एफ़आईआर कैसे दर्ज कराएँ, और पुलिस मना करे तो क्या करें
किसी भी थाने में ज़ीरो एफ़आईआर, ई-एफ़आईआर, मुफ़्त कॉपी, और पुलिस के मना करने पर सही क़दम: SP को डाक से, फिर धारा 175(3) BNSS में मजिस्ट्रेट।
संक्षेप में
- गंभीर (संज्ञेय) अपराध में पुलिस को एफ़आईआर दर्ज करनी ही होगी। "अपराध दूसरे इलाक़े में हुआ", "यह सिविल मामला है" या "पहले सबूत लाओ", ये मना करने के क़ानूनी आधार नहीं हैं।
- आप किसी भी थाने में मौखिक रूप से या इलेक्ट्रॉनिक तरीक़े से सूचना दे सकते हैं; ई-शिकायत पर 3 दिन के अंदर दस्तख़त करते ही वह एफ़आईआर बन जाती है धारा 173(1) BNSS।
- एफ़आईआर की मुफ़्त कॉपी माँगिए और एफ़आईआर नंबर नोट कर लीजिए धारा 173(2) BNSS।
- पुलिस मना करे तो: पुलिस अधीक्षक को डाक से लिखें धारा 173(4) BNSS, फिर न्यायिक मजिस्ट्रेट को अर्ज़ी दें धारा 175(3) BNSS।
- मुफ़्त क़ानूनी मदद: 15100। आपातकाल: 112।
आपके साथ लूट, ठगी, मारपीट या धमकी हुई है और कोई कहता है "एफ़आईआर करवाओ"। यह लेख बताता है कि इसका मतलब क्या है, पुलिस क़ानूनन क्या करने को बाध्य है, और काउंटर पर बैठा अफ़सर मना कर दे तो क्या करें।
एफ़आईआर क्या है
फ़र्स्ट इन्फ़ॉर्मेशन रिपोर्ट (FIR) वह पहला लिखित रिकॉर्ड है जो पुलिस तब बनाती है जब उसे किसी संज्ञेय अपराध (cognizable offence) की सूचना मिलती है। संज्ञेय अपराध इतना गंभीर होता है कि पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है और बिना अदालत की इजाज़त जाँच शुरू कर सकती है। चोरी, लूट, सेंधमारी, चोट पहुँचाने वाली मारपीट, ठगी, आपराधिक धमकी, अपहरण, बलात्कार और हत्या, सब संज्ञेय हैं।
एफ़आईआर अपराध का सबूत नहीं है। यह वह चाबी है जिससे पुलिस की जाँच शुरू होती है। इसका नंबर ही आप बैंक, बीमा कंपनी, दफ़्तर और अदालत में बताएँगे।
असंज्ञेय (non-cognizable) अपराध में (छोटे मामले, जैसे साधारण गाली-गलौज या बिना चोट की धक्का-मुक्की) पुलिस एफ़आईआर दर्ज नहीं करती। वह आपकी सूचना रजिस्टर में लिखती है और आपको मजिस्ट्रेट के पास भेजने की पर्ची देती है, जो पुलिस को जाँच का निर्देश दे सकते हैं धारा 174 BNSS।
क़ानून क्या कहता है
1 जुलाई 2024 से एफ़आईआर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत दर्ज होती है, जिसने दंड प्रक्रिया संहिता की जगह ली है। मुख्य धारा है धारा 173 BNSS (पहले धारा 154 CrPC)।
- कोई भी थाना। संज्ञेय अपराध की सूचना किसी भी थाने के प्रभारी अधिकारी को दी जा सकती है, "चाहे अपराध किसी भी इलाक़े में हुआ हो" धारा 173(1) BNSS। यही ज़ीरो एफ़आईआर (Zero FIR) है: थाना उसे "0" नंबर से दर्ज करता है और सही थाने को भेज देता है। आपको पहले सही थाना ढूँढकर जाने की ज़रूरत नहीं।
- मौखिक या इलेक्ट्रॉनिक। आप ख़ुद जाकर या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम (ईमेल, राज्य पुलिस का ऐप या पोर्टल) से सूचना दे सकते हैं। मौखिक सूचना लिखकर, आपको पढ़कर सुनाकर, आपके दस्तख़त लिए जाते हैं। इलेक्ट्रॉनिक सूचना तीन दिन के अंदर आपके दस्तख़त होने पर रिकॉर्ड में आती है।
- मुफ़्त कॉपी, तुरंत। आपको या पीड़ित को एफ़आईआर की कॉपी बिना देरी और बिना शुल्क दी जानी चाहिए धारा 173(2) BNSS।
- महिलाएँ और दिव्यांग व्यक्ति। कुछ यौन अपराधों और महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों में सूचना महिला पुलिस अधिकारी दर्ज करती है। मानसिक या शारीरिक दिव्यांग व्यक्ति की सूचना उसके घर या उसकी पसंद की जगह पर, दुभाषिए या विशेष शिक्षक की मौजूदगी में और वीडियो पर दर्ज की जा सकती है धारा 173(1) BNSS।
- प्रारंभिक जाँच। जिन अपराधों में 3 साल से 7 साल से कम की सज़ा है, उनमें थाना प्रभारी, पुलिस उपाधीक्षक (DSP) या उससे ऊपर के अधिकारी की अनुमति से, पहले प्रारंभिक जाँच (preliminary enquiry) कर सकता है कि प्रथम दृष्टया (prima facie, यानी ऊपरी तौर पर) मामला बनता है या नहीं। यह 14 दिन में पूरी होनी चाहिए धारा 173(3) BNSS। यह BNSS में नया है; पुराने क़ानून में सुप्रीम कोर्ट ने ललिता कुमारी (2014) में ऐसी जाँच बहुत सीमित मामलों में ही मानी थी, और इस नई शक्ति के दायरे पर अदालतों में बहस जारी है।
- प्रगति की सूचना। पुलिस को सूचना देने वाले या पीड़ित को 90 दिन के अंदर जाँच की प्रगति बतानी होगी, इलेक्ट्रॉनिक तरीक़े से भी धारा 193 BNSS।
ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2014) का सिद्धांत आज भी लागू है: अगर सूचना से संज्ञेय अपराध का पता चलता है तो एफ़आईआर दर्ज करना अनिवार्य है। पुलिस पहले यह नहीं परख सकती कि आपकी बात सच है या नहीं।
क़दम दर क़दम: एफ़आईआर दर्ज कराना
- नज़दीकी थाने जाएँ (कोई भी थाना चलेगा) और ड्यूटी अफ़सर या थाना प्रभारी (SHO) से मिलें। पहचान पत्र और फ़ोन साथ रखें। हो सके तो किसी को साथ ले जाएँ।
- जो हुआ, क्रम से बताएँ: तारीख़, समय, जगह, क्या किया गया, किसने (नाम या हुलिया), किसने देखा, क्या गया या टूटा। सिर्फ़ तथ्य बताएँ। जो नहीं पता, उसके बारे में अंदाज़ा न लगाएँ, "पता नहीं" कहें।
- लिखित शिकायत दें अगर तैयार है। दो कॉपी ले जाएँ: एक पर थाने की प्राप्ति मुहर, तारीख़ और डायरी नंबर लगवाकर अपने पास रखें। यही सबूत है कि आपने सूचना दी थी।
- दस्तख़त से पहले एफ़आईआर पढ़ें। तारीख़, समय, जगह, नाम और भारतीय न्याय संहिता (BNS) की लगाई गई धाराएँ जाँचें। कुछ ग़लत हो तो दस्तख़त से पहले सुधरवाएँ।
- मुफ़्त कॉपी लें और एफ़आईआर नंबर, थाने का नाम, जाँच अधिकारी (IO) का नाम और फ़ोन नंबर नोट करें।
- फ़ोन या दस्तावेज़ खो जाने पर (न कोई आरोपी, न अपराध) कई राज्य एफ़आईआर की जगह ऑनलाइन "गुमशुदगी रिपोर्ट" स्वीकार करते हैं; राज्य पुलिस की वेबसाइट देखें। खोया फ़ोन sancharsaathi.gov.in पर ब्लॉक भी कराएँ।
अगर पुलिस मना कर दे
मना करने के बहाने जाने-पहचाने हैं: "यह हमारा इलाक़ा नहीं", "यह सिविल झगड़ा है", "सबूत लेकर आओ", "आपस में निपटा लो"। संज्ञेय शिकायत पर इनमें से कोई भी क़ानूनी आधार नहीं है। नीचे दी सीढ़ी चढ़ें। हर क़दम एक काग़ज़ी रिकॉर्ड बनाता है जो अगले क़दम में काम आता है।
- विनम्रता से लिखित इनकार माँगें, या कम से कम अपने आने की रोज़नामचा (GD) प्रविष्टि का नंबर। अफ़सर का नाम, पद, तारीख़ और समय नोट करें।
- इलेक्ट्रॉनिक शिकायत आज़माएँ: राज्य पुलिस पोर्टल पर, या SHO और ज़िला पुलिस को ईमेल से, ताकि तारीख़ वाला रिकॉर्ड बने।
- पुलिस अधीक्षक को लिखें (शहरों में पुलिस उपायुक्त, DCP), रजिस्टर्ड या स्पीड पोस्ट से, अपनी शिकायत साथ लगाकर धारा 173(4) BNSS। डाक की रसीद और ट्रैकिंग पेज संभालें। अगर SP संतुष्ट हों कि संज्ञेय अपराध बनता है, तो वे ख़ुद जाँच करते हैं या किसी अधीनस्थ अधिकारी को निर्देश देते हैं।
- न्यायिक मजिस्ट्रेट को अर्ज़ी दें धारा 175(3) BNSS (पहले धारा 156(3) CrPC) के तहत। अर्ज़ी के साथ शपथपत्र (affidavit) ज़रूरी है और उसमें दिखाएँ कि आप पहले थाने और SP के पास गए थे। मजिस्ट्रेट पुलिस का पक्ष सुनकर एफ़आईआर दर्ज करने और जाँच का आदेश दे सकते हैं। मुफ़्त क़ानूनी सहायता का वकील (15100) यह अर्ज़ी तैयार कर सकता है।
फ़रीदा का पर्स, जिसमें फ़ोन और ₹8,000 थे, रात 9 बजे लाजपत नगर मेट्रो के पास बाइक सवार दो लोगों ने छीन लिया। वह नज़दीकी डिफ़ेंस कॉलोनी थाने गईं। सिपाही ने कहा, "यह हमारा इलाक़ा नहीं, लाजपत नगर जाओ।" फ़रीदा ने शांति से कहा कि धारा 173(1) BNSS के तहत कोई भी थाना ज़ीरो एफ़आईआर दर्ज करके आगे भेजने को बाध्य है। ड्यूटी अफ़सर ने एफ़आईआर दर्ज की, "0" नंबर वाली मुफ़्त कॉपी दी, और अगली सुबह फ़रीदा ने उसी कॉपी से सिम ब्लॉक कराई और फ़ोन के बीमे का दावा किया। मामला एक दिन में लाजपत नगर थाने पहुँच गया।
ये तैयार रखें
- एक पन्ने की लिखित शिकायत: तारीख़, समय, जगह, क्या हुआ, नाम या हुलिया, गवाह। दो कॉपी।
- पहचान पत्र और फ़ोन नंबर।
- जो सबूत पहले से हैं: फ़ोटो, वीडियो, CCTV की जगह, बिल, बैंक या UPI लेन-देन की आईडी, संदेशों के स्क्रीनशॉट, चोट लगी हो तो मेडिकल रिपोर्ट।
- दर्ज होने के बाद: एफ़आईआर की कॉपी, शिकायत पर लगी प्राप्ति मुहर, जाँच अधिकारी का नाम-नंबर, और SP को भेजे पत्रों की डाक रसीदें।
बढ़ा-चढ़ाकर न बताएँ और जिनके शामिल होने का भरोसा नहीं, उनके नाम न जोड़ें। पुलिस को जानबूझकर झूठी सूचना देना BNS के तहत ख़ुद एक अपराध है, और बढ़ा-चढ़ाकर लिखी एफ़आईआर अदालत में बिखर जाती है। यह भी याद रखें कि दर्ज एफ़आईआर आप ख़ुद "वापस" नहीं ले सकते; उसे सिर्फ़ हाई कोर्ट रद्द (quash) कर सकता है, इसलिए सोच-समझकर दर्ज कराएँ।
कहाँ जाएँ
- आपातकाल: 112 (कोई भी आपात स्थिति), 100 (पुलिस), 181 (महिलाएँ), 1098 (बच्चे), ऑनलाइन आर्थिक ठगी के लिए 1930।
- पहले: नज़दीकी थाना (SHO), ख़ुद जाकर या राज्य पुलिस के पोर्टल/ऐप से।
- फिर: ज़िले के पुलिस अधीक्षक या पुलिस उपायुक्त को रजिस्टर्ड डाक से।
- फिर: न्यायिक मजिस्ट्रेट, धारा 175(3) BNSS के तहत शपथपत्र के साथ। मुफ़्त वकील: 15100 या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (nalsa.gov.in)।
- पुलिस की ज़्यादती पर: राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण, राज्य मानवाधिकार आयोग या NHRC (14433), और pgportal.gov.in।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या पुलिस यह कहकर एफ़आईआर से मना कर सकती है कि अपराध दूसरे इलाक़े में हुआ?
नहीं। धारा 173(1) BNSS के तहत आप संज्ञेय अपराध की सूचना किसी भी थाने में दे सकते हैं, इलाक़ा चाहे जो हो। उस थाने को ज़ीरो एफ़आईआर दर्ज करके क्षेत्राधिकार वाले थाने को भेजनी होगी। फिर भी मना करे तो अफ़सर का नाम नोट करें और SP को लिखित शिकायत करें।
क्या एफ़आईआर दर्ज कराने की कोई समय सीमा है?
एफ़आईआर दर्ज कराने की कोई अंतिम तारीख़ नहीं है, और पुलिस सिर्फ़ देरी के आधार पर मना नहीं कर सकती। लेकिन बिना कारण की देरी केस को कमज़ोर करती है, इसलिए जितनी जल्दी हो सके रिपोर्ट करें, और देर हुई हो तो उसकी वजह (चोट, डर, सदमा, सफ़र) शिकायत में ही लिख दें।
क्या मैं एफ़आईआर ऑनलाइन दर्ज करा सकता हूँ?
हाँ। धारा 173(1) BNSS इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से सूचना देने की इजाज़त देती है, और ज़्यादातर राज्य पुलिस के पास पोर्टल या ऐप है। रिपोर्ट औपचारिक रूप से तब दर्ज मानी जाती है जब आप तीन दिन के अंदर उस पर दस्तख़त करें, इसलिए एक बार थाने जाना आम तौर पर पड़ेगा। ऑनलाइन पैसों की ठगी में पहले cybercrime.gov.in या 1930 पर रिपोर्ट करें।
मुझे कैसे पता चलेगा कि मेरे केस में क्या हो रहा है?
जाँच अधिकारी से पूछें, जिनका नाम एफ़आईआर पर होता है। धारा 193 BNSS के तहत पुलिस को 90 दिन के अंदर सूचनादाता या पीड़ित को जाँच की प्रगति बतानी होगी। जाँच पूरी होने पर चार्जशीट या क्लोज़र रिपोर्ट मजिस्ट्रेट के पास जाती है; क्लोज़र रिपोर्ट हो तो अदालत के उसे मंज़ूर करने से पहले आपको सुने जाने का हक़ है।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।