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The Madras High Court building, Chennaiस्वतंत्रता

फ़ोटो: Yercaud-elango, Wikimedia Commons, CC BY 4.0. सांकेतिक चित्र.

जनहित याचिका (PIL): क़दम दर क़दम कैसे दायर करें

न्याय पाठशाला7 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

PIL क्या है, कौन दायर कर सकता है, कौन-सी अदालत चुनें, खर्च कितना है, पत्र-याचिका कैसे काम करती है, और किन ग़लतियों से PIL जुर्माने के साथ खारिज होती है।

क़ानून: अनुच्छेद 32 और 226, भारत का संविधान · अनुच्छेद 39A · विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987

संक्षेप में

  • जनहित याचिका (Public Interest Litigation, PIL) एक रिट याचिका (writ petition) है जो हाई कोर्ट (अनुच्छेद 226) या सुप्रीम कोर्ट (अनुच्छेद 32) में जनता के, या ऐसे लोगों के अधिकारों की रक्षा के लिए दायर की जाती है जो खुद अदालत नहीं पहुँच सकते।
  • ज़रूरी नहीं कि आप ही पीड़ित हों। लेकिन आपको ईमानदारी से, बिना किसी निजी या राजनीतिक मक़सद के काम करना होगा, और यह बात हलफ़नामे (affidavit) में लिखनी होगी।
  • दायर करने से पहले ज़िम्मेदार अधिकारी को लिखित शिकायत भेजें और सबूत रखें। अदालत पूछती है कि आपने पहले यह किया या नहीं।
  • स्थानीय या राज्य-स्तर की समस्या के लिए अपने हाई कोर्ट से शुरू करें। कोर्ट फ़ीस कम है; असली खर्च ड्राफ़्टिंग का है, जो क़ानूनी सहायता (15100) या जनहित में काम करने वाला वकील उठा सकता है।
  • निजी रंजिश निकालने या प्रचार के लिए दायर की गई PIL भारी जुर्माने (costs) के साथ खारिज हो सकती है।

एक फ़ैक्ट्री उस नदी में कचरा बहा रही है जिसका पानी आपका गाँव पीता है। सरकारी हॉस्टल के बच्चे भूखे रह रहे हैं। सबसे ज़्यादा नुकसान अक्सर गरीब, बिखरे हुए या डरे हुए लोगों को होता है, जो शायद कभी वकील न कर पाएँ। जनहित याचिका ठीक इसी खाई को पाटने के लिए है।

PIL क्या है और कौन दायर कर सकता है

आमतौर पर सिर्फ़ वही व्यक्ति अदालत जा सकता है जिसके अपने अधिकार प्रभावित हुए हों। वकील इसे locus standi कहते हैं, यानी मामला लाने की हैसियत। 1970 के दशक के आखिर से सुप्रीम कोर्ट ने सार्वजनिक अन्याय के मामलों में इस नियम में ढील दी। Hussainara Khatoon v. State of Bihar (1979) में सालों से जेल में बंद विचाराधीन क़ैदियों पर अखबार की रिपोर्टों के आधार पर कोर्ट ने हज़ारों लोगों की रिहाई का आदेश दिया। S.P. Gupta v. Union of India (1981) में कोर्ट ने कहा कि नेकनीयती से काम करने वाला कोई भी नागरिक उन लोगों के लिए अदालत आ सकता है जो खुद नहीं आ सकते। Bandhua Mukti Morcha v. Union of India (1984) में एक PIL ने पत्थर की खदानों के बंधुआ मज़दूरों को आज़ाद कराया।

तो "क्या मैं PIL दायर कर सकता हूँ?" का जवाब है हाँ, अगर तीन बातें सच हों: मुद्दा जनता या ऐसे समूह को प्रभावित करता है जो अपनी बात नहीं रख सकता, नतीजे में आपका कोई निजी स्वार्थ नहीं है, और आपके पास सिर्फ़ ग़ुस्सा नहीं, तथ्य हैं।

क़ानून क्या कहता है

PIL किसी अलग क़ानून से नहीं बनी। इसका आधार संविधान है। अनुच्छेद 32 मौलिक अधिकार के उल्लंघन पर आपको सीधे सुप्रीम कोर्ट जाने देता है। अनुच्छेद 226 आपको अपने राज्य के हाई कोर्ट जाने देता है, और इसका दायरा ज़्यादा बड़ा है: यह मौलिक अधिकारों के अलावा किसी भी क़ानूनी अधिकार को कवर करता है। अनुच्छेद 39A राज्य को निर्देश देता है कि वह समान न्याय और मुफ़्त क़ानूनी सहायता सुनिश्चित करे ताकि गरीबी की वजह से कोई न्याय से वंचित न रहे। विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987 के तहत NALSA और ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) बने हैं जो यह सहायता देते हैं।

PIL लगभग हमेशा सरकार या किसी सार्वजनिक संस्था के ख़िलाफ़ दायर होती है, क्योंकि अधिकारों की रक्षा का कर्तव्य राज्य का है। अदालत अधिकारियों को काम करने का निर्देश दे सकती है, रिपोर्ट माँग सकती है, amicus curiae (अदालत की मदद करने वाला वकील) नियुक्त कर सकती है, समिति बना सकती है, और महीनों-सालों तक मामले को खुला रखकर अमल पर नज़र रख सकती है।

अदालतों ने सीमाएँ भी तय की हैं। State of Uttaranchal v. Balwant Singh Chaufal (2010) में सुप्रीम कोर्ट ने सभी अदालतों से कहा कि वे PIL याचिकाकर्ता की साख और नीयत जाँचें, देखें कि याचिका सचमुच जनहित में है, और निजी फ़ायदे, प्रचार या राजनीतिक मक़सद से दायर याचिकाओं को हतोत्साहित करें, ज़रूरत पड़े तो जुर्माना लगाकर। अदालतें आमतौर पर शुद्ध नीतिगत फ़ैसलों में, जैसे बजट कैसे खर्च हो, दख़ल नहीं देतीं, जब तक किसी अधिकार या क़ानून का उल्लंघन न हो रहा हो।

व्यवहार में यह कैसे चलती है

PIL एक रिट याचिका के रूप में तैयार होती है। इसमें तथ्य, जिस अधिकार का उल्लंघन हो रहा है, ज़िम्मेदार अधिकारी, आपने सुधार के लिए क्या किया, और आप ठीक-ठीक कौन-से आदेश चाहते हैं, यह सब लिखा होता है। साथ में हलफ़नामा होता है जिसमें आप बताते हैं कि आप कौन हैं, जानकारी का स्रोत क्या है, आपका कोई निजी स्वार्थ नहीं है, और आपने कुछ छिपाया नहीं है। ज़्यादातर हाई कोर्ट के PIL नियम और सुप्रीम कोर्ट के नियम ये खुलासे अनिवार्य करते हैं।

रिट याचिका की कोर्ट फ़ीस कम होती है और हर अदालत में अलग है। बड़ा खर्च वकील का समय है। कई वकील सच्चे जनहित के मामले बहुत कम या बिना फ़ीस के लेते हैं, और अगर आप क़ानूनी सहायता के पात्र हैं तो DLSA मुफ़्त वकील दे सकता है। पहली सुनवाई में अदालत या तो सरकार को नोटिस जारी कर जवाब माँगती है या याचिका खारिज कर देती है। अंतिम आदेश में महीने या उससे ज़्यादा लग सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट पत्र-याचिका (letter petition) भी स्वीकार करते हैं। मुख्य न्यायाधीश को संबोधित पत्र, जिसमें गंभीर उल्लंघन, जैसे हिरासत में हिंसा, बंधुआ मज़दूरी या सरकारी आश्रय गृह में उपेक्षा, का ब्योरा हो, PIL के रूप में दर्ज हो सकता है। हर अदालत ऐसे पत्रों की छँटाई अपने दिशानिर्देशों से करती है, इसलिए यह रास्ता आपात स्थिति में उपयोगी है, पर इसकी गारंटी नहीं।

क़दम दर क़दम

  1. सार्वजनिक अन्याय को एक वाक्य में लिखें। "नगर निगम ने उस झील में बिना शोधन का सीवेज बहने दिया है जिससे 40,000 लोगों को पीने का पानी मिलता है।" अगर आप यह वाक्य नहीं लिख सकते, तो आप अभी तैयार नहीं हैं।
  2. सबूत जुटाएँ। तारीख़ वाली तस्वीरें, जाँच रिपोर्ट, RTI के जवाब, अखबार की ख़बरें, सरकारी पत्र, और प्रभावित लोगों के छोटे हस्ताक्षरित बयान। अदालत दस्तावेज़ों पर चलती है।
  3. अभ्यावेदन (representation) भेजें। ज़िम्मेदार अधिकारी (ज़िलाधिकारी, प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, विभाग के सचिव) को समस्या बताते हुए तय समय में कार्रवाई माँगें। रजिस्टर्ड डाक या ईमेल से भेजें और पावती रखें।
  4. अदालत चुनें। ज़िले या राज्य के मुद्दे के लिए अनुच्छेद 226 के तहत अपना हाई कोर्ट। कई राज्यों में फैले मुद्दे या शुद्ध मौलिक अधिकार के सवाल पर अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट।
  5. याचिका तैयार करवाएँ। रिट मामलों के वकील से मिलें या अपने DLSA से (15100 पर कॉल करें)। क़दम 1 से 3 की सारी सामग्री दें। कहें कि याचिका में ठोस, अमल में लाने लायक आदेश माँगे जाएँ।
  6. सच्चा हलफ़नामा दें। पुराने मुक़दमे, मामले से कोई संबंध, और तथ्य कैसे पता चले, सब बताएँ। छिपाना PIL हारने का सबसे तेज़ रास्ता है।
  7. पीछा करें। सुनवाई में जाएँ, सरकार का जवाब पढ़ें, और नए तथ्य तुरंत वकील को दें। ज़्यादातर PIL इसी निगरानी में जीती या हारी जाती हैं।
उदाहरण

छोटे क़स्बे की शिक्षिका रेखा ने देखा कि सरकारी बालिका छात्रावास में एक भी शौचालय चालू नहीं है और लड़कियाँ खुले में नहा रही हैं। उन्होंने इमारत की तस्वीरें लीं, तीन अभिभावकों से छोटे बयान लिखवाए, और ज़िलाधिकारी व शिक्षा विभाग को पत्र भेजकर डाक की रसीदें रख लीं। चार हफ़्ते बीत गए, कोई जवाब नहीं। वे ज़िला अदालत में DLSA गईं, जहाँ से उन्हें एक पैनल वकील मिला। वकील ने उनके पत्र और तस्वीरें लगाकर हाई कोर्ट में PIL दायर की। पहली सुनवाई में अदालत ने नोटिस जारी कर विभाग से तीन हफ़्ते में रिपोर्ट माँगी। अगली तारीख़ से पहले मरम्मत शुरू हो गई।

ये तैयार रखें

  • आपका पहचान-पत्र और एक छोटा नोट कि आप कौन हैं और क्यों दायर कर रहे हैं
  • तारीख़ वाली तस्वीरें या वीडियो, लैब या निरीक्षण रिपोर्ट
  • RTI आवेदन और जवाब (जल्दी डालें; जवाब 30 दिन में आना चाहिए)
  • अधिकारी को भेजे अभ्यावेदन की प्रति और भेजने का सबूत
  • प्रभावित लोगों के हस्ताक्षरित बयान, नाम और संपर्क सहित
  • समस्या पर छपी ख़बरें या रिपोर्टें
सावधान

निजी झगड़ा, पड़ोसी, नियोक्ता या कारोबारी प्रतिद्वंद्वी से लड़ने के लिए PIL दायर न करें, और मामले से अपना कोई संबंध कभी न छिपाएँ। अदालतें ऐसी याचिकाएँ खारिज करती हैं और प्रक्रिया का दुरुपयोग करने वालों पर लाखों रुपये तक का जुर्माना लगा चुकी हैं।

कहाँ जाएँ

  • पहले अधिकारी के पास: ज़िम्मेदार ज़िलाधिकारी, विभाग प्रमुख या नियामक को लिखित में; केंद्र या राज्य की शिकायत के लिए pgportal.gov.in।
  • जानकारी: विभाग को RTI आवेदन (केंद्रीय विभागों के लिए rtionline.gov.in)।
  • मुफ़्त क़ानूनी मदद: NALSA हेल्पलाइन 15100, ज़िला अदालत में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण, nalsa.gov.in।
  • अदालतें: अनुच्छेद 226 के तहत आपका हाई कोर्ट; अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट (sci.gov.in)।
  • आपातकाल: लोगों को तुरंत ख़तरा हो तो 112; संकट में बच्चों के लिए 1098।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या मैं बिना वकील के PIL दायर कर सकता हूँ?

हाँ। आप "party in person" के रूप में खुद अपना मामला रख सकते हैं, और अदालतों ने मुख्य न्यायाधीश को लिखे पत्रों को भी याचिका माना है। लेकिन व्यवहार में रिट याचिका अदालत के फ़ॉर्मेट और नियमों के मुताबिक़ होनी चाहिए, इसलिए वकील से संभावना बहुत बढ़ जाती है। वकील का खर्च न उठा सकें तो ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण मुफ़्त पैनल वकील दे सकता है।

PIL में कितना खर्च और कितना समय लगता है?

रिट याचिका की कोर्ट फ़ीस कम है और हर अदालत के नियमों से तय होती है। वकील की फ़ीस अलग-अलग है; कई वकील सच्चे जनहित के मामले बहुत कम या बिना फ़ीस के लेते हैं, और क़ानूनी सहायता मुफ़्त है। पहली सुनवाई आमतौर पर कुछ हफ़्तों में हो जाती है। अंतिम फ़ैसले में महीने या साल लग सकते हैं, ख़ासकर जहाँ अदालत लंबे समय तक अमल की निगरानी करती है।

हाई कोर्ट जाऊँ या सुप्रीम कोर्ट?

अपने ज़िले या राज्य की समस्या के लिए हाई कोर्ट से शुरू करें। अनुच्छेद 226 के तहत उसका दायरा ज़्यादा बड़ा है, वह पास है, और सुप्रीम कोर्ट अक्सर याचिकाकर्ताओं से पहले हाई कोर्ट जाने को कहता है। सीधे अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट तब जाएँ जब मुद्दा कई राज्यों में फैला हो या साफ़ तौर पर मौलिक अधिकार का सवाल हो।

अगर अदालत को मेरी PIL बेबुनियाद लगे तो क्या होगा?

अदालत पहली सुनवाई में ही उसे खारिज कर सकती है और आप पर जुर्माना लगा सकती है, जो कुछ मामलों में काफ़ी बड़ा रहा है। इसीलिए सिर्फ़ दस्तावेज़ी तथ्यों पर, अधिकारी को कार्रवाई का मौक़ा देने के बाद, और मामले में अपने हित का पूरा खुलासा करके ही दायर करें।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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