Englishफ़ॉलो करें:
A bamboo-lined forest trail in Tadoba Andhari National Parkसमानता

फ़ोटो: Rohit Sharma, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0. सांकेतिक चित्र.

वन अधिकार अधिनियम: ज़मीन और जंगल पर अपना हक़ कैसे माँगें

न्याय पाठशाला8 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

वन अधिकार अधिनियम 2006 किसकी रक्षा करता है, कौन-से अधिकार मानता है, ग्राम सभा के ज़रिए दावा (फ़ॉर्म A, B, C) कैसे करें, और बेदख़ली का ख़तरा हो तो क्या करें।

क़ानून: धारा 3, 4, 6 · अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006 · अनुच्छेद 14, 21 और 244, भारत का संविधान

संक्षेप में

  • अगर आपका परिवार 13 दिसंबर 2005 से पहले से वन भूमि पर रहता या उस पर निर्भर था, तो वन अधिकार अधिनियम (FRA) उस ज़मीन और जंगल की उपज पर आपका हक़ मान्य कर सकता है धारा 3 FRA।
  • दावा वन विभाग के दफ़्तर में नहीं, अपनी ग्राम सभा के ज़रिए होता है। फ़ॉर्म A (ज़मीन), फ़ॉर्म B (सामुदायिक अधिकार) या फ़ॉर्म C (सामुदायिक वन संसाधन) भरकर गाँव की वन अधिकार समिति को दें।
  • जब तक आपके दावे पर अंतिम फ़ैसला न हो जाए, आपको क़ब्ज़े वाली वन भूमि से कोई नहीं हटा सकता धारा 4(5) FRA।
  • दावा आपको सुने बिना, लिखित कारण दिए बिना, या सिर्फ़ इसलिए ख़ारिज नहीं हो सकता कि कोई ख़ास काग़ज़ नहीं है। 60 दिन के भीतर अपील कर सकते हैं धारा 6 FRA।
  • मुफ़्त क़ानूनी मदद: 15100। हिंसा या धमकी: 112।

सौ साल से ज़्यादा समय तक वन क़ानूनों ने जंगल में खेती करने, मवेशी चराने और उपज बटोरने वाले लोगों को अपनी ही ज़मीन पर अतिक्रमणकारी माना। अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, 2006, जिसे आम तौर पर FRA कहते हैं, इसी "ऐतिहासिक अन्याय" को सुधारने के लिए बना, जैसा इसकी प्रस्तावना कहती है। यह नई ज़मीन नहीं बाँटता। यह उन अधिकारों को मान्यता देता है जो लोगों के पास पहले से थे, पर जिन्हें वे काग़ज़ पर कभी साबित नहीं कर पाए। इस लेख में बताया गया है कि कौन दावा कर सकता है, क्या माँग सकता है, दावा किन-किन स्तरों से गुज़रता है, और कोई हटाने की कोशिश करे तो क्या करें।

कौन दावा कर सकता है

  • वन में रहने वाली अनुसूचित जनजातियाँ: अनुसूचित जनजाति के वे सदस्य जो मुख्य रूप से जंगल या वन भूमि में रहते हैं और अपनी असली आजीविका की ज़रूरतों के लिए उस पर निर्भर हैं।
  • अन्य परंपरागत वन निवासी (OTFD): कोई भी और व्यक्ति जिसका परिवार 13 दिसंबर 2005 से पहले कम से कम तीन पीढ़ियों, यानी 75 साल, से मुख्य रूप से वन भूमि पर रहता और उस पर निर्भर रहा हो।

दोनों ही मामलों में ज़मीन 13 दिसंबर 2005 को आपके क़ब्ज़े में होनी चाहिए। उसके बाद का क़ब्ज़ा नहीं चलेगा।

क़ानून कौन-से अधिकार मानता है

धारा 3(1) FRA में तेरह तरह के अधिकार गिनाए गए हैं। जिनका सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होता है, वे हैं:

  • व्यक्तिगत वन अधिकार (IFR): जिस वन भूमि पर आप खेती करते या रहते थे, उस पर रहने और उसे रखने का हक़, अधिकतम 4 हेक्टेयर तक और सिर्फ़ उतना जितना असल में आपके क़ब्ज़े में था धारा 4(6) FRA।
  • सामुदायिक अधिकार (CR): लघु वन उपज (minor forest produce: बाँस, तेंदू पत्ता, शहद, लाख, महुआ, जड़ी-बूटी जैसी लकड़ी के अलावा उपज) इकट्ठा करने, इस्तेमाल करने और बेचने का हक़; चराई; मछली पकड़ना; और घुमंतू व पशुपालक समुदायों के मौसमी अधिकार। इनका दावा गाँव मिलकर करता है।
  • सामुदायिक वन संसाधन (CFR) अधिकार: ग्राम सभा का यह हक़ कि वह अपने परंपरागत जंगल की रक्षा करे, उसे फिर से हरा-भरा करे, बचाए और उसका प्रबंधन करे। यह इस क़ानून का सबसे मज़बूत अधिकार है, क्योंकि इससे गाँव को अपने जंगल के बारे में क़ानूनी आवाज़ मिलती है।
  • विकास सुविधाएँ: ग्राम सभा की मंज़ूरी से एक हेक्टेयर तक वन भूमि स्कूल, डिस्पेंसरी, आँगनवाड़ी, पेयजल लाइन, गाँव की सड़क जैसी सुविधा के लिए इस्तेमाल हो सकती है धारा 3(2) FRA।

मान्य अधिकार आपके वारिसों को मिलता है, पर उसे बेचा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता धारा 4(4) FRA। ज़मीन का पट्टा पति-पत्नी दोनों के संयुक्त नाम पर, या अकेले परिवार-प्रमुख (महिला या पुरुष) के नाम पर जारी होता है।

दावे पर फ़ैसला कैसे होता है

पूरी प्रक्रिया तीन स्तरों से गुज़रती है। नियम बताते हैं कि हर स्तर को क्या करना है।

  • ग्राम सभा (गाँव या टोले के सभी वयस्क निवासी) 10 से 15 सदस्यों की वन अधिकार समिति (FRC) चुनती है, जिसमें कम से कम एक-तिहाई महिलाएँ और, जहाँ अनुसूचित जनजाति के लोग हों, कम से कम दो-तिहाई उनमें से हों। FRC दावे लेती है, मौक़े पर जाँच करती है, नक्शा बनाती है, और फिर ग्राम सभा प्रस्ताव पारित करती है।
  • उपखंड स्तरीय समिति (SDLC), जिसकी अध्यक्षता SDO करते हैं, ग्राम सभा के प्रस्ताव की जाँच करके रिकॉर्ड तैयार करती है।
  • ज़िला स्तरीय समिति (DLC), जिसकी अध्यक्षता कलेक्टर करते हैं, अंतिम मंज़ूरी देती है और पट्टा जारी करती है।

तीन सुरक्षाएँ सबसे अहम हैं। दावा लंबित रहते कोई बेदख़ली नहीं धारा 4(5) FRA। अगर SDLC या DLC दावे को ख़ारिज या कम करना चाहे, तो उसे विस्तृत कारण लिखने होंगे और आपको सुनना होगा; वह किसी एक ख़ास दस्तावेज़ पर ज़िद नहीं कर सकती, और पुराने सरकारी रिकॉर्ड का न होना अकेले दावे को गिराने का आधार नहीं हो सकता। और असंतुष्ट कोई भी व्यक्ति 60 दिन के भीतर अगले स्तर पर याचिका दे सकता है धारा 6 FRA; यह अवधि फ़ैसले की तारीख़ से गिनी जाती है, इसलिए उसे लिखित में माँगें।

क़दम दर क़दम

  1. उस ग्राम सभा बैठक में जाएँ जिसमें FRC बनती है और दावे माँगे जाते हैं। अगर आपके गाँव में प्रक्रिया शुरू नहीं हुई, तो पंचायत सचिव या ब्लॉक के आदिवासी कल्याण अधिकारी से बैठक बुलाने को कहें। दावे आम तौर पर ग्राम सभा के बुलावे के तीन महीने के भीतर देने होते हैं, पर ग्राम सभा लिखित कारण दर्ज करके यह समय बढ़ा सकती है।
  2. सही फ़ॉर्म चुनें। व्यक्तिगत ज़मीन के लिए फ़ॉर्म A, सामुदायिक अधिकारों के लिए फ़ॉर्म B, सामुदायिक वन संसाधन के लिए फ़ॉर्म C। ख़ाली फ़ॉर्म FRC, पंचायत दफ़्तर या ज़िला आदिवासी कल्याण कार्यालय से लें।
  3. कम से कम दो सबूत लगाएँ। नियमों में सबूतों की सूची है (नीचे चेकलिस्ट देखें)। गाँव के बुज़ुर्गों का लिखा और दस्तख़त किया बयान भी मान्य सबूत है।
  4. मौक़ा-जाँच के समय मौजूद रहें। FRC, और उपलब्ध हों तो वन व राजस्व कर्मचारी, आपके खेत पर जाकर सीमाएँ नोट करेंगे। देख लें कि दर्ज रक़बा आपके असली क़ब्ज़े से मेल खाता हो।
  5. ग्राम सभा प्रस्ताव की प्रति लें। संभालकर रखें। यही सबूत है कि आपका दावा लंबित है।
  6. SDLC और DLC में पैरवी करें। ब्लॉक या ज़िला आदिवासी कल्याण दफ़्तर से दावे की स्थिति पूछें। कई राज्य अब राज्य के आदिवासी विभाग के ज़रिए दावे की स्थिति ऑनलाइन दिखाते हैं।
  7. ख़ारिज या कम हो जाए, तो ग्राम सभा के समर्थन के साथ 60 दिन के भीतर अगली समिति में याचिका दें। ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण का विधिक सहायता वकील इसे मुफ़्त तैयार कर सकता है।
उदाहरण

मंडला ज़िले के गोंड किसान सुखलाल दो एकड़ के उस खेत में कोदो उगाते हैं जिसे उनके दादा ने 1960 के दशक में साफ़ किया था। 2024 में वन रक्षक कहता है कि यह "आरक्षित वन" है और उन्हें हटना होगा। सुखलाल अपनी ग्राम सभा में जाते हैं, जहाँ FRC बनी है। वे फ़ॉर्म A के साथ पिता का पुराना राशन कार्ड, 1998 की मतदाता सूची जिसमें टोले का नाम है, और तीन बुज़ुर्गों का दस्तख़त किया बयान लगाते हैं। FRC खेत की जाँच करती है। चूँकि धारा 4(5) FRA दावा लंबित रहते बेदख़ली रोकती है, वन विभाग उन्हें हटा नहीं सकता, और DLC उनके और उनकी पत्नी के संयुक्त नाम पर पट्टा जारी करती है।

ये तैयार रखें

  • कोई भी पुराना सरकारी रिकॉर्ड: गज़ेटियर, जनगणना, सर्वे या बंदोबस्त की प्रविष्टि, वन कार्य-योजना, वन विभाग की पुरानी जुर्माना या "अतिक्रमण" रसीद (ये असल में लंबे क़ब्ज़े का सबूत हैं)।
  • वोटर ID, राशन कार्ड, आधार, जाति प्रमाणपत्र, परिवार के पुराने स्कूल रिकॉर्ड।
  • मौजूदगी के भौतिक सबूत: घर, कुआँ, मेड़, फलदार पेड़, क़ब्रें, देवस्थान।
  • गाँव के ऐसे बुज़ुर्गों के लिखित और दस्तख़त किए बयान जो ख़ुद दावेदार न हों।
  • खेत का मोटा नक्शा जिसमें पहचान के निशान हों; कोई मदद कर सके तो GPS रीडिंग।
  • पारित होने पर ग्राम सभा प्रस्ताव की प्रति, और दावा फ़ॉर्म की पावती।

बेदख़ली या किसी परियोजना का ख़तरा हो तो

खदानें, बाँध, सड़कें और प्लांटेशन अक्सर वन भूमि पर ही आते हैं। Orissa Mining Corporation v Ministry of Environment and Forests (2013), यानी नियमगिरि मामले में, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रभावित गाँवों की ग्राम सभाएँ तय करेंगी कि खनन परियोजना उनके धार्मिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक अधिकारों को नुक़सान पहुँचाएगी या नहीं। गाँवों ने मना कर दिया और परियोजना रुक गई। FRA के तहत जब तक अधिकार मान्य न हो जाएँ और ग्राम सभा लिखित सहमति न दे, वन भूमि किसी परियोजना के लिए नहीं दी जा सकती।

क़ानून की वैधता को ही Wildlife First v Union of India में चुनौती दी गई। फ़रवरी 2019 में कोर्ट ने राज्यों को उन लोगों को हटाने का आदेश दिया जिनके दावे ख़ारिज हुए थे, पर दो हफ़्ते के भीतर उस आदेश पर रोक लगा दी, जब सामने आया कि बहुत-से दावे दावेदारों को सुने बिना ख़ारिज हुए थे। 2026 तक मामला लंबित है और रोक जारी है, और राज्यों को ख़ारिज दावों की समीक्षा करने को कहा गया। अगर कोई उस आदेश का हवाला देकर आपको हटाना चाहे, तो यह रोक आपका जवाब है।

बेदख़ली की धमकी मिले तो: आदेश लिखित में माँगें और "अतिक्रमण" मानने वाले किसी काग़ज़ पर दस्तख़त न करें; उसी दिन ग्राम सभा को बताएँ; ज़िला कलेक्टर को लिखित शिकायत दें। अनुसूचित जनजाति के सदस्य को ज़मीन से ज़बरन बेदख़ल करना SC/ST (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत अपराध है, इसलिए पुलिस में शिकायत करें और FIR पर ज़ोर दें।

सावधान

"काग़ज़ नहीं हैं" सोचकर हार न मानें। बुज़ुर्गों के बयान और ज़मीन पर मौजूद निशान सबूत माने जाते हैं, और किसी एक दस्तावेज़ की कमी भर से दावा ख़ारिज नहीं हो सकता। दावे सबसे ज़्यादा इसलिए गिरते हैं कि चुपचाप ख़ारिज होने के 60 दिन के भीतर किसी ने अपील नहीं की, इसलिए लिखित फ़ैसला माँगते रहें। और सामुदायिक दावे (फ़ॉर्म B और C) भी ज़रूर दें: CFR पट्टा पूरे गाँव के जंगल की रक्षा करता है।

कहाँ जाएँ

  • अपने गाँव की ग्राम सभा और वन अधिकार समिति: दावा यहीं दें और यहीं से पैरवी करें।
  • ब्लॉक / ज़िला आदिवासी कल्याण कार्यालय, फिर उपखंड अधिकारी (SDLC) और ज़िला कलेक्टर (DLC), स्थिति, अपील और उत्पीड़न की शिकायत के लिए।
  • ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण या NALSA हेल्पलाइन 15100 मुफ़्त वकील के लिए; अनुसूचित जनजाति के सदस्य और कम आय वाले दावेदार इसके हक़दार हैं (nalsa.gov.in)।
  • राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग (ncst.nic.in) वन अधिकार न मिलने की शिकायत के लिए; जनजातीय कार्य मंत्रालय की FRA जानकारी tribal.nic.in पर।
  • पुलिस / 112 धमकी, हिंसा या तोड़फोड़ के लिए, और अधिकारियों के ख़िलाफ़ केंद्रीय शिकायत के लिए pgportal.gov.in।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मैं अनुसूचित जनजाति से नहीं हूँ। क्या फिर भी FRA में दावा कर सकता हूँ?

हाँ, अन्य परंपरागत वन निवासी (OTFD) के रूप में, पर शर्त कड़ी है। आपको दिखाना होगा कि आपका परिवार 13 दिसंबर 2005 से पहले तीन पीढ़ियों (75 साल) से मुख्य रूप से वन भूमि पर रहता और उस पर निर्भर था। पुराने रिकॉर्ड, बुज़ुर्गों के बयान और क़ब्रों, कुओं, फलदार पेड़ों जैसे भौतिक निशान इसे साबित कर सकते हैं। बहुत-से OTFD दावे किसी एक दस्तावेज़ की कमी से ग़लत ख़ारिज होते हैं, जिसकी नियम इजाज़त नहीं देते, इसलिए ऐसा हो तो अपील करें।

दावा लंबित रहते क्या वन विभाग मुझे हटा सकता है?

नहीं। FRA की धारा 4(5) कहती है कि मान्यता और सत्यापन की प्रक्रिया पूरी होने तक किसी वन निवासी को उसके क़ब्ज़े की वन भूमि से हटाया नहीं जाएगा। ग्राम सभा प्रस्ताव या दावे की पावती की प्रति लेकर रखें और दिखाएँ। अधिकारी फिर भी आगे बढ़ें तो कलेक्टर को लिखित शिकायत दें और विधिक सहायता वकील के लिए 15100 पर कॉल करें।

मेरा दावा ख़ारिज हो गया। अब क्या?

आपको कारणों सहित लिखित आदेश पाने का और उससे पहले सुने जाने का हक़ है। धारा 6 FRA के तहत फ़ैसले के 60 दिन के भीतर अगली ऊँची समिति में याचिका दें। अगर बिना सुनवाई के या सिर्फ़ किसी दस्तावेज़ की कमी से ख़ारिज हुआ, तो याचिका में यह लिखें। ग्राम सभा आपके समर्थन में नया प्रस्ताव भी पारित कर सकती है।

क्या FRA में मिली ज़मीन बेच सकता हूँ?

नहीं। धारा 4(4) कहती है कि यह अधिकार वारिसों को मिलता है, पर इसे बेचा या हस्तांतरित नहीं किया जा सकता। आपकी मृत्यु पर यह क़ानूनी वारिसों को जाता है, पर आप इसे बेच, दान या गिरवी नहीं रख सकते। जो कोई FRA की ज़मीन "ख़रीदने" की पेशकश करे, वह ऐसा सौदा सुझा रहा है जिसे क़ानून मानता ही नहीं।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

क्या यह लेख उपयोगी था?कोई ग़लती दिखी? हमें बताएँ

हर हफ़्ते एक सरल क़ानूनी लेख पाएँ

आपके अधिकारों पर नए लेख, सीधे आपके ईमेल पर। कोई स्पैम नहीं।