अपने उम्मीदवार को जानिए: फ़ॉर्म 26 शपथपत्र, KYC ऐप और NOTA
फ़ॉर्म 26 शपथपत्र में उम्मीदवार के आपराधिक मामले, संपत्ति और शिक्षा देखने का आपका अधिकार, कहाँ पढ़ें (ECI KYC), और NOTA दबाने से क्या होता है और क्या नहीं।
संक्षेप में
- हर उम्मीदवार को नामांकन के साथ शपथ पर फ़ॉर्म 26 शपथपत्र (affidavit) देना होता है, जिसमें आपराधिक मामले, संपत्ति, देनदारियाँ और शिक्षा दर्ज हों (धारा 33A, RP Act 1951; नियम 4A)।
- शपथपत्र नामांकन के कुछ दिनों में सार्वजनिक हो जाते हैं। इन्हें चुनाव आयोग के शपथपत्र पोर्टल या उसके ऐप के Know Your Candidate (KYC) फ़ीचर पर पढ़ें।
- लंबित मामलों वाले उम्मीदवारों को उन्हें अख़बारों और टीवी पर छपवाना होता है, और पार्टियों को बताना होता है कि उन्हें क्यों चुना (सुप्रीम कोर्ट, 2018 और 2020)।
- झूठा शपथपत्र अपराध है (धारा 125A) और नतीजे के 45 दिन के भीतर दायर चुनाव याचिका का आधार (धारा 81)।
- NOTA गुप्त रूप से दर्ज करता है कि आप सबको नकारते हैं, पर सबसे ज़्यादा वोट पाने वाला उम्मीदवार फिर भी जीतता है।
ड्राइवर रखने या किराएदार लाने से पहले आप जाँचते हैं कि वह कौन है। जो व्यक्ति आपके लिए क़ानून बनाएगा, उसे चुनने में कम से कम उतनी ही सावधानी बनती है। भारतीय क़ानून इससे सहमत है: मतदाता के रूप में आपको यह जानने का अधिकार है कि आपका वोट कौन माँग रहा है, उसके आपराधिक मामले, संपत्ति और शिक्षा समेत। आपको औपचारिक और गुप्त रूप से यह कहने का भी अधिकार है कि इनमें से कोई स्वीकार्य नहीं। यह गाइड बताती है कि कहाँ देखें और जानकारी का मतलब क्या है।
यह अधिकार कहाँ से आता है
अनुच्छेद 19(1)(a) वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करता है, और सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इसमें मतदाता का जानकारी पाने का अधिकार शामिल है। भारत संघ बनाम एसोसिएशन फ़ॉर डेमोक्रेटिक रिफ़ॉर्म्स (2002) और PUCL बनाम भारत संघ (2003) में कोर्ट ने कहा कि उम्मीदवारों के बारे में बुनियादी तथ्य जाने बिना मतदाता सच्चा चुनाव नहीं कर सकता। फिर संसद ने धारा 33A, RP Act 1951 जोड़ी, और चुनाव आयोग (ECI) ने निर्वाचन संचालन नियम, 1961 के नियम 4A के तहत फ़ॉर्म 26 का शपथपत्र तय किया, जो संसद या विधानसभा के हर उम्मीदवार को नामांकन के साथ देना होता है।
शपथपत्र में क्या बताना ज़रूरी है
- आपराधिक रिकॉर्ड: हर लंबित मामला जिसमें अदालत ने आरोप तय किए हैं या संज्ञान लिया है, FIR संख्या, धाराओं और अदालत के साथ; और हर पुरानी सज़ा, दंड के साथ। धारा 33A ख़ास तौर पर दो साल या ज़्यादा की सज़ा वाले लंबित मामलों (जिनमें आरोप तय हों) और एक साल या ज़्यादा की सज़ा वाली दोषसिद्धियों का खुलासा माँगती है।
- संपत्ति और देनदारियाँ, उम्मीदवार, पति/पत्नी और आश्रितों की: नक़द, बैंक जमा, शेयर, वाहन, गहने, ज़मीन, मकान और क़र्ज़, मूल्य और PAN के ब्योरे के साथ।
- आय, पिछले पाँच साल के आयकर रिटर्न में दिखाई गई, और आय के स्रोत।
- शैक्षिक योग्यता, संस्थान और वर्ष के साथ।
- सरकारी बक़ाया, जैसे सरकारी आवास का किराया, बिजली, पानी या टेलीफ़ोन के बिल।
कोई कॉलम ख़ाली नहीं छोड़ा जा सकता; चुनाव आयोग "शून्य" या "लागू नहीं" लिखने को कहता है। ख़ाली शपथपत्र वाला नामांकन नोटिस के बाद ख़ारिज हो सकता है। झूठी जानकारी देना या छिपाना छह महीने तक की क़ैद या जुर्माना या दोनों से दंडनीय है (धारा 125A), और सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि शपथपत्र में अहम तथ्य छिपाना ऐसा भ्रष्ट आचरण हो सकता है जिससे चुनाव रद्द हो जाए।
आपराधिक मामलों का प्रचार
पब्लिक इंटरेस्ट फ़ाउंडेशन बनाम भारत संघ (2018) में पाँच जजों की पीठ ने निर्देश दिया कि लंबित मामलों वाला हर उम्मीदवार नामांकन के बाद कम से कम तीन बार उन्हें प्रमुख अख़बारों में मोटे अक्षरों में और टीवी चैनलों पर प्रकाशित करे, और पार्टियाँ अपनी वेबसाइट पर दिखाएँ। रामबाबू सिंह ठाकुर बनाम सुनील अरोड़ा (2020) में कोर्ट और आगे गया: पार्टी को अपनी वेबसाइट, सोशल मीडिया और अख़बारों में बताना होगा कि लंबित मामलों वाले उम्मीदवार को क्यों चुना और बिना ऐसे मामलों वाला व्यक्ति क्यों नहीं चुना जा सका। सिर्फ़ "जीतने की क्षमता" स्वीकार्य कारण नहीं है। 2021 में कोर्ट ने इसे नज़रअंदाज़ करने पर कई पार्टियों पर जुर्माना लगाया और चयन के 48 घंटे के भीतर जानकारी प्रकाशित करना अनिवार्य किया।
लंबित मामला दोषसिद्धि नहीं है; दोष साबित होने तक हर कोई निर्दोष माना जाता है। सिर्फ़ मामलों की गिनती नहीं, आरोप की प्रकृति, मामला कब दर्ज हुआ और आरोप तय हुए या नहीं, यह देखें। धरने-प्रदर्शन के मामले वसूली या मारपीट के आरोपों से अलग हैं।
क़दम दर क़दम: उम्मीदवार को कैसे जाँचें
- अपने निर्वाचन क्षेत्र में नामांकनों की जाँच (scrutiny) का इंतज़ार करें (तारीख़ चुनाव कार्यक्रम में होती है)। शपथपत्र दाख़िल होने के कुछ ही समय बाद ऑनलाइन आ जाते हैं।
- चुनाव आयोग का शपथपत्र पोर्टल (affidavit.eci.gov.in) या उसके ऐप का KYC फ़ीचर खोलें, चुनाव, राज्य और निर्वाचन क्षेत्र चुनें, और हर उम्मीदवार का फ़ॉर्म 26 खोलें।
- आपराधिक मामलों के लिए भाग A पढ़ें: धाराएँ, अदालत और आरोप तय हुए या नहीं, नोट करें।
- संपत्ति की तालिकाएँ पढ़ें। उम्मीदवार पहले चुनाव लड़ चुका हो तो पुराने शपथपत्र से तुलना करें, जो पोर्टल पर ही है। बिना वजह की बड़ी उछाल पर जनसभा में सवाल पूछना बनता है।
- उम्मीदवारों और पार्टियों द्वारा अनिवार्य रूप से प्रकाशित अख़बार और टीवी की घोषणाएँ, और पार्टी के कारणों का बयान देखें।
- शपथपत्र झूठा लगे तो मतदान से पहले रिटर्निंग अधिकारी को सबूत के साथ लिखित शिकायत दें। नतीजे के बाद उस क्षेत्र का कोई मतदाता 45 दिन के भीतर हाई कोर्ट में चुनाव याचिका दायर कर सकता है (धारा 81); पहले क़ानूनी सलाह लें।
NOTA क्या करता है
PUCL बनाम भारत संघ (2013) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वोट देने के अधिकार में किसी भी उम्मीदवार को वोट न देने का अधिकार शामिल है, और यह चुनाव भी उतना ही गुप्त होना चाहिए। अब हर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन में सूची के सबसे नीचे NOTA ("इनमें से कोई नहीं") का बटन है। NOTA के वोट अलग से गिने और प्रकाशित होते हैं, इसलिए आपकी अस्वीकृति रिकॉर्ड पर आती है। पर लोकसभा और विधानसभा चुनावों में नतीजे पर NOTA का कोई क़ानूनी असर नहीं: सबसे ज़्यादा वैध वोट पाने वाला उम्मीदवार जीतता है, भले ही NOTA को उससे ज़्यादा वोट मिले हों। कुछ राज्य निर्वाचन आयोगों ने स्थानीय निकाय चुनावों में NOTA को ज़्यादा वज़न देने के प्रयोग किए हैं, इसलिए वहाँ स्थिति राज्य के हिसाब से अलग है। NOTA जीते तो दोबारा चुनाव की माँग वाली याचिका सुप्रीम कोर्ट में सुनी गई है, पर 2026 तक क़ानून बदला नहीं है।
अपने क्षेत्र के विधानसभा चुनाव से पहले पटना की कॉलेज छात्रा प्रिया जाँच के अगले दिन चुनाव आयोग का KYC फ़ीचर खोलती है। तीन उम्मीदवार हैं। एक के दो लंबित मामले हैं: वह धाराएँ पढ़ती है और देखती है कि वसूली के एक मामले में 2023 में आरोप तय हो चुके हैं। दूसरे की संपत्ति 2020 के शपथपत्र के बाद से 40 लाख से बढ़कर 6 करोड़ हो गई है। पार्टी के स्थानीय दफ़्तर में वह पहले उम्मीदवार के चयन के प्रकाशित कारण माँगती है, जो पार्टी को छापने ही होते हैं। वह अपने मोहल्ले के ग्रुप में पोर्टल के लिंक के साथ शपथपत्रों के स्क्रीनशॉट भेजती है, ताकि लोग अफ़वाहों के बजाय ख़ुद जाँच सकें।
ये तैयार रखें
- चुनाव कार्यक्रम: आपके क्षेत्र में नामांकन की आख़िरी तारीख़ और जाँच की तारीख़
- आपके निर्वाचन क्षेत्र का नाम और नंबर (मतदाता पर्ची और ECI पोर्टल पर छपा)
- तुलना के लिए हर शपथपत्र का स्क्रीनशॉट या डाउनलोड, तारीख़ के साथ
- झूठे शपथपत्र की शिकायत के लिए: उसे ग़लत साबित करने वाले दस्तावेज़, जैसे संपत्ति रिकॉर्ड या अदालत का आदेश
सोशल मीडिया पर "आपराधिक उम्मीदवारों" की सूचियाँ अक्सर ग़लत या पुरानी होती हैं। आधिकारिक पोर्टल पर शपथपत्र ख़ुद देखें, और याद रखें कि लंबित मामला दोषसिद्धि नहीं है। साथ ही, साफ़ शपथपत्र को सही मान लेने की ग़लती भी न करें: धारा 125A और चुनाव याचिका इसीलिए हैं।
कहाँ जाएँ
- चुनाव आयोग का शपथपत्र पोर्टल और उसके ऐप का Know Your Candidate फ़ीचर; ज़िला कलेक्ट्रेट में रिटर्निंग अधिकारी का नोटिस बोर्ड भी शपथपत्र प्रदर्शित करता है
- मतदान से पहले झूठे या अधूरे शपथपत्र की शिकायत के लिए निर्वाचन क्षेत्र का रिटर्निंग अधिकारी
- मतदाता हेल्पलाइन 1950; सूची और मतदान की जानकारी के लिए voters.eci.gov.in
- वोट ख़रीदना, धमकी या सरकारी मशीनरी का दुरुपयोग: चुनाव आयोग का cVIGIL
- चुनाव याचिका या क़ानूनी सलाह: वकील, या 15100 (NALSA मुफ़्त क़ानूनी सहायता)
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
उम्मीदवार का आपराधिक रिकॉर्ड और संपत्ति कहाँ देख सकते हैं?
नामांकन के साथ दाख़िल फ़ॉर्म 26 शपथपत्र में, जो नामांकन बंद होने के कुछ दिनों में चुनाव आयोग के शपथपत्र पोर्टल और उसके ऐप के Know Your Candidate फ़ीचर पर उपलब्ध होता है। इसमें उम्मीदवार, पति/पत्नी और आश्रितों के लंबित मामले, दोषसिद्धियाँ, संपत्ति, देनदारियाँ, आय और शिक्षा दर्ज होती है। वही शपथपत्र रिटर्निंग अधिकारी के दफ़्तर के बाहर भी लगाया जाता है।
क्या आपराधिक मामलों वाला व्यक्ति चुनाव लड़ सकता है?
हाँ, जब तक दोषी न ठहराया गया हो। ज़्यादातर अपराधों में दो साल या ज़्यादा की सज़ा पाया व्यक्ति दोषसिद्धि की तारीख़ से सज़ा की अवधि और रिहाई के छह साल बाद तक अयोग्य है (धारा 8, RP Act 1951), जैसा सुप्रीम कोर्ट ने लिली थॉमस (2013) में पक्का किया। लंबित मामले अयोग्य नहीं बनाते, पर उनका खुलासा और प्रचार ज़रूरी है, और पार्टी को उम्मीदवार चुनने के कारण प्रकाशित करने होते हैं।
NOTA को सबसे ज़्यादा वोट मिलें तो क्या होगा?
लोकसभा और विधानसभा चुनावों में कुछ नहीं बदलता: सबसे ज़्यादा वैध वोट पाने वाला उम्मीदवार निर्वाचित घोषित होता है, भले ही NOTA को उससे ज़्यादा वोट मिले हों। NOTA के वोट गिने और प्रकाशित होते हैं, यही उनका मक़सद है। कुछ राज्य निर्वाचन आयोगों ने स्थानीय निकाय चुनावों में NOTA को ज़्यादा असर दिया है; अपने राज्य के नियम देखें।
उम्मीदवार का शपथपत्र झूठा हो तो मैं क्या कर सकता हूँ?
मतदान से पहले रिटर्निंग अधिकारी को सबूत के साथ लिखित शिकायत भेजें, जो ख़ाली या अधूरे कॉलम पर संज्ञान ले सकता है। झूठा शपथपत्र देना धारा 125A के तहत अपराध है, छह महीने तक की क़ैद या जुर्माने से दंडनीय, और इसकी आपराधिक शिकायत की जा सकती है। नतीजे के बाद उस क्षेत्र का मतदाता या उम्मीदवार 45 दिन के भीतर हाई कोर्ट में नामांकन की ग़लत स्वीकृति या भ्रष्ट आचरण के आधार पर चुनाव याचिका दायर कर सकता है।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।