चिकित्सा लापरवाही और मरीज़ के अधिकार: क्या करें
आपातकालीन इलाज, सहमति और 72 घंटे में रिकॉर्ड का हक़, चिकित्सा लापरवाही क्या है, और शिकायत कहाँ करें: उपभोक्ता आयोग, पुलिस, मेडिकल काउंसिल।
संक्षेप में
- आपात स्थिति में हर अस्पताल को जान बचाने के लिए तुरंत इलाज देना होगा, पुलिस की औपचारिकता या एडवांस भुगतान का इंतज़ार किए बिना।
- अपने पूरे मेडिकल रिकॉर्ड लिखित में माँगें। चिकित्सा आचार नियमों के तहत डॉक्टर को माँग के 72 घंटे में रिकॉर्ड देने होते हैं।
- हर बुरा नतीजा लापरवाही नहीं है। लापरवाही का मतलब है डॉक्टर का एक सामान्य सक्षम डॉक्टर के स्तर से नीचे गिरना (जैकब मैथ्यू, 2005)।
- मुआवज़े के लिए 2 साल के भीतर उपभोक्ता आयोग जाएँ। घोर लापरवाही से मौत हो तो पुलिस। दुराचार के लिए राज्य मेडिकल काउंसिल।
- जल्दी ही किसी दूसरे डॉक्टर की लिखित राय लें। अक्सर यही सबसे अहम सबूत होता है।
अस्पताल में कुछ ग़लत हो गया: एक मामूली ऑपरेशन बिगड़ गया, ग़लत इंजेक्शन लगा, मरीज़ को बिना निगरानी छोड़ दिया गया, या परिवार के किसी सदस्य की मौत हो गई और कोई कारण नहीं बता रहा। आप जवाब चाहते हैं, और शायद जवाबदेही भी। यह लेख आपके अधिकार, क़ानून में लापरवाही का मतलब, और व्यावहारिक क़दम बताता है।
मरीज़ के रूप में आपके अधिकार
- आपातकालीन इलाज। परमानंद कटारा बनाम भारत संघ (1989) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर डॉक्टर, सरकारी हो या निजी, को पुलिस की औपचारिकता का इंतज़ार किए बिना जान बचाने के लिए तुरंत इलाज देना होगा। पश्चिम बंग खेत मज़दूर समिति बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1996) में कहा कि सरकारी अस्पताल का समय पर आपातकालीन इलाज न देना अनुच्छेद 21 के जीवन के अधिकार का उल्लंघन है।
- जानकारी। आपको अपनी बीमारी, प्रस्तावित इलाज, उसके जोखिम और विकल्प, और अनुमानित ख़र्च, अपनी समझ की भाषा में जानने का हक़ है।
- सूचित सहमति (informed consent)। किसी प्रक्रिया से पहले डॉक्टर को आपकी (या आप न दे सकें तो अभिभावक की) सहमति लेनी होगी। एक प्रक्रिया की सहमति किसी दूसरी प्रक्रिया की अनुमति नहीं देती, सच्ची आपात स्थिति को छोड़कर (समीरा कोहली बनाम डॉ. प्रभा मनचंदा, 2008)।
- मेडिकल रिकॉर्ड। आपको केस पेपर, जाँच रिपोर्ट और डिस्चार्ज समरी की कॉपी पाने का हक़ है। भारतीय चिकित्सा परिषद (व्यावसायिक आचरण, शिष्टाचार और नैतिकता) विनियम, 2002, जो अब भी लागू हैं, के तहत मरीज़ या अधिकृत परिजन की माँग के 72 घंटे में डॉक्टर को रिकॉर्ड देने होते हैं विनियम 1.3.2, MCI विनियम 2002।
- गोपनीयता और गरिमा। आपकी चिकित्सा जानकारी गोपनीय रहनी चाहिए, और जाति, धर्म, लिंग, एचआईवी स्थिति या विकलांगता के आधार पर कोई भेदभाव नहीं होना चाहिए।
- दूसरी राय और चुनाव। आप दूसरी राय ले सकते हैं, और दवाएँ या जाँच किसी भी लाइसेंसशुदा जगह से करा सकते हैं, जब तक कोई चिकित्सकीय कारण न हो।
राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने इन अधिकारों का "मरीज़ों के अधिकारों का चार्टर" जारी किया है। कुछ राज्यों ने क्लिनिकल एस्टैब्लिशमेंट (पंजीकरण और विनियमन) अधिनियम, 2010 अपनाया है, जो अस्पतालों को नियंत्रित करता है और दरें प्रदर्शित करने को कह सकता है।
चिकित्सा लापरवाही क्या है
इलाज में जोखिम होता है, और सिर्फ़ इलाज विफल होने से डॉक्टर ज़िम्मेदार नहीं हो जाता। जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य (2005) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर तब लापरवाह है जब उसमें वह कौशल ही न हो जिसका वह दावा करता है, या वह उचित कौशल और सावधानी न बरते, और इसे उस क्षेत्र के एक सामान्य सक्षम डॉक्टर के स्तर से परखा जाता है। इलाज के एक मान्य तरीक़े की जगह दूसरा मान्य तरीक़ा चुनना लापरवाही नहीं है।
ये स्थितियाँ लापरवाही हो सकती हैं:
- शरीर के ग़लत हिस्से का ऑपरेशन, या अंदर कोई औज़ार या पट्टी छोड़ देना;
- ग़लत दवा, ग़लत खुराक या ग़लत ब्लड ग्रुप देना;
- ऑपरेशन या प्रसव के बाद मरीज़ की निगरानी न करना;
- मामला डॉक्टर के कौशल या अस्पताल की सुविधाओं से बाहर हो, फिर भी रेफ़र न करना;
- बिना सहमति, या बिना योग्य डॉक्टर के प्रक्रिया करना।
तीन तरह के उपाय
1. मुआवज़ा: उपभोक्ता आयोग
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन बनाम वी.पी. शांता (1995) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पैसे देकर ली गई चिकित्सा सेवा उपभोक्ता क़ानून में "सेवा" है। सरकारी अस्पताल का मुफ़्त इलाज आम तौर पर इसके बाहर है, पर बीमे से भुगतान वाला इलाज शामिल है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 के तहत चुकाई गई रकम के हिसाब से ज़िला, राज्य या राष्ट्रीय आयोग में शिकायत करें, और e-Jagriti पोर्टल पर ऑनलाइन दायर कर सकते हैं। घटना के दो साल के भीतर दायर करें। वकील ज़रूरी नहीं, हालाँकि जटिल मामलों में मदद करता है।
2. आपराधिक शिकायत: पुलिस
उतावलेपन या लापरवाही से मौत का कारण बनना अपराध है धारा 106(1) BNS (पहले धारा 304A IPC)। अगर यह किसी पंजीकृत डॉक्टर से चिकित्सा प्रक्रिया के दौरान हुआ हो, तो क़ानून कम अधिकतम सज़ा रखता है। आपराधिक ज़िम्मेदारी के लिए घोर (gross) लापरवाही चाहिए, यानी बहुत ज़्यादा लापरवाही। जैकब मैथ्यू के बाद पुलिस आम तौर पर डॉक्टर के ख़िलाफ़ कार्रवाई से पहले स्वतंत्र चिकित्सा राय, अक्सर सरकारी डॉक्टरों के बोर्ड से, लेती है।
3. व्यावसायिक दुराचार: राज्य मेडिकल काउंसिल
डॉक्टर के व्यावसायिक दुराचार, जैसे रिकॉर्ड न देना या उनमें हेराफेरी, की शिकायत राज्य मेडिकल काउंसिल में कर सकते हैं। वह डॉक्टर को चेतावनी दे सकती है या पंजीकरण निलंबित कर सकती है। अपील राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के नैतिकता और चिकित्सा पंजीकरण बोर्ड में होती है। इस रास्ते से डॉक्टर पर कार्रवाई होती है, पर आपको मुआवज़ा नहीं मिलता।
आप एक साथ एक से ज़्यादा रास्ते अपना सकते हैं।
क़दम दर क़दम: क्या करें
- अभी सब लिख लें। तारीख़ें, समय, क्या कहा गया, और शामिल डॉक्टरों व नर्सों के नाम।
- रिकॉर्ड लिखित में माँगें चिकित्सा अधीक्षक (medical superintendent) से। अर्ज़ी की मुहर लगी कॉपी रखें। 72 घंटे में न मिलें तो दर्ज करें; रिकॉर्ड न देना ख़ुद दुराचार है।
- सब कुछ सँभालें: पर्चे, बिल, रसीदें, रिपोर्ट, चोटों की तस्वीरें।
- संदिग्ध हालात में मौत हुई हो तो पुलिस को सूचना दें और अंतिम संस्कार से पहले पोस्टमार्टम की माँग करें।
- लिखित शिकायत दें अस्पताल के शिकायत प्रकोष्ठ या चिकित्सा अधीक्षक को।
- विशेषज्ञ राय लें किसी दूसरे योग्य डॉक्टर से कि इलाज अपेक्षित स्तर से नीचे था या नहीं।
- रास्ता चुनें (उपभोक्ता, पुलिस, मेडिकल काउंसिल) और दायर करें। मुफ़्त क़ानूनी मदद के लिए 15100 पर कॉल करें।
मीना के 68 वर्षीय पिता का लखनऊ के एक निजी अस्पताल में हर्निया का सामान्य ऑपरेशन हुआ। उन्हें तेज़ बुख़ार और दर्द हुआ, पर स्टाफ़ ने दो दिन सर्जन को नहीं बुलाया; फिर संक्रमण के लिए आपात दूसरा ऑपरेशन करना पड़ा। मीना ने लिखित में सारे केस रिकॉर्ड माँगे और तीसरे दिन मिल गए। एक सरकारी अस्पताल के सर्जन ने उन्हें देखकर लिखा कि ऑपरेशन के बाद की निगरानी में कमी थी। मीना ने रिकॉर्ड, बिल और राय लगाकर ज़िला आयोग में ऑनलाइन उपभोक्ता शिकायत की, और दूसरे ऑपरेशन का ख़र्च व मुआवज़ा माँगा।
ये तैयार रखें
- भर्ती के काग़ज़, सहमति पत्र, केस शीट, नर्सिंग नोट्स, जाँच रिपोर्ट, डिस्चार्ज या मृत्यु समरी।
- सारे बिल, रसीदें और बीमे के काग़ज़।
- रिकॉर्ड की आपकी लिखित माँग, अस्पताल की मुहर या पावती सहित।
- दूसरे डॉक्टर की लिखित राय।
- मौत होने पर पोस्टमार्टम रिपोर्ट और एफ़आईआर की कॉपी।
- घटनाओं की आपकी अपनी डायरी, नाम और समय सहित।
ग़ुस्से को सबूत की जगह न लेने दें। सिर्फ़ नतीजे पर टिकी शिकायतें ("मौत हुई, इसलिए लापरवाही थी") आम तौर पर नाकाम होती हैं। देर भी न करें: रिकॉर्ड मिलना मुश्किल होता जाता है, और उपभोक्ता शिकायत की दो साल की सीमा घटना से गिनी जाती है।
कहाँ जाएँ
- आपातकाल: 112। वरिष्ठ नागरिकों के लिए एल्डर लाइन 14567।
- पहले: अस्पताल का शिकायत प्रकोष्ठ या चिकित्सा अधीक्षक, लिखित में।
- मुआवज़ा: ज़िला उपभोक्ता आयोग (e-Jagriti से ऑनलाइन)। मार्गदर्शन: 1915 या consumerhelpline.gov.in।
- आपराधिक: थाना; मना करे तो एसपी, फिर मजिस्ट्रेट।
- दुराचार: राज्य मेडिकल काउंसिल; अपील राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग में।
- सरकारी अस्पताल: राज्य स्वास्थ्य विभाग या pgportal.gov.in।
- मुफ़्त क़ानूनी मदद: 15100 या ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (nalsa.gov.in)।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
चिकित्सा लापरवाही कैसे साबित करें?
आपको दिखाना होगा कि डॉक्टर ने वह सावधानी नहीं बरती जो एक सामान्य सक्षम डॉक्टर बरतता, और इसी से नुक़सान हुआ। सबसे मज़बूत सबूत है पूरा मेडिकल रिकॉर्ड और किसी दूसरे योग्य डॉक्टर की लिखित राय। इसके बिना सिर्फ़ नतीजा शायद ही काफ़ी होता है।
क्या अस्पताल मेडिकल रिकॉर्ड देने से मना कर सकता है?
नहीं। 2002 के भारतीय चिकित्सा परिषद विनियम, जो अब भी लागू हैं, के तहत मरीज़ या अधिकृत परिजन की माँग के 72 घंटे में डॉक्टर को रिकॉर्ड देने होते हैं। लिखित में माँगें और सबूत रखें। मना करने की शिकायत राज्य मेडिकल काउंसिल में करें।
चिकित्सा लापरवाही के मामले की समय-सीमा क्या है?
उपभोक्ता शिकायत घटना के दो साल के भीतर दायर करनी चाहिए, हालाँकि पर्याप्त कारण होने पर आयोग देरी माफ़ कर सकता है। मौत की सूचना पुलिस को देने की कोई तय सीमा नहीं, पर देरी से सबूत जुटाना मुश्किल होता है।
क्या मुफ़्त सरकारी अस्पताल के इलाज पर केस कर सकते हैं?
उपभोक्ता क़ानून आम तौर पर मुफ़्त इलाज पर लागू नहीं होता। फिर भी आप स्वास्थ्य विभाग और राज्य मेडिकल काउंसिल में शिकायत कर सकते हैं, अनुच्छेद 21 के तहत हाई कोर्ट जा सकते हैं या हर्जाने का दीवानी मुक़दमा कर सकते हैं। घोर लापरवाही से मौत में आपराधिक शिकायत भी हो सकती है।
पैसे न हों तो क्या अस्पताल आपातकालीन इलाज से मना कर सकता है?
नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि आपात स्थिति में डॉक्टरों को जान बचाने के लिए तुरंत इलाज देना होगा, और सरकारी अस्पताल का ऐसा न करना अनुच्छेद 21 का उल्लंघन है। मरीज़ को स्थिर करने वाले इलाज पर ज़ोर दें; बिल बाद में सुलझ सकता है।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।