स्वच्छ पर्यावरण का अधिकार: शिकायत और एनजीटी
साफ़ हवा-पानी का आपका हक़, प्रदूषण और शोर की स्थानीय शिकायत कैसे करें, और कोई भी नागरिक राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) कैसे जाए।
संक्षेप में
- स्वच्छ और स्वस्थ पर्यावरण अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार का हिस्सा है। कार्रवाई के लिए प्रदूषित ज़मीन का मालिक होना ज़रूरी नहीं।
- शुरुआत स्थानीय स्तर से करें: राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, नगर निकाय या पंचायत और ज़िला मजिस्ट्रेट को लिखित शिकायत दें; मजिस्ट्रेट सार्वजनिक उपद्रव (public nuisance) हटाने का आदेश दे सकते हैं धारा 152 BNSS।
- कोई भी व्यक्ति या समूह राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) जा सकता है धारा 18 NGT अधिनियम। मुआवज़ा न माँगने वाली अर्ज़ी की फ़ीस ₹1,000 है, और आप ख़ुद बहस कर सकते हैं।
- समय-सीमा का ध्यान रखें: ज़्यादातर NGT मामलों में समस्या शुरू होने से आम तौर पर छह महीने, और मंज़ूरी (clearance) के ख़िलाफ़ अपील के लिए 30 दिन।
पास की फ़ैक्टरी का धुआँ, गाँव के तालाब में गिरता नाला, रात भर चलती निर्माण की ड्रिल, किसी ग़ैरक़ानूनी प्रोजेक्ट के लिए कटते पेड़। पर्यावरण का नुक़सान दूर की बात नहीं है। यह आपके फेफड़ों, बच्चों की सेहत और पीने के पानी तक पहुँचता है। भारतीय क़ानून आपको मज़बूत औज़ार देता है, और इन्हें इस्तेमाल करने के लिए वैज्ञानिक या वकील होना ज़रूरी नहीं।
एक संवैधानिक अधिकार
सुप्रीम कोर्ट ने माना है कि अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार में प्रदूषण-मुक्त हवा और पानी का अधिकार शामिल है (सुभाष कुमार बनाम बिहार राज्य, 1991)। वेल्लोर सिटिज़न्स वेलफ़ेयर फ़ोरम बनाम भारत संघ (1996) में कोर्ट ने दो सिद्धांत अपनाए जो आज भी लागू होते हैं:
- प्रदूषक भुगतान करे (polluter pays): जो प्रदूषण फैलाए, वही नुक़सान की भरपाई करे और पीड़ितों को मुआवज़ा दे।
- एहतियाती सिद्धांत (precautionary principle): पर्यावरण को गंभीर ख़तरा हो तो पूरी वैज्ञानिक निश्चितता न होना कार्रवाई टालने का बहाना नहीं।
एम.के. रणजीतसिंह बनाम भारत संघ (2024) में कोर्ट ने जलवायु परिवर्तन के बुरे असर से मुक्त रहने का अधिकार भी माना। संविधान राज्य को पर्यावरण की रक्षा का निर्देश देता है अनुच्छेद 48A और इसे हर नागरिक का कर्तव्य बनाता है अनुच्छेद 51A(g)।
क़ानून और नियामक
कई क़ानून मिलकर काम करते हैं: जल अधिनियम, 1974, वायु अधिनियम, 1981, पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986, वन और जैव विविधता क़ानून, और शोर, ठोस कचरा, प्लास्टिक व जैव-चिकित्सा कचरे के नियम। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) और राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (SPCB) इन्हें लागू करते हैं। फ़ैक्टरी को बोर्ड की "संचालन सहमति" (consent to operate) चाहिए; बोर्ड जाँच कर सकता है, प्रदूषण रोकने का आदेश दे सकता है, और बंद करने या बिजली-पानी काटने का निर्देश दे सकता है। हाल के संशोधनों में कई उल्लंघनों पर जेल की जगह भारी आर्थिक दंड रखा गया है।
आपराधिक क़ानून भी लागू होता है: सार्वजनिक उपद्रव धारा 270 BNS, सार्वजनिक जल स्रोत को गंदा करना धारा 279 BNS, और हवा को सेहत के लिए हानिकारक बनाना धारा 280 BNS।
क़दम दर क़दम: स्थानीय स्तर से शुरू करें
- समस्या का रिकॉर्ड बनाएँ। तारीख़ वाली फ़ोटो और वीडियो, धुएँ या शोर का समय, गंध, सेहत पर असर (डॉक्टर के पर्चे काम आते हैं), और इकाइयों के नाम। प्रभावित पड़ोसियों के हस्ताक्षर लें।
- लिखित शिकायत करें SPCB के क्षेत्रीय कार्यालय, नगर निकाय या पंचायत और ज़िला मजिस्ट्रेट को। कई SPCB की ऑनलाइन शिकायत व्यवस्था है। पावती रखें।
- मजिस्ट्रेट से सार्वजनिक उपद्रव हटवाएँ। ज़िला मजिस्ट्रेट या उप-मंडल मजिस्ट्रेट (SDM) समुदाय की सेहत के लिए हानिकारक धंधे या बंद सार्वजनिक नाले जैसे उपद्रव हटाने का आदेश दे सकते हैं धारा 152 BNSS (पहले धारा 133 CrPC)।
- रात का शोर। ध्वनि प्रदूषण नियमों में रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर आम तौर पर मना हैं, सिवाय नियमों में दी छूट के। पुलिस कार्रवाई के लिए 112 पर कॉल करें।
- RTI का इस्तेमाल करें। SPCB से इकाई की संचालन सहमति, उसकी शर्तें, निरीक्षण रिपोर्ट और निगरानी के आँकड़े माँगें। सहमति की शर्तों का उल्लंघन मज़बूत सबूत है।
- आगे बढ़ें NGT तक, या जन-स्वास्थ्य के तुरंत ख़तरे में अनुच्छेद 226 के तहत हाई कोर्ट।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) में जाना
राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 ने न्यायिक और विशेषज्ञ सदस्यों वाली एक विशेष अदालत बनाई। प्रधान पीठ नई दिल्ली में है, और क्षेत्रीय पीठें भोपाल, पुणे, कोलकाता और चेन्नई में।
- पर्यावरण विवाद धारा 14: अधिनियम की अनुसूची के क़ानूनों (जल, वायु, पर्यावरण संरक्षण, वन संरक्षण, जैव विविधता और सार्वजनिक दायित्व बीमा अधिनियम) से जुड़ा पर्यावरण का कोई ठोस सवाल। वन्यजीव संरक्षण अधिनियम के मामले अनुसूची में नहीं हैं। समस्या पहली बार शुरू होने से छह महीने के भीतर दाख़िल करें; उचित कारण पर अधिकरण 60 दिन और दे सकता है।
- राहत और मुआवज़ा धारा 15: प्रदूषण पीड़ितों को मुआवज़ा और नुक़सान हुई संपत्ति व पर्यावरण की बहाली। ऐसे दावे आम तौर पर पाँच साल के भीतर।
- अपील धारा 16: पर्यावरण मंज़ूरी या प्रदूषण बोर्ड के आदेश जैसे कुछ आदेशों के ख़िलाफ़, आदेश की सूचना मिलने के 30 दिन के भीतर (उचित कारण पर 60 दिन और)।
- कौन अर्ज़ी दे सकता है धारा 18: पीड़ित व्यक्ति, प्रभावित संपत्ति का मालिक, या कोई भी व्यक्ति या संस्था, निवासियों का समूह भी।
मुआवज़ा न माँगने वाली अर्ज़ी या अपील की फ़ीस ₹1,000 है; मुआवज़े के दावे में फ़ीस रक़म के हिसाब से होती है। अर्ज़ी के साथ सहायक दस्तावेज़ और हलफ़नामा (affidavit) चाहिए। सादी चिट्ठी से आम तौर पर मुक़दमा शुरू नहीं होता, हालाँकि NGT कभी-कभी समाचारों पर ख़ुद संज्ञान लेता है। NGT के आदेश के ख़िलाफ़ 90 दिन के भीतर सुप्रीम कोर्ट में अपील होती है धारा 22।
पानीपत में 40 साल के इमरान की कॉलोनी के पास एक रँगाई इकाई घरों के पीछे वाले नाले में रंगीन पानी छोड़ती है। निवासी वीडियो बनाते हैं, बच्चे बीमार पड़ते हैं। इमरान हरियाणा SPCB को लिखते हैं और RTI लगाते हैं, जिससे पता चलता है कि इकाई की सहमति ख़त्म हो चुकी है। SPCB नोटिस देता है पर कुछ नहीं बदलता। रेज़िडेंट्स वेलफ़ेयर एसोसिएशन RTI जवाब, फ़ोटो और मेडिकल रिकॉर्ड के साथ NGT प्रधान पीठ में अर्ज़ी देती है। NGT संयुक्त निरीक्षण का निर्देश देता है; उपचार संयंत्र लगने तक इकाई बंद होती है और उसे पर्यावरण मुआवज़ा भरने का आदेश मिलता है।
ये तैयार रखें
- तारीख़ वाली फ़ोटो और वीडियो, जगह का ब्योरा और घटनाओं की छोटी डायरी।
- SPCB, नगर निकाय और ज़िला मजिस्ट्रेट को दी शिकायतों और पावतियों की प्रतियाँ।
- RTI जवाब: इकाई की संचालन सहमति, निरीक्षण और निगरानी रिपोर्ट।
- प्रभावित लोगों के मेडिकल रिकॉर्ड; निवासियों के हस्ताक्षर।
सबसे आम ग़लती है बहुत देर तक इंतज़ार करना। NGT की समय-सीमा नुक़सान शुरू होने या आदेश की सूचना से गिनी जाती है, और देर से आए मामले अक्सर ख़ारिज हो जाते हैं। अधिकारियों से जल्दी शिकायत करें, तारीख़ें लिखें, और वे कुछ न करें तो समय के भीतर NGT जाएँ।
कहाँ जाएँ
- राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड का क्षेत्रीय कार्यालय (केंद्रशासित प्रदेश में प्रदूषण नियंत्रण समिति); नगर निकाय या पंचायत।
- ज़िला मजिस्ट्रेट / SDM धारा 152 BNSS के उपद्रव आदेश के लिए; रात के शोर के लिए पुलिस (112)।
- केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड: cpcb.nic.in।
- राष्ट्रीय हरित अधिकरण: greentribunal.gov.in; फिर हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट। मुफ़्त क़ानूनी सहायता: 15100।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या आम नागरिक NGT में मामला दायर कर सकता है?
हाँ। NGT अधिनियम की धारा 18 के तहत कोई भी व्यक्ति, समूह या संस्था अर्ज़ी दे सकती है, सिर्फ़ सीधे पीड़ित व्यक्ति नहीं। मुआवज़ा न माँगने पर फ़ीस ₹1,000 है, और आप ख़ुद पेश हो सकते हैं, हालाँकि वकील अक्सर मदद करता है।
NGT जाने की समय-सीमा क्या है?
धारा 14 के पर्यावरण विवादों में आम तौर पर समस्या पहली बार शुरू होने से छह महीने, उचित कारण पर 60 दिन और। धारा 15 के मुआवज़े के दावों में आम तौर पर पाँच साल। धारा 16 की अपील आदेश के 30 दिन के भीतर, 60 दिन तक बढ़ सकती है।
प्रदूषण फैलाने वाली फ़ैक्टरी की शिकायत किससे करें?
राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, स्थानीय निकाय और ज़िला मजिस्ट्रेट को लिखित शिकायत से शुरू करें; मजिस्ट्रेट धारा 152 BNSS के तहत सार्वजनिक उपद्रव हटाने का आदेश दे सकते हैं। RTI से फ़ैक्टरी की सहमति शर्तें और निरीक्षण रिपोर्ट लें। वे कार्रवाई न करें तो NGT जाएँ।
क्या रात में लाउडस्पीकर की शिकायत कर सकते हैं?
हाँ। ध्वनि प्रदूषण नियमों में रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक लाउडस्पीकर आम तौर पर मना हैं, सिवाय नियमों की छूट के। पुलिस कार्रवाई के लिए 112 पर कॉल करें, और जारी रहे तो थाने व ज़िला मजिस्ट्रेट को लिखित शिकायत दें।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।