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फ़ोटो: Shajankumar, Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0. सांकेतिक चित्र.

बोलने की आज़ादी: क्या कह सकते हैं, और पुलिस का फ़ोन आए तो क्या करें

न्याय पाठशाला7 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

अनुच्छेद 19(1)(a) क्या सुरक्षित करता है, सीमाओं के आठ आधार, पोस्ट पर कौन-सी BNS धाराएँ लगती हैं, और FIR या नोटिस आए तो आपके ठीक-ठीक अधिकार।

क़ानून: अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(2), भारत का संविधान · धारा 196, 299 और 356 BNS · Shreya Singhal v. Union of India (2015)

संक्षेप में

  • अनुच्छेद 19(1)(a) आपके बोलने, लिखने, कला और ऑनलाइन पोस्ट की रक्षा करता है, सरकार की आलोचना समेत। सीमाएँ सिर्फ़ अनुच्छेद 19(2) के आठ आधारों पर लग सकती हैं, और वह भी "उचित" (reasonable) हों तभी।
  • आलोचना, व्यंग्य और अलोकप्रिय राय सुरक्षित हैं। हिंसा के लिए उकसाना, समूहों में दुश्मनी फैलाना, धमकी, और किसी असली व्यक्ति की प्रतिष्ठा बर्बाद करने वाले जानबूझकर झूठे बयान सुरक्षित नहीं हैं।
  • किसी पोस्ट पर पुलिस संपर्क करे तो: उसे डिलीट न करें, FIR या नोटिस लिखित में माँगें, और सवालों का जवाब देने से पहले वकील या 15100 पर कॉल करें।
  • ज़्यादातर अभिव्यक्ति से जुड़े अपराधों में पुलिस को गिरफ़्तारी के बजाय धारा 35 BNSS का नोटिस देना चाहिए, और सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि FIR से पहले आमतौर पर प्रारंभिक जाँच होनी चाहिए।

जब भी आप कोई राय पोस्ट करते हैं, याचिका पर दस्तख़त करते हैं, संपादक को पत्र लिखते हैं या ख़राब सड़क की शिकायत करते हैं, आप अपने सबसे अहम अधिकारों में से एक का इस्तेमाल कर रहे होते हैं। इस आज़ादी की सीमाएँ भी हैं, और लकीर कहाँ है यह जानने से आप भरोसे के साथ बोल पाते हैं और पहचान पाते हैं कि कोई बिना क़ानूनी आधार के आपको चुप कराने की कोशिश कर रहा है।

संविधान क्या सुरक्षित करता है

अनुच्छेद 19(1)(a) हर नागरिक को वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देता है। अदालतें इसे व्यापक अर्थ में पढ़ती हैं: बोले और लिखे शब्द, कला, फ़िल्में, कार्टून, पहनावा, चुप्पी, और इंटरनेट पर अभिव्यक्ति। इसमें जानकारी पाने का अधिकार भी शामिल है, इसीलिए प्रेस की आज़ादी और सूचना का अधिकार इसी से निकलते हैं।

Shreya Singhal v. Union of India (2015) में सुप्रीम कोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम की धारा 66A रद्द कर दी, जो "आपत्तिजनक" या "परेशान करने वाले" ऑनलाइन संदेशों पर गिरफ़्तारी की इजाज़त देती थी। कोर्ट ने चर्चा और वकालत (जो सुरक्षित हैं) और उकसावे (जो सुरक्षित नहीं) के बीच लकीर खींची। Anuradha Bhasin v. Union of India (2020) में कोर्ट ने कहा कि इंटरनेट के ज़रिए अभिव्यक्ति और व्यापार अनुच्छेद 19 से सुरक्षित हैं, और इंटरनेट बंदी ज़रूरी, आनुपातिक और समीक्षा के लिए खुली होनी चाहिए।

क़ानून कौन-सी सीमाएँ मानता है

अनुच्छेद 19(2) राज्य को सिर्फ़ इन आधारों पर "उचित प्रतिबंध" लगाने वाले क़ानून बनाने देता है: भारत की संप्रभुता और अखंडता; राज्य की सुरक्षा; विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध; सार्वजनिक व्यवस्था; शिष्टता या नैतिकता; अदालत की अवमानना; मानहानि; और अपराध के लिए उकसाना। Kaushal Kishor v. State of Uttar Pradesh (2023) में संविधान पीठ ने कहा कि इनके अलावा कोई नया आधार नहीं जोड़ा जा सकता। "उचित" का मतलब है प्रतिबंध ज़रूरत से आगे न जाए; कोई क़ानून पूरे विषय पर सिर्फ़ इसलिए रोक नहीं लगा सकता कि कुछ लोगों को वह नापसंद है।

अभिव्यक्ति कहाँ अपराध बन जाती है

भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) इन सीमाओं को लागू करती है। पोस्ट और भाषणों पर सबसे ज़्यादा लगाई जाने वाली धाराएँ:

  • धारा 196 BNS (पहले धारा 153A IPC): धर्म, नस्ल, जाति, भाषा आदि के आधार पर समूहों के बीच दुश्मनी फैलाना।
  • धारा 197 BNS (पहले धारा 153B IPC): यह लांछन कि कोई समूह भारत के प्रति वफ़ादार नहीं हो सकता, या राष्ट्रीय एकता के लिए हानिकारक बयान।
  • धारा 299 BNS (पहले धारा 295A IPC): धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने के इरादे से जानबूझकर और दुर्भावनापूर्ण कृत्य।
  • धारा 302 BNS (पहले धारा 298 IPC): धार्मिक भावनाओं को चोट पहुँचाने के जानबूझकर इरादे से कहे गए शब्द।
  • धारा 353 BNS (पहले धारा 505 IPC): ऐसे बयान, अफ़वाहें या झूठी जानकारी जिनसे सार्वजनिक उपद्रव, डर या दुश्मनी पैदा होने की संभावना हो।
  • धारा 356 BNS (पहले धारा 499–500 IPC): मानहानि (defamation), यानी किसी असली व्यक्ति की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने वाला झूठा लांछन। जनहित में सच, निष्पक्ष टिप्पणी और सद्भाव में दी गई राय बचाव हैं।
  • धारा 152 BNS: भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को ख़तरे में डालने वाले कृत्य (देखें राजद्रोह पर हमारा अलग लेख)।

अदालतें ज़ोर देती हैं कि इन धाराओं को संकीर्ण अर्थ में पढ़ा जाए। Imran Pratapgarhi v. State of Gujarat (2025) में सुप्रीम कोर्ट ने एक कविता पर दर्ज FIR रद्द की और कहा कि शब्दों का असर एक समझदार, मज़बूत दिमाग़ वाले व्यक्ति के पैमाने से आँका जाए, न कि ऐसे व्यक्ति के जो हर विरोधी विचार से ख़तरा महसूस करता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि तीन से सात साल की सज़ा वाले अभिव्यक्ति-संबंधी अपराधों में पुलिस को FIR दर्ज करने से पहले आमतौर पर धारा 173(3) BNSS की प्रारंभिक जाँच (वरिष्ठ अधिकारी की अनुमति से, 14 दिन तक) करनी चाहिए।

क़दम दर क़दम: किसी पोस्ट पर पुलिस संपर्क करे तो

  1. कुछ भी डिलीट न करें। पूरी पोस्ट, संदर्भ के साथ, आमतौर पर आपका सबसे अच्छा बचाव है। उसके और मिली धमकियों के तारीख़ वाले स्क्रीनशॉट लें।
  2. काग़ज़ माँगें। विनम्रता से FIR की प्रति और लगाई गई धाराएँ माँगें। FIR की मुफ़्त प्रति आपका हक़ है। "थाने आ जाइए" का फ़ोन आए तो लिखित नोटिस माँगें।
  3. नोटिस का नियम जानें। सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में पुलिस को आपको गिरफ़्तार करने के बजाय आमतौर पर धारा 35 BNSS (पहले धारा 41A CrPC) के तहत पेश होने का नोटिस देना चाहिए, जैसा सुप्रीम कोर्ट ने Arnesh Kumar v. State of Bihar (2014) में कहा। नोटिस का पालन वकील के साथ करें।
  4. बात करने से पहले वकील को बुलाएँ। जिन सवालों से आप खुद फँस सकते हैं उन पर चुप रहने का (अनुच्छेद 20(3)) और वकील से सलाह लेने का आपको अधिकार है। मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।
  5. गिरफ़्तार हों तो आपको आधार बताने होंगे, आप रिश्तेदार या दोस्त को सूचित कर सकते हैं, पूछताछ के दौरान वकील से मिल सकते हैं, और 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश होना ज़रूरी है।
  6. मामला बेबुनियाद हो तो हाई कोर्ट जाएँ। वकील अग्रिम ज़मानत (anticipatory bail) माँग सकता है और हाई कोर्ट से ऐसी FIR रद्द करवाने की माँग कर सकता है जिसमें कोई अपराध ही नहीं बनता, जैसा अदालतें अभिव्यक्ति के मामलों में अक्सर करती हैं।
उदाहरण

कॉलेज छात्र नितिन ने बाढ़ से निपटने में राज्य सरकार की नाकामी पर व्यंग्य करता वीडियो पोस्ट किया। तीन दिन बाद एक सिपाही ने फ़ोन कर "आकर सफ़ाई देने" को कहा। नितिन ने वीडियो डिलीट नहीं किया। उन्होंने अपलोड की तारीख़ सहित उसकी प्रति सँभाली, NALSA हेल्पलाइन पर कॉल किया और उन्हें पैनल वकील मिला। वकील ने थाने को पत्र लिखकर FIR और धाराएँ पूछीं। जवाब में धारा 353 BNS की FIR निकली। वकील ने जवाब दिया कि वीडियो में आलोचना है, सार्वजनिक उपद्रव फैलाने वाला झूठा बयान नहीं, Shreya Singhal और Imran Pratapgarhi का हवाला दिया और FIR रद्द करने की याचिका दायर की। हाई कोर्ट ने पहली सुनवाई में ही दंडात्मक कार्रवाई पर रोक लगा दी।

ये तैयार रखें

  • पूरी पोस्ट के तारीख़ वाले स्क्रीनशॉट या डाउनलोड की गई प्रति, जवाबों और संदर्भ सहित
  • मिली धमकियों, गालियों या नोटिस के स्क्रीनशॉट, भेजने वाले के हैंडल और URL सहित
  • FIR या धारा 35 BNSS के नोटिस की प्रति, अगर हो
  • आपका पहचान-पत्र और किसी वकील या DLSA का संपर्क नंबर
  • सबूत कि बयान सच है, या साफ़ तौर पर राय या व्यंग्य के रूप में लिखा गया है
सावधान

फ़ॉरवर्ड करना भी बोलना है। किसी समुदाय के बारे में छेड़छाड़ किया वीडियो या झूठी अफ़वाह शेयर करने पर धारा 196 या 353 BNS लग सकती है, भले ही आपने उसे बनाया न हो, और मानहानि में "मैंने तो सिर्फ़ फ़ॉरवर्ड किया" बचाव नहीं है। शेयर करने से पहले जाँचें।

कहाँ जाएँ

  • आपातकाल या हिंसा की धमकी: 112; महिलाएँ 181 पर कॉल कर सकती हैं।
  • ऑनलाइन गाली, धमकी या फ़र्ज़ी प्रोफ़ाइल: प्लेटफ़ॉर्म पर रिपोर्ट करें, फिर cybercrime.gov.in पर या हेल्पलाइन 1930 पर।
  • अगर जाँच आपके ख़िलाफ़ है: FIR की प्रति के लिए थाना प्रभारी (SHO); थाना न दे तो पुलिस अधीक्षक।
  • मुफ़्त क़ानूनी सहायता: 15100, आपका ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण, nalsa.gov.in।
  • अदालतें: अग्रिम ज़मानत के लिए सत्र न्यायालय; बेबुनियाद FIR रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट (अनुच्छेद 226 या धारा 528 BNSS); अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या सोशल मीडिया पर सरकार या मंत्री की आलोचना करने पर मुझे गिरफ़्तार किया जा सकता है?

आलोचना, चाहे कितनी भी तीखी हो, अनुच्छेद 19(1)(a) से सुरक्षित है, और सुप्रीम कोर्ट ऐसी पोस्ट पर दर्ज FIR बार-बार रद्द कर चुका है। गिरफ़्तारी तभी क़ानूनी है जब आपके शब्द सचमुच किसी अपराध में आते हों, जैसे हिंसा के लिए उकसाना या समूहों में दुश्मनी फैलाना। ज़्यादातर अभिव्यक्ति-संबंधी अपराधों में पुलिस को गिरफ़्तारी के बजाय पहले धारा 35 BNSS का नोटिस देना चाहिए।

क्या भारत में मानहानि अपराध है?

हाँ। मानहानि दीवानी ग़लती भी है (आप पर हर्जाने का मुक़दमा हो सकता है) और धारा 356 BNS के तहत आपराधिक अपराध भी, जिसमें दो साल तक की क़ैद, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं। जनहित में प्रकाशित सच, सार्वजनिक आचरण पर निष्पक्ष टिप्पणी, और सद्भाव में दी गई राय बचाव हैं। सुप्रीम कोर्ट ने Subramanian Swamy v. Union of India (2016) में आपराधिक मानहानि को बरक़रार रखा।

क्या भारतीय क़ानून में हेट स्पीच परिभाषित है?

"हेट स्पीच" नाम का कोई एक अपराध नहीं है। BNS की कई धाराएँ इसे कवर करती हैं, मुख्यतः धारा 196 (समूहों में दुश्मनी फैलाना), धारा 197 (राष्ट्रीय एकता के ख़िलाफ़ लांछन), धारा 299 (धार्मिक भावनाएँ भड़काना) और धारा 353 (सार्वजनिक उपद्रव फैलाने वाले बयान)। सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस को निर्देश दिया है कि हेट स्पीच के मामलों में शिकायत का इंतज़ार किए बिना खुद FIR दर्ज करे।

क्या सरकार मेरी पोस्ट या अकाउंट ब्लॉक कर सकती है?

सिर्फ़ क़ानून के तहत। सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A तय आधारों पर, एक समिति की प्रक्रिया से, ब्लॉकिंग आदेश की इजाज़त देती है, और सुप्रीम कोर्ट ने Shreya Singhal में इसे बरक़रार रखा क्योंकि इसमें सुरक्षा-उपाय हैं। ब्लॉकिंग आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है। प्लेटफ़ॉर्म अपने नियमों के तहत भी सामग्री हटाते हैं, जो एक अलग, निजी फ़ैसला है।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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