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Indian newspapers for sale at a news vendor in New Delhiस्वतंत्रता

फ़ोटो: Shajankumar, Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0. सांकेतिक चित्र.

प्रेस की आज़ादी: पाठक के अधिकार और मीडिया की शिकायत कैसे करें

न्याय पाठशाला7 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

अनुच्छेद 19(1)(a) पत्रकारों की रक्षा कैसे करता है, क्या सीमाएँ हैं, प्रेस परिषद या चैनल में शिकायत कैसे करें, और धमकी झेल रहा पत्रकार क्या करे।

क़ानून: अनुच्छेद 19(1)(a), भारत का संविधान · प्रेस परिषद अधिनियम, 1978 · प्रेस और पत्र-पत्रिका पंजीकरण अधिनियम, 2023

संक्षेप में

  • संविधान में "प्रेस" शब्द नहीं है, पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि प्रेस की आज़ादी अनुच्छेद 19(1)(a) का हिस्सा है। पत्रकारों के अधिकार और सीमाएँ (अनुच्छेद 19(2)) वही हैं जो हर नागरिक की।
  • किसी अखबार ने आपके साथ ग़लत किया? पहले संपादक को लिखकर सुधार या अपना जवाब छापने को कहें। बात न बने तो भारतीय प्रेस परिषद (Press Council of India) में उसके नियमों की छोटी समय-सीमा (दैनिक अखबारों के लिए लगभग दो महीने) के भीतर शिकायत करें।
  • TV चैनल के लिए पहले चैनल, फिर उसकी स्व-नियामक संस्था, फिर सूचना और प्रसारण मंत्रालय। समाचार वेबसाइट के लिए IT नियम, 2021 के तहत साइट पर नामित शिकायत अधिकारी।
  • धमकी झेल रहे पत्रकार पुलिस में शिकायत करें, सब कुछ रिकॉर्ड करें, संपादक और प्रेस संगठनों को बताएँ, और क़ानूनी सहायता (15100) लें। निष्पक्ष रिपोर्टिंग को निशाना बनाने वाले मामले हाई कोर्ट रद्द कर सकता है।

जब कोई अखबार अस्पताल का घोटाला उजागर करता है या स्थानीय रिपोर्टर दिखाता है कि पुल घटिया सामग्री से बना, तो फ़ायदा आपको होता है, भले ही आप उस पत्रकार से कभी न मिलें। प्रेस की आज़ादी सिर्फ़ पत्रकार का अधिकार नहीं है। यह आपके जानने, राय बनाने और सार्वजनिक जीवन में हिस्सा लेने के अधिकार से जुड़ी है।

संविधान क्या कहता है

प्रेस की आज़ादी अनुच्छेद 19(1)(a), वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, में पढ़ी जाती है और अनुच्छेद 19(2) के उन्हीं उचित प्रतिबंधों के अधीन है: भारत की संप्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध, सार्वजनिक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता, अदालत की अवमानना, मानहानि और अपराध के लिए उकसाना। कुछ ऐतिहासिक फ़ैसले:

  • Romesh Thappar v. State of Madras (1950): एक पत्रिका के राज्य में प्रवेश पर रोक रद्द की गई; प्रसार की आज़ादी प्रेस की आज़ादी का हिस्सा है।
  • Sakal Papers v. Union of India (1962): सरकार अखबार के पन्नों की संख्या या क़ीमत को इस तरह नियंत्रित नहीं कर सकती कि उसका प्रसार घटे।
  • Indian Express Newspapers v. Union of India (1985): अखबारों को पंगु करने वाले कर प्रेस की आज़ादी का उल्लंघन कर सकते हैं।
  • Madhyamam Broadcasting v. Union of India (2023): कोर्ट ने चैनल MediaOne को लाइसेंस देने से इनकार रद्द किया और कहा कि सरकारी नीति पर आलोचनात्मक विचारों को "सत्ता-विरोधी" कहकर ऐसी कार्रवाई को सही नहीं ठहराया जा सकता, और राज्य ऐसी सीलबंद सामग्री पर भरोसा नहीं कर सकता जो दूसरा पक्ष कभी न देखे।

प्रेस पर सीमाएँ

पत्रकार को भी किसी और की तरह मानहानि (धारा 356 BNS), अदालत की अवमानना, अश्लीलता, या हिंसा या समूहों में दुश्मनी भड़काने वाली बात के लिए ज़िम्मेदार ठहराया जा सकता है। कुछ सुरक्षाएँ विशेष हैं। बलात्कार या अन्य यौन अपराधों की पीड़िता की पहचान प्रकाशित नहीं की जा सकती (धारा 72 BNS, पहले धारा 228A IPC), और किशोर न्याय अधिनियम, 2015 के तहत क़ानून से संघर्षरत बच्चे या बाल पीड़ित की पहचान उजागर नहीं की जा सकती। अदालतों ने "मीडिया ट्रायल" के ख़िलाफ़ भी चेताया है जो फ़ैसले से पहले अभियुक्त को दोषी दिखाता है।

प्रेस की आज़ादी झूठ बोलने की आज़ादी नहीं है। संविधान ईमानदार रिपोर्टिंग और राय की रक्षा करता है, उस रिपोर्टिंग की भी जो सरकार को असहज लगे; वह किसी असली व्यक्ति को नुकसान पहुँचाने वाले जानबूझकर झूठे बयानों की रक्षा नहीं करता।

कौन किसे नियंत्रित करता है

  • अखबार और पत्रिकाएँ: प्रेस परिषद अधिनियम, 1978 के तहत बनी वैधानिक संस्था भारतीय प्रेस परिषद प्रिंट मीडिया के ख़िलाफ़ शिकायतें और प्रेस की आज़ादी पर ख़तरे की पत्रकारों की शिकायतें सुनती है। अधिनियम के तहत वह प्रकाशन को चेतावनी दे सकती है, फटकार या निंदा कर सकती है और अपना निष्कर्ष छापने का निर्देश दे सकती है, पर किसी पर जुर्माना या जेल नहीं कर सकती।
  • पंजीकरण: प्रेस और पत्र-पत्रिका पंजीकरण अधिनियम, 2023 ने 1 मार्च 2024 से 1867 के अधिनियम की जगह ली। शीर्षक प्रेस सेवा पोर्टल के ज़रिए प्रेस रजिस्ट्रार जनरल के पास ऑनलाइन पंजीकृत होते हैं।
  • टीवी समाचार: चैनलों को केबल टेलीविज़न नेटवर्क नियमों के कार्यक्रम संहिता (Programme Code) का पालन करना होता है। शिकायत पहले चैनल को, फिर उसकी स्व-नियामक संस्था को (ज़्यादातर समाचार चैनल किसी एक के सदस्य हैं), और फिर सूचना और प्रसारण मंत्रालय को।
  • डिजिटल समाचार: सूचना प्रौद्योगिकी (मध्यवर्ती दिशानिर्देश और डिजिटल मीडिया आचार संहिता) नियम, 2021 के तहत हर प्रकाशक को शिकायत अधिकारी नामित कर 15 दिन में जवाब देना होता है, ऊपर स्व-नियामक संस्था और सरकारी निगरानी समिति है। इन नियमों के कुछ हिस्सों को अदालत में चुनौती दी गई है, इसलिए स्थिति बदल सकती है।

क़दम दर क़दम: कोई ख़बर आपके साथ ग़लत करे तो

  1. सबूत सँभालें। छपा पन्ना या तारीख़ वाला स्क्रीनशॉट, URL और प्रसारण का समय रखें।
  2. कुछ दिनों के भीतर संपादक को लिखें। ठीक-ठीक बताएँ कि कौन-से वाक्य झूठे या अनुचित हैं, अपने सबूत दें, और सुधार या समान प्रमुखता से अपना जवाब छापने की माँग करें। ईमेल और रजिस्टर्ड डाक से भेजें।
  3. ऊपर जाएँ। प्रिंट के लिए अपने पत्र और संपादक के जवाब या चुप्पी की प्रतियों के साथ भारतीय प्रेस परिषद में शिकायत करें। उसके नियम प्रकाशन की तारीख़ से छोटी समय-सीमा तय करते हैं, दैनिक के लिए लगभग दो महीने और अन्य पत्रिकाओं के लिए चार महीने, इसलिए इंतज़ार न करें। TV के लिए चैनल की स्व-नियामक संस्था; वेबसाइट के लिए उसके शिकायत अधिकारी के पास।
  4. मानहानि पर विचार करें। रिपोर्ट झूठी है और आपको नुकसान पहुँचा है तो वकील क़ानूनी नोटिस भेज सकता है और हर्जाने का दीवानी मुक़दमा या धारा 356 BNS में आपराधिक शिकायत दायर कर सकता है। सच, निष्पक्ष टिप्पणी और सद्भाव में सार्वजनिक कार्यवाही की रिपोर्टिंग बचाव हैं, इसलिए पहले अपना मामला ईमानदारी से आँकें।

अगर आप धमकी झेल रहे पत्रकार हैं

  1. हर धमकी रिकॉर्ड करें, तारीख़, नंबर, स्क्रीनशॉट या रिकॉर्डिंग सहित, और बैकअप रखें।
  2. तुरंत पुलिस में शिकायत करें; हिंसा की धमकी पर 112 पर कॉल करें। FIR की प्रति माँगें। थाना मना करे तो पुलिस अधीक्षक और प्रेस परिषद को लिखें।
  3. संपादक और प्रेस संगठनों को बताएँ ताकि धमकी आपसे आगे भी रिकॉर्ड में रहे।
  4. किसी ख़बर पर आपके ख़िलाफ़ FIR हो तो कुछ भी डिलीट न करें, उसी दिन वकील करें, और मामला निष्पक्ष रिपोर्टिंग को निशाना बनाता हो तो हाई कोर्ट से उसे रद्द करने को कहें। क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।
उदाहरण

एक ज़िला दैनिक ने छापा कि स्कूल के प्रधानाध्यापक सुनील को "गबन के लिए निलंबित" किया गया है। असल में उनका तबादला हुआ था और कोई जाँच नहीं थी। सुनील ने अखबार सँभाला, अपना तबादला आदेश और शिक्षा कार्यालय से यह पत्र लिया कि कोई जाँच लंबित नहीं है, और उसी हफ़्ते संपादक को ईमेल कर समान प्रमुखता से सुधार माँगा। अखबार ने अंदर के पन्ने पर दो पंक्तियों का "स्पष्टीकरण" छापा। सुनील ने फिर समय-सीमा के भीतर अपना पत्र और अखबार का जवाब लगाकर प्रेस परिषद में शिकायत की। परिषद ने रिपोर्ट को असत्यापित पाया, अखबार की निंदा की और निष्कर्ष छापने का निर्देश दिया। सुनील ने परिषद के आदेश का इस्तेमाल उस मानहानि नोटिस में किया जो उनके वकील ने फिर भेजा।

ये तैयार रखें

  • मूल रिपोर्ट: कटिंग, तारीख़ वाला स्क्रीनशॉट, URL, या चैनल और समय सहित रिकॉर्डिंग
  • सही तथ्य दिखाने वाले दस्तावेज़
  • संपादक को आपका पत्र और भेजने का सबूत; संपादक का जवाब, अगर कोई हो
  • पत्रकारों के लिए: धमकी के स्क्रीनशॉट, कॉल रिकॉर्ड, FIR की प्रति, संपादक की पावती
सावधान

सबसे आम ग़लती है पहले मानहानि का नोटिस भेज देना और फिर पता चलना कि रिपोर्ट काफ़ी हद तक सच थी, जिससे आप पर जुर्माना आ सकता है। संपादक और प्रेस परिषद से शुरू करें; ये मुफ़्त हैं, तेज़ हैं और इनमें वकील की ज़रूरत नहीं। और पाठक के रूप में याद रखें कि किसी व्यक्ति के बारे में झूठी ख़बर शेयर करने पर आप भी ज़िम्मेदार हो सकते हैं।

कहाँ जाएँ

  • पत्रकार के ख़िलाफ़ धमकी या हिंसा: 112, फिर स्थानीय थाना और पुलिस अधीक्षक।
  • प्रिंट मीडिया की शिकायत: संपादक, फिर भारतीय प्रेस परिषद (presscouncil.nic.in)।
  • TV और डिजिटल समाचार: चैनल या वेबसाइट का शिकायत अधिकारी, फिर उसकी स्व-नियामक संस्था, फिर सूचना और प्रसारण मंत्रालय (mib.gov.in)।
  • मीडिया के ख़िलाफ़ सरकारी कार्रवाई की शिकायत: pgportal.gov.in; पत्रकारों पर हमलों के लिए NHRC (hrcnet.nic.in, हेल्पलाइन 14433)।
  • मुफ़्त क़ानूनी सहायता: 15100, आपका ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण, nalsa.gov.in।
  • अदालतें: अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट; अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या भारतीय प्रेस परिषद का TV चैनलों और वेबसाइटों पर अधिकार है?

नहीं। प्रेस परिषद अधिनियम, 1978 सिर्फ़ अखबारों, पत्रिकाओं और समाचार एजेंसियों को कवर करता है। टीवी समाचार कार्यक्रम संहिता के तहत चैनल की स्व-नियामक संस्था और सूचना और प्रसारण मंत्रालय देखते हैं, और डिजिटल समाचार प्रकाशक IT नियम, 2021 की तीन-स्तरीय शिकायत व्यवस्था में आते हैं। परिषद का दायरा बढ़ाने के प्रस्तावों पर चर्चा हुई है, पर 2026 तक क़ानून नहीं बना।

क्या पत्रकार को अपना स्रोत बताने पर मजबूर किया जा सकता है?

भारतीय क़ानून पत्रकारों के स्रोतों को कोई पूर्ण विशेषाधिकार नहीं देता। अदालत ज़रूरी समझे तो खुलासे का निर्देश दे सकती है, और जाँच एजेंसियाँ कभी-कभी फ़ोन और लैपटॉप ज़ब्त करती हैं। हालाँकि अदालतों ने माना है कि स्रोतों की सुरक्षा प्रेस की आज़ादी के लिए अहम है और संयम बरतने को कहा है; ऐसी माँग का सामना कर रहे पत्रकार को अनौपचारिक रूप से उपकरण सौंपने के बजाय तुरंत वकील करना चाहिए।

क्या ख़बर में बलात्कार पीड़िता का नाम देना ग़ैरक़ानूनी है?

हाँ। बलात्कार और कुछ अन्य यौन अपराधों की पीड़िता की पहचान उजागर कर सकने वाली कोई भी चीज़ छापना या प्रकाशित करना धारा 72 BNS (पहले धारा 228A IPC) में अपराध है, जिसमें दो साल तक की क़ैद और जुर्माना है। किशोर न्याय अधिनियम, 2015 और POCSO अधिनियम, 2012 के तहत बच्चों के लिए भी ऐसी ही रोक है। यह सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं पर उतना ही लागू है जितना अखबारों पर।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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