इंटरनेट बंदी: क़ानून क्या कहता है, सीमाएँ और आपके विकल्प
दूरसंचार अधिनियम 2023 और 2024 के नियमों में इंटरनेट कौन बंद कर सकता है, 15 दिन की सीमा, Anuradha Bhasin की शर्तें, और आप क्या कर सकते हैं।
संक्षेप में
- इंटरनेट बंद (suspension) करने का आदेश सिर्फ़ केंद्रीय गृह सचिव या राज्य का गृह सचिव दे सकता है, धारा 20(2)(b) दूरसंचार अधिनियम, 2023 और 2024 के निलंबन नियमों के तहत।
- हर आदेश लिखित होना चाहिए, उसमें कारण और इलाक़ा होना चाहिए, और वह प्रकाशित होना चाहिए। एक आदेश 15 दिन से ज़्यादा नहीं चल सकता। समीक्षा समिति को पाँच दिन में उसकी जाँच करनी होती है।
- सुप्रीम कोर्ट ने Anuradha Bhasin (2020) में कहा कि बंदी ज़रूरी, आनुपातिक (proportionate) और सबसे कम पाबंदी वाला विकल्प होनी चाहिए। अनिश्चित काल की बंदी ग़ैरक़ानूनी है।
- आप प्रभावित हैं तो: आदेश ढूँढें, नुकसान दर्ज करें, आदेश छिपा हो तो RTI डालें, और हाई कोर्ट में रिट याचिका पर विचार करें। क़ानूनी सहायता: 15100।
बहुत लोगों के लिए इंटरनेट ही कमाई, पढ़ाई, बिल भुगतान, डॉक्टर से संपर्क और परिवार से बात का ज़रिया है। यह बंद होता है तो छात्र की ऑनलाइन परीक्षा छूटती है, दुकानदार UPI नहीं ले पाता, और गिग वर्कर लॉग-इन नहीं कर पाता। भारत में दुनिया के लगभग किसी भी देश से ज़्यादा इंटरनेट बंदी हुई है, कुछ घंटों की और कुछ महीनों की। सरकार के पास सेवाएँ निलंबित करने की क़ानूनी शक्ति है। पर उसकी साफ़ सीमाएँ हैं, और उन्हें जानने से पता चलता है कि बंदी कब ग़ैरक़ानूनी है और आप क्या कर सकते हैं।
बंदी की इजाज़त देने वाला क़ानून
यह शक्ति दूरसंचार अधिनियम, 2023 की धारा 20(2)(b) से आती है। यह केंद्र या राज्य सरकार को सार्वजनिक आपातकाल (public emergency) या सार्वजनिक सुरक्षा के हित में, सार्वजनिक व्यवस्था या अपराध के लिए उकसावे की रोकथाम जैसे कारणों से, दूरसंचार सेवाएँ निलंबित करने का निर्देश देने की इजाज़त देती है। इसने भारतीय टेलीग्राफ़ अधिनियम, 1885 की पुरानी शक्ति की जगह ली।
प्रक्रिया दूरसंचार (सेवाओं का अस्थायी निलंबन) नियम, 2024 में है, जो 22 नवंबर 2024 को अधिसूचित हुए और 2017 के नियमों की जगह आए। 2024 के नियमों के तहत:
- आदेश कौन दे सकता है। "सक्षम प्राधिकारी" (competent authority) केंद्र के लिए केंद्रीय गृह सचिव और राज्य के लिए राज्य गृह विभाग का सचिव है। ज़िला मजिस्ट्रेट या पुलिस अधिकारी अपने दम पर बंदी का आदेश नहीं दे सकते।
- आपात आदेश। सक्षम प्राधिकारी के लिए कार्रवाई संभव न हो तो कम से कम संयुक्त सचिव स्तर का अधिकृत अधिकारी आदेश दे सकता है, पर सक्षम प्राधिकारी 24 घंटे में पुष्टि न करे तो वह ख़त्म हो जाता है।
- आदेश में क्या हो। कारण, भौगोलिक इलाक़ा और अवधि लिखी होनी चाहिए, और आदेश प्रकाशित होना चाहिए।
- समीक्षा। शीर्ष अधिकारियों की समीक्षा समिति (केंद्र में कैबिनेट सचिव, राज्य में मुख्य सचिव की अध्यक्षता में) को आदेश के पाँच दिन के भीतर बैठक करके दर्ज करना होता है कि आदेश क़ानूनी कसौटी पर खरा है या नहीं।
- अवधि। एक निलंबन आदेश 15 दिन से ज़्यादा नहीं चल सकता।
दो और शक्तियाँ अक्सर बंदी से उलझा दी जाती हैं। IT अधिनियम, 2000 की धारा 69A केंद्र सरकार को ख़ास वेबसाइट, ऐप या पोस्ट ब्लॉक करने देती है; वह सामग्री ब्लॉक करना है, सेवा बंद करना नहीं। और धारा 163 BNSS की निषेधाज्ञा (पुरानी धारा 144) किसी इलाक़े में जमावड़े और कामों पर रोक लगाती है; Anuradha Bhasin के बाद वह इंटरनेट काटने का सही आधार नहीं है।
अदालतों ने क्या कहा है
मुख्य फ़ैसला Anuradha Bhasin v. Union of India (2020) है, जो जम्मू-कश्मीर की लंबी बंदी के बाद आया। सुप्रीम कोर्ट ने कहा:
- इंटरनेट पर बोलने की आज़ादी और व्यापार या कारोबार करने की आज़ादी अनुच्छेद 19(1)(a) और अनुच्छेद 19(1)(g) में संरक्षित हैं।
- बंदी इन अधिकारों पर पाबंदी है, इसलिए वह ज़रूरी, आनुपातिक और सबसे कम पाबंदी वाला विकल्प होनी चाहिए। पूरी बंदी से पहले सरकार को छोटे क़दम, जैसे ख़ास साइटें ब्लॉक करना या इलाक़ा सीमित करना, सोचने होंगे।
- अनिश्चित काल का निलंबन जायज़ नहीं है, और आदेशों की समय-समय पर समीक्षा होनी चाहिए।
- सभी निलंबन आदेश प्रकाशित होने चाहिए, ताकि प्रभावित लोग अदालत में चुनौती दे सकें।
इससे पहले Faheema Shirin v. State of Kerala (2019) में केरल हाई कोर्ट ने कहा था कि इंटरनेट की पहुँच अनुच्छेद 21 के तहत शिक्षा और निजता के अधिकार का हिस्सा है। 2024 के नियम Anuradha Bhasin की कई सुरक्षाओं, जैसे प्रकाशन और समय-सीमा, को क़ानून में ही लिख देते हैं।
व्यवहार में यह कैसे चलता है
ज़्यादातर बंदी किसी ज़िले या कुछ थाना क्षेत्रों में मोबाइल डेटा का निलंबन होती है, सांप्रदायिक तनाव, प्रदर्शन या, विवादास्पद रूप से, भर्ती परीक्षाओं में नक़ल रोकने के लिए। ब्रॉडबैंड अक्सर चालू रहता है। वॉइस कॉल और SMS आम तौर पर चलते रहते हैं, इसलिए 112 और दूसरी हेल्पलाइनें काम करती हैं। कुछ आदेश हर 15 दिन में लंबे समय तक दोहराए जाते हैं; हर नवीनीकरण नया आदेश है जिसे वही कसौटियाँ पूरी करनी होंगी और समीक्षा समिति के सामने जाना होगा। परीक्षा के लिए बंदी "सार्वजनिक आपातकाल" है या नहीं, यह विवादित है।
क़दम दर क़दम: आप क्या कर सकते हैं
- आदेश ढूँढें। राज्य गृह विभाग की वेबसाइट, ज़िला वेबसाइट, अख़बार और आधिकारिक सोशल मीडिया अकाउंट देखें। तारीख़ सहित प्रति सेव करें।
- नुकसान दर्ज करें। तारीख़ें, घंटे और प्रभावित इलाक़े लिखें, और क्या नुकसान हुआ: छूटी परीक्षा या इंटरव्यू, रद्द ऑर्डर, फेल भुगतान, इलाज में देरी। रसीदें और स्क्रीनशॉट रखें।
- RTI डालें अगर आदेश या समीक्षा समिति के निष्कर्ष सार्वजनिक नहीं हैं। राज्य गृह विभाग से आदेश, उसके कारण और समीक्षा समिति की कार्यवाही (minutes) माँगें। फ़ीस 10 रुपये है और जवाब 30 दिन में मिलना चाहिए।
- प्राधिकारी से शिकायत करें। गृह सचिव और ज़िला मजिस्ट्रेट को लिखकर बंदी हटाने या सीमित करने को कहें, Anuradha Bhasin और 15 दिन की सीमा का हवाला देते हुए।
- हाई कोर्ट जाएँ। प्रभावित व्यक्ति, कारोबार या संगठन अप्रकाशित, बिना कारण, बहुत व्यापक या बार-बार दोहराए आदेश के ख़िलाफ़ अनुच्छेद 226 में रिट याचिका (writ petition) दायर कर सकता है। आदेश और नुकसान के सबूत साथ लगाएँ।
- मदद लें। NALSA की मुफ़्त क़ानूनी सहायता लाइन 15100 पर कॉल करें या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण जाएँ।
सुनीता एक छोटा बुटीक चलाती हैं और 80 प्रतिशत भुगतान UPI से लेती हैं। स्थानीय झड़प के बाद "क़ानून-व्यवस्था" के नाम पर उनके ज़िले में मोबाइल डेटा बंद होता है, और फिर दो बार बढ़ाया जाता है। तीसरे हफ़्ते तक उनकी बिक्री आधी रह जाती है। वे गृह विभाग की वेबसाइट पर आदेश ढूँढती हैं, देखती हैं कि दूसरा और तीसरा आदेश पहले की शब्दशः नक़ल हैं, और गिरावट दिखाते अपने रोज़ के बिक्री रिकॉर्ड रखती हैं। ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण की मदद से वे और चार अन्य व्यापारी हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर करते हैं। अदालत राज्य से पूछती है कि पूरे ज़िले में बंदी अब भी क्यों ज़रूरी है, और राज्य उसे दो थाना क्षेत्रों तक सीमित कर देता है।
बंदी के दौरान सुरक्षित रहना
आपातकालीन नंबर फ़ोन में सेव और काग़ज़ पर लिखे रखें। कुछ नक़द रखें। बंदी की आशंका हो तो ऑफ़लाइन नक़्शे और ज़रूरी दस्तावेज़ पहले डाउनलोड कर लें। जानकारी कम हो तो अफ़वाहें तेज़ फैलती हैं; आधिकारिक घोषणाओं पर भरोसा करें और सेवा लौटने पर बिना जाँचे संदेश आगे न बढ़ाएँ, क्योंकि डर फैलाने वाली झूठी ख़बर फैलाना धारा 353 BNS में अपराध हो सकता है।
ये तैयार रखें
- निलंबन आदेश और हर नवीनीकरण की प्रति, तारीख़ों सहित।
- बिना सेवा के घंटों और इलाक़ों का तारीख़वार रिकॉर्ड।
- नुकसान का सबूत: बिक्री रिकॉर्ड, फेल लेन-देन के स्क्रीनशॉट, परीक्षा या इंटरव्यू की सूचना, मेडिकल अपॉइंटमेंट।
- आपका RTI आवेदन और कोई जवाब।
- याचिका की योजना हो तो पहचान और कारोबार का प्रमाण।
ज़िला मजिस्ट्रेट का "धारा 144" नोटिस इंटरनेट निलंबन का वैध आदेश नहीं है। 2024 के नियमों में सिर्फ़ गृह सचिव (या 24 घंटे में पुष्टि के साथ संयुक्त सचिव स्तर का अधिकारी) ही यह आदेश दे सकता है। बंदी सिर्फ़ स्थानीय आदेश पर चल रही हो तो उसे चुनौती दी जा सकती है।
कहाँ जाएँ
- राज्य गृह विभाग (सक्षम प्राधिकारी) और ज़िला मजिस्ट्रेट, आदेश माँगने और उसे हटाने या सीमित कराने के लिए।
- आदेश और समीक्षा समिति की कार्यवाही के लिए गृह विभाग में RTI; केंद्रीय निकायों के लिए ऑनलाइन rtionline.gov.in पर।
- अनुच्छेद 226 में हाई कोर्ट रिट याचिका; असाधारण मामलों में अनुच्छेद 32 में सुप्रीम कोर्ट।
- मुफ़्त क़ानूनी सहायता 15100 (NALSA); आपातकाल 112 (डेटा बंदी में वॉइस कॉल आम तौर पर चलती है)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
भारत में इंटरनेट बंदी का आदेश कौन दे सकता है?
2024 के निलंबन नियमों में सिर्फ़ केंद्रीय गृह सचिव या राज्य का गृह सचिव। आपात स्थिति में उनके द्वारा अधिकृत कम से कम संयुक्त सचिव स्तर का अधिकारी आदेश दे सकता है, पर 24 घंटे में पुष्टि न हो तो वह ख़त्म हो जाता है। ज़िला मजिस्ट्रेट या पुलिस प्रमुख अपने दम पर बंदी का आदेश नहीं दे सकते।
बंदी क़ानूनी तौर पर कितनी लंबी हो सकती है?
एक आदेश 15 दिन से ज़्यादा नहीं चल सकता। उसके बाद सरकार नया आदेश दे सकती है, पर हर आदेश में कारण होने चाहिए, वह प्रकाशित होना चाहिए और पाँच दिन में समीक्षा समिति के सामने जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अनिश्चित काल की बंदी असंवैधानिक है।
क्या बंदी के दौरान हुए नुकसान का मुआवज़ा मिल सकता है?
अधिनियम या नियमों में अपने आप मुआवज़ा नहीं है। हाई कोर्ट रिट याचिका में बंदी को ग़ैरक़ानूनी पाए तो मुआवज़ा दे सकता है, पर यह दुर्लभ है और तथ्यों पर निर्भर करता है। ऐसे किसी दावे के लिए नुकसान का विस्तृत रिकॉर्ड रखना ज़रूरी है।
क्या इंटरनेट बंदी और वेबसाइट ब्लॉक करना एक ही बात है?
नहीं। IT अधिनियम की धारा 69A में ब्लॉकिंग पूरे देश में ख़ास वेबसाइट, ऐप या पोस्ट तक पहुँच रोकती है। दूरसंचार अधिनियम में निलंबन किसी इलाक़े में सेवा ही बंद कर देता है। दोनों में अलग अधिकारी, प्रक्रिया और सुरक्षा उपाय लागू होते हैं।
क्या परीक्षा के लिए बंदी "सार्वजनिक आपातकाल" मानी जाती है?
यह विवादित है। कई राज्यों ने भर्ती परीक्षाओं में नक़ल रोकने के लिए मोबाइल डेटा बंद किया है। आलोचकों का तर्क है कि यह धारा 20 के तहत सार्वजनिक आपातकाल या सार्वजनिक सुरक्षा की ज़रूरत नहीं है। ऐसे आदेश को परखने का रास्ता रिट याचिका है; अपने नुकसान का सबूत रखें।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।