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A golden statue of Justice holding scales against a blue skyस्वाधीनता

फ़ोटो: James Cridland, Wikimedia Commons, CC BY 2.0. सांकेतिक चित्र.

भारत में अपराध पीड़ितों के अधिकार: व्यावहारिक गाइड

न्याय पाठशाला7 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

FIR की मुफ़्त कॉपी, ज़ीरो FIR, 90 दिन में जानकारी, अपना वकील, DLSA से मुआवज़ा, मुफ़्त इलाज, केस वापसी से पहले सुनवाई, और बरी होने पर अपील का हक़।

क़ानून: धारा 2(1)(y), 18(8), 173, 193, 230, 360, 396, 397 और 413 BNSS · धारा 72 BNS · अनुच्छेद 21, भारत का संविधान

संक्षेप में

  • संज्ञेय अपराध (cognizable offence, जिसमें पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है) की रिपोर्ट आप किसी भी थाने में कर सकते हैं, और आपको तुरंत FIR की मुफ़्त कॉपी मिलनी चाहिए (धारा 173 BNSS)।
  • पुलिस को 90 दिन के भीतर आपको जाँच की प्रगति बतानी होगी (धारा 193(3) BNSS)।
  • आप ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण के ज़रिए राज्य से मुआवज़ा माँग सकते हैं, भले ही आरोपी बरी हो जाए या कभी पकड़ा ही न जाए (धारा 396 BNSS)।
  • आप अभियोजक की मदद के लिए अपना वकील रख सकते हैं, और केस वापस लेने से पहले अदालत को आपको सुनना होगा।
  • आरोपी बरी हो तो आप ख़ुद अपील कर सकते हैं (धारा 413 BNSS)। मुफ़्त क़ानूनी सहायता: 15100।

लंबे समय तक भारत में आपराधिक मामला राज्य और आरोपी के बीच की लड़ाई था। जिसे सचमुच चोट पहुँची, वह अक्सर बस एक और गवाह बनकर रह जाता था, अदालत के बाहर इंतज़ार करता, बिना यह जाने कि उसके अपने मामले में क्या हो रहा है। 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) लगभग हर चरण पर पीड़ितों को साफ़ अधिकार देती है। आपके या आपके परिवार के साथ कोई अपराध हुआ है, तो ये अधिकार आपके हैं।

पीड़ित किसे माना जाता है

धारा 2(1)(y) BNSS पीड़ित उसे कहती है जिसे आरोपी के किसी काम या चूक से कोई नुकसान या चोट पहुँची हो, और इसमें पीड़ित का अभिभावक या क़ानूनी वारिस शामिल है। इसलिए अगर व्यक्ति की मौत हो गई है या वह ख़ुद कुछ नहीं कर सकता, तो उसके माता-पिता, पति/पत्नी या बच्चे ये अधिकार इस्तेमाल कर सकते हैं।

अपराध की रिपोर्ट करते समय के अधिकार

  • कहीं भी रिपोर्ट करें ("ज़ीरो FIR")। धारा 173(1) BNSS के तहत आप संज्ञेय अपराध की जानकारी किसी भी थाने में दे सकते हैं, अपराध चाहे जिस इलाक़े में हुआ हो। उस थाने को इसे दर्ज करके सही थाने को भेजना होगा। आप इलेक्ट्रॉनिक रूप से (ईमेल या राज्य पुलिस पोर्टल पर) भी रिपोर्ट कर सकते हैं, लेकिन तीन दिन के भीतर उस पर दस्तख़त करने होंगे।
  • FIR की मुफ़्त कॉपी। धारा 173(2) BNSS कहती है कि सूचना देने वाले या पीड़ित को कॉपी तुरंत, मुफ़्त दी जाए। पुलिस दर्ज करने से मना करे तो शिकायत लिखित में पुलिस अधीक्षक को भेजें, और वह भी न हो तो मजिस्ट्रेट को अर्ज़ी दें (धारा 173(4) BNSS)।
  • मुफ़्त इलाज। धारा 397 BNSS के तहत हर अस्पताल को, सरकारी हो या निजी, एसिड हमले, बलात्कार और कुछ अन्य यौन अपराधों के पीड़ितों को तुरंत मुफ़्त प्राथमिक उपचार या इलाज देना होगा और पुलिस को सूचित करना होगा। मना करने वाला अस्पताल अपराध करता है।

जाँच और मुक़दमे के दौरान के अधिकार

  • प्रगति की जानकारी। धारा 193(3) BNSS पुलिस से कहती है कि वह 90 दिन के भीतर सूचना देने वाले या पीड़ित को जाँच की प्रगति बताए, SMS, ईमेल या फ़ोन से भी।
  • चार्जशीट की कॉपी। धारा 230 BNSS के तहत, आपका वकील हो तो मजिस्ट्रेट को आरोपी की पहली पेशी के 14 दिन के भीतर आपको पुलिस रिपोर्ट, FIR, गवाहों के बयान और दस्तावेज़ों की मुफ़्त कॉपी देनी होगी।
  • अपना वकील। मुक़दमा लोक अभियोजक (Public Prosecutor) चलाता है, लेकिन धारा 18(8) BNSS के तहत अदालत आपको अभियोजन की मदद के लिए वकील रखने की इजाज़त दे सकती है। आपका वकील सवाल सुझा सकता है और लिखित दलीलें दे सकता है।
  • केस वापसी से पहले सुनवाई। अभियोजक केस वापस लेना चाहे, तो धारा 360 BNSS का परंतुक कहता है कि पीड़ित को सुने जाने का मौक़ा दिए बिना कोई अदालत इसकी इजाज़त नहीं देगी।
  • निजता। बलात्कार और कुछ अन्य यौन अपराधों की पीड़िता का नाम या पहचान छापना या प्रकाशित करना धारा 72 BNS (पहले धारा 228A IPC) के तहत ख़ुद अपराध है। ऐसे मामलों की सुनवाई बंद कमरे में (in camera) होती है।
  • सुरक्षा। धमकी मिले तो आप राज्य की गवाह संरक्षण योजना के तहत सुरक्षा माँग सकते हैं (धारा 398 BNSS); गवाह सुरक्षा पर हमारा लेख देखें।

मुआवज़ा

दो रास्ते हैं। पहला, दोषी ठहराने वाली अदालत आरोपी को जुर्माने में से या अलग से मुआवज़ा देने का आदेश दे सकती है (धारा 395 BNSS)। दूसरा, और आरोपी के ग़रीब, बरी या लापता होने पर ज़्यादा अहम, हर राज्य में धारा 396 BNSS के तहत पीड़ित मुआवज़ा योजना है, जिसे राज्य पैसा देता है और विधिक सेवा प्राधिकरण चलाते हैं।

  • ट्रायल कोर्ट मुआवज़े की सिफ़ारिश कर सकता है जब आरोपी से दिलाई रक़म नाकाफ़ी हो, या आरोपी बरी या डिस्चार्ज हो जाए (धारा 396(3) BNSS)।
  • अपराधी का पता न चले या पहचान न हो लेकिन आप पहचाने गए हों, तो आप मुक़दमे का इंतज़ार किए बिना सीधे ज़िला या राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण को अर्ज़ी दे सकते हैं (धारा 396(4) BNSS)।
  • प्राधिकरण को दो महीने के भीतर जाँच पूरी करके मुआवज़ा देना होगा (धारा 396(5) BNSS), और वह पुलिस या मजिस्ट्रेट के प्रमाणपत्र पर मुफ़्त इलाज जैसी अंतरिम राहत दे सकता है (धारा 396(6) BNSS)।

रक़म हर राज्य की योजना तय करती है और अपराध के हिसाब से अलग है। DLSA के फ़ॉर्म पर FIR, मेडिकल काग़ज़ और पहचान पत्र के साथ अर्ज़ी दें।

अपील का अधिकार

पहले बरी होने के ख़िलाफ़ सिर्फ़ राज्य अपील कर सकता था। अब धारा 413 BNSS (पहले धारा 372 CrPC) के परंतुक के तहत पीड़ित अपील कर सकता है अगर अदालत आरोपी को बरी करे, कम अपराध में दोषी ठहराए, या नाकाफ़ी मुआवज़ा दे। Mallikarjun Kodagali v. State of Karnataka (2018) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसी अपील के लिए पीड़ित को अदालत की विशेष अनुमति (special leave) की ज़रूरत नहीं। अपील की समय-सीमाएँ सख़्त हैं, इसलिए फ़ैसले के कुछ दिनों के भीतर वकील से मिलें।

क़दम दर क़दम

  1. आपात स्थिति में 112 पर कॉल करें। महिलाएँ 181, बच्चे 1098, और ऑनलाइन ठगी के लिए 1930।
  2. किसी भी थाने में FIR दर्ज कराएँ और मुफ़्त कॉपी लें। FIR नंबर और जाँच अधिकारी का नाम व नंबर नोट करें।
  3. एक फ़ाइल बनाएँ: FIR, मेडिकल काग़ज़ (मेडिको-लीगल सर्टिफ़िकेट माँगें), तस्वीरें, चैट और पुलिस से हर संपर्क का तारीख़ सहित नोट।
  4. 90वें दिन जानकारी न मिली हो तो लिखित में माँगें; कॉपी पुलिस अधीक्षक को भेजें।
  5. DLSA जाएँ (ज़िला अदालत परिसर) या 15100 पर कॉल करें: अभियोजन की मदद के लिए मुफ़्त वकील, मुआवज़े की अर्ज़ी, और धमकी मिलने पर गवाह सुरक्षा के लिए।
  6. फ़ैसले के बाद उसी हफ़्ते वकील से पूछें कि धारा 413 के तहत अपील करनी है या नहीं।
उदाहरण

भोपाल में 40 साल की फ़रीदा हिट-एंड-रन में बुरी तरह घायल हो जाती हैं; ड्राइवर का कभी पता नहीं चलता। पुलिस FIR दर्ज करके मुफ़्त कॉपी देती है। अस्पताल में एक पैरा-लीगल वॉलंटियर बताती है कि उन्हें ऐसे मुक़दमे का इंतज़ार नहीं करना जो शायद कभी हो ही नहीं: धारा 396(4) BNSS के तहत वह सीधे ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण को अर्ज़ी दे सकती हैं। वह DLSA का फ़ॉर्म FIR, डिस्चार्ज समरी और बिलों के साथ भरती हैं। प्राधिकरण कुछ हफ़्तों में अंतरिम मेडिकल राहत का आदेश देता है और दो महीने के भीतर राज्य योजना के तहत मुआवज़ा देता है। अलग से, वह मोटर वाहन हिट-एंड-रन कोष से भी दावा करती हैं।

ये तैयार रखें

  • FIR की मुफ़्त कॉपी, नंबर, तारीख़ और थाने के साथ
  • मेडिको-लीगल सर्टिफ़िकेट, डिस्चार्ज समरी और बिल
  • तस्वीरें, चैट, कॉल रिकॉर्ड और गवाहों के नाम
  • पुलिस के हर दौरे या कॉल का तारीख़ सहित नोट, और भेजे पत्रों की कॉपी
  • आधार या अन्य पहचान पत्र, बैंक विवरण (मुआवज़े के लिए), और DLSA का आवेदन फ़ॉर्म
सावधान

यह न मानें कि लोक अभियोजक आपको जानकारी देता रहेगा; अभियोजक सैकड़ों मामले देखते हैं। eCourts पर केस ट्रैक करें, अहम तारीख़ों पर हाज़िर रहें, और अभियोजन की मदद के लिए धारा 18(8) के तहत वकील रखने पर विचार करें। साथ ही, गंभीर ग़ैर-समझौता योग्य (non-compoundable) अपराध को निजी तौर पर पैसे लेकर कभी न निपटाएँ; ऐसे "समझौते" अदालत पर बाध्यकारी नहीं होते और आप पर दबाव का रास्ता खोलते हैं।

कहाँ जाएँ

  • ज़ीरो FIR के लिए कोई भी थाना; दर्ज करने से मना हो तो पुलिस अधीक्षक, फिर मजिस्ट्रेट
  • ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (ज़िला अदालत परिसर) या NALSA हेल्पलाइन 15100: मुफ़्त वकील, मुआवज़ा, गवाह सुरक्षा
  • धारा 413 BNSS के तहत अपील के लिए सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट
  • 112 आपात; 181 महिलाएँ; 1098 बच्चे; 1930 साइबर ठगी; ऑनलाइन अपराधों के लिए cybercrime.gov.in

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

आरोपी बरी हो जाए या कभी पकड़ा न जाए, तो क्या मुआवज़ा मिल सकता है?

हाँ। धारा 396 BNSS के तहत ट्रायल कोर्ट बरी या डिस्चार्ज होने पर भी मुआवज़े की सिफ़ारिश कर सकता है, और अपराधी का पता न चले तो आप सीधे ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण को अर्ज़ी दे सकते हैं। प्राधिकरण को दो महीने में फ़ैसला करना होगा और वह मुफ़्त इलाज जैसी अंतरिम राहत दे सकता है। रक़म आपके राज्य की योजना पर निर्भर है।

क्या पीड़ित आपराधिक मामले में निजी वकील रख सकता है?

हाँ। मुक़दमा लोक अभियोजक चलाता है, लेकिन धारा 18(8) BNSS के तहत अदालत आपको अभियोजन की मदद के लिए अपनी पसंद का वकील रखने की इजाज़त दे सकती है। पैसे न हों तो ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण मुफ़्त वकील देता है; 15100 पर कॉल करें।

पुलिस मुझे मेरे मामले की जानकारी न दे तो क्या करूँ?

धारा 193(3) BNSS पुलिस से कहती है कि वह 90 दिन के भीतर पीड़ित या सूचना देने वाले को जाँच की प्रगति बताए। इस धारा का हवाला देकर जाँच अधिकारी को, फिर पुलिस अधीक्षक को लिखें। चार्जशीट दाख़िल होने के बाद eCourts पर केस देख सकते हैं, और वकील के ज़रिए धारा 230 BNSS के तहत कॉपी माँग सकते हैं।

आरोपी बरी हो जाए तो क्या पीड़ित अपील कर सकता है?

हाँ। धारा 413 BNSS का परंतुक पीड़ित को बरी होने, कम अपराध में दोषसिद्धि या नाकाफ़ी मुआवज़े के ख़िलाफ़ अपील का अधिकार देता है, और Mallikarjun Kodagali (2018) में कहा गया कि इसके लिए विशेष अनुमति की ज़रूरत नहीं। समय-सीमाएँ सख़्त हैं, इसलिए फ़ैसले के तुरंत बाद वकील से मिलें।

क्या अभियोजक मुझसे पूछे बिना मेरा केस वापस ले सकता है?

नहीं। धारा 360 BNSS के परंतुक के तहत अदालत पीड़ित को सुने जाने का मौक़ा दिए बिना अभियोजन वापस लेने की इजाज़त नहीं दे सकती। वापसी की अर्ज़ी का पता चले तो वकील या DLSA के ज़रिए लिखित आपत्ति दाख़िल करें।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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