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फ़ोटो: Shajankumar, Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0. सांकेतिक चित्र.

मानहानि: क्या गिनी जाती है, बचाव क्या हैं और क्या करें

न्याय पाठशाला8 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

धारा 356 BNS में मानहानि का मतलब, दस बचाव, मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत या दीवानी मुकदमा कैसे करें, समय-सीमा, और नोटिस मिलने पर क्या करें।

क़ानून: अनुच्छेद 19(2), भारत का संविधान · धारा 356 BNS · धारा 222 BNSS · Subramanian Swamy v. Union of India (2016)

संक्षेप में

  • मानहानि (defamation) का मतलब है किसी के बारे में ऐसी झूठी बात कहना, लिखना या पोस्ट करना जो उसे दूसरों की नज़र में गिरा दे। यह अपराध भी है (धारा 356 BNS) और दीवानी ग़लती भी।
  • जनहित में कहा गया सच, सार्वजनिक आचरण पर ईमानदार राय, और सही अधिकारी से नेकनीयती से की गई शिकायत मानहानि नहीं है।
  • पुलिस मानहानि की FIR दर्ज नहीं करती। जिसकी मानहानि हुई है वही मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत (धारा 222 BNSS) या हर्जाने का दीवानी मुकदमा, आम तौर पर एक साल के भीतर, दायर करता है।
  • क़ानूनी नोटिस मिले तो उसे अनदेखा न करें। वकील के ज़रिए जवाब दें, अपने सबूत सँभालें, और ग़लती हुई हो तो सुधार पर विचार करें।

कॉलोनी में अफ़वाह कि आपने रिश्वत ली। व्हाट्सऐप फ़ॉरवर्ड कि फलाँ दुकानदार नकली दवाएँ बेचता है। किसी शिक्षक पर ऐसे दुर्व्यवहार का आरोप लगाती पोस्ट जो कभी हुआ ही नहीं। ऐसे शब्द ज़िंदगी भर में बनी साख मिनटों में मिटा सकते हैं, और ऑनलाइन तो वे और तेज़ फैलते हैं। मानहानि का क़ानून आपके अच्छे नाम की रक्षा करता है। साथ ही यह ईमानदार आलोचना की भी रक्षा करता है, ताकि कोई मुकदमे की धमकी से सच को दबा न सके। यह गाइड दोनों पहलू समझाती है।

मानहानि का मतलब क्या है

धारा 356(1) BNS (पहले IPC की धारा 499 और 500) के तहत मानहानि का मतलब है किसी व्यक्ति के बारे में कोई "लांछन" (imputation, यानी आरोप या इशारा) बनाना या प्रकाशित करना, इस इरादे से कि उसकी साख को नुकसान हो, या यह जानते हुए कि नुकसान होने की संभावना है। यह बोलकर, लिखकर, चित्र बनाकर, वीडियो में या ऑनलाइन पोस्ट करके हो सकता है। लिखी या छपी मानहानि को अक्सर "libel" और बोली गई को "slander" कहते हैं। भारतीय आपराधिक क़ानून दोनों को एक जैसा मानता है।

क़ानून बताता है कि किसकी और कैसे मानहानि हो सकती है:

  • किसी जीवित व्यक्ति, कंपनी, या लोगों के संगठन या समूह की।
  • किसी मृत व्यक्ति की, अगर वह बात उसके जीवित रहते उसकी साख बिगाड़ती और उसका मकसद परिवार की भावनाओं को ठेस पहुँचाना हो।
  • इशारे, व्यंग्य, सवाल या चित्र के ज़रिए, अगर देखने-सुनने वाले मतलब समझ जाते हैं।

कसौटी यह है कि शब्द व्यक्ति को दूसरों की नज़र में कितना गिराते हैं: उसका चरित्र, उसके पेशे या जाति में उसकी हैसियत, या उसकी साख (credit)। यह नहीं कि उसे कितना बुरा लगा। सिर्फ़ बदतमीज़ी मानहानि नहीं है।

मानहानि से दो तरह के मामले बन सकते हैं:

  • आपराधिक मानहानि, धारा 356(2) BNS: दो साल तक की साधारण कैद, या जुर्माना, या दोनों, या सामुदायिक सेवा (community service)। जानते हुए मानहानिकारक सामग्री छापना या बेचना भी अपराध है (धारा 356(3) और (4) BNS)।
  • दीवानी मानहानि: दीवानी अदालत में मुआवज़े, जिसे हर्जाना (damages) कहते हैं, और अक्सर आगे प्रकाशन रोकने के आदेश (injunction) के लिए मुकदमा।

Subramanian Swamy v. Union of India (2016) में सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मानहानि को अनुच्छेद 19(2) के तहत बोलने की आज़ादी पर उचित पाबंदी माना और कहा कि साख का अधिकार अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार का हिस्सा है। मानहानि अपराध रहे या नहीं, इस पर सार्वजनिक बहस जारी है और जजों ने सुनवाइयों में टिप्पणियाँ भी की हैं, लेकिन अक्टूबर 2026 तक क़ानून बदला नहीं है।

दस बचाव: कब यह मानहानि नहीं है

धारा 356 BNS में दस अपवाद (exceptions) हैं। आपकी बात इनमें से किसी में आती है तो वह अपराध नहीं है। आसान भाषा में:

  1. जनहित में सच। सच्ची बात, जिसे छापना जनता के हित में हो। आपराधिक क़ानून में सिर्फ़ सच काफ़ी नहीं; जनहित वाला हिस्सा भी ज़रूरी है।
  2. लोक सेवक। कोई लोक सेवक अपना सरकारी काम कैसे करता है, उस पर ईमानदार राय।
  3. सार्वजनिक सवाल। किसी सार्वजनिक मुद्दे पर किसी के आचरण पर ईमानदार राय, जैसे किसी नेता का रुख़ या किसी बिल्डर का सार्वजनिक प्रोजेक्ट।
  4. अदालती रिपोर्ट। अदालत में जो हुआ उसकी लगभग सही रिपोर्ट।
  5. तय हो चुके मुकदमे पर राय और उसमें पक्षकारों और गवाहों के आचरण पर राय।
  6. समीक्षा। जनता के सामने रखी गई किताब, फ़िल्म, भाषण या किसी रचना पर ईमानदार राय।
  7. अधिकार रखने वाले की फटकार, जैसे नियोक्ता की कर्मचारी को चेतावनी या शिक्षक की छात्र को टिप्पणी, नेकनीयती से।
  8. सही अधिकारी से शिकायत। उस व्यक्ति पर वैध अधिकार रखने वाले से नेकनीयती से किया गया आरोप: पुलिस, नियोक्ता, बार काउंसिल या स्कूल प्रिंसिपल से शिकायत।
  9. अपने हित की रक्षा। अपने या किसी और के हित की रक्षा के लिए, या जनहित में, नेकनीयती से कही गई बात, जैसे बैंक का क्रेडिट एजेंसी को बकाया क़र्ज़ की सूचना देना।
  10. चेतावनी, जो जिसे दी गई उसके या जनता के भले के लिए नेकनीयती से दी गई हो।

"नेकनीयती" (good faith) का क़ानूनी मतलब है। धारा 2(11) BNS के अनुसार जो काम उचित सावधानी और ध्यान के बिना किया गया हो, वह नेकनीयती से किया गया नहीं माना जाता। इसलिए "मैंने तो सिर्फ़ फ़ॉरवर्ड किया" अपने आप बचाव नहीं है। मानहानिकारक बात को दोहराना या फ़ॉरवर्ड करना भी प्रकाशन है, और फ़ॉरवर्ड करने वाला भी ज़िम्मेदार हो सकता है।

सुझावकिसी असली व्यक्ति पर आरोप पोस्ट या फ़ॉरवर्ड करने से पहले दो सवाल पूछें: क्या मैं इसे साबित कर सकता हूँ, और क्या इसे फैलाने से कोई सार्वजनिक मक़सद पूरा होता है? किसी का भी जवाब "नहीं" हो तो शेयर न करें।

व्यवहार में यह कैसे चलता है

मानहानि की FIR नहीं होती। मानहानि असंज्ञेय अपराध (non-cognizable offence, यानी ऐसा अपराध जिसमें पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार नहीं कर सकती और बिना मजिस्ट्रेट के आदेश जाँच नहीं कर सकती) है। धारा 222 BNSS (पहले CrPC की धारा 199) के तहत अदालत मानहानि का मामला सिर्फ़ उसी व्यक्ति की शिकायत पर ले सकती है जिसकी मानहानि हुई है। अगर वह व्यक्ति बच्चा है, मानसिक रूप से अस्वस्थ है, या इतना बीमार है कि शिकायत नहीं कर सकता, तो अदालत की अनुमति से कोई और शिकायत कर सकता है। किसी मंत्री या लोक सेवक के सरकारी काम को लेकर मानहानि हो तो लोक अभियोजक (Public Prosecutor) सत्र न्यायालय में शिकायत दे सकता है, पर सिर्फ़ छह महीने के भीतर।

शिकायत के बाद क्या होता है। मजिस्ट्रेट आपका बयान शपथ पर दर्ज करता है और आपके गवाहों से पूछताछ कर सकता है (धारा 223 BNSS)। BNSS के तहत संज्ञान लेने (cognizance, यानी मामले को औपचारिक रूप से हाथ में लेने) से पहले आरोपी को सुनवाई का मौक़ा देना ज़रूरी है। पर्याप्त आधार मिले तो आरोपी को समन जारी होता है। मामला ज़मानती (bailable) है और आरोपी की आम तौर पर गिरफ़्तारी नहीं होती।

समझौता हो सकता है। मानहानि शमनीय (compoundable) अपराध है, यानी जिसकी मानहानि हुई है वह किसी भी चरण में आरोपी से समझौता कर सकता है, आम तौर पर माफ़ी या सुधार के बाद, और मामला ख़त्म हो जाता है।

दीवानी मुकदमा। आप उस ज़िले की दीवानी अदालत में हर्जाने का मुकदमा कर सकते हैं जहाँ बयान प्रकाशित हुआ या जहाँ आप रहते हैं। परिसीमा अधिनियम (Limitation Act) के तहत libel या slander का मुकदमा प्रकाशन के एक साल के भीतर करना होता है। कोर्ट फ़ीस आपके दावे की रक़म पर निर्भर करती है और राज्य के हिसाब से अलग होती है। हर्जाना इस पर तय होता है कि बात कितनी फैली और आप कितना नुकसान दिखा पाते हैं। अदालत सामग्री हटाने का आदेश (injunction) भी दे सकती है, पर मुकदमे से पहले ईमानदार रिपोर्टिंग पर रोक लगाने में अदालतें सावधानी बरतती हैं।

क़दम दर क़दम: अगर आपकी मानहानि हुई है

  1. सबूत सुरक्षित करें। ऐसे स्क्रीनशॉट लें जिनमें तारीख़, समय, अकाउंट का नाम और लिंक दिखे। मूल संदेश सेव करें। बोली गई बात हो तो उसी दिन लिख लें कि किसने, कहाँ, क्या कहा और किसने सुना।
  2. क़ानूनी नोटिस भेजें। वकील का नोटिस, जिसमें तय समय में बात वापस लेने, माफ़ी और हटाने की माँग हो, कई विवाद अदालत के बिना निपटा देता है। डिलीवरी का सबूत रखें।
  3. ऑनलाइन पोस्ट की शिकायत प्लेटफ़ॉर्म के शिकायत अधिकारी (grievance officer) से करें। साफ़ तौर पर ग़ैरक़ानूनी सामग्री प्लेटफ़ॉर्म हटा सकता है, हालाँकि सिर्फ़ मानहानि के दावे पर ज़्यादातर प्लेटफ़ॉर्म अदालत के आदेश का इंतज़ार करते हैं।
  4. आपराधिक शिकायत दायर करें इलाक़े के न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने, सबूत और गवाहों की सूची के साथ। धारा 514 BNSS के तहत तीन साल तक की सज़ा वाले अपराध की शिकायत तीन साल के भीतर दायर करनी होती है।
  5. या दीवानी मुकदमा करें हर्जाने और injunction के लिए, एक साल के भीतर। दोनों कर सकते हैं, पर ख़र्च और समय सोचें; बहुत लोग एक ही रास्ता चुनते हैं।
  6. मदद लें। वकील का ख़र्च न उठा सकें तो 15100 (NALSA) पर कॉल करें या ज़िला अदालत में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) जाएँ।
उदाहरण

रेखा एक छोटा ट्यूशन सेंटर चलाती हैं। फ़ीस को लेकर नाराज़ एक अभिभावक मोहल्ले के तीन व्हाट्सऐप ग्रुपों में लिखता है कि रेखा "बच्चों को मारती है" और "उस पर पुलिस केस है"। दोनों बातें झूठी हैं। रेखा तारीख़ सहित स्क्रीनशॉट लेती हैं, ग्रुप के दो सदस्यों से पुष्टि करवाती हैं कि उन्होंने पोस्ट देखी, और वकील से सात दिन में बात वापस लेने का नोटिस भिजवाती हैं। अभिभावक मना कर देता है। रेखा न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने धारा 356 BNS में स्क्रीनशॉट और गवाहों की सूची के साथ शिकायत दायर करती हैं। समन के बाद अभिभावक उन्हीं ग्रुपों में लिखित माफ़ी देता है। रेखा मान जाती हैं और मामला समझौते से ख़त्म हो जाता है।

अगर आप पर मानहानि का आरोप है

  • नोटिस को अनदेखा न करें। दिए गए समय में वकील के ज़रिए जवाब दें, और ग़ुस्से में जवाब या नए आरोप पोस्ट न करें।
  • अपने सबूत जुटाएँ: ऐसे दस्तावेज़ जो दिखाएँ कि बात सच थी, साफ़ तौर पर राय थी, या आपने सिर्फ़ सही अधिकारी से शिकायत की थी।
  • असली ग़लती तुरंत सुधारें। जल्दी और खुलकर किया गया सुधार या माफ़ी अक्सर मामला ख़त्म कर देती है और हर्जाना घटाती है।
  • अदालत का समन मिले तो तारीख़ पर हाज़िर हों। मानहानि ज़मानती है; शिकायत में अपराध न बनता हो तो आपका वकील आरोपमुक्ति (discharge) माँग सकता है।

ये तैयार रखें

  • तारीख़, समय, अकाउंट नाम और URL वाले स्क्रीनशॉट; तारीख़ के साथ आपके दस्तख़त वाला प्रिंटआउट।
  • मूल संदेश, ईमेल या रिकॉर्डिंग, दो जगह सेव की हुई।
  • जिन्होंने बात देखी या सुनी, उनके नाम और फ़ोन नंबर।
  • नुकसान का सबूत: गए हुए ऑर्डर, रद्द अनुबंध, तबादला, तनाव के मेडिकल रिकॉर्ड।
  • भेजे या मिले क़ानूनी नोटिस की प्रति, डाक या कूरियर की रसीद के साथ।
  • आपका पहचान-पत्र और, दीवानी मुकदमे के लिए, हर्जाने की रक़म और उसका आधार।
सावधान

बहुत लोग मानहानि की FIR कराने थाने जाते हैं और लौटा दिए जाते हैं। यह लापरवाही नहीं, सही क़ानून है: मानहानि के लिए मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत चाहिए। साथ ही, आपराधिक मामले में "बात सच है" पूरा बचाव नहीं है, जब तक उसे छापना जनहित में न हो।

कहाँ जाएँ

  • न्यायिक मजिस्ट्रेट की अदालत (आपराधिक शिकायत) या आपके ज़िले की दीवानी अदालत (हर्जाने का मुकदमा)।
  • ऑनलाइन पोस्ट के लिए प्लेटफ़ॉर्म का शिकायत अधिकारी; जवाब न मिले तो gac.gov.in पर शिकायत अपीलीय समिति (Grievance Appellate Committee) में अपील।
  • मानहानि के साथ धमकी या उत्पीड़न हो तो: cybercrime.gov.in या हेल्पलाइन 1930; महिलाएँ 181; आपातकाल 112।
  • मुफ़्त क़ानूनी सहायता: NALSA हेल्पलाइन 15100 या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

क्या मैं मानहानि की FIR करा सकता हूँ?

नहीं। मानहानि असंज्ञेय अपराध है, इसलिए पुलिस सिर्फ़ इसके लिए FIR दर्ज नहीं करती। धारा 222 BNSS के तहत जिसकी मानहानि हुई है उसे मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दायर करनी होती है। अगर उसी पोस्ट में धमकी, पीछा करना (stalking) या यौन उत्पीड़न भी है, तो उन अपराधों की शिकायत पुलिस या cybercrime.gov.in पर की जा सकती है।

अगर मेरी कही बात सच है तो क्या वह मानहानि है?

दीवानी मुकदमे में सच पूरा बचाव है। धारा 356 BNS के आपराधिक मामले में पहला अपवाद सच्ची बात को तभी बचाता है जब उसे छापना जनहित में हो। ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी उजागर करना जनहित है; किसी को शर्मिंदा करने के लिए उसकी निजी मेडिकल बात फैलाना आम तौर पर नहीं।

कार्रवाई के लिए मेरे पास कितना समय है?

परिसीमा अधिनियम के तहत हर्जाने का दीवानी मुकदमा प्रकाशन के एक साल के भीतर करना होता है। धारा 356 BNS की आपराधिक शिकायत धारा 514 BNSS के तहत तीन साल के भीतर दायर होनी चाहिए। हर दोबारा पोस्ट नई अवधि शुरू कर सकती है, पर इस पर भरोसा न करें। सबूत ताज़ा रहते जल्दी क़दम उठाएँ।

आपराधिक मानहानि में क्या सज़ा है?

धारा 356(2) BNS में दो साल तक की साधारण कैद, या जुर्माना, या दोनों, या सामुदायिक सेवा का प्रावधान है। व्यवहार में अदालतें पहली बार के आरोपी को कम ही जेल भेजती हैं, और कई मामले माफ़ी और समझौते से ख़त्म होते हैं। असली क़ीमत आम तौर पर वकील का ख़र्च और सालों की तारीख़ें होती हैं।

जो संदेश मैंने लिखा नहीं, सिर्फ़ फ़ॉरवर्ड किया, उसके लिए क्या मैं ज़िम्मेदार हूँ?

हाँ। फ़ॉरवर्ड करना भी प्रकाशन है। संदेश मानहानिकारक हो और आपने बिना जाँचे फ़ॉरवर्ड किया हो, तो आपको भी पक्षकार बनाया जा सकता है। अपवाद नेकनीयती की रक्षा करते हैं, जिसका मतलब है उचित सावधानी, इसलिए फ़ॉरवर्ड से पहले जाँच सिर्फ़ नैतिक नहीं, क़ानूनी रूप से भी मायने रखती है।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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