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A laptop locked with a chain and padlockनिजता

फ़ोटो: Santeri Viinamäki, Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0. सांकेतिक चित्र.

निजता का अधिकार: पुट्टस्वामी फ़ैसला और उसका इस्तेमाल

न्याय पाठशाला6 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

सुप्रीम कोर्ट ने 2017 में निजता को मौलिक अधिकार कैसे बनाया, राज्य के दख़ल की कसौटी क्या है, और आज आप अपनी रक्षा कैसे करें।

क़ानून: अनुच्छेद 21, भारत का संविधान · जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) · डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023

संक्षेप में

  • निजता (privacy) भारत में हर व्यक्ति का मौलिक अधिकार है, अनुच्छेद 21 के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा (जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ, 2017, नौ जज, सर्वसम्मति से)।
  • राज्य आपकी निजता में तभी दख़ल दे सकता है जब कोई क़ानून हो, वैध उद्देश्य हो, और दख़ल आनुपातिक (proportionate) हो। कोई अधिकारी आपका डेटा माँगे तो पूछें: किस क़ानून के तहत, और किस मक़सद से?
  • सरकार के ख़िलाफ़ आप हाई कोर्ट अनुच्छेद 226 या सुप्रीम कोर्ट अनुच्छेद 32 जा सकते हैं। कंपनियों और व्यक्तियों के ख़िलाफ़ ख़ास क़ानूनों का सहारा लें: आईटी अधिनियम, BNS, और लागू होने के साथ DPDP अधिनियम, 2023।
  • आपकी निजी तस्वीरों या डेटा का ऑनलाइन दुरुपयोग हो तो 1930 या cybercrime.gov.in पर रिपोर्ट करें।

आपका फ़ोन जानता है कि आप कल रात कहाँ सोए। बैंक जानता है कि आपने क्या ख़रीदा। कोई ऐप आपकी धड़कन तक जानता है। सरकारें और कंपनियाँ आपके बारे में किसी पड़ोसी से कहीं ज़्यादा जानकारी जुटाती हैं। 2017 में सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ जवाब दिया कि आपकी ज़िंदगी में कौन, किन शर्तों पर झाँक सकता है: निजता एक मौलिक अधिकार है। यह लेख बताता है इसका मतलब क्या है और इसे कैसे इस्तेमाल करें।

वह मामला जिसने फ़ैसला किया

जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ आधार को चुनौती से शुरू हुआ। सरकार ने तर्क दिया कि संविधान में निजता का कोई अधिकार नहीं है, और 1954 (एम.पी. शर्मा) व 1962 (खड़क सिंह) के पुराने फ़ैसलों का हवाला दिया। 24 अगस्त 2017 को नौ जजों की पीठ ने सर्वसम्मति से माना कि निजता मौलिक अधिकार है। यह अनुच्छेद 21 के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का हिस्सा है, और अनुच्छेद 19 की स्वतंत्रताओं व अनुच्छेद 14 की समानता से भी निकलता है। पुराने फ़ैसले उस हद तक पलट दिए गए।

निजता में क्या-क्या आता है

कोर्ट ने कोई बंद सूची नहीं दी, पर कई परतें मानीं:

  • आपका शरीर: उसके साथ क्या हो, इस पर आपका नियंत्रण, इलाज और प्रजनन से जुड़े फ़ैसलों सहित।
  • आपकी जानकारी: स्वास्थ्य रिकॉर्ड, पैसे और संदेशों जैसे व्यक्तिगत डेटा पर नियंत्रण ("सूचनात्मक निजता")।
  • आपके फ़ैसले: किससे प्रेम करें, क्या खाएँ, क्या मानें, कैसे जिएँ।
  • आपकी जगह: घर और निजी जगहें जहाँ आपको अकेला छोड़ दिए जाने का हक़ है।

कोर्ट ने ज़ोर दिया कि निजता अमीर-ग़रीब सबकी बराबर है, और इस सोच को ख़ारिज किया कि कल्याण योजनाओं पर निर्भर लोगों को निजता की परवाह नहीं।

राज्य निजता को कब सीमित कर सकता है

निजता पूर्ण (absolute) नहीं है। राज्य के दख़ल को तीन हिस्सों वाली कसौटी पार करनी होगी:

  1. वैधता (legality): कोई क़ानून इसकी अनुमति दे। कार्यकारी निर्देश या पुलिस की आदत काफ़ी नहीं।
  2. वैध उद्देश्य: क़ानून का मक़सद उचित हो, जैसे राष्ट्रीय सुरक्षा, अपराध रोकना या कल्याण योजनाएँ पहुँचाना।
  3. आनुपातिकता (proportionality): दख़ल उस मक़सद के लिए ज़रूरत से ज़्यादा न हो, और नुक़सान व फ़ायदे में उचित संतुलन हो।

जजों ने दुरुपयोग रोकने के लिए प्रक्रियात्मक सुरक्षा (procedural safeguards) पर भी ज़ोर दिया। अदालतें अब यही कसौटी निगरानी, डेटा संग्रह, तलाशी और फ़ोन ज़ब्ती पर लगाती हैं। उदाहरण के लिए, फ़ोन टैपिंग सिर्फ़ दूरसंचार क़ानून और उसके नियमों की प्रक्रिया से, वरिष्ठ अधिकारी के आदेश पर ही हो सकती है।

सुझावकोई अधिकारी निजी जानकारी माँगे तो विनम्रता से पूछें: "किस क़ानून के तहत, और किस मक़सद से?" ये पुट्टस्वामी कसौटी के पहले दो हिस्से हैं, और बाद में शिकायत करनी पड़े तो लिखित जवाब काम आता है।

उसके बाद क्या हुआ

  • नवतेज सिंह जौहर बनाम भारत संघ (2018): निजता और गरिमा के आधार पर कोर्ट ने वयस्कों के बीच सहमति से समलैंगिक संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया।
  • जोसेफ़ शाइन बनाम भारत संघ (2018): कोर्ट ने व्यभिचार (adultery) के पुराने अपराध को व्यक्तिगत स्वायत्तता में दख़ल मानकर रद्द किया।
  • के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2018), आधार मामला: पाँच जजों की पीठ ने सरकारी सब्सिडी और लाभों के लिए आधार को सही ठहराया, पर निजी कंपनियों को आधार माँगने देने वाला प्रावधान रद्द किया, और कहा कि बैंक खाते या मोबाइल कनेक्शन के लिए इसे अनिवार्य नहीं किया जा सकता।
  • डेटा संरक्षण क़ानून: 2017 के फ़ैसले ने संसद से व्यक्तिगत डेटा की रक्षा का आग्रह किया था। इसके बाद डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 आया। इसके नियम 13 नवंबर 2025 को अधिसूचित हुए; अक्टूबर 2026 तक सिर्फ़ डेटा संरक्षण बोर्ड बनाने वाले प्रावधान लागू हैं, और कंपनियों के ज़्यादातर कर्तव्य व आपके अधिकार 13 मई 2027 से लागू होने हैं।
  • RTI और निजता: 13 नवंबर 2025 से DPDP अधिनियम के एक संशोधन के कारण RTI अधिनियम की व्यक्तिगत जानकारी वाली छूट में व्यक्तिगत जानकारी देने पर रोक है, और पहले का जनहित वाला अपवाद हटा दिया गया है। इस बदलाव को चुनौती देने वाली याचिकाएँ 2026 में सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं।

कुछ हाई कोर्ट ने ऑनलाइन फ़ैसलों या सर्च नतीजों में नाम छिपाने के आदेश भी दिए हैं ("भुला दिए जाने का अधिकार", right to be forgotten), पर सुप्रीम कोर्ट ने अभी कोई तय नियम नहीं बनाया है।

क़दम दर क़दम: इस अधिकार का इस्तेमाल

  1. सिर्फ़ ज़रूरी जानकारी दें। पूछें कि कोई ख़ाना अनिवार्य क्यों है। जहाँ पूरा ब्योरा ज़रूरी न हो, मास्क्ड आधार या दूसरा पहचान पत्र दें।
  2. क़ानूनी आधार लिखित में माँगें जब कोई सरकारी दफ़्तर डेटा, तलाशी या आपके फ़ोन तक पहुँच माँगे।
  3. ऊपर शिकायत करें। दफ़्तर के प्रमुख को लिखें, फिर CPGRAMS (pgportal.gov.in) का इस्तेमाल करें।
  4. ऑनलाइन दुरुपयोग (फ़ोटो, चैट या डेटा) की रिपोर्ट 1930 या cybercrime.gov.in पर करें। बिना सहमति निजी तस्वीरें शेयर करना अपराध है धारा 66E आईटी अधिनियम, वैसे ही दृश्यरतिकता (voyeurism) धारा 77 BNS और ऑनलाइन पीछा करना (stalking) धारा 78 BNS।
  5. अदालत जाएँ अनुच्छेद 226 या 32 के तहत रिट याचिका से, अगर राज्य बिना क़ानून या ज़रूरत से ज़्यादा दख़ल दे। मुफ़्त क़ानूनी सहायता: 15100।
उदाहरण

20 साल की फ़राह एक सरकारी कॉलेज के हॉस्टल में रहती है। हॉस्टल दफ़्तर छात्राओं के नाम, फ़ोन नंबर, जाति और घर के पते एक सार्वजनिक व्हाट्सऐप ग्रुप और कॉलेज वेबसाइट पर डाल देता है। फ़राह प्रिंसिपल को लिखकर पूछती है कि कौन-सा नियम सार्वजनिक प्रदर्शन ज़रूरी करता है; वह बताती है कि पुट्टस्वामी कसौटी में क़ानून, वैध उद्देश्य और आनुपातिकता चाहिए, और अब अनजान लोग छात्राओं को फ़ोन कर रहे हैं। कुछ न होने पर वह CPGRAMS पर शिकायत करती है। कॉलेज सूची हटा देता है और संपर्क ब्योरा सिर्फ़ वार्डन के पास रहता है।

सावधान

मौलिक अधिकार सीधे राज्य के ख़िलाफ़ लागू होता है, आपके मकान मालिक, नियोक्ता या किसी ऐप के ख़िलाफ़ नहीं। निजी पक्षों के ख़िलाफ़ आईटी अधिनियम, BNS और लागू होने पर DPDP अधिनियम जैसे ख़ास क़ानूनों पर निर्भर रहना होगा। यह भी याद रखें कि अक्टूबर 2026 तक DPDP अधिनियम के मुख्य अधिकार लागू नहीं हुए हैं।

कहाँ जाएँ

  • डेटा माँगने वाला दफ़्तर या कंपनी: क़ानूनी आधार और शिकायत अधिकारी का ब्योरा लिखित में माँगें।
  • साइबर दुरुपयोग: 1930 और cybercrime.gov.in; महिला हेल्पलाइन 181।
  • सरकारी शिकायतें: pgportal.gov.in।
  • अदालत: हाई कोर्ट (अनुच्छेद 226) या सुप्रीम कोर्ट (अनुच्छेद 32)। मुफ़्त क़ानूनी सहायता: 15100 (nalsa.gov.in)।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या भारत में निजता मौलिक अधिकार है?

हाँ। जस्टिस के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017) में सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की पीठ ने सर्वसम्मति से माना कि निजता मौलिक अधिकार है, मुख्य रूप से अनुच्छेद 21 के तहत। इसमें आपका शरीर, व्यक्तिगत जानकारी, निजी फ़ैसले और निजी जगहें शामिल हैं।

क्या सरकार कभी मेरी निजता में दख़ल दे सकती है?

सिर्फ़ तब जब वह पुट्टस्वामी कसौटी पार करे: कोई क़ानून अनुमति दे, उद्देश्य वैध हो, और दख़ल उस उद्देश्य के अनुपात में हो, दुरुपयोग से सुरक्षा के साथ। बिना क़ानून या ज़रूरत से कहीं ज़्यादा दख़ल को हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

क्या मैं किसी निजी कंपनी के ख़िलाफ़ निजता का अधिकार लागू करा सकता हूँ?

सीधे मौलिक अधिकार के रूप में नहीं। इसके बजाय ख़ास क़ानूनों का इस्तेमाल होता है: निजी तस्वीरें शेयर करने या पीछा करने जैसे अपराधों के लिए आईटी अधिनियम और BNS, और डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023, जिसके मुख्य अधिकार 13 मई 2027 से लागू होने हैं।

क्या भारत में भुला दिए जाने का अधिकार है?

अभी तय नियम के रूप में नहीं। कुछ हाई कोर्ट ने ख़ास मामलों में ऑनलाइन फ़ैसलों में नाम छिपाने या सर्च नतीजों से हटाने के आदेश दिए हैं, पर 2026 तक सुप्रीम कोर्ट ने कोई सामान्य नियम तय नहीं किया है।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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