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A women's self-help group meeting in Cuddaloreनारी

फ़ोटो: Pondicherry17, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0. सांकेतिक चित्र.

कामकाज की जगह पर यौन उत्पीड़न: POSH क़ानून कैसे इस्तेमाल करें

न्याय पाठशाला8 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

काम की जगह पर यौन उत्पीड़न क्या है, इंटरनल या लोकल कमेटी में शिकायत कैसे करें, 3 महीने की सीमा, अंतरिम राहत, SHe-Box, और नियोक्ता को क्या करना होगा।

क़ानून: धारा 4, 6, 9, 11, 12, 13 · कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013 · धारा 75 BNS · अनुच्छेद 14, 15, 19(1)(g) और 21

संक्षेप में

  • काम की जगह पर यौन प्रकृति का कोई भी अनचाहा बर्ताव, शारीरिक, मौखिक या ऑनलाइन, यौन उत्पीड़न है, जिसमें "मज़ाक", घूरना, मैसेज और यौन संबंध से जुड़े वादे या धमकियाँ भी शामिल हैं।
  • आख़िरी घटना के 3 महीने के भीतर अपने दफ़्तर की आंतरिक समिति (Internal Committee, IC) को लिखित शिकायत दें धारा 9 POSH अधिनियम। 10 से कम कर्मचारी हों, या आरोपी ख़ुद नियोक्ता हो? ज़िले की स्थानीय समिति (Local Committee) में जाएँ धारा 6।
  • जाँच चलते हुए आप तबादला या 3 महीने तक की सवेतन छुट्टी माँग सकती हैं धारा 12। जाँच 90 दिन में पूरी होनी चाहिए धारा 11।
  • ऑनलाइन शिकायत shebox.wcd.gov.in पर कर सकती हैं, और अलग से धारा 75 BNS के तहत पुलिस में अपराध की रिपोर्ट भी। हेल्पलाइन: 181, 112, 15100।

हर महिला को यह हक़ है कि वह बिना छुए जाने, बिना अश्लील प्रस्ताव और बिना अपमान के अपनी रोज़ी कमा सके। अश्लील टिप्पणी करने वाले बॉस या देर रात मैसेज भेजने वाले सहकर्मी के बारे में बहुत-सी महिलाएँ चुप रह जाती हैं, इस डर से कि नौकरी जाएगी या इल्ज़ाम उन्हीं पर आएगा। कार्यस्थल पर महिलाओं का लैंगिक उत्पीड़न (निवारण, प्रतिषेध और प्रतितोष) अधिनियम, 2013, यानी POSH क़ानून, इसीलिए है कि बोझ नियोक्ता पर पड़े, आप पर नहीं। यह Vishaka v State of Rajasthan (1997) से निकला, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि काम की जगह पर उत्पीड़न अनुच्छेद 14, अनुच्छेद 15, अनुच्छेद 19(1)(g) और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है।

यौन उत्पीड़न में क्या-क्या आता है

धारा 2(n) POSH अधिनियम यौन प्रकृति के हर अनचाहे काम को, सीधे या इशारे में, शामिल करती है: शारीरिक संपर्क या छेड़छाड़; यौन संबंध की माँग या गुज़ारिश; यौन रंग वाली टिप्पणियाँ; पॉर्नोग्राफ़ी दिखाना; और यौन प्रकृति का कोई भी और अनचाहा शारीरिक, मौखिक या बिना बोले किया बर्ताव। धारा 3 आसपास के दबाव को जोड़ती है: तरजीह देने का वादा, नौकरी को नुक़सान की धमकी, डराने वाला या दुश्मनी भरा माहौल, या ऐसा अपमानजनक बर्ताव जो आपकी सेहत या सुरक्षा पर असर डाले।

"अनचाहा" आपकी नज़र से आँका जाता है। आपको यह साबित नहीं करना कि उस आदमी की नीयत बुरी थी या आपने उसी समय ज़ोर से विरोध किया था। एक गंभीर घटना काफ़ी है; उसका बार-बार होना ज़रूरी नहीं।

किसे सुरक्षा मिलती है

काम की जगह पर हर महिला को, चाहे उसकी हैसियत कुछ भी हो: स्थायी, ठेके पर, अस्थायी, प्रशिक्षु, इंटर्न, अप्रेंटिस, स्वयंसेवी, दिहाड़ी मज़दूर, या काम के सिलसिले में आई मेहमान। "कार्यस्थल" में निजी कंपनियाँ, सरकारी दफ़्तर, अस्पताल, स्कूल-कॉलेज, दुकानें, खेल स्थल, NGO, वे घर जहाँ घरेलू कामगार काम करती हैं, और हर वह जगह जहाँ आप काम की वजह से जाती हैं, नियोक्ता की दी गाड़ी समेत, शामिल हैं धारा 2(o)। काम से जुड़े WhatsApp, ईमेल या वीडियो कॉल पर उत्पीड़न भी इसमें आता है।

यह क़ानून सिर्फ़ महिलाओं की रक्षा करता है; उत्पीड़न झेल रहे पुरुष और ट्रांसजेंडर कर्मचारी नियोक्ता की अनुशासन नीति और आपराधिक क़ानून का सहारा ले सकते हैं।

शिकायत कौन सुनता है

  • आंतरिक समिति (IC): 10 या उससे ज़्यादा कर्मचारियों वाली हर जगह पर होनी ही चाहिए धारा 4। इसकी अध्यक्ष एक वरिष्ठ महिला कर्मचारी होती है, इसमें महिलाओं के मुद्दों से जुड़े या क़ानूनी/सामाजिक कार्य की जानकारी वाले कम से कम दो और कर्मचारी, और NGO या संबंधित विशेषज्ञता वाला एक बाहरी सदस्य होता है। कम से कम आधी सदस्य महिलाएँ होनी चाहिए। IC का संपर्क दफ़्तर में लगा होना चाहिए।
  • स्थानीय समिति (LC): हर ज़िले में ज़िला अधिकारी (आम तौर पर कलेक्टर) बनाते हैं धारा 6। इसका इस्तेमाल तब करें जब आपके यहाँ 10 से कम कर्मचारी हों, IC न हो, शिकायत ख़ुद नियोक्ता के ख़िलाफ़ हो, या आप घरेलू कामगार या असंगठित क्षेत्र में हों।

क़दम दर क़दम

  1. अभी लिख लें। हर घटना की तारीख़, समय, जगह, क्या कहा या किया गया और आसपास कौन था, नोट करें। मैसेज, ईमेल, कॉल लॉग और स्क्रीनशॉट ऐसी जगह रखें जहाँ नियोक्ता की पहुँच न हो, जैसे निजी ईमेल।
  2. 3 महीने के भीतर शिकायत दें, घटना के या सिलसिले की आख़िरी घटना के धारा 9। माँगे जाने पर छह प्रतियाँ, सबूत और गवाहों के नाम दें। देर का कारण दर्ज करके समिति यह सीमा 3 महीने और बढ़ा सकती है। आप लिख न सकें तो IC को आपकी मदद करनी होगी। आप असमर्थ हों तो रिश्तेदार, दोस्त, सहकर्मी या वकील शिकायत दे सकते हैं।
  3. उसी चिट्ठी में अंतरिम राहत माँगें धारा 12: आरोपी का या अपना तबादला, सामान्य छुट्टियों के अलावा 3 महीने तक की सवेतन छुट्टी, या यह आदेश कि आरोपी आपके काम का मूल्यांकन न करे।
  4. समझौता (conciliation) वैकल्पिक है और सिर्फ़ आपकी माँग पर धारा 10। पैसे का लेन-देन इसका आधार नहीं हो सकता। समझौता हो और वह शर्तें तोड़े, तो जाँच फिर शुरू होती है।
  5. जाँच धारा 11: दोनों पक्ष सुने जाते हैं, आप गवाह ला सकती हैं, और समिति के पास लोगों व दस्तावेज़ों को बुलाने की सिविल कोर्ट जैसी शक्तियाँ हैं। यह 90 दिन में पूरी होनी चाहिए।
  6. रिपोर्ट और कार्रवाई धारा 13: जाँच पूरी होने के 10 दिन में समिति रिपोर्ट नियोक्ता को भेजती है। उत्पीड़न साबित हो तो नियोक्ता को 60 दिन में कार्रवाई करनी होगी: चेतावनी, पदोन्नति या वेतन-वृद्धि रोकना, बर्ख़ास्तगी, या आपको मुआवज़े के लिए उसके वेतन से कटौती।
  7. अपील 90 दिन के भीतर उस अदालत या ट्रिब्यूनल में जो सेवा मामले सुनती है, अगर निष्कर्ष या कार्रवाई से आप असंतुष्ट हैं धारा 18।

समिति को आपकी पहचान, आरोपी की पहचान और कार्यवाही गोपनीय रखनी होगी धारा 16। इन्हें सार्वजनिक करने वाले पर जुर्माना हो सकता है।

उदाहरण

40 लोगों की एक लॉजिस्टिक्स कंपनी में अकाउंट्स एग्ज़ीक्यूटिव रुख़सार को उनका रिपोर्टिंग मैनेजर दफ़्तर के बाद बार-बार मैसेज करता है, "इंक्रीमेंट पर बात करने ड्रिंक पर चलो" कहता है, और कहता है कि वे "नज़र में आने के लिए कपड़े पहनती हैं"। वे तारीख़ समेत मैसेज के स्क्रीनशॉट लेती हैं, दो पन्ने की शिकायत लिखकर एक महीने के भीतर IC की पीठासीन अधिकारी को ईमेल करती हैं, और धारा 12 के तहत माँगती हैं कि उनका अप्रेज़ल किसी और मैनेजर को दिया जाए। IC उसी हफ़्ते अंतरिम बदलाव मंज़ूर करती है, टिप्पणियाँ सुनने वाले दो सहकर्मियों से पूछताछ करती है, और 90 दिन के भीतर मैनेजर को दोषी पाती है। नियोक्ता उसे अंतिम चेतावनी देता है, इंक्रीमेंट काटता है और दूसरी यूनिट में भेज देता है।

ये तैयार रखें

  • हर घटना का तारीख़ समेत लिखित ब्योरा, जितनी जल्दी हो सके तैयार किया हुआ।
  • मैसेज, ईमेल, कॉल लॉग के स्क्रीनशॉट; फ़ोन का मूल डेटा भी रखें।
  • उन सहकर्मियों के नाम जिन्होंने कुछ देखा-सुना, या जिन्हें आपने तुरंत बाद बताया।
  • आपका नियुक्ति पत्र या अनुबंध, और इनकार के बाद अचानक आया ख़राब अप्रेज़ल या तबादला।
  • तनाव से सेहत पर असर पड़ा हो तो मेडिकल या काउंसलिंग के काग़ज़।

जब यह अपराध भी हो

POSH शिकायत और पुलिस शिकायत एक-दूसरे से स्वतंत्र हैं। यौन उत्पीड़न धारा 75 BNS (पहले धारा 354A IPC) के तहत संज्ञेय अपराध (cognizable offence, जिसमें पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है) है: शारीरिक छेड़छाड़, यौन संबंध की माँग या पॉर्नोग्राफ़ी दिखाने पर तीन साल तक का सश्रम कारावास, और यौन रंग वाली टिप्पणियों पर एक साल तक। पीछा करना (धारा 78 BNS), चोरी-छिपे देखना (धारा 77) और लज्जा भंग करने की नीयत से हमला (धारा 74) अलग अपराध हैं। आप किसी भी थाने में FIR दर्ज करा सकती हैं, और जहाँ संभव हो पुलिस को इन अपराधों की जानकारी महिला अधिकारी से दर्ज करानी होगी धारा 173 BNSS। आप कहें तो IC को FIR दर्ज कराने में आपकी मदद करनी होगी धारा 19(g) POSH अधिनियम।

नियोक्ता को क्या करना होगा, और न करे तो क्या

धारा 19 के तहत नियोक्ता को IC बनानी होगी, उत्पीड़न की सज़ाएँ और IC का ब्योरा लगाना होगा, जागरूकता कार्यशालाएँ करनी होंगी, IC को ज़रूरी साधन देने होंगे, आप चाहें तो पुलिस केस में मदद करनी होगी, और उत्पीड़न को सेवा नियमों में कदाचार मानना होगा। जो नियोक्ता IC नहीं बनाता या क़ानून की अनदेखी करता है, उस पर ₹50,000 तक जुर्माना हो सकता है, और दोहराने पर जुर्माना दोगुना और लाइसेंस या पंजीकरण रद्द हो सकता है धारा 26। Aureliano Fernandes v State of Goa (2023) में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि कई संस्थानों में काम करती समिति ही नहीं थी, और सरकारों को अनुपालन की जाँच करने को कहा, साथ ही ज़ोर दिया कि जाँच में दोनों पक्षों के लिए निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जाए।

सावधान

शिकायत करने से पहले दबाव में इस्तीफ़ा न दें। इस्तीफ़े से लगता है कि आप अपनी मर्ज़ी से गईं, और अंतरिम राहत मुश्किल हो जाती है। "एक और घटना" का इंतज़ार भी न करें कि सिलसिला साबित हो: 3 महीने की घड़ी आख़िरी घटना से चलती है, और एक घटना काफ़ी है। शिकायत करने पर सज़ा मिल रही हो (ख़राब अप्रेज़ल, अचानक तबादला), तो समिति को लिखित में बताएँ; बदले की कार्रवाई ख़ुद राहत का आधार है।

सुझाव"झूठी शिकायत" के आरोप का डर बहुत-सी महिलाओं को रोक देता है। धारा 14 कार्रवाई सिर्फ़ तब होने देती है जब समिति पाए कि शिकायत दुर्भावनापूर्ण या जानबूझकर झूठी थी। जो शिकायत सबूत की कमी से बस साबित न हो सके, उस पर सज़ा नहीं हो सकती।

कहाँ जाएँ

  • अपने कार्यस्थल की आंतरिक समिति (ब्योरा नोटिस बोर्ड या HR पोर्टल पर होना चाहिए); फिर ज़िला अधिकारी / कलेक्टर के ज़रिए स्थानीय समिति।
  • SHe-Box, महिला एवं बाल विकास मंत्रालय का ऑनलाइन शिकायत पोर्टल: shebox.wcd.gov.in। यह शिकायत सही IC या LC को भेजता है और आप उसे ट्रैक कर सकती हैं।
  • पुलिस: कोई भी थाना या महिला थाना, धारा 75 BNS में FIR के लिए; आपातकाल 112; महिला हेल्पलाइन 181।
  • राष्ट्रीय महिला आयोग (ncw.gov.in), अगर नियोक्ता या समिति कार्रवाई नहीं कर रहे।
  • मुफ़्त वकील: 15100 या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (nalsa.gov.in); मानसिक स्वास्थ्य सहायता टेली-मानस 14416।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

उत्पीड़न WhatsApp पर या दफ़्तर के समय के बाद हुआ हो तो क्या शिकायत कर सकती हूँ?

हाँ। क़ानून हर उस जगह को कवर करता है जहाँ आप काम की वजह से हैं, और अदालतें काम से जुड़े डिजिटल संवाद को भी वैसा ही मानती हैं। किसी सहकर्मी या वरिष्ठ के यौन और अनचाहे मैसेज, कॉल और सोशल मीडिया संपर्क धारा 2(n) की परिभाषा में आते हैं। किसी को ब्लॉक करने से पहले तारीख़ और भेजने वाले के नंबर या हैंडल समेत स्क्रीनशॉट रख लें।

मेरे दफ़्तर में सिर्फ़ 6 कर्मचारी हैं और कोई समिति नहीं। कहाँ जाऊँ?

अपने ज़िले की स्थानीय समिति में, जो धारा 6 के तहत ज़िला अधिकारी, आम तौर पर कलेक्टर या उपायुक्त, बनाते हैं। घरेलू कामगार भी LC में जाती हैं। आप SHe-Box से या ज़िला अधिकारी के दफ़्तर को लिखकर शिकायत दे सकती हैं। LC भी 90 दिन की वही जाँच प्रक्रिया अपनाती है और कार्रवाई व मुआवज़े की सिफ़ारिश कर सकती है।

क्या कोई समय-सीमा है, और चूक गई तो?

शिकायत घटना के, या कई घटनाएँ हों तो आख़िरी घटना के, 3 महीने के भीतर देनी चाहिए (धारा 9)। देर का कारण लिखित में बताने पर, जैसे नौकरी जाने का डर या बीमारी, समिति इसे 3 महीने और बढ़ा सकती है। उसके बाद भी आप पुलिस में जा सकती हैं, क्योंकि इन अपराधों के लिए आपराधिक क़ानून में समय-सीमा लंबी है।

क्या आरोपी को पता चलेगा कि शिकायत किसने की?

हाँ, क्योंकि जवाब देने के लिए उसे आपकी शिकायत की प्रति देनी होती है। पर क़ानून नियोक्ता और समिति सदस्यों समेत सभी को आपकी पहचान, उसकी पहचान या कार्यवाही सार्वजनिक करने से रोकता है (धारा 16)। इसे तोड़ने पर जुर्माना है। आप समिति से कह सकती हैं कि गवाहों के नाम दफ़्तर के बाक़ी लोगों से गोपनीय रखे जाएँ।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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