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Children playing cricket in a park in Delhiनारी

फ़ोटो: Ktorrespr, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0. सांकेतिक चित्र.

POCSO: बच्चे के यौन शोषण की शिकायत कैसे करें, आगे क्या होता है

न्याय पाठशाला7 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

POCSO किन अपराधों को कवर करता है, रिपोर्ट करने की क़ानूनी ज़िम्मेदारी (धारा 19), 1098 और पुलिस, बाल-हितैषी प्रक्रिया, मुआवज़ा और मुफ़्त क़ानूनी सहायता।

क़ानून: धारा 3–12, 19–24, 27, 33, 35–37 और 40, यौन अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (2019 में संशोधित) · POCSO नियम, 2020 · अनुच्छेद 15(3) और 21, भारत का संविधान

संक्षेप में

  • POCSO 18 साल से कम उम्र के हर व्यक्ति की, किसी भी लिंग के, रक्षा करता है। बच्चे की "सहमति" कोई बचाव नहीं है।
  • अगर आपको शोषण का पता है या शक भी है, तो आपको पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई को रिपोर्ट करनी ही होगी (धारा 19 POCSO)। चुप रहना ख़ुद एक अपराध है (धारा 21 POCSO)।
  • मदद और काउंसलिंग के लिए 1098 (चाइल्डलाइन), बच्चा अभी ख़तरे में हो तो 112 पर कॉल करें।
  • बच्चे का बयान घर पर, सादे कपड़ों में महिला अधिकारी, भरोसेमंद बड़े की मौजूदगी में लेती है। अदालत में बच्चा कभी आरोपी के सामने नहीं आता।
  • मुफ़्त क़ानूनी सहायता (15100) और विशेष अदालत से मुआवज़ा मिलता है। बच्चे का नाम या फ़ोटो कोई प्रकाशित नहीं कर सकता।

यौन शोषण का शिकार ज़्यादातर बच्चे उस व्यक्ति को जानते हैं जो उन्हें नुक़सान पहुँचाता है: कोई रिश्तेदार, पड़ोसी, शिक्षक, परिवार का दोस्त। बच्चे डर या उलझन में चुप रहते हैं। बड़े कभी-कभी परिवार की इज़्ज़त बचाने के लिए चुप रहते हैं। यौन अपराधों से बालकों का संरक्षण अधिनियम, 2012 (POCSO) इसी चुप्पी को तोड़ने के लिए बना। यह गाइड बताती है कि क़ानून किन अपराधों को कवर करता है, कोई बच्चा आपको कुछ बताए तो आपको क्या करना है, और पुलिस व अदालत से बच्चे को क्या उम्मीद रखनी चाहिए।

किसे सुरक्षा मिलती है

POCSO में "बालक" (child) 18 साल से कम उम्र का कोई भी व्यक्ति है। क़ानून लिंग-निरपेक्ष है: यह लड़कों, लड़कियों और किसी भी लिंग के बच्चों की रक्षा करता है, और अपराधी भी किसी भी लिंग का हो सकता है। बच्चे की सहमति कोई बचाव नहीं, क्योंकि क़ानून 18 से कम उम्र के व्यक्ति को यौन गतिविधि के लिए सहमति देने योग्य नहीं मानता।

कौन-कौन से काम अपराध हैं

  • प्रवेशन यौन हमला (penetrative sexual assault, धारा 3 POCSO) और उसका गंभीर रूप (धारा 5): "गंभीर" में पुलिस, शिक्षक, अस्पताल कर्मचारी, रिश्तेदार या भरोसे की किसी भी हैसियत वाले व्यक्ति द्वारा शोषण, बहुत छोटे या दिव्यांग बच्चों का शोषण, और सामूहिक या बार-बार किया गया शोषण आता है।
  • यौन हमला, यानी यौन इरादे से छूना (धारा 7), और गंभीर यौन हमला (धारा 9)।
  • यौन उत्पीड़न (धारा 11): यौन टिप्पणियाँ या इशारे, पॉर्नोग्राफ़ी दिखाना, बच्चे का बार-बार पीछा करना या उस पर नज़र रखना, या उसकी तस्वीरें फैलाने की धमकी।
  • बच्चे का पॉर्नोग्राफ़ी के लिए इस्तेमाल (धारा 13–14) और बाल यौन शोषण सामग्री रखना या शेयर करना (धारा 15)।
  • इनमें से किसी की कोशिश या उकसावा (धारा 16–18)।

2019 के संशोधन के बाद प्रवेशन यौन हमले की सज़ा कम से कम दस साल क़ैद है, और बच्चा 16 साल से छोटा हो तो कम से कम बीस साल (धारा 4)। गंभीर प्रवेशन यौन हमले में कम से कम बीस साल, जो बाक़ी प्राकृतिक जीवन की क़ैद या मृत्युदंड तक जा सकती है (धारा 6)। POCSO के अपराध संज्ञेय (cognizable, यानी पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है) हैं।

रिपोर्ट करने की ज़िम्मेदारी

धारा 19(1) POCSO कहती है कि जिस किसी को पता हो कि अपराध हुआ है, या आशंका हो कि होने वाला है, वह स्थानीय पुलिस या विशेष किशोर पुलिस इकाई (SJPU) को सूचना "देगा"। यह ज़िम्मेदारी सब पर है: माता-पिता, पड़ोसी, शिक्षक, डॉक्टर, हॉस्टल वार्डन। रिपोर्ट न करने पर छह महीने तक की क़ैद या जुर्माना या दोनों (धारा 21(1))। स्कूल, अस्पताल या किसी संस्था का प्रमुख अपने अधीनस्थ के शोषण की रिपोर्ट न करे तो एक साल तक की क़ैद (धारा 21(2))। रिपोर्ट न करने वाले बच्चे को कभी सज़ा नहीं होती।

नेक नीयत से रिपोर्ट करने वाले को सुरक्षा है: इसके लिए आप पर कोई दीवानी या फ़ौजदारी मामला नहीं चल सकता (धारा 19(7))। सिर्फ़ किसी को अपमानित करने, वसूली या बदनाम करने के लिए झूठी शिकायत अपराध है (धारा 22), लेकिन यह बच्चे पर कभी लागू नहीं होता।

X बनाम प्रिंसिपल सेक्रेटरी, स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण विभाग (2022) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गर्भवती नाबालिग की धारा 19 के तहत रिपोर्ट करने वाले डॉक्टर को, लड़की और उसके अभिभावक के कहने पर, उसका नाम और पहचान बताने की ज़रूरत नहीं। रिपोर्ट की ज़िम्मेदारी कभी भी बच्चे के इलाज में रुकावट नहीं बननी चाहिए।

सुझाव

कोई बच्चा शोषण के बारे में बताए तो: शांत रहें, सुनें, और साफ़ कहें कि इसमें उसकी कोई ग़लती नहीं। एक ही सवाल बार-बार न पूछें, राज़ रखने का वादा न करें, और बच्चे के सामने शोषक से भिड़ें नहीं। बच्चे ने जो कहा, उसी के शब्दों में तारीख़ के साथ लिख लें। फिर रिपोर्ट करें।

रिपोर्ट के बाद क्या होता है

  • रिपोर्ट दर्ज करना। पुलिस को उसे लिखना, आपको पढ़कर सुनाना और रजिस्टर में दर्ज करना होगा (धारा 19(2))। बच्चा ख़ुद रिपोर्ट करे तो सरल भाषा में लिखी जाएगी और ज़रूरत हो तो दुभाषिया मिलेगा।
  • 24 घंटे के भीतर। बच्चे को देखभाल या सुरक्षा चाहिए तो पुलिस उसका इंतज़ाम करेगी, और 24 घंटे के भीतर बच्चे को बाल कल्याण समिति (CWC) के सामने पेश करेगी और विशेष अदालत को रिपोर्ट करेगी (धारा 19(5)–(6))। CWC, POCSO नियम 2020 के तहत एक सहायक व्यक्ति (support person) नियुक्त कर सकती है जो पूरे मामले में बच्चे के साथ रहे।
  • बच्चे का बयान। यह बच्चे के घर या उसकी पसंद की जगह पर, जहाँ तक हो सके सब-इंस्पेक्टर से नीचे न हो ऐसी महिला अधिकारी द्वारा, सादे कपड़ों में, माता-पिता या भरोसेमंद व्यक्ति की मौजूदगी में दर्ज होता है (धारा 24)। बच्चे को रात में थाने में नहीं रखा जा सकता और न आरोपी के सामने लाया जा सकता है।
  • मेडिकल जाँच। तुरंत, FIR से पहले भी, बच्चे या अभिभावक की सहमति से। लड़की की जाँच महिला डॉक्टर करेगी, और माता-पिता या भरोसेमंद व्यक्ति साथ रह सकता है (धारा 27)। अस्पताल पहले इलाज करेंगे, सवाल बाद में।
  • जाँच और चार्जशीट। पुलिस को रिपोर्ट के दो महीने के भीतर जाँच पूरी करनी होगी (धारा 193(2) BNSS, जो POCSO अपराधों पर लागू है)।

विशेष अदालत में

  • मुक़दमा विशेष अदालत (Special Court) में, बंद कमरे में (in camera, यानी आम लोगों के बिना) चलता है, और बच्चा पर्दे के पीछे से या वीडियो लिंक से गवाही दे सकता है ताकि वह आरोपी को कभी न देखे (धारा 36–37)।
  • बच्चे से सवाल जज के ज़रिए पूछे जाते हैं; आक्रामक जिरह और बच्चे के चरित्र पर सवाल की इजाज़त नहीं (धारा 33)।
  • बच्चे की गवाही 30 दिन के भीतर दर्ज होनी चाहिए और मुक़दमा जहाँ तक हो सके एक साल में पूरा (धारा 35)।
  • परिवार अपना वकील रख सकता है, और न रख पाए तो विधिक सेवा प्राधिकरण को मुफ़्त वकील देना होगा (धारा 40)।
  • अदालत इलाज, काउंसलिंग और पुनर्वास के लिए मुआवज़ा दे सकती है, मामला चलते हुए अंतरिम मुआवज़ा भी (धारा 33(8); POCSO नियम, 2020)। यह राज्य के पीड़ित मुआवज़ा कोष से मिलता है, भले ही आरोपी बरी हो जाए या कभी पकड़ा न जाए।
  • मीडिया समेत कोई भी बच्चे का नाम, पता, स्कूल, फ़ोटो या परिवार का ब्योरा उजागर नहीं कर सकता (धारा 23)। उल्लंघन पर छह महीने से एक साल तक की क़ैद।

क़दम दर क़दम

  1. बच्चा अभी ख़तरे में हो तो 112 पर कॉल करें और उसे शोषक से दूर ले जाएँ।
  2. 1098 (चाइल्डलाइन) पर कॉल करें। प्रशिक्षित कर्मचारी आ सकते हैं, बच्चे की काउंसलिंग कर सकते हैं और पुलिस व CWC में आपकी मदद कर सकते हैं।
  3. नज़दीकी थाने या SJPU जाएँ। आप किसी भी थाने में रिपोर्ट कर सकते हैं (ज़ीरो FIR)। रिपोर्ट पढ़कर सुनाने को कहें, प्रविष्टि संख्या और FIR की मुफ़्त कॉपी लें।
  4. बच्चे को जाँच और इलाज के लिए सरकारी अस्पताल ले जाएँ। मेडिकल काग़ज़ सँभालकर रखें।
  5. शोषक उसी घर में रहता हो तो CWC से सुरक्षित जगह या सुरक्षा आदेश माँगें।
  6. ऑनलाइन शोषण या तस्वीरें: cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट करें या 1930 पर कॉल करें; NCPCR का POCSO e-Box भी है जहाँ बच्चे ऑनलाइन शिकायत कर सकते हैं।
  7. वकील, मुआवज़े की अर्ज़ी और विशेष अदालत में मदद के लिए 15100 पर कॉल करें या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण जाएँ।
उदाहरण

नागपुर में कक्षा 6 की शिक्षिका रेखा देखती हैं कि दस साल का अमन अपने चाचा के लेने आने पर सहम जाता है। एक दिन वह बताता है कि चाचा रात में "गंदी हरकतें" करते हैं। रेखा और सवाल नहीं पूछतीं। वे उसके शब्द लिख लेती हैं, प्रिंसिपल को बताती हैं, और उसी दोपहर दोनों 1098 पर कॉल करके थाने जाते हैं। रिपोर्ट दर्ज होती है, अमन को CWC के सामने पेश किया जाता है, जो एक सहायक व्यक्ति नियुक्त करती है और उसे दादी के पास रखती है। एक महिला अधिकारी दादी के घर पर उसका बयान दर्ज करती है। रेखा ने ठीक वही किया जो धारा 19 कहती है, और रिपोर्ट करने के लिए उन पर कोई क़ानूनी कार्रवाई नहीं हो सकती।

ये तैयार रखें

  • बच्चे का जन्म प्रमाणपत्र या स्कूल आईडी (18 से कम उम्र का सबूत)
  • बच्चे ने जो कहा, उसका आपका नोट, तारीख़ और समय के साथ
  • मेडिकल जाँच रिपोर्ट और इलाज के काग़ज़
  • FIR की कॉपी और प्रविष्टि संख्या; सहायक व्यक्ति का नाम और संपर्क
  • कोई मैसेज, फ़ोटो या स्क्रीनशॉट (डिलीट या फ़ॉरवर्ड न करें; पुलिस को दिखाएँ)
सावधान

POCSO मामले को परिवार या समाज में "निपटाना" क़ानूनन संभव नहीं है और रिपोर्ट न करने के लिए आप पर मुक़दमा चल सकता है। "शर्म" के डर से मेडिकल जाँच में देरी न करें: सबूत कुछ दिनों में मिट जाते हैं, और मामला चले या न चले, बच्चे को इलाज चाहिए।

कहाँ जाएँ

  • 112 आपातकाल; 1098 चाइल्डलाइन (मुफ़्त, 24 घंटे)
  • स्थानीय थाना या विशेष किशोर पुलिस इकाई; ज़िले की बाल कल्याण समिति
  • ऑनलाइन शोषण: cybercrime.gov.in या 1930; NCPCR POCSO e-Box
  • मुफ़्त क़ानूनी सहायता और मुआवज़ा: 15100 (NALSA), ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण
  • पुलिस कार्रवाई न करे तो: पुलिस अधीक्षक, फिर मजिस्ट्रेट (धारा 175(3) BNSS); राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पक्का न हो कि शोषण हुआ है, तब भी रिपोर्ट करनी होगी?

हाँ। धारा 19 सिर्फ़ पक्की जानकारी नहीं, अपराध होने की वाजिब आशंका को भी कवर करती है। नेक नीयत से रिपोर्ट करने पर आप क़ानूनी कार्रवाई से सुरक्षित हैं, भले ही पुलिस को बाद में कुछ न मिले। फ़ैसला प्रशिक्षित लोगों पर छोड़ें; आपका काम रिपोर्ट करना है, जाँच करना नहीं।

क्या माता-पिता बाद में POCSO केस वापस ले सकते हैं?

नहीं। POCSO के अपराध समझौते योग्य (compoundable) नहीं हैं, यानी मुक़दमा राज्य चलाता है और परिवार उसे "निपटा" या वापस नहीं ले सकता। हाई कोर्ट दुर्लभ स्थितियों में केस रद्द कर सकता है, लेकिन परिवारों को इस पर भरोसा नहीं करना चाहिए। केस वापस लेने के लिए बच्चे या परिवार पर दबाव ख़ुद अपराध हो सकता है।

क्या बच्चे को बार-बार अदालत जाना पड़ेगा?

क़ानून इसे सीमित करने की कोशिश करता है। बयान एक बार घर पर दर्ज होता है, गवाही 30 दिन में होनी चाहिए, बच्चा वीडियो से या पर्दे के पीछे से गवाही दे सकता है, और सवालों पर जज का नियंत्रण रहता है। सहायक व्यक्ति बच्चे के साथ रह सकता है। ये सुरक्षाएँ न मिलें तो अदालत से माँगें।

शोषक शिक्षक हो या स्कूल में काम करता हो तो?

सीधे पुलिस या SJPU को रिपोर्ट करें; स्कूल की इजाज़त की ज़रूरत नहीं। स्कूल प्रमुख पर अलग से रिपोर्ट करने की ज़िम्मेदारी है और न करने पर एक साल तक की क़ैद हो सकती है। आप राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग और शिक्षा विभाग में भी शिकायत कर सकते हैं।

आरोपी बरी हो जाए तो क्या मुआवज़ा मिलेगा?

हाँ। विशेष अदालत बच्चे के इलाज, काउंसलिंग और पुनर्वास के लिए मुआवज़ा दे सकती है, भले ही आरोपी बरी हो या पकड़ा न जाए। यह राज्य के पीड़ित मुआवज़ा कोष से विधिक सेवा प्राधिकरण के ज़रिए मिलता है। ज़रूरी ख़र्चों के लिए शुरुआत में ही अंतरिम मुआवज़ा दिया जा सकता है।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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