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Women working in a rice field near Junagadh, Gujaratसमानता

फ़ोटो: Bernard Gagnon, Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0. सांकेतिक चित्र.

समान काम के लिए समान वेतन: वेतन संहिता के तहत आपके अधिकार

न्याय पाठशाला7 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

महिलाओं और ठेका मज़दूरों के समान वेतन पर संविधान और वेतन संहिता 2019 क्या कहती है, वेतन में अंतर कब वैध है, दावा कैसे करें और 3 साल की सीमा।

क़ानून: अनुच्छेद 14, 16 और 39(d), भारत का संविधान · धारा 3, 4 और 45, वेतन संहिता, 2019

संक्षेप में

  • नियोक्ता समान काम या समान प्रकृति के काम के लिए महिला को पुरुष से कम वेतन नहीं दे सकता धारा 3, वेतन संहिता, 2019। 21 नवंबर 2025 को श्रम संहिताएँ लागू होने पर इसने समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 की जगह ली।
  • नियोक्ता "बराबरी" के नाम पर किसी का वेतन घटा नहीं सकता; कम वेतन को बढ़ाना होगा।
  • नियमित कर्मचारियों जैसा ही काम करने वाले सरकारी अस्थायी, दिहाड़ी और ठेका कर्मचारी समान वेतन माँग सकते हैं (State of Punjab v Jagjit Singh, 2016)।
  • वेतन में अंतर सिर्फ़ असली वजहों से वैध है: योग्यता, वरिष्ठता, ज़िम्मेदारी, भर्ती का तरीक़ा। लिंग या सिर्फ़ किसी लेबल से नहीं।
  • धारा 45, वेतन संहिता के तहत प्राधिकारी के सामने 3 साल के भीतर वेतन दावा करें; ट्रेड यूनियन या इंस्पेक्टर-सह-सुविधादाता आपकी ओर से दावा कर सकते हैं।

दो लोग एक ही जगह, एक ही घंटे, एक ही काम करते हैं। एक को कम मिलता है क्योंकि वह महिला है, या क्योंकि दस साल काम करने के बाद भी उसे "अस्थायी" कहा जाता है। ज़्यादातर लोग तुरंत महसूस करते हैं कि यह अन्याय है। भारतीय क़ानून सहमत है। इस लेख में बताया गया है कि यह सिद्धांत कहाँ से आता है, मौजूदा क़ानून क्या कहता है, और दावा ठीक-ठीक कैसे करें।

संविधान क्या कहता है

अनुच्छेद 39(d) राज्य को निर्देश देता है कि वह पुरुषों और महिलाओं दोनों के लिए समान काम का समान वेतन सुनिश्चित करे। यह एक नीति निदेशक तत्व (Directive Principle) है, जो क़ानून बनाने में राह दिखाता है पर अपने आप अदालत में लागू नहीं कराया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने Randhir Singh v Union of India (1982) में इसे बदला और कहा कि समान काम का समान वेतन अनुच्छेद 14 की समानता और अनुच्छेद 16 के सरकारी नौकरी में समान अवसर के ज़रिए लागू कराया जा सकता है। सरकार एक जैसा काम करने वाले कर्मचारियों को बिना उचित आधार के अलग-अलग वेतन नहीं दे सकती।

State of Punjab v Jagjit Singh (2016) में कोर्ट ने इसे सरकार के उन अस्थायी, दिहाड़ी और ठेका कर्मचारियों पर लागू किया जो नियमित कर्मचारियों जैसे ही कर्तव्य निभाते हैं। कोर्ट ने कहा कि समान काम का कम वेतन शोषण है और मानवीय गरिमा के ख़िलाफ़ है।

श्रम क़ानून अब क्या कहता है

क़रीब पचास साल तक मुख्य क़ानून समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 था। वह निरस्त हो चुका है। 21 नवंबर 2025 से, जब चारों श्रम संहिताएँ लागू हुईं, यह सुरक्षा वेतन संहिता, 2019 में है, जो सभी प्रतिष्ठानों और सभी कर्मचारियों पर लागू है, छोटे प्रतिष्ठानों के लिए कोई छूट नहीं।

  • वेतन में लिंग-भेदभाव नहीं। एक ही नियोक्ता के यहाँ समान काम या समान प्रकृति के काम के लिए वेतन के मामलों में कर्मचारियों के बीच लिंग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होगा धारा 3(1)।
  • वेतन घटाकर बराबरी नहीं। नियम का पालन करने के लिए नियोक्ता किसी कर्मचारी का वेतन घटा नहीं सकता धारा 3(2)।
  • भर्ती में भेदभाव नहीं। समान या समान प्रकृति के काम के लिए भर्ती या सेवा शर्तों में नियोक्ता लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं कर सकता, सिवाय वहाँ जहाँ कोई क़ानून उस काम में महिलाओं के नियोजन को सीमित करता हो धारा 3(2)।
  • काम "समान" है या नहीं, कौन तय करेगा? विवाद होने पर यह उस प्राधिकारी के पास जाता है जिसे उपयुक्त सरकार अधिसूचित करे धारा 4।
  • सबके लिए न्यूनतम मज़दूरी। संहिता न्यूनतम मज़दूरी को सभी कर्मचारियों तक बढ़ाती है, और केंद्र सरकार एक आधार मज़दूरी (floor wage) तय करती है जिससे नीचे कोई राज्य न्यूनतम तय नहीं कर सकता धारा 9।

"समान काम या समान प्रकृति का काम" का मतलब है ऐसा काम जिसमें समान कौशल, मेहनत, अनुभव और ज़िम्मेदारी लगे और जो समान परिस्थितियों में हो। पद का नाम तय नहीं करता; आप असल में क्या करते हैं, वह तय करता है।

वेतन में अंतर कब वैध हो सकता है

समान वेतन का मतलब यह नहीं कि सबको एक जैसा मिले। अदालतें असली वजहों पर आधारित अंतर मानती हैं: पद के लिए अलग योग्यता, सेवा की लंबाई, अलग और ज़्यादा कड़ी भर्ती प्रक्रिया, या सचमुच अलग ज़िम्मेदारियाँ। क़ानून लिंग पर आधारित अंतर, या "अस्थायी" जैसे मनमाने लेबल को मना करता है जिसके पीछे काम में कोई असली फ़र्क़ न हो। समान वेतन माँगने वाले को दिखाना होता है कि काम सचमुच समान है, इसलिए आपके असल कर्तव्यों का सबूत किसी भी दावे की जान है।

क़दम दर क़दम

  1. काम और वेतन का सबूत जुटाएँ। नियुक्ति पत्र, वेतन पर्ची या बैंक क्रेडिट, ड्यूटी रोस्टर, हाज़िरी, लिखित निर्देश, और तुलना वाले सहकर्मी की भूमिका और वेतन दिखाने वाली कोई चीज़ (नोटिस, संगठन चार्ट, नौकरी का विज्ञापन)।
  2. लिखित में पूछें। HR या नियोक्ता को लिखकर अंतर की वजह पूछें। लिखित जवाब, या चुप्पी, बाद में काम आती है।
  3. आंतरिक रास्ते अपनाएँ। कई कार्यस्थलों में शिकायत समिति होती है। अगर लिंग-भेदभाव के साथ उत्पीड़न भी हो, तो यौन उत्पीड़न क़ानून की आंतरिक समिति के पास भी जा सकते हैं।
  4. इंस्पेक्टर-सह-सुविधादाता से संपर्क करें ज़िला या क्षेत्रीय श्रम कार्यालय में, या समाधान पोर्टल पर मामला उठाएँ। अधिकारी निरीक्षण कर सकता है, नियोक्ता को सलाह दे सकता है और आपकी ओर से दावा दायर कर सकता है।
  5. दावा दायर करें धारा 45 के तहत अधिसूचित प्राधिकारी के सामने (आम तौर पर राज्य का श्रम अधिकारी या श्रम आयुक्त, या रेलवे, बैंक और खदान जैसे केंद्रीय क्षेत्र के प्रतिष्ठानों के लिए केंद्रीय श्रम प्राधिकारी)। आप, आपकी ट्रेड यूनियन या इंस्पेक्टर-सह-सुविधादाता इसे दायर कर सकते हैं। समय-सीमा दावा बनने से तीन साल है, पर्याप्त कारण पर बढ़ाई जा सकती है धारा 45(6)। प्राधिकारी अंतर की राशि और मुआवज़ा देने का आदेश दे सकता है, और देय से कम देने वाले नियोक्ता पर 50,000 रुपये तक जुर्माना हो सकता है धारा 54।
  6. सरकारी कर्मचारी पद के हिसाब से केंद्रीय या राज्य प्रशासनिक अधिकरण या हाई कोर्ट भी जा सकते हैं।
  7. मुफ़्त क़ानूनी मदद: NALSA 15100। उत्पीड़न झेल रही महिला कर्मचारी 181 पर भी कॉल कर सकती हैं।
उदाहरण

सुनीता गुरुग्राम की एक फ़ैक्ट्री में दिनेश जैसी ही पैकिंग मशीन चलाती है, उसी शिफ़्ट में, उसी उत्पादन लक्ष्य के साथ। उसकी पर्ची में हर महीने 2,000 रुपये कम हैं, जिसे सुपरवाइज़र "हेल्पर ग्रेड" कहता है। उसने ड्यूटी रोस्टर की फ़ोटो ली, छह महीने की वेतन पर्चियाँ रखीं, और HR को लिखकर वजह पूछी। जवाब न आने पर वह दो और महिलाओं के साथ अपने काग़ज़ और रोस्टर की कॉपी लेकर श्रम कार्यालय में इंस्पेक्टर-सह-सुविधादाता के पास गई। अधिकारी ने नियोक्ता को सुनवाई के लिए बुलाया, और फ़ैक्ट्री ने महिलाओं को ऑपरेटर ग्रेड दिया और बक़ाया चुकाया।

ये तैयार रखें

  • नियुक्ति पत्र, पहचान पत्र और पूरी अवधि की वेतन पर्चियाँ या बैंक स्टेटमेंट।
  • ड्यूटी रोस्टर, हाज़िरी रिकॉर्ड और लिखित निर्देश जो दिखाएँ कि आप असल में क्या करते हैं।
  • तुलना वाले कर्मचारी की भूमिका और वेतन का कोई सबूत: नोटिस, विज्ञापन, संगठन चार्ट, या स्वेच्छा से साझा की गई उसकी पर्ची।
  • नियोक्ता को आपका लिखित सवाल और कोई जवाब।
  • ट्रेड यूनियन सदस्यता कार्ड, अगर हो।
सावधान

इंतज़ार न करें। संहिता के तहत दावा आम तौर पर वेतन देय होने की तारीख़ से तीन साल के भीतर करना होता है, और देरी का हर महीना ऐसा महीना हो सकता है जिसकी वसूली न हो। और बिना सलाह लिए ऐसा "पूर्ण और अंतिम निपटान" (full and final settlement) न साइन करें जो आपका दावा छोड़ देता हो।

सुझाव

साथ मिलकर दावे मज़बूत होते हैं। एक ही ग्रेड के कई कर्मचारी प्रभावित हों तो संयुक्त रूप से या यूनियन के ज़रिए दावा करें; नियोक्ता किसी एक को "ख़ास मामला" बताकर अलग नहीं कर सकता।

कहाँ जाएँ

  • कार्यस्थल के भीतर: HR या शिकायत समिति, लिखित में।
  • श्रम प्राधिकारी: ज़िला या क्षेत्रीय श्रम कार्यालय में इंस्पेक्टर-सह-सुविधादाता और दावा प्राधिकारी; केंद्रीय क्षेत्र के प्रतिष्ठानों के लिए केंद्रीय श्रम आयुक्त संगठन; samadhan.labour.gov.in; labour.gov.in।
  • सरकारी कर्मचारी: केंद्रीय या राज्य प्रशासनिक अधिकरण; हाई कोर्ट।
  • मुफ़्त क़ानूनी मदद: NALSA 15100, nalsa.gov.in; महिला हेल्पलाइन 181; कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की शिकायत shebox.wcd.gov.in पर।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या समान पारिश्रमिक अधिनियम अब भी लागू है?

नहीं। समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976 को वेतन संहिता, 2019 ने निरस्त कर दिया, जो 21 नवंबर 2025 को लागू हुई। समान वेतन का नियम अब संहिता की धारा 3 में है, जो समान या समान प्रकृति के काम के वेतन में लिंग-भेदभाव रोकती है और पालन के लिए किसी का वेतन घटाने से मना करती है।

क्या समान वेतन निजी कंपनियों पर लागू है?

हाँ। वेतन संहिता हर प्रतिष्ठान पर लागू है, सरकारी हो या निजी, बड़ा हो या छोटा, और लिंग के आधार पर समान वेतन के नियम में छोटे नियोक्ताओं के लिए कोई छूट नहीं है। अनुच्छेद 14 और 16 के तहत "समान काम का समान वेतन" के संवैधानिक दावे सरकार और उसकी संस्थाओं पर लागू होते हैं; निजी कर्मचारी संहिता पर निर्भर करते हैं।

क्या ठेका या अस्थायी कर्मचारी स्थायी कर्मचारी जितना वेतन माँग सकता है?

सरकारी सेवा में हाँ, जहाँ कर्तव्य समान हों: सुप्रीम कोर्ट ने State of Punjab v Jagjit Singh (2016) में कहा कि नियमित कर्मचारियों जैसा काम करने वाले अस्थायी और दिहाड़ी कर्मचारी नियमित वेतनमान के न्यूनतम के हक़दार हैं। निजी रोज़गार में संहिता का समान वेतन नियम लिंग के बारे में है; दूसरे दावे अनुबंध, न्यूनतम मज़दूरी और ठेका श्रम क़ानून पर निर्भर करते हैं।

वेतन दावा दायर करने के लिए मेरे पास कितना समय है?

वेतन देय होने की तारीख़ से तीन साल धारा 45(6), वेतन संहिता। देरी का पर्याप्त कारण दिखाने पर प्राधिकारी बाद का दावा भी ले सकता है, पर इस पर भरोसा न करें। दावा आप, आपकी पंजीकृत ट्रेड यूनियन या इंस्पेक्टर-सह-सुविधादाता दायर कर सकते हैं।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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