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A State Bank of India branch in Nagpurश्रम

फ़ोटो: Ganesh Dhamodkar, Wikimedia Commons, CC BY 4.0. सांकेतिक चित्र.

चेक बाउंस हुआ? धारा 138 की समय-सीमा और क्या करें

न्याय पाठशाला7 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

नोटिस के लिए 30 दिन, भुगतान के लिए 15 दिन, शिकायत के लिए एक महीना: धारा 138 की पूरी समय-सारिणी, अंतरिम मुआवज़ा, और चेक देने वाले के लिए रास्ते।

क़ानून: धाराएँ 138, 139, 142, 143A, 147, 148 · परक्राम्य लिखत अधिनियम (Negotiable Instruments Act), 1881

संक्षेप में

  • "अपर्याप्त राशि" (insufficient funds) या "व्यवस्था से अधिक" पर लौटा चेक, अगर असली क़र्ज़ चुकाने के लिए दिया गया था, तो आपराधिक अपराध है धारा 138 NI एक्ट।
  • घड़ी सख़्त है: बैंक के रिटर्न मेमो के 30 दिन के अंदर लिखित माँग नोटिस भेजें; नोटिस मिलने के बाद चेक देने वाले के पास भुगतान के लिए 15 दिन; उसके बाद एक महीने में शिकायत दर्ज करें धारा 142 NI एक्ट।
  • केस चलते हुए अदालत चेक राशि का 20% तक अंतरिम मुआवज़ा दिलवा सकती है धारा 143A NI एक्ट।
  • अगर चेक आपने दिया था: नोटिस के 15 दिन में भुगतान करने से मामला वहीं ख़त्म। बचाव के सबूत से पहले भुगतान करने पर बिना अतिरिक्त ख़र्च समझौता।

किरायेदार का किराये का चेक, दोस्त का क़र्ज़ लौटाने का चेक, ग्राहक का माल का भुगतान: बैंक से पर्ची के साथ लौट आता है, "Funds insufficient"। लोग आमतौर पर दो बातें खोजते हैं: "क्या केस हो सकता है?" और "कितने दिन हैं?"। यह लेख दोनों का जवाब देता है, चेक रखने वाले के लिए भी और चेक देने वाले के लिए भी।

बाउंस चेक अपराध कब बनता है

धारा 138, परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 के तहत चेक जारी करने वाला (आहर्ता, drawer) तब अपराध करता है जब ये सब सच हों:

  • चेक किसी क़ानूनन वसूली योग्य क़र्ज़ या देनदारी (उधार, किराया, माल की क़ीमत, समझौते की रक़म) के लिए दिया गया था, तोहफ़े के रूप में नहीं;
  • चेक अपनी वैधता, यानी उस पर लिखी तारीख़ से तीन महीने के अंदर बैंक में लगाया गया;
  • बैंक ने उसे इसलिए लौटाया कि खाते में पैसा कम था या राशि व्यवस्था से ज़्यादा थी। पैसे की कमी होने पर अदालतों ने "खाता बंद" और "भुगतान रोका गया" को भी इसमें माना है;
  • आपने (आदाता, payee) समय पर लिखित माँग नोटिस भेजा, और नोटिस मिलने के 15 दिन में भुगतान नहीं हुआ।

सज़ा: दो साल तक की क़ैद, या चेक राशि के दोगुने तक जुर्माना, या दोनों। व्यवहार में अदालतें आपको पैसा दिलाने पर ध्यान देती हैं।

क़ानून मानकर चलता है कि चेक क़र्ज़ के लिए दिया गया था धारा 139 NI एक्ट। उलटा साबित करना चेक देने वाले का काम है। संजाबिज तारी बनाम किशोर एस. बोरकर (2025) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ₹20,000 से ज़्यादा का नक़द क़र्ज़ भी धारा 138 के लिए "क़ानूनन वसूली योग्य क़र्ज़" है, भले ही नक़द लेना आयकर क़ानून के नियम के ख़िलाफ़ था।

वह समय-सारिणी जो छूटनी नहीं चाहिए

  1. दिन 0: रिटर्न मेमो। आपका बैंक चेक को कारण लिखे रिटर्न मेमो के साथ लौटाता है। असली चेक और मेमो संभालकर रखें। चेक देने वाला कहे तो तीन महीने की वैधता के अंदर चेक दोबारा लगा सकते हैं।
  2. 30 दिन के अंदर: माँग नोटिस। बैंक की सूचना मिलने के 30 दिन के अंदर चेक देने वाले को चेक राशि माँगते हुए लिखित नोटिस भेजें। रजिस्टर्ड डाक या स्पीड पोस्ट से, पावती के साथ, और हो सके तो ईमेल या व्हाट्सऐप पर भी।
  3. भुगतान के लिए 15 दिन। नोटिस मिलने से 15 दिन। भुगतान हो गया तो कोई अपराध नहीं। सही पते पर "इनकार" या "दावा नहीं किया" लिखकर लौटा नोटिस आमतौर पर पहुँचा हुआ माना जाता है।
  4. एक महीने के अंदर: शिकायत। 15 दिन बिना भुगतान बीत जाएँ तो अपराध पूरा। एक महीने में न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दर्ज करें धारा 142(1) NI एक्ट। देर से शिकायत तभी मानी जाती है जब आप देरी का पर्याप्त कारण दिखाएँ।
  5. कौन-सी अदालत? अगर आपने चेक वसूली के लिए अपने खाते में जमा किया था, तो केस आपकी बैंक शाखा के इलाक़े की अदालत में होगा धारा 142(2) NI एक्ट, चेक देने वाले के घर के इलाक़े में नहीं।
सुझावकैलेंडर पर दिन गिनिए और फ़ाइल के कवर पर तारीख़ें लिख लीजिए: मेमो मिला, नोटिस भेजा, नोटिस पहुँचा, 15 दिन पूरे, शिकायत की आख़िरी तारीख़। 30 दिन की नोटिस सीमा चूकना असली मामलों के हारने की सबसे आम वजह है।

नोटिस में क्या लिखें

छोटा और सटीक रखें: चेक नंबर, तारीख़, राशि और बैंक; लौटने की तारीख़ और मेमो में लिखा कारण; किस क़र्ज़ के लिए चेक दिया गया; और नोटिस मिलने के 15 दिन में चेक राशि चुकाने की साफ़ माँग। चेक राशि के साथ भारी ब्याज जैसी अलग रक़म बिना साफ़ अलग किए न माँगें; उलझी हुई माँग नोटिस को कमज़ोर कर सकती है।

अदालत में क्या होता है

  • संक्षिप्त सुनवाई (summary trial)। ये मामले छोटी प्रक्रिया से चलते हैं। आपकी शिकायत हलफ़नामे (affidavit) के साथ होती है और अदालत समन जारी करती है।
  • शुरुआत में ही भुगतान। संजाबिज तारी (2025) के बाद समन में अभियुक्त को बताया जाना है कि वह पहले ही चरण में चेक राशि चुका सकता है, ऑनलाइन लिंक से भी, और फिर केस बंद हो सकता है।
  • अंतरिम मुआवज़ा। अदालत चेक देने वाले को 60 दिन (30 दिन और बढ़ सकते हैं) में चेक राशि का 20% तक देने का आदेश दे सकती है। बाद में वह बरी हो जाए तो आपको यह राशि ब्याज सहित लौटानी होगी धारा 143A NI एक्ट।
  • अपील में जमा। सज़ा पाया व्यक्ति अपील करे तो अपील अदालत जुर्माने या मुआवज़े का कम से कम 20% जमा करवा सकती है धारा 148 NI एक्ट।
  • कभी भी समझौता। यह अपराध शमनीय (compoundable, यानी पक्ष आपस में समझौता कर केस ख़त्म कर सकते हैं) है धारा 147 NI एक्ट। 2025 के दिशानिर्देशों के अनुसार बचाव के सबूत से पहले समझौते पर कोई अतिरिक्त ख़र्च नहीं; उसके बाद ट्रायल कोर्ट में चेक राशि का 5%, सेशन कोर्ट या हाई कोर्ट में 7.5% और सुप्रीम कोर्ट में 10% ख़र्च जुड़ता है।

अगर चेक आपने दिया था

नोटिस को नज़रअंदाज़ न करें। अगर पैसा देना है तो 15 दिन में चुकाएँ और लिखित रसीद लें; तब अपराध बनता ही नहीं। अगर पैसा नहीं देना है, तो 15 दिन के अंदर लिखित जवाब दें और कारण बताएँ: क़र्ज़ पहले ही चुका दिया, ख़ाली सिक्योरिटी चेक का ग़लत इस्तेमाल हुआ, राशि ग़लत भरी गई, या कोई क़र्ज़ था ही नहीं। सबूत रखें। मुक़दमे में आप सबूतों से धारा 139 की धारणा को काट सकते हैं, पर शुरुआती जवाब मायने रखता है।

केस दर्ज होने के बाद हर तारीख़ पर हाज़िर रहें। ग़ैरहाज़िरी पर वारंट जारी हो सकता है। किस्तों में समझौता चाहें तो अदालत से मामला मध्यस्थता या लोक अदालत भेजने को कहें।

उदाहरण

मीना ने पड़ोसी को ₹1,50,000 उधार दिए। पड़ोसी ने 2 मार्च का चेक दिया, जो 5 मार्च को "Funds insufficient" लिखकर लौट आया। मीना ने 20 मार्च को स्पीड पोस्ट से नोटिस भेजा और ट्रैकिंग पेज सँभाल लिया; नोटिस 23 मार्च को पहुँचा। 7 अप्रैल तक पड़ोसी ने न पैसा दिया न जवाब। मीना ने 25 अप्रैल को अपनी बैंक शाखा के इलाक़े की मजिस्ट्रेट अदालत में शिकायत दर्ज की, जो एक महीने के अंदर थी। पहली सुनवाई में अदालत ने 20% अंतरिम मुआवज़े का आदेश दिया, और पड़ोसी ने सबूत से पहले ही समझौता कर लिया।

ये तैयार रखें

  • बाउंस हुआ असली चेक और बैंक का रिटर्न मेमो।
  • माँग नोटिस की कॉपी, डाक रसीद, ट्रैकिंग प्रिंटआउट और पावती कार्ड या लौटा लिफ़ाफ़ा।
  • क़र्ज़ का सबूत: उधार का क़रार, बैंक ट्रांसफ़र रिकॉर्ड, बिल, रक़म मानने वाले मैसेज।
  • आपकी पहचान और बैंक खाते का विवरण; हलफ़नामा, जो आपका वकील बनाएगा।
सावधान

दस्तख़त किया ख़ाली चेक "सिक्योरिटी" के रूप में बिना साथ के पत्र में मक़सद और सीमा लिखे न दें, और उस पत्र की कॉपी रखें। ख़ाली चेक में कोई भी राशि भरी जा सकती है, और जब तक आप उलटा साबित न करें, क़ानून क़र्ज़ मानकर चलेगा।

कहाँ जाएँ

  • पहले: अपना बैंक, रिटर्न मेमो के लिए; फिर चेक देने वाले को लिखित माँग नोटिस।
  • फिर: आपकी बैंक शाखा के इलाक़े की न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत, 15 दिन पूरे होने के एक महीने के अंदर।
  • समझौते के लिए: अदालत का मध्यस्थता केंद्र या अगली लोक अदालत; ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण से पूछें।
  • मुफ़्त वकील: 15100 या nalsa.gov.in।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

चेक बाउंस का नोटिस भेजने के लिए कितने दिन हैं?

बैंक से चेक बिना भुगतान लौटने की सूचना मिलने के दिन से तीस दिन (धारा 138 NI एक्ट)। नोटिस मिलने के बाद चेक देने वाले के पास भुगतान के लिए 15 दिन हैं। भुगतान न हो तो आपको एक महीने के अंदर शिकायत दर्ज करनी होगी।

क्या समय-सीमा के बाद चेक बाउंस केस हो सकता है?

देर से शिकायत तभी मानी जाती है जब अदालत देरी का पर्याप्त कारण स्वीकार करे (धारा 142 NI एक्ट)। देर से भेजा नोटिस बचाना कहीं ज़्यादा मुश्किल है। नोटिस की सीमा चूक गई हो तो भी क़र्ज़ की वसूली के लिए सिविल मुक़दमे में चेक काम आ सकता है।

क्या चेक बाउंस पर जेल हो सकती है?

क़ानून में दो साल तक की क़ैद, चेक राशि के दोगुने तक जुर्माना, या दोनों हैं। ज़्यादातर मामले भुगतान या समझौते पर ख़त्म होते हैं। नोटिस के 15 दिन में चेक राशि चुका देने से अपराध बनता ही नहीं।

क्या सिक्योरिटी चेक पर भी धारा 138 लागू होती है?

हाँ, अगर चेक लगाए जाने के समय सचमुच क़र्ज़ बकाया था। अगर तब तक क़र्ज़ बना ही नहीं था, या चुका दिया गया था, तो चेक देने वाला सबूत के साथ यह बचाव ले सकता है।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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