प्रदेश के एक क़स्बे में सांप्रदायिक हिंसा के बाद के तनाव भरे हफ़्ते में पुलिस इमरान के भाई साजिद को चाय की दुकान से ले जाती है। परिवार को सिर्फ़ इतना बताया जाता है कि वह "NSA में" है। इमरान अगली सुबह ज़िला अदालत में DLSA जाता है। क़ानूनी सहायता का वकील निरोध आदेश हासिल करता है और देखता है कि आधार हिरासत के बारह दिन बाद दिए गए और 2019 की एक घटना का हवाला देते हैं जिसमें साजिद बरी हो चुका है। वह राज्य सरकार और सलाहकार बोर्ड को अभ्यावेदन, और इलाहाबाद हाई कोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर करता है। कोर्ट हिरासत रद्द करता है: पुराने आधार और देर से तामील ने हिरासत को ग़ैर-क़ानूनी बना दिया।

ये तैयार रखें

  • निरोध आदेश और निरोध के आधार, तामील की तारीख़ों के साथ।
  • गिरफ़्तारी मेमो, FIR नंबर, या परिवार को मिला कोई नोटिस।
  • अधिकारियों के नाम, उठाए जाने का समय और जगह, और गवाह।
  • बंदी का पहचान और पते का प्रमाण; क़ानूनी सहायता के लिए आय या श्रेणी का प्रमाण।
सावधान

"आपातकालीन शक्तियों" का दावा कभी-कभी तब भी किया जाता है जब कोई आपातकाल घोषित ही नहीं हुआ, जैसे कर्फ़्यू या इंटरनेट बंदी के दौरान। ये सामान्य क़ानून (BNSS, दूरसंचार अधिनियम और उसके नियम) से चलते हैं, अनुच्छेद 358 और 359 से नहीं। आपके मौलिक अधिकार पूरी तरह लागू रहते हैं, और हर रोक लिखित, कारण सहित आदेश से होनी चाहिए जिसे अदालत जाँच सके।

कहाँ जाएँ

  • आपातकाल: 112; महिलाएँ 181; बच्चे 1098।
  • पुलिस और प्रशासन: थाना प्रभारी, फिर पुलिस अधीक्षक या ज़िला मजिस्ट्रेट को लिखित में।
  • मुफ़्त क़ानूनी सहायता: 15100; ज़िला अदालत में DLSA; nalsa.gov.in।
  • मानवाधिकार आयोग: NHRC हेल्पलाइन 14433, hrcnet.nic.in; आपका राज्य मानवाधिकार आयोग।
  • अदालतें: हाई कोर्ट (अनुच्छेद 226) या सुप्रीम कोर्ट (अनुच्छेद 32, sci.gov.in) में बंदी प्रत्यक्षीकरण।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

आपातकाल में कौन-से मौलिक अधिकार निलंबित नहीं हो सकते?

अनुच्छेद 20 (आपराधिक मामलों में सुरक्षा: पिछली तारीख़ से सज़ा नहीं, दोहरी सज़ा नहीं, ख़ुद के ख़िलाफ़ गवाही नहीं) और अनुच्छेद 21 (जीवन और दैहिक स्वतंत्रता)। 1978 के 44वें संशोधन के बाद अनुच्छेद 359 का कोई राष्ट्रपति आदेश इन दोनों के लिए अदालत जाने का अधिकार निलंबित नहीं कर सकता। बाक़ी अधिकार सिर्फ़ उतने ही प्रभावित हो सकते हैं जितना अनुच्छेद 358 और 359 इजाज़त देते हैं।

क्या सरकार हर आपातकाल में अनुच्छेद 19 की आज़ादियाँ निलंबित कर सकती है?

नहीं। अनुच्छेद 358 के तहत बोलने, इकट्ठा होने, संगठन, आने-जाने, बसने और पेशे की आज़ादियाँ अपने आप सिर्फ़ तब निलंबित होती हैं जब आपातकाल युद्ध या बाहरी आक्रमण के आधार पर घोषित हो। सशस्त्र विद्रोह पर घोषित आपातकाल में ये अपने आप निलंबित नहीं होतीं, और हर रोक को सामान्य क़ानून के तहत सही ठहराना होगा।

भारत में राष्ट्रीय आपातकाल कितनी बार घोषित हुआ है?

तीन बार: 1962 में चीन युद्ध के दौरान, 1971 में पाकिस्तान युद्ध के दौरान, और 1975 में आंतरिक अशांति के आधार पर, जो मार्च 1977 तक चला। 44वें संशोधन के बाद "आंतरिक अशांति" अब आधार नहीं है; सिर्फ़ युद्ध, बाहरी आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह ही आधार हो सकते हैं।

बंदी प्रत्यक्षीकरण क्या है और क्या मैं इसे आपातकाल में दायर कर सकता हूँ?

बंदी प्रत्यक्षीकरण अदालत का आदेश है जो प्राधिकरण को बंदी को पेश करने और हिरासत को सही ठहराने को कहता है; ग़ैर-क़ानूनी हो तो अदालत रिहाई का आदेश देती है। चूँकि अनुच्छेद 21 अब निलंबित नहीं हो सकता, यह उपाय हर आपातकाल में उपलब्ध रहता है। कोई भी रिश्तेदार या दोस्त इसे हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में दायर कर सकता है, और पात्र लोगों के लिए क़ानूनी सहायता के वकील इसे मुफ़्त दायर करते हैं।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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