Englishफ़ॉलो करें:
A historic protest march during the Vaikom Satyagrahaस्वतंत्रता

फ़ोटो: Unknown author, Wikimedia Commons, Public domain. सांकेतिक चित्र.

राजद्रोह से धारा 152 BNS तक: क्या दंडनीय है, केस दर्ज हो तो क्या करें

न्याय पाठशाला7 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

2022 की रोक के बाद पुराना राजद्रोह क़ानून कहाँ खड़ा है, धारा 152 BNS किसे सज़ा देती है, अदालतों ने क्या कहा है, और FIR दर्ज हो तो आपके अधिकार।

क़ानून: अनुच्छेद 19, भारत का संविधान · धारा 152 BNS · धारा 124A IPC (निरस्त) · Kedar Nath Singh v. State of Bihar (1962)

संक्षेप में

  • पुराने राजद्रोह (sedition) अपराध, पुरानी धारा 124A IPC, पर सुप्रीम कोर्ट ने 2022 में रोक लगाई थी और उसे भारतीय न्याय संहिता, 2023 (BNS) में शामिल नहीं किया गया। "राजद्रोह" शब्द अब क़ानून की किताब से हट गया है।
  • उसकी जगह आई धारा 152 BNS ऐसे कृत्यों को दंडित करती है जो "जानबूझकर या जानते हुए" अलगाव, सशस्त्र विद्रोह या विध्वंसक गतिविधियों को भड़काएँ, या भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को ख़तरे में डालें। सज़ा: आजीवन कारावास या सात साल तक, साथ में जुर्माना।
  • सरकार या उसकी नीतियों की आलोचना, उन्हें क़ानूनी तरीक़ों से बदलवाने के मक़सद से, धारा के स्पष्टीकरण (Explanation) के मुताबिक़ साफ़ तौर पर अपराध नहीं है।
  • केस दर्ज हो तो: तुरंत वकील करें (15100), अपनी पोस्ट या भाषण डिलीट न करें, FIR माँगें, और हाई कोर्ट में FIR रद्द कराने की याचिका पर विचार करें।
  • अक्टूबर 2026 तक धारा 152 की वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा चुकी है, पर धारा लागू है।

150 साल से ज़्यादा समय तक भारतीयों को ऐसे शब्दों के लिए जेल हो सकती थी जो सरकार के प्रति "असंतोष" दिखाते हों। तिलक और गांधी पर राजद्रोह क़ानून में मुक़दमे चले; आज़ादी के बाद यह छात्रों, पत्रकारों, कार्टूनिस्टों और कार्यकर्ताओं पर इस्तेमाल हुआ। 1 जुलाई 2024 से भारतीय दंड संहिता की जगह BNS ने ले ली है, जिसमें राजद्रोह नाम का कोई अपराध नहीं है। अब एक नया प्रावधान, धारा 152 BNS, मिलती-जुलती जगह लेता है। यह लेख बताता है कि क्या बदला, नई धारा किसे सज़ा देती है, और उसके तहत केस दर्ज हो तो क्या करें।

पुराना क़ानून और उसकी मौजूदा स्थिति

पुरानी धारा 124A IPC उस व्यक्ति को आजीवन कारावास तक की सज़ा देती थी जो क़ानून से स्थापित सरकार के प्रति "घृणा या अवमानना" लाए या लाने की कोशिश करे, या "असंतोष" भड़काए। Kedar Nath Singh v. State of Bihar (1962) में सुप्रीम कोर्ट ने धारा को बरक़रार रखा पर उसे सीमित किया: सिर्फ़ वही बात राजद्रोह हो सकती है जो हिंसा भड़काए या सार्वजनिक अव्यवस्था की प्रवृत्ति रखे। सरकार की कड़ी आलोचना काफ़ी नहीं थी। व्यवहार में पुलिस अक्सर इस सीमा को नज़रअंदाज़ करती रही।

S.G. Vombatkere v. Union of India (मई 2022) में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 124A को स्थगित (in abeyance) कर दिया। उसने केंद्र और राज्यों से कहा कि नई राजद्रोह FIR दर्ज न करें, और सरकार द्वारा क़ानून पर पुनर्विचार तक लंबित मुक़दमे रोक दिए। मई 2026 में कोर्ट ने Kamran v. State of Madhya Pradesh नाम की अपील में स्पष्ट किया कि धारा 124A का लंबित मुक़दमा या अपील तब आगे बढ़ सकती है जब अभियुक्त सहमत हो। धारा की वैधता की चुनौती अब भी लंबित है। अगर आपका कोई पुराना राजद्रोह केस है तो मौजूदा स्थिति अपने वकील से पूछें; यह लेख उस सलाह की जगह नहीं ले सकता।

धारा 152 BNS क्या कहती है

धारा 152 BNS का शीर्षक है "भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता को ख़तरे में डालने वाला कृत्य"। यह उस व्यक्ति को दंडित करती है जो जानबूझकर या जानते हुए, बोले या लिखे शब्दों, संकेतों, दृश्य चित्रण, इलेक्ट्रॉनिक संचार, वित्तीय साधनों के इस्तेमाल या अन्य किसी तरह से:

  • अलगाव (secession), सशस्त्र विद्रोह या विध्वंसक गतिविधियों को भड़काए या भड़काने की कोशिश करे;
  • अलगाववादी गतिविधियों की भावनाओं को बढ़ावा दे; या
  • भारत की संप्रभुता या एकता और अखंडता को ख़तरे में डाले,

या ऐसे किसी कृत्य में शामिल हो या उसे करे। सज़ा आजीवन कारावास, या सात साल तक का कारावास, और जुर्माना है। यह अपराध संज्ञेय (cognizable, पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है), ग़ैर-ज़मानती (non-bailable, ज़मानत अदालत के विवेक पर) है और सत्र न्यायालय में चलता है।

धारा का स्पष्टीकरण उसके पाठ जितना ही अहम है: सरकार के उपायों या कार्रवाइयों पर असहमति जताने वाली टिप्पणियाँ, जो उन्हें क़ानूनी तरीक़ों से बदलवाने के मक़सद से की गई हों, इस धारा के तहत अपराध नहीं हैं, बशर्ते वे ऊपर बताई गतिविधियों को भड़काएँ या भड़काने की कोशिश न करें।

क्या बदला, और क्या नहीं

तीन चीज़ें बदलीं। निशाना "सरकार" से हटकर देश की संप्रभुता और एकता हो गया। "असंतोष" शब्द चला गया। और अब धारा में कृत्य का "जानबूझकर या जानते हुए" किया जाना ज़रूरी है, यानी इरादा या जानकारी साबित करनी होगी।

जो नहीं बदला वह है सज़ा की सख़्ती: आजीवन कारावास अब भी संभव है, और नए शब्द "विध्वंसक गतिविधियाँ" और "अलगाववादी गतिविधियों की भावनाएँ" परिभाषित नहीं हैं। आलोचकों का तर्क है कि इससे पहले जैसे दुरुपयोग की गुंजाइश बनी रहती है; सरकार का पक्ष है कि धारा देश के लिए ख़तरों पर है, असहमति पर नहीं। Tejender Pal Singh v. State of Rajasthan (2024) में राजस्थान हाई कोर्ट ने एक सोशल मीडिया वीडियो पर धारा 152 की FIR रद्द की और कहा कि धारा में जानबूझकर इरादा और शब्दों तथा विद्रोह या अलगाव के वास्तविक ख़तरे के बीच सीधा संबंध ज़रूरी है, और असहमति या आलोचना जताना अपराध नहीं है। धारा 152 की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाएँ सुप्रीम कोर्ट में लंबित हैं, जिसने केंद्र से जवाब माँगा है; अक्टूबर 2026 तक धारा पर रोक नहीं लगी है।

क़दम दर क़दम: धारा 152 में केस दर्ज हो तो

  1. उसी दिन वकील करें। यह गंभीर, ग़ैर-ज़मानती आरोप है। वकील का खर्च न उठा सकें तो 15100 पर कॉल करें या ज़िला अदालत में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण जाएँ।
  2. पोस्ट, वीडियो या भाषण डिलीट न करें। डिलीट करना छिपाने जैसा दिखता है और वह संदर्भ मिटा देता है जो आमतौर पर आपका सबसे अच्छा बचाव है। तारीख़ सहित पूरी प्रति सँभालें।
  3. FIR माँगें। मुफ़्त प्रति आपका हक़ है। ठीक-ठीक पढ़ें कि किन शब्दों या कृत्यों का आरोप है और क्या FIR में इरादे या उकसावे के बारे में कुछ लिखा है।
  4. गिरफ़्तारी के अधिकार इस्तेमाल करें। आपको गिरफ़्तारी के आधार बताने होंगे, आप परिवार के सदस्य या दोस्त को सूचित कर सकते हैं, वकील से सलाह ले सकते हैं, और 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश होना ज़रूरी है। वकील के बिना किसी बयान पर दस्तख़त न करें।
  5. सही सामग्री के साथ ज़मानत माँगें। पूरा भाषण या पोस्ट, उसका संदर्भ, और हिंसा के किसी आह्वान का न होना सत्र न्यायालय के सामने रखें। गिरफ़्तारी न हुई हो तो अग्रिम ज़मानत (anticipatory bail) संभव है।
  6. FIR रद्द कराने पर विचार करें। अगर शब्द अलगाव या विद्रोह के उकसावे के बजाय आलोचना दिखाते हैं, तो वकील Kedar Nath Singh और Tejender Pal Singh का हवाला देकर धारा 528 BNSS या अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट से FIR रद्द करने की माँग कर सकता है।
उदाहरण

किसान-कार्यकर्ता फ़रीदा ने एक रैली में भाषण देकर राज्य सरकार पर किसानों से विश्वासघात का आरोप लगाया और राज्यव्यापी बंद का आह्वान किया। एक हफ़्ते बाद उन्हें पता चला कि धारा 152 BNS में FIR दर्ज हुई है। उन्होंने रैली का वीडियो डिलीट नहीं किया। DLSA के ज़रिए मिले वकील ने FIR की प्रति ली, जिसमें सिर्फ़ सरकार के "विश्वासघात" वाले शब्द थे। उन्होंने पूरे वीडियो की लिखित प्रति के साथ अग्रिम ज़मानत की अर्ज़ी दी, जिसमें शांतिपूर्ण बंद का आह्वान था और अलगाव या सशस्त्र विद्रोह का कोई ज़िक्र नहीं। सत्र न्यायालय ने अंतरिम सुरक्षा दी, और बाद में हाई कोर्ट ने धारा 152 के स्पष्टीकरण और विद्रोह भड़काने के इरादे के अभाव का हवाला देकर FIR रद्द कर दी।

ये तैयार रखें

  • भाषण, पोस्ट या वीडियो की पूरी, तारीख़ वाली प्रति, आसपास के संदर्भ सहित
  • FIR और आप पर तामील किसी भी नोटिस की प्रति
  • मौजूद लोगों के नाम और संपर्क जो बता सकें कि असल में क्या कहा गया
  • ज़मानत के लिए पहचान-पत्र और पते का सबूत
  • वकील या DLSA का संपर्क काग़ज़ पर लिखा हुआ, फ़ोन ज़ब्त होने की स्थिति के लिए
सावधान

सबसे आम ग़लती है घबराकर सब कुछ डिलीट कर देना, या बिना वकील पुलिस को "सफ़ाई देना"। दोनों आपको नुकसान पहुँचा सकते हैं। दूसरी ग़लती यह मानना कि राजद्रोह "ख़त्म" हो गया है तो कड़ी बात में कोई जोखिम नहीं: धारा 152 BNS लागू है और इसमें आजीवन कारावास है, इसलिए WhatsApp फ़ॉरवर्ड नहीं, वकील आपका मार्गदर्शन करे।

कहाँ जाएँ

  • तुरंत मुफ़्त क़ानूनी सहायता: 15100 (NALSA); ज़िला अदालत में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण; nalsa.gov.in।
  • FIR की प्रति: थाना प्रभारी (SHO); मना करे तो पुलिस अधीक्षक या न्यायिक मजिस्ट्रेट।
  • हिरासत में दुर्व्यवहार: पहली पेशी पर मजिस्ट्रेट को बताएँ, और NHRC (hrcnet.nic.in, हेल्पलाइन 14433)।
  • अदालतें: ज़मानत या अग्रिम ज़मानत के लिए सत्र न्यायालय; FIR रद्द कराने के लिए हाई कोर्ट (धारा 528 BNSS, अनुच्छेद 226); अनुच्छेद 32 के तहत सुप्रीम कोर्ट (sci.gov.in)।
  • आपातकाल: 112।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या भारत में राजद्रोह अब भी अपराध है?

इस नाम से नहीं। पुरानी धारा 124A IPC सुप्रीम कोर्ट के 2022 के S.G. Vombatkere आदेश से स्थगित है, और 1 जुलाई 2024 से लागू BNS में राजद्रोह नाम का कोई अपराध नहीं है। लेकिन धारा 152 BNS ऐसे कृत्यों को आजीवन कारावास तक की सज़ा देती है जो अलगाव, सशस्त्र विद्रोह या विध्वंसक गतिविधियों को भड़काएँ या भारत की संप्रभुता और एकता को ख़तरे में डालें, इसलिए इस तरह की बात अब भी गंभीर अपराध है।

क्या सरकार की आलोचना करने पर मुझ पर धारा 152 लग सकती है?

धारा खुद कहती है नहीं: उसका स्पष्टीकरण सरकारी उपायों पर असहमति वाली उन टिप्पणियों को सुरक्षित करता है जो उन्हें क़ानूनी तरीक़ों से बदलवाने के मक़सद से की गई हों। अपराध के लिए ज़रूरी है कि आप जानबूझकर या जानते हुए अलगाव, विद्रोह या विध्वंसक गतिविधि भड़काएँ। सिर्फ़ आलोचना पर FIR दर्ज हो तो हाई कोर्ट उसे रद्द कर सकता है, जैसा राजस्थान हाई कोर्ट ने Tejender Pal Singh (2024) में किया।

क्या धारा 152 BNS ज़मानती है?

नहीं। यह संज्ञेय और ग़ैर-ज़मानती अपराध है जो सत्र न्यायालय में चलता है। ज़मानत अदालत के विवेक पर है, और गिरफ़्तारी से पहले अग्रिम ज़मानत माँगी जा सकती है। अदालतें देखती हैं कि क्या शब्द सचमुच अलगाव या विद्रोह भड़काने का इरादा दिखाते हैं; जहाँ वे सिर्फ़ असहमति दिखाते हैं, वहाँ ज़मानत या FIR रद्द होना आम है।

पुराने राजद्रोह मामलों का क्या हुआ?

2022 में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 124A के सभी लंबित मुक़दमे और अपीलें रोक दी थीं। मई 2026 में उसने स्पष्ट किया कि ऐसी कार्यवाही तब आगे बढ़ सकती है जब अभियुक्त सहमत हो। धारा की वैधता की चुनौती अब भी लंबित है, इसलिए पुराने मामले के अभियुक्त को सहमति देने या इंतज़ार करने पर सलाह लेनी चाहिए।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

क्या यह लेख उपयोगी था?कोई ग़लती दिखी? हमें बताएँ

हर हफ़्ते एक सरल क़ानूनी लेख पाएँ

आपके अधिकारों पर नए लेख, सीधे आपके ईमेल पर। कोई स्पैम नहीं।