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Utensils in a Maharashtrian household kitchenनारी

फ़ोटो: Drmarathe, Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0. सांकेतिक चित्र.

धारा 144 BNSS में भरण-पोषण: पत्नी, बच्चे और माता-पिता

न्याय पाठशाला8 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

धारा 144 BNSS (पहले धारा 125 CrPC) में भरण-पोषण कौन माँग सकता है, कहाँ आवेदन करें, 60 दिन में अंतरिम राशि, Rajnesh v Neha का शपथपत्र, और वसूली।

क़ानून: धारा 144–147 BNSS (पहले धारा 125–128 CrPC) · अनुच्छेद 15(3) और 21, भारत का संविधान · माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007

संक्षेप में

  • पत्नी (तलाक़शुदा पत्नी भी, जिसने दोबारा शादी न की हो), नाबालिग़ बच्चे, विकलांगता के कारण अपना ख़र्च न उठा सकने वाले बालिग़ बच्चे, और माता-पिता उस व्यक्ति से मासिक भत्ता माँग सकते हैं जिसके पास साधन हैं पर जो भरण-पोषण से इनकार करता है धारा 144(1) BNSS। यह हर धर्म पर लागू है।
  • आवेदन उस प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने करें जहाँ आप रहती हैं, जहाँ वह रहता है, या जहाँ आप आख़िरी बार साथ रहे धारा 145 BNSS। कोर्ट फ़ीस नाममात्र; मुफ़्त विधिक सहायता उपलब्ध।
  • पहले ही दिन अंतरिम भरण-पोषण माँगें। क़ानून कहता है इस पर नोटिस के 60 दिन में फ़ैसला हो धारा 144(1) परंतुक। दोनों पक्षों को संपत्ति और आय का शपथपत्र देना होगा (Rajnesh v Neha, 2020)।
  • वह न दे तो कोर्ट उसकी तनख़्वाह या संपत्ति कुर्क कर सकता है और हर महीने की चूक पर एक महीने तक जेल भेज सकता है धारा 144(3)। हर चूक के एक साल के भीतर आवेदन करें।

जब पति घर छोड़ दे, पिता बच्चे के स्कूल का ख़र्च बंद कर दे, या बड़े हो चुके बच्चे बुज़ुर्ग माता-पिता को छोड़ दें, तो पीछे रह गए व्यक्ति के पास अक्सर कोई आमदनी नहीं होती। क़ानून कहता है कि साधन वाला व्यक्ति अपने पर निर्भर लोगों का ख़र्च उठाने से इनकार नहीं कर सकता। सबसे तेज़ और सबसे ज़्यादा इस्तेमाल होने वाला उपाय धारा 144 BNSS (पहले धारा 125 CrPC) में मजिस्ट्रेट के सामने भरण-पोषण (maintenance) का दावा है। यह बेसहारा होने से बचाने की संक्षिप्त प्रक्रिया है, पूरा वैवाहिक मुक़दमा नहीं, और हर धर्म के लोगों के लिए है।

कौन माँग सकता है, और किससे

प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट पर्याप्त साधनों वाले उस व्यक्ति को मासिक भत्ता देने का आदेश दे सकते हैं जो इनका भरण-पोषण करने में लापरवाही या इनकार करे धारा 144(1) BNSS:

  • उसकी पत्नी, अगर वह अपना ख़र्च नहीं उठा सकती। "पत्नी" में वह तलाक़शुदा महिला भी है जिसने दोबारा शादी नहीं की;
  • उसका नाबालिग़ बच्चा, वैध हो या न हो, शादीशुदा हो या न हो, जो अपना ख़र्च नहीं उठा सकता;
  • उसका बालिग़ बच्चा (शादीशुदा बेटी को छोड़कर) जो शारीरिक या मानसिक असामान्यता या चोट के कारण अपना ख़र्च नहीं उठा सकता;
  • उसके माता-पिता, अगर वे अपना ख़र्च नहीं उठा सकते। अदालतें इसमें बेटियों को भी शामिल मानती हैं, इसलिए माता-पिता बेटे या बेटी, दोनों से माँग सकते हैं।

"पर्याप्त साधन" के लिए वेतन वाली नौकरी ज़रूरी नहीं। हट्टे-कट्टे आदमी को कमाने में सक्षम माना जाता है, और अदालतें "बेरोज़गार हूँ" का बहाना अक्सर ठुकरा देती हैं। तलाक़शुदा मुस्लिम महिला भी यहाँ दावा कर सकती है, मुस्लिम महिला (तलाक़ पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम के अपने अधिकारों के अलावा, जैसा सुप्रीम कोर्ट ने Mohd. Abdul Samad v State of Telangana (2024) में पक्का किया।

पत्नी को कब मना किया जाता है

धारा 144(4) BNSS के तहत पत्नी हक़दार नहीं है अगर वह व्यभिचार में रह रही है, बिना पर्याप्त कारण पति के साथ रहने से इनकार करती है, या दोनों आपसी सहमति से अलग रह रहे हैं। पति ने दूसरी शादी कर ली हो या किसी और महिला को रखा हो, तो धारा ख़ुद इसे अलग रहने का उचित कारण मानती है। थोड़ा-बहुत कमाने वाली पत्नी अयोग्य नहीं हो जाती: कमाने में सक्षम होना और असल में पर्याप्त कमाना एक बात नहीं, और कसौटी यह है कि क्या वह शादी के समय जैसे स्तर पर जी सकती है।

कोर्ट रक़म कैसे तय करता है

कोई ऊपरी सीमा नहीं है। Rajnesh v Neha (2020) में सुप्रीम कोर्ट ने तय किया कि हर फ़ैमिली कोर्ट और मजिस्ट्रेट को क्या करना होगा:

  • दोनों पक्ष केस की शुरुआत में ही तय प्रारूप पर संपत्ति, आय, ख़र्च, क़र्ज़ और आश्रितों का प्रकटीकरण शपथपत्र (affidavit of disclosure) दें। आय छिपाने पर सज़ा हो सकती है।
  • कोर्ट पक्षों की हैसियत, पत्नी-बच्चों की उचित ज़रूरतें, उसकी अपनी आय और योग्यता, पति की देनदारियाँ, और बच्चों की पढ़ाई व इलाज का ख़र्च तौलता है।
  • भरण-पोषण आम तौर पर आवेदन की तारीख़ से मिलना चाहिए, आदेश की तारीख़ से नहीं, ताकि प्रतिवादी की देरी उसे फ़ायदा न दे; धारा 144(2) BNSS दोनों की इजाज़त देती है।
  • किसी दूसरे क़ानून (घरेलू हिंसा अधिनियम, हिंदू विवाह अधिनियम, हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम) में मिली रक़म समायोजित होती है ताकि दोहरा भुगतान न हो, पर आप एक से ज़्यादा रास्ते अपना सकती हैं।

हालात बदलने पर, जैसे पदोन्नति, नौकरी छूटना या बच्चे का कॉलेज शुरू होना, कोई भी पक्ष रक़म बढ़ाने या घटाने का आवेदन कर सकता है धारा 146 BNSS।

क़दम दर क़दम

  1. कोर्ट परिसर में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण जाएँ या 15100 पर कॉल करें। महिलाओं, बच्चों, वरिष्ठ नागरिकों और कम आय वालों को मुफ़्त वकील मिलता है। कई ज़िला अदालतों में फ़ैमिली कोर्ट ये मामले सुनती है।
  2. धारा 144 BNSS में आवेदन दें उस ज़िले की अदालत में जहाँ आप रहती हैं, जहाँ प्रतिवादी रहता या काम करता है, या जहाँ आप आख़िरी बार साथ रहे धारा 145। रिश्ता, लापरवाही, मोटे बजट के साथ अपनी मासिक ज़रूरतें, और उसकी आय, नौकरी, संपत्ति व रहन-सहन की जो जानकारी हो, लिखें।
  3. उसी दिन अंतरिम भरण-पोषण और मुक़दमे के ख़र्च का अलग आवेदन दें। उसे नोटिस तामील होने के 60 दिन में कोर्ट को इस पर फ़ैसला करना चाहिए। अपना प्रकटीकरण शपथपत्र लगाएँ।
  4. नोटिस तामील कराएँ। वह बचे तो कोर्ट उसकी ग़ैरहाज़िरी में (एकपक्षीय) आगे बढ़ सकता है; वह उसे तीन महीने के भीतर अच्छा कारण दिखाकर ही रद्द करवा सकता है धारा 145(2) BNSS।
  5. सुनवाइयों में जाएँ और हो सके तो उसकी आय का सबूत लाएँ: सैलरी स्लिप, उसकी दुकान या गाड़ियों की तस्वीरें, रहन-सहन दिखाता सोशल मीडिया, GST या संपत्ति के रिकॉर्ड। कोर्ट उसके नियोक्ता या बैंक को बुला सकता है।
  6. आदेश के बाद वह न दे तो निष्पादन (execution) आवेदन दें। कोर्ट तनख़्वाह या संपत्ति कुर्क करने का वारंट दे सकता है और हर बक़ाया महीने के लिए एक महीने तक जेल भेज सकता है धारा 144(3)। हर बक़ाया किस्त के एक साल के भीतर आवेदन करें।
उदाहरण

कानपुर की 29 साल की पूजा को उनके पति ने, जो एक निजी बैंक में अधिकारी है, पैसे भेजना बंद कर 4 साल के बेटे के साथ मायके भेज दिया। वे DLSA जाती हैं, जो उन्हें वकील देता है। वे कानपुर में धारा 144 BNSS में आवेदन करती हैं, साथ में अंतरिम आवेदन और शपथपत्र जिसमें शून्य आय और ₹18,000 मासिक ख़र्च दर्ज है। कोर्ट नोटिस भेजता है; पति कहता है वह ₹20,000 कमाता है, पर उसका अपना शपथपत्र और बुलाई गई सैलरी स्लिप ₹72,000 दिखाती हैं। दो महीने के भीतर मजिस्ट्रेट पूजा और बच्चे के लिए आवेदन की तारीख़ से ₹20,000 मासिक अंतरिम भरण-पोषण मंज़ूर करते हैं। तीन महीने की चूक पर कोर्ट उसकी तनख़्वाह कुर्क कर देता है।

ये तैयार रखें

  • रिश्ते का सबूत: शादी की तस्वीरें, कार्ड, विवाह प्रमाणपत्र, बच्चों के जन्म प्रमाणपत्र और स्कूल रिकॉर्ड।
  • आपका प्रकटीकरण शपथपत्र: बैंक स्टेटमेंट, कोई आय, किराया, इलाज और स्कूल का ख़र्च।
  • उसकी आय या संपत्ति दिखाने वाली कोई भी चीज़: सैलरी स्लिप, ITR, विज़िटिंग कार्ड, गाड़ियों या संपत्ति की तस्वीरें, उसका सोशल मीडिया।
  • भुगतान से इनकार या घर छोड़ने की माँग वाले मैसेज या चिट्ठियाँ।
  • पहले के कोई कोर्ट आदेश (DV अधिनियम, तलाक़) ताकि कोर्ट समायोजन कर सके।

दूसरे रास्ते

  • माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों का भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत भरण-पोषण अधिकरण (आम तौर पर SDO) में भी आवेदन कर सकते हैं। यह तेज़ है और वकील की ज़रूरत नहीं, पर अधिनियम में रक़म की सीमा ₹10,000 महीना है। एल्डर लाइन: 14567।
  • घरेलू हिंसा झेल रही महिलाएँ धारा 20 PWDVA में आर्थिक राहत और निवास आदेश माँग सकती हैं, अक्सर धारा 144 के साथ-साथ।
  • तलाक़ के मुक़दमे में पर्सनल लॉ के तहत अंतरिम और स्थायी गुज़ारा भत्ता माँगा जा सकता है (जैसे धारा 24, 25 हिंदू विवाह अधिनियम)।
सावधान

पैसे माँगने के लिए अंतिम आदेश का इंतज़ार न करें। बहुत-से आवेदक साल भर या ज़्यादा बिना कुछ पाए रहते हैं क्योंकि किसी ने अंतरिम आवेदन दिया ही नहीं। पहले दिन दें और कोर्ट को 60 दिन की समय-सीमा याद दिलाएँ। और एकमुश्त रक़म के बदले भविष्य का भरण-पोषण छोड़ने वाले किसी "समझौते" पर बिना क़ानूनी सलाह दस्तख़त न करें; अदालतों ने कहा है कि पत्नी बच्चों के भरण-पोषण के हक़ का सौदा नहीं कर सकती।

कहाँ जाएँ

  • ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण ज़िला अदालत में, या NALSA हेल्पलाइन 15100, मुफ़्त वकील और आवेदन लिखवाने के लिए (nalsa.gov.in)।
  • प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट / फ़ैमिली कोर्ट अपने ज़िले में धारा 144 BNSS के आवेदन के लिए; केस की स्थिति ecourts.gov.in पर देखें।
  • संरक्षण अधिकारी अपने ज़िले में घरेलू हिंसा अधिनियम की समानांतर राहत के लिए; महिला हेल्पलाइन 181।
  • भरण-पोषण अधिकरण (SDO) माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के लिए; एल्डर लाइन 14567। ज़रूरतमंद बच्चे के लिए 1098।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

मुझे कितना भरण-पोषण मिलेगा?

धारा 144 BNSS में कोई तय फ़ॉर्मूला या ऊपरी सीमा नहीं है। कोर्ट उसकी आय और संपत्ति, आपकी ज़रूरतें और जीवन-स्तर, आपकी अपनी कमाई और बच्चों के ख़र्च देखता है, उन शपथपत्रों के आधार पर जो Rajnesh v Neha (2020) के तहत दोनों पक्षों को देने होते हैं। अदालतें अक्सर पत्नी और बच्चों को उसकी शुद्ध आय का अच्छा-ख़ासा हिस्सा देती हैं, पर रक़म तथ्यों पर निर्भर है।

क्या कामकाजी पत्नी भरण-पोषण माँग सकती है?

हाँ, अगर उसकी आय शादी के जीवन-स्तर पर ख़ुद को रखने के लिए काफ़ी नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि कमाने में सक्षम होना भरण-पोषण से इनकार का आधार नहीं; सवाल असल पर्याप्त आय का है। छोटी तनख़्वाह वाली पत्नी को भी भरण-पोषण मिल सकता है, हालाँकि रक़म में उसकी कमाई का ध्यान रखा जाएगा।

पति कहे कि वह बेरोज़गार है तो?

अदालतें मानकर चलती हैं कि हट्टा-कट्टा आदमी कम से कम मज़दूर जितना कमा सकता है और न्यूनतम रक़म तय करती हैं। वह आय छिपा रहा हो तो कोर्ट से उसके नियोक्ता, बैंक स्टेटमेंट या GST रिकॉर्ड बुलवाने को कहें, और उसके शपथपत्र और रहन-सहन के विरोधाभास दिखाएँ। झूठा शपथपत्र देने पर सज़ा हो सकती है।

उसने आठ महीने से नहीं दिया। मैं क्या करूँ?

उसी कोर्ट में हर बक़ाया किस्त के लिए, उसके देय होने के एक साल के भीतर, निष्पादन आवेदन दें। मजिस्ट्रेट तनख़्वाह, बैंक खाता या संपत्ति कुर्क करने का वारंट दे सकते हैं और धारा 144(3) BNSS में हर महीने की चूक पर एक महीने तक जेल भेज सकते हैं। जेल से क़र्ज़ ख़त्म नहीं होता; बक़ाया देना ही होगा।

क्या माता-पिता शादीशुदा बेटी से माँग सकते हैं?

हाँ। सुप्रीम कोर्ट ने 1987 में कहा कि पर्याप्त साधनों वाली बेटी भी बेटे जितनी ही उन माता-पिता के भरण-पोषण के लिए ज़िम्मेदार है जो अपना ख़र्च नहीं उठा सकते, और शादी से यह नहीं बदलता। माता-पिता 2007 के वरिष्ठ नागरिक अधिनियम के अधिकरण का भी इस्तेमाल कर सकते हैं, जो तेज़ है पर ₹10,000 महीना तक सीमित।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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