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Stacks of files in a government office in Indiaस्वतंत्रता

फ़ोटो: Ganesh Dhamodkar, Wikimedia Commons, CC BY 2.0. सांकेतिक चित्र.

सूचना का अधिकार: आपकी आज़ादी है, कोई एहसान नहीं

न्याय पाठशाला8 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

संविधान में RTI की जड़, 10 रुपये में 10 मिनट में आवेदन, 30 दिन और 48 घंटे की समय-सीमा, अपील, जुर्माना, और नवंबर 2025 में क्या बदला।

क़ानून: अनुच्छेद 19(1)(a) और 21, भारत का संविधान · सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 · डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 की धारा 44(3)

संक्षेप में

  • जानने का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) की बोलने की आज़ादी का हिस्सा है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 (RTI Act) इसे ऐसी प्रक्रिया बनाता है जिसे कोई भी नागरिक इस्तेमाल कर सकता है; कारण बताना कभी ज़रूरी नहीं।
  • विभाग के जन सूचना अधिकारी (PIO) को लिखें, 10 रुपये फ़ीस दें (केंद्रीय निकाय; BPL आवेदक कुछ नहीं देते), और भेजने का सबूत रखें। ऑनलाइन: केंद्रीय निकायों के लिए rtionline.gov.in।
  • जवाब 30 दिन में; जीवन या स्वतंत्रता का सवाल हो तो 48 घंटे में धारा 7, RTI अधिनियम।
  • जवाब नहीं या ग़लत जवाब? 30 दिन में वरिष्ठ अधिकारी को पहली अपील; 90 दिन में सूचना आयोग को दूसरी अपील, जो PIO पर 250 रुपये रोज़ का जुर्माना लगा सकता है धारा 19 और 20।
  • 13 नवंबर 2025 से "व्यक्तिगत जानकारी" जनहित की कसौटी के बिना रोकी जा सकती है, इसलिए सवाल व्यक्तियों पर नहीं, रिकॉर्ड और फ़ैसलों पर पूछें।

आपका राशन नहीं पहुँचा। आपके गाँव की सड़क काग़ज़ पर "पूरी" हो गई, पर बनी नहीं। आपकी पेंशन की फ़ाइल महीनों से अटकी है। हर मामले में जवाब सरकारी फ़ाइल में है, और सूचना का अधिकार आपको वह फ़ाइल माँगने का हक़ देता है। बहुत-से लोग RTI आवेदन को अफ़सर की मेहरबानी की अर्ज़ी समझते हैं। ऐसा नहीं है। यह संवैधानिक अधिकार है, और जो अफ़सर आपको जवाब देता है वह अपना क़ानूनी फ़र्ज़ निभा रहा है।

यह अधिकार कहाँ से आता है

संविधान में "सूचना का अधिकार" शब्द नहीं हैं। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार कहा है कि यह अनुच्छेद 19(1)(a) की बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा है, क्योंकि तथ्यों के बिना आप न राय बना सकते हैं, न रख सकते हैं।

  • State of U.P. v. Raj Narain (1975): जनता को सरकारी अफ़सरों के हर सार्वजनिक रूप से किए गए सार्वजनिक काम को जानने का अधिकार है।
  • S.P. Gupta v. Union of India (1981): खुली सरकार लोकतंत्र का हिस्सा है और जानने के अधिकार से निकलती है।
  • CBSE v. Aditya Bandopadhyay (2011): छात्र RTI अधिनियम के तहत अपनी जाँची हुई उत्तर-पुस्तिकाएँ देख सकते हैं।

सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 ने इसे चालू प्रक्रिया बना दिया। यह हर "लोक प्राधिकरण" (public authority) पर लागू है: मंत्रालय, राज्य के विभाग, पंचायत और नगरपालिका, पुलिस, सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियाँ, सरकारी स्कूल और अस्पताल, और सरकार से काफ़ी धन पाने वाली संस्थाएँ धारा 2(h)। लोक प्राधिकरणों को बिना माँगे भी बहुत-सी जानकारी ख़ुद छापनी होती है धारा 4।

क़दम दर क़दम: आवेदन कैसे करें

  1. वह लोक प्राधिकरण पहचानें जिसके पास रिकॉर्ड है। ग़लत जगह भेज दिया तो उसे पाँच दिन में आपका आवेदन सही जगह भेजना होगा धारा 6(3), इसलिए बहुत चिंता न करें।
  2. आवेदन लिखें अंग्रेज़ी, हिंदी या राज्य की राजभाषा में, "जन सूचना अधिकारी, [विभाग]" के नाम। अपना नाम और डाक का पता दें (कोई और निजी जानकारी ज़रूरी नहीं) और ख़ास रिकॉर्ड माँगें: "कार्य आईडी X के अप्रैल से जून 2026 के मस्टर रोल की प्रमाणित प्रति"। कारण बताना ज़रूरी नहीं धारा 6(2)।
  3. फ़ीस दें। केंद्र सरकार के निकायों के लिए 10 रुपये, पोस्टल ऑर्डर, डिमांड ड्राफ़्ट, कोर्ट फ़ीस स्टांप या ऑनलाइन। राज्यों की फ़ीस मिलती-जुलती है पर अलग-अलग है। ग़रीबी रेखा से नीचे के आवेदक कुछ नहीं देते; BPL कार्ड की कॉपी लगाएँ धारा 7(5)। केंद्र में प्रतियाँ 2 रुपये प्रति पेज; PIO समय-सीमा चूक जाए तो जानकारी मुफ़्त धारा 7(6)।
  4. भेजें रजिस्टर्ड या स्पीड पोस्ट से, रसीद लेकर हाथों-हाथ दें, या ऑनलाइन दायर करें। केंद्रीय निकायों के लिए rtionline.gov.in; कई राज्यों के अपने पोर्टल हैं।
  5. आवेदन की कॉपी और भेजने का सबूत सँभालकर रखें। आपके 30 दिन उस तारीख़ से गिने जाते हैं जब PIO को आवेदन मिला।
सुझावदस्तावेज़ माँगें, सफ़ाई नहीं। "X गाँव में 2025 के सड़क कार्य की मेज़रमेंट बुक और भुगतान वाउचर की प्रतियाँ दें" काम करता है। "सड़क क्यों नहीं बनी?" का जवाब आता है "ऐसी कोई सूचना उपलब्ध नहीं"।

समय-सीमा, अपील और जुर्माना

  • PIO को आवेदन मिलने के 30 दिन में जवाब देना है; जानकारी किसी के जीवन या स्वतंत्रता से जुड़ी हो तो 48 घंटे में धारा 7(1)।
  • 30 दिन में जवाब न आना इनकार माना जाता है। 30 दिन के भीतर प्रथम अपीलीय प्राधिकारी (First Appellate Authority) को पहली अपील करें, जो उसी विभाग में PIO से वरिष्ठ अधिकारी होता है। यह मुफ़्त है। उसे 30 दिन में, ज़्यादा से ज़्यादा 45 दिन में, फ़ैसला करना है धारा 19(1), 19(6)।
  • फिर भी संतुष्ट नहीं? 90 दिन के भीतर केंद्रीय सूचना आयोग या अपने राज्य सूचना आयोग को दूसरी अपील करें धारा 19(3)। अगर PIO है ही नहीं या काउंटर पर आपका आवेदन लेने से मना कर दिया गया, तो आयोग को सीधी शिकायत भी कर सकते हैं धारा 18।
  • आयोग बिना वाजिब कारण मना करने या देरी करने वाले PIO पर 250 रुपये रोज़, अधिकतम 25,000 रुपये तक का जुर्माना उसकी अपनी तनख़्वाह से लगा सकता है, और अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफ़ारिश कर सकता है धारा 20।

कई राज्यों के सूचना आयोगों में लंबा बैकलॉग और ख़ाली पद हैं, इसलिए दूसरी अपील में महीने या साल लग सकते हैं। पहली अपील अच्छी तरह करें; ज़्यादातर जानकारी असल में वहीं निकलती है।

किन बातों से इनकार हो सकता है

धारा 8(1) में छूटें हैं: वह जानकारी जिससे राष्ट्रीय सुरक्षा, संप्रभुता या विदेश संबंधों को नुक़सान हो; जिसे अदालत ने मना किया हो; फ़ैसले से पहले के कैबिनेट काग़ज़ात; तीसरे पक्ष के व्यापारिक रहस्य; विदेशी सरकार से गोपनीय रूप से मिली जानकारी; जिससे किसी की जान ख़तरे में पड़े या जाँच में बाधा आए; और व्यक्तिगत जानकारी।

13 नवंबर 2025 को एक अहम बदलाव लागू हुआ। डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 की धारा 44(3) ने धारा 8(1)(j) में संशोधन किया। पहले, बड़ा जनहित हो तो व्यक्तिगत जानकारी दी जा सकती थी, और जो संसद को मना नहीं किया जा सकता वह आपको भी मना नहीं किया जा सकता था। अब व्यक्तिगत जानकारी उस कसौटी के बिना रोकी जा सकती है। धारा 8(2) अब भी PIO को छूट वाली जानकारी देने देती है जहाँ जनहित नुक़सान से बड़ा हो, पर यह उसके विवेक पर है। किसी नामित व्यक्ति के बारे में सवालों, जैसे अफ़सर की संपत्ति या हाज़िरी, पर ज़्यादा इनकार की उम्मीद रखें, और फ़ाइल, आदेश, टेंडर या ख़र्च माँगने पर ज़्यादा कामयाबी की। जिस इनकार को आप ग़लत समझें, उसकी अपील अब भी कर सकते हैं।

उदाहरण

कमला ने झारखंड के अपने गाँव में मनरेगा के तालाब पर 42 दिन काम किया, पर मज़दूरी 20 दिन की मिली। वे प्रखंड विकास अधिकारी के PIO को RTI भेजती हैं: "कार्य कोड X के मई–जून 2026 के मस्टर रोल और FTO (फंड ट्रांसफ़र ऑर्डर) की प्रमाणित प्रतियाँ, और जॉब कार्ड Y पर दर्ज दिनों की संख्या"। वे पोस्टल ऑर्डर से 10 रुपये देती हैं और स्पीड-पोस्ट की पर्ची रखती हैं। 25वें दिन मस्टर रोल आता है, जिसमें उनके नाम पर 42 दिन दर्ज हैं पर भुगतान 20 दिन का। वे इसे ज़िला कार्यक्रम समन्वयक को शिकायत के साथ लगाती हैं। बाक़ी रक़म एक महीने में खाते में आ जाती है।

ये तैयार रखें

  • तारीख़ और PIO के नाम या पदनाम सहित आपका आवेदन
  • पोस्टल ऑर्डर / फ़ीस रसीद और स्पीड-पोस्ट या ऑनलाइन पावती
  • कोई भी जवाब, उसकी तारीख़ के साथ (आपकी अपील की घड़ी वहीं से चलती है)
  • फ़ीस छूट माँग रहे हों तो BPL कार्ड की कॉपी
सावधान

सिर्फ़ नागरिक आवेदन कर सकते हैं, और अधिनियम आपको रिकॉर्ड देता है, राय, सलाह या "क्यों" वाले सवालों के जवाब नहीं। एक आवेदन में बीस बेमेल सवाल न ठूँसें; PIO इन्हें अस्पष्ट कहकर ख़ारिज कर देते हैं। एक विषय, तीन-चार सटीक माँगें, सबसे अच्छा काम करता है।

कहाँ जाएँ

  • विभाग का जन सूचना अधिकारी (डाक से, हाथों-हाथ, या केंद्रीय निकायों के लिए rtionline.gov.in पर)।
  • उसी विभाग का प्रथम अपीलीय प्राधिकारी, 30 दिन के भीतर।
  • केंद्रीय / राज्य सूचना आयोग, 90 दिन के भीतर दूसरी अपील, या शिकायत।
  • RTI इस्तेमाल करने पर धमकी: पुलिस, 112, और राज्य मानवाधिकार आयोग।
  • आवेदन या अपील बनाने में मुफ़्त मदद: 15100 (NALSA), या गाइड और PIO सूची के लिए केंद्रीय पोर्टल rti.gov.in।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

RTI आवेदन का ख़र्च कितना है?

केंद्र सरकार के निकायों के लिए 10 रुपये, पोस्टल ऑर्डर, डिमांड ड्राफ़्ट, कोर्ट फ़ीस स्टांप या ऑनलाइन। ज़्यादातर राज्य उतना ही या मिलता-जुलता शुल्क लेते हैं। ग़रीबी रेखा से नीचे के लोग सबूत लगाकर कोई फ़ीस नहीं देते। केंद्र में फ़ोटोकॉपी 2 रुपये प्रति पेज है, और PIO 30 दिन की समय-सीमा चूक जाए तो जानकारी मुफ़्त हो जाती है।

क्या मुझे माँगने का कारण बताना होगा?

नहीं। RTI अधिनियम की धारा 6(2) कहती है कि आवेदक से कोई कारण, या संपर्क के लिए ज़रूरी से ज़्यादा कोई निजी जानकारी, नहीं माँगी जाएगी। जो PIO पूछे "यह क्यों चाहिए", वह क़ानून से बाहर जा रहा है; विनम्रता से धारा 6(2) का हवाला दें।

30 दिन में जवाब न आए तो?

चुप्पी इनकार मानी जाती है। समय-सीमा ख़त्म होने के 30 दिन के भीतर उसी विभाग के प्रथम अपीलीय प्राधिकारी को पहली अपील करें, आवेदन और भेजने का सबूत लगाकर। उससे काम न बने तो 90 दिन के भीतर सूचना आयोग को दूसरी अपील करें, जो PIO पर 250 रुपये रोज़, अधिकतम 25,000 रुपये तक जुर्माना भी लगा सकता है।

क्या मैं किसी सरकारी अफ़सर की तनख़्वाह या संपत्ति की जानकारी ले सकता हूँ?

13 नवंबर 2025 से धारा 8(1)(j) व्यक्तिगत जानकारी को जनहित तौले बिना रोकने देती है, इसलिए ऐसे अनुरोधों पर इनकार की संभावना ज़्यादा है। आप फिर भी अपील कर सकते हैं, और धारा 8(2) वहाँ खुलासे की इजाज़त देती है जहाँ जनहित नुक़सान से साफ़ बड़ा हो। जो जानकारी लोक प्राधिकरण को धारा 4 के तहत ख़ुद छापनी होती है, जैसे वेतनमान और बजट, वह उपलब्ध रहती है।

क्या सूचना का अधिकार मौलिक अधिकार है?

हाँ। सुप्रीम कोर्ट ने State of U.P. v. Raj Narain (1975) से शुरू करके कहा है कि जानने का अधिकार अनुच्छेद 19(1)(a) की बोलने और अभिव्यक्ति की आज़ादी का हिस्सा है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 वह क़ानून है जो इस अधिकार को व्यावहारिक प्रक्रिया, समय-सीमा और अपील व्यवस्था देता है।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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