धारा 163 BNSS (पुरानी धारा 144): निषेधाज्ञा का मतलब क्या है
धारा 163 BNSS (पुरानी 144) का आदेश क्या रोक सकता है और क्या नहीं, कितने दिन चलता है, तोड़ने पर सज़ा, और उसे बदलवाने या चुनौती देने का तरीक़ा।
संक्षेप में
- "धारा 144" अब धारा 163 BNSS है। कार्यपालक मजिस्ट्रेट (Executive Magistrate) लिखित और कारण सहित आदेश से किसी ख़ास इलाक़े में ख़ास काम ज़्यादा से ज़्यादा दो महीने के लिए रोक सकता है।
- आम तौर पर यह पाँच या ज़्यादा लोगों के जमावड़े, हथियार या लाठी ले चलने, या लाउडस्पीकर पर रोक लगाता है। यह आपकी दुकान बंद नहीं कराता, काम, अस्पताल या अदालत जाने से नहीं रोकता, और आपके अधिकार स्थगित नहीं करता।
- जानते हुए आदेश तोड़ना धारा 223 BNS में अपराध है: छह महीने तक की कैद या 2,500 रुपये जुर्माना, और जान या सुरक्षा को ख़तरा हो तो ज़्यादा।
- आप उसी मजिस्ट्रेट से आदेश रद्द या बदलने की अर्ज़ी दे सकते हैं (धारा 163(5) BNSS), और बिना कारण या अंतहीन आदेश को हाई कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं।
ख़बरों में सुनते हैं या थाने पर चिपके नोटिस में पढ़ते हैं: "धारा 144 लागू कर दी गई है।" 1 जुलाई 2024 से यही शक्ति धारा 163 BNSS में है, इसलिए नए नोटिस "धारा 163" कहते हैं। दोनों सूरत में, कुछ समय के लिए जमावड़े पर रोक, जुलूस बंद या दुकानें जल्दी बंद करने को कहा जा सकता है। ये आदेश आपकी रोज़मर्रा की ज़िंदगी और विरोध करने की आज़ादी को छूते हैं। यहाँ जानिए कि ये क्या कर सकते हैं, क्या नहीं, और आप क्या कर सकते हैं।
क़ानून क्या कहता है
धारा 163 BNSS (पहले CrPC की धारा 144) ज़िला मजिस्ट्रेट, उप-ज़िला मजिस्ट्रेट (SDM) या राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से अधिकृत किसी कार्यपालक मजिस्ट्रेट को तुरंत आदेश देने की शक्ति देती है। कार्यपालक मजिस्ट्रेट सरकारी अधिकारी होता है (आम तौर पर ज़िला प्रशासन का, जज नहीं) जिसके पास सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की शक्तियाँ हैं।
मजिस्ट्रेट तब कार्रवाई कर सकता है जब पर्याप्त आधार हो और "तुरंत रोकथाम या त्वरित उपाय" ज़रूरी हो। आदेश किसी व्यक्ति, किसी इलाक़े के निवासियों या वहाँ आने वाली जनता को कोई काम न करने, या किसी संपत्ति को ख़ास तरीक़े से रखने का निर्देश दे सकता है। इसका मक़सद वैध काम कर रहे किसी व्यक्ति को बाधा, परेशानी या चोट, मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा को ख़तरा, सार्वजनिक शांति भंग, या दंगा या बलवा (affray, यानी सार्वजनिक मारपीट) रोकना होना चाहिए।
- आदेश लिखित होना चाहिए और उसमें ज़रूरी तथ्य दर्ज होने चाहिए (धारा 163(1))।
- आपात स्थिति में यह प्रभावित लोगों को सुने बिना भी पारित हो सकता है (धारा 163(2))।
- यह दो महीने बाद ख़त्म हो जाता है। राज्य सरकार अधिसूचना से इसे छह महीने तक और बढ़ा सकती है, पर सिर्फ़ जान, स्वास्थ्य या सुरक्षा को ख़तरा या दंगा रोकने के लिए (धारा 163(4))।
- कोई भी व्यथित व्यक्ति इसे रद्द या बदलवाने की अर्ज़ी दे सकता है। मजिस्ट्रेट को आपको जल्दी सुनवाई का मौक़ा देना होगा, ख़ुद या वकील के ज़रिए, और अर्ज़ी ख़ारिज करे तो लिखित कारण दर्ज करने होंगे (धारा 163(5) से (7))।
आम आदेश क्या रोकता है, और क्या नहीं
आदेश ज़िले-ज़िले अलग होते हैं, इसलिए हमेशा असली पाठ पढ़ें। आम धाराएँ हैं: बिना अनुमति पाँच या ज़्यादा लोगों का जमावड़ा नहीं; हथियार, लाठी या ज्वलनशील सामग्री ले चलना नहीं; बिना अनुमति लाउडस्पीकर या जुलूस नहीं; और कभी-कभी अफ़वाह फैलाने पर रोक। कुछ ज़िले परीक्षा या त्योहार से पहले नियमित आदेश भी निकालते हैं।
आदेश क्या नहीं है:
- यह कर्फ़्यू नहीं है। कर्फ़्यू लोगों को घर में रोकता है। धारा 163 का आदेश आम तौर पर जमावड़े पर रोक लगाता है, आने-जाने पर नहीं, जब तक पाठ में ऐसा न लिखा हो।
- यह अपने आप बाज़ार, स्कूल या दफ़्तर बंद नहीं करता, न काम, अस्पताल, अदालत या रेलवे स्टेशन जाने से रोकता है।
- यह अनुच्छेद 19(1)(a), (b) और (d) के बोलने, शांतिपूर्वक इकट्ठा होने और आने-जाने के आपके अधिकार रद्द नहीं करता। यह उन्हें सीमित इलाक़े में सीमित समय के लिए रोकता है, और वह रोक अनुच्छेद 19(2) और (3) के तहत उचित होनी चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने Madhu Limaye v. Sub-Divisional Magistrate, Monghyr (1970) में इस शक्ति को सही ठहराया पर कहा कि यह आपात स्थिति के लिए है। Anuradha Bhasin v. Union of India (2020) में काम की सीमाएँ तय कीं: आदेश का इस्तेमाल राय या शिकायत की वैध अभिव्यक्ति दबाने के लिए नहीं हो सकता; मजिस्ट्रेट को सोच-समझकर, कारण दर्ज करके, सबसे कम पाबंदी वाला कारगर उपाय चुनना होगा; बार-बार आदेश देकर किसी इलाक़े को अनिश्चित काल तक रोक में नहीं रखा जा सकता; और हर आदेश की जाँच अदालत कर सकती है।
आदेश तोड़ने पर क्या होता है
लोक सेवक के वैध आदेश को जानते हुए तोड़ना धारा 223 BNS (पहले IPC की धारा 188) में अपराध है। "जानते हुए" शब्द अहम है: अभियोजन को दिखाना होगा कि आपको आदेश की जानकारी थी। सज़ा है:
- छह महीने तक की साधारण कैद, या 2,500 रुपये तक जुर्माना, या दोनों, अगर अवज्ञा से बाधा, परेशानी या चोट हो या उसका ख़तरा हो।
- एक साल तक की कैद, या 5,000 रुपये तक जुर्माना, या दोनों, अगर इससे मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा को ख़तरा हो, या दंगा या बलवा हो या उसका ख़तरा हो।
पुलिस जमावड़े को तितर-बितर होने का आदेश दे सकती है और अपराध रोकने के लिए लोगों को थोड़ी देर हिरासत में ले सकती है। आपसे जाने को कहा जाए तो आम तौर पर मान लेना सबसे सुरक्षित है, जो हुआ उसे दर्ज करें, और बाद में क़ानूनी रास्ते से आपत्ति करें।
क़दम दर क़दम
- आदेश पढ़ें। थाने, ज़िला मजिस्ट्रेट कार्यालय या ज़िला वेबसाइट से प्रति लें। इलाक़ा, रोके गए काम और शुरू-ख़त्म की तारीख़ें देखें।
- छूट या बदलाव की अर्ज़ी दें। धारा 163(5) BNSS के तहत आदेश देने वाले मजिस्ट्रेट को लिखें। बताएँ कि आप कौन हैं, क्या करना चाहते हैं (शांतिपूर्ण सभा, शादी का जुलूस, विरोध प्रदर्शन), जगह, समय, अनुमानित संख्या, और सुरक्षा के क्या इंतज़ाम करेंगे। सुनवाई माँगें।
- पहले से अनुमति लें। नियोजित प्रदर्शन या मार्च के लिए स्थानीय पुलिस और प्रशासन में काफ़ी पहले आवेदन दें। कई शहरों में तय प्रदर्शन-स्थल और समय-सीमा हैं; उनके बारे में पूछें।
- हाई कोर्ट जाएँ। आदेश बिना कारण का हो, हफ़्तों तक पूरे ज़िले पर लागू हो, या बार-बार दोहराया जा रहा हो, तो अनुच्छेद 226 में रिट याचिका (writ petition) से चुनौती दी जा सकती है। आदेश और अपनी ख़ारिज अर्ज़ी साथ लगाएँ।
- मदद लें। मुफ़्त क़ानूनी सहायता: 15100 पर कॉल करें या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण जाएँ। आपातकाल में 112।
फ़रहान की रेज़िडेंट्स एसोसिएशन सीवर उफनने के मुद्दे पर 200 लोगों की बैठक करना चाहती है, पर चुनाव से पहले एक महीने के लिए पूरे शहर में धारा 163 का आदेश पाँच या ज़्यादा लोगों के जमावड़े पर रोक लगाता है। बैठक रद्द करने के बजाय फ़रहान ज़िला वेबसाइट से आदेश डाउनलोड करते हैं और SDM को धारा 163(5) में अर्ज़ी देते हैं: सामुदायिक भवन के अंदर दो घंटे की बैठक के लिए छूट, एजेंडा और आयोजकों के नामों के साथ। SDM तीन दिन में सुनवाई करके बैठक की अनुमति देते हैं, इस शर्त पर कि बाद में कोई जुलूस नहीं निकलेगा। फ़रहान उस दिन लिखित अनुमति साथ रखते हैं।
अगर आपको हिरासत में लिया जाए या आरोप लगे
आपको यह जानने का अधिकार है कि आपको क्यों रोका गया है और वकील से बात करने का अधिकार है। धारा 223 BNS का अपराध छोटा और ज़मानती (bailable) है, इसलिए थाने में या मजिस्ट्रेट के सामने ज़मानत माँगें। शांत रहें, विरोध न करें, और जितनी जल्दी हो सके अधिकारियों के नाम, समय और जगह लिख लें। परिवार के किसी सदस्य और वकील को सूचित करें। Arnesh Kumar v. State of Bihar (2014) के अनुसार सात साल तक की सज़ा वाले अपराधों में गिरफ़्तारी अपने आप नहीं होती; पुलिस को कारण दर्ज करने होते हैं।
ये तैयार रखें
- निषेधाज्ञा की प्रति या फ़ोटो, तारीख़ और इलाक़े सहित।
- मजिस्ट्रेट को दी गई आपकी लिखित अर्ज़ी और जवाब, अगर मिला हो।
- आपके कार्यक्रम के लिए मिली अनुमति, प्रिंट करके उस दिन साथ।
- शांतिपूर्ण जमावड़े पर पुलिस कार्रवाई हो तो फ़ोटो, वीडियो और गवाहों के नाम।
"धारा 144 लागू है" का मतलब शहर बंद नहीं है। धाराएँ पढ़ें। उसी तरह, "मुझे पता नहीं था" तभी चलता है जब सचमुच आपको सूचना न मिली हो; आदेश प्रकाशित और घोषित हो जाए तो अदालतें मानती हैं कि इलाक़े के लोग उसे जानते हैं।
कहाँ जाएँ
- आदेश देने वाला कार्यपालक मजिस्ट्रेट (SDM या ज़िला मजिस्ट्रेट), धारा 163(5) BNSS के तहत।
- अधिसूचना से बढ़ाए गए आदेशों के लिए राज्य सरकार (गृह विभाग), धारा 163(6) के तहत।
- बिना कारण, व्यापक या बार-बार के आदेशों के लिए अनुच्छेद 226 में हाई कोर्ट रिट याचिका।
- मुफ़्त क़ानूनी सहायता 15100 (NALSA); आपातकाल 112; अधिकारियों के ख़िलाफ़ शिकायत pgportal.gov.in पर।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
निषेधाज्ञा लागू हो तो क्या मैं काम या अस्पताल जा सकता हूँ?
हाँ, जब तक आदेश ख़ुद आने-जाने पर रोक न लगाए, जो कम ही होता है। आम आदेश पाँच या ज़्यादा लोगों के जमावड़े, हथियार और जुलूस पर रोक लगाता है। पहचान-पत्र साथ रखें और ज़रूरी काम से निकलें तो उसका कोई सबूत भी।
धारा 163 का आदेश कितने दिन चल सकता है?
बनने की तारीख़ से दो महीने। राज्य सरकार इसे छह महीने तक और बढ़ा सकती है, पर सिर्फ़ जान, स्वास्थ्य या सुरक्षा को ख़तरा या दंगा रोकने के लिए। अदालतों ने कहा है कि मजिस्ट्रेट बार-बार आदेश जारी करके रोक को स्थायी नहीं बना सकते।
आदेश तोड़ने पर क्या सज़ा है?
धारा 223 BNS में छह महीने तक की साधारण कैद या 2,500 रुपये जुर्माना या दोनों; जान, स्वास्थ्य या सुरक्षा को ख़तरा हुआ हो या दंगे का ख़तरा हो तो एक साल तक या 5,000 रुपये या दोनों। अपराध ज़मानती है, और आपको आदेश की जानकारी होना ज़रूरी है।
क्या निषेधाज्ञा के दौरान विरोध प्रदर्शन हो ही नहीं सकता?
आप मजिस्ट्रेट से छूट या पुलिस से तय स्थल पर अनुमति माँग सकते हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन अनुच्छेद 19(1)(b) का अधिकार है, और Anuradha Bhasin (2020) कहता है कि आदेश का इस्तेमाल सिर्फ़ शिकायतें दबाने के लिए नहीं हो सकता। बिना कारण सीधा इनकार हाई कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।
