ऑनलाइन मानहानि और ट्रोलिंग: क़ानून क्या इजाज़त देता है
पोस्ट कब मानहानि बनती है, ट्रोलिंग कब अपराध है, 2026 के आईटी नियमों की समय-सीमा में कंटेंट कैसे हटवाएँ, और आप पर आरोप लगे तो क्या करें।
संक्षेप में
- मानहानि (defamation) किसी के बारे में ऐसा झूठा तथ्य कहना है जिससे उसकी इज़्ज़त घटे। जनहित में सच और ईमानदार राय मानहानि नहीं है धारा 356 BNS।
- सिर्फ़ मानहानि के लिए पुलिस एफ़आईआर दर्ज नहीं करती; जिसकी मानहानि हुई उसे मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत करनी होती है धारा 222 BNSS। ऑनलाइन धमकी, पीछा करना और यौन उत्पीड़न पुलिस के मामले हैं।
- पहले स्क्रीनशॉट लें (पोस्ट, URL, तारीख़, हैंडल), फिर प्लेटफ़ॉर्म को रिपोर्ट करें। फ़रवरी 2026 से नग्नता या नक़ली पहचान की शिकायत पर 2 घंटे में और बाक़ी ग़ैरक़ानूनी कंटेंट की शिकायत पर 36 घंटे में कार्रवाई ज़रूरी है।
- धमकी, पीछा करने या निजी तस्वीरों के लिए: 1930 / cybercrime.gov.in; महिलाएँ 181; आपातकाल 112।
- आप पर आरोप लगे तो: ग़ुस्से में जवाब न दें, सबूत सँभालें, वकील से मिलें। मुफ़्त सलाह: 15100।
एक पोस्ट एक दिन में लाखों लोगों तक पहुँच सकती है। किसी डॉक्टर, टीचर या दुकानदार पर लगा झूठा आरोप सालों में बनी साख मिटा सकता है। साथ ही लोग ख़राब सेवा की शिकायत और ताक़तवर लोगों की आलोचना के लिए सोशल मीडिया का सही इस्तेमाल भी करते हैं। क़ानून आपके बोलने के हक़ और अच्छे नाम के हक़, दोनों की रक्षा करता है। यह लेख दोनों के बीच की लकीर खींचता है और बताता है कि लकीर के किसी भी तरफ़ हों, आप क्या करें।
मानहानि क्या है
मानहानि का मतलब है किसी व्यक्ति के बारे में शब्दों, लेख, तस्वीर या वीडियो से ऐसा लांछन लगाना या छापना, जिसका इरादा या जानकारी यह हो कि इससे उसकी इज़्ज़त को नुक़सान होगा। भारत में यह दीवानी ग़लती भी है (आप हर्जाने और निषेधाज्ञा का मुक़दमा कर सकते हैं) और अपराध भी।
अपराध अब धारा 356 BNS में है (पहले IPC की धारा 499 और 500)। सज़ा दो साल तक की साधारण क़ैद, या जुर्माना, या दोनों, या सामुदायिक सेवा (community service) है, जो 2024 में जोड़ा गया नया विकल्प है। Subramanian Swamy v. Union of India (2016) में सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक मानहानि को बरक़रार रखा और कहा कि इज़्ज़त अनुच्छेद 21 के तहत गरिमा से जीने के अधिकार का हिस्सा है। आलोचकों का कहना है कि यह अपराध बोलने की आज़ादी को दबाता है; 2026 तक यह क़ानून की किताब में बना हुआ है।
मानहानिकारक पोस्ट को शेयर या रीट्वीट करना भी उसे "प्रकाशित" करना है। "जैसा मिला वैसा भेजा" कोई बचाव नहीं है।
क्या मानहानि नहीं है
धारा 356 में दस अपवाद हैं। ऑनलाइन सबसे ज़्यादा काम आने वाले:
- जनहित में सच। सच्चा बयान सुरक्षित है अगर उसे छापना जनता के भले के लिए हो। उसे साबित कर पाना आपकी ज़िम्मेदारी है।
- सार्वजनिक आचरण पर ईमानदार राय। कोई लोकसेवक अपना सरकारी काम कैसे करता है, या किसी भी व्यक्ति के सार्वजनिक सवाल पर आचरण के बारे में नेक नीयत से की गई टिप्पणी।
- समीक्षा। किसी किताब, फ़िल्म, रेस्तराँ, उत्पाद या प्रदर्शन पर ईमानदार राय, जिसे उस व्यक्ति ने ख़ुद जनता के सामने रखा हो।
- सही जगह शिकायत। उस व्यक्ति पर क़ानूनी अधिकार रखने वाले को नेक नीयत से लगाया गया आरोप, जैसे पुलिस, नियोक्ता या नियामक से शिकायत।
ट्रोलिंग कब अपराध बन जाती है
रूखे या चुभने वाले कमेंट अपने आप में ग़ैरक़ानूनी नहीं हैं। लेकिन कुछ ऑनलाइन हरकतें अलग, संज्ञेय अपराध (cognizable offence, यानी जिसमें पुलिस एफ़आईआर दर्ज कर सकती है और बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है) हैं:
- आपके शरीर, इज़्ज़त या संपत्ति को नुक़सान पहुँचाने की धमकी: आपराधिक धमकी धारा 351 BNS।
- पीछा करना (stalking), जिसमें किसी महिला के मना करने के बावजूद बार-बार संपर्क करना या उसकी ऑनलाइन गतिविधि पर नज़र रखना शामिल है धारा 78 BNS।
- यौन उत्पीड़न, जैसे यौन रंग वाली टिप्पणियाँ या माँगें धारा 75 BNS, और किसी महिला की लज्जा का अपमान करने के इरादे से कहे शब्द या इशारे धारा 79 BNS।
- बिना सहमति ली या फैलाई गई निजी तस्वीरें धारा 66E आईटी अधिनियम, और यौन रूप से स्पष्ट सामग्री धारा 67 और 67A आईटी अधिनियम। मॉर्फ़ की हुई या AI से बनी यौन तस्वीरें भी इसी में आती हैं।
- किसी धर्म, जाति या समुदाय को निशाना बनाने वाली नफ़रत भरी पोस्ट: वैमनस्य फैलाना धारा 196 BNS।
ध्यान रखें कि अब कोई आम "आपत्तिजनक संदेश" वाला अपराध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने Shreya Singhal v. Union of India (2015) में आईटी अधिनियम की धारा 66A रद्द कर दी थी। पुलिस उसका हवाला दे तो यह बात कहें।
क़दम दर क़दम: अगर आपको निशाना बनाया जाए
- सबसे पहले सबूत सँभालें। पोस्ट का स्क्रीनशॉट लें जिसमें हैंडल, तारीख़, समय और URL दिखें। लिंक सेव करें। प्रोफ़ाइल स्क्रॉल करते हुए स्क्रीन वीडियो बनाएँ। रिपोर्ट होते ही पोस्ट ग़ायब हो जाती हैं।
- प्लेटफ़ॉर्म को रिपोर्ट करें। ऐप के रिपोर्ट बटन का इस्तेमाल करें और प्लेटफ़ॉर्म के शिकायत अधिकारी (grievance officer) को ईमेल भी करें (आईटी नियम, 2021 के तहत हर बड़े प्लेटफ़ॉर्म को भारत के लिए एक अधिकारी का नाम छापना होता है)। प्लेटफ़ॉर्म को 24 घंटे में पावती देनी होती है और 15 दिन में निपटारा करना होता है; फ़रवरी 2026 के संशोधन के बाद बिना सहमति की नग्नता या नक़ली पहचान को उपयोगकर्ता की शिकायत के 2 घंटे में (पहले 24) और बाक़ी ग़ैरक़ानूनी कंटेंट को 36 घंटे में (पहले 72) हटाना होता है। अदालत या सरकार के हटाने के आदेश का पालन 3 घंटे में करना होता है।
- अपील करें। प्लेटफ़ॉर्म मना करे या अनदेखा करे, तो उसके फ़ैसले के 30 दिन के भीतर आईटी नियमों के तहत बनी शिकायत अपील समिति (Grievance Appellate Committee) में अपील करें।
- अपराध की रिपोर्ट पुलिस को करें। धमकी, पीछा करने, यौन उत्पीड़न या निजी तस्वीरों के लिए cybercrime.gov.in पर शिकायत करें, 1930 पर कॉल करें, या किसी भी थाने या साइबर सेल जाएँ। ये संज्ञेय हैं; पुलिस प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए गुमनाम अकाउंट का पता लगा सकती है।
- सिर्फ़ मानहानि के लिए अदालत का रास्ता लें। पोस्ट हटाने और माफ़ी की माँग वाला क़ानूनी नोटिस भेजें। फिर या तो धारा 222 BNSS के तहत मजिस्ट्रेट के सामने आपराधिक शिकायत करें, या हर्जाने और निषेधाज्ञा (injunction, यानी कंटेंट हटाने और दोबारा न डालने का अदालती आदेश) के लिए दीवानी मुक़दमा। दीवानी मुक़दमा परिसीमा अधिनियम (Limitation Act) के तहत प्रकाशन के एक साल के भीतर करना होता है।
अगर आप पर मानहानि का आरोप लगे
क़ानूनी नोटिस अदालत का आदेश नहीं है। ऐसा सबूत न मिटाएँ जो आपके काम आए, और ग़ुस्से में जवाबी पोस्ट न डालें। अपनी मूल पोस्ट और उसके समर्थन की हर चीज़ सेव करें। नोटिस पढ़कर देखें कि वह किसी झूठे तथ्य का आरोप लगा रहा है या सिर्फ़ आपकी राय पर आपत्ति कर रहा है। जनहित में सच, ईमानदार राय और सही प्राधिकारी से शिकायत पूरे बचाव हैं। आपराधिक शिकायत में मजिस्ट्रेट को अब संज्ञान लेने से पहले आपको सुनना होता है धारा 223 BNSS, इसलिए आपको शुरू में ही यह दिखाने का मौक़ा मिलता है कि पोस्ट जायज़ थी। कभी-कभी सुधार या स्पष्टीकरण से मामला ख़त्म हो जाता है; उसे देने से पहले सलाह लें।
इंदौर के दंत चिकित्सक अर्जुन देखते हैं कि एक गुमनाम अकाउंट उनके क्लिनिक को टैग करके लिख रहा है कि वे "रूट कैनाल बिगाड़ देते हैं और ड्रग इंस्पेक्टरों को रिश्वत देते हैं"। वे हर पोस्ट का URL और समय सहित स्क्रीनशॉट लेते हैं, उन्हें प्लेटफ़ॉर्म के शिकायत अधिकारी को झूठा और मानहानिकारक बताकर रिपोर्ट करते हैं, और एक हफ़्ते में वे हट जाती हैं। फिर वे वकील के ज़रिए न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने धारा 356 BNS और धारा 222 BNSS में शिकायत दायर करते हैं और अदालत से प्लेटफ़ॉर्म को अकाउंट धारक का ब्योरा देने का निर्देश माँगते हैं। अकाउंट एक पूर्व कर्मचारी का निकलता है, जो लिखित माफ़ी माँगता है और शिकायत समझौते से ख़त्म हो जाती है।
ये तैयार रखें
- हैंडल, तारीख़, समय और URL दिखाते स्क्रीनशॉट; प्रोफ़ाइल की स्क्रीन रिकॉर्डिंग
- सही लिंक, और प्लेटफ़ॉर्म की शिकायत के टिकट नंबर और जवाब
- नुक़सान का सबूत: रद्द हुई बुकिंग, ग्राहकों के संदेश
- अगर आप पर आरोप है: आपकी मूल पोस्ट, उसके पीछे के तथ्य और दस्तावेज़, और मिला हुआ नोटिस
"मानहानि की एफ़आईआर कराने" थाने जाना समय की बर्बादी है: मानहानि असंज्ञेय अपराध है और सिर्फ़ मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत ही काम करती है। इसी तरह ट्रोल को "तुम्हें गिरफ़्तार करवा दूँगा" जैसी धमकी न दें; आपकी अपनी धमकी आपके ख़िलाफ़ सबूत बन सकती है।
कहाँ जाएँ
- प्लेटफ़ॉर्म का शिकायत अधिकारी, फिर आईटी नियमों के तहत शिकायत अपील समिति।
- राष्ट्रीय साइबर अपराध पोर्टल: cybercrime.gov.in या हेल्पलाइन 1930 धमकी, पीछा करने, उत्पीड़न और निजी तस्वीरों के लिए; महिलाएँ 181 पर भी कॉल कर सकती हैं।
- न्यायिक मजिस्ट्रेट आपराधिक मानहानि की शिकायत के लिए; दीवानी अदालत हर्जाने और निषेधाज्ञा के लिए।
- ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (15100) मुफ़्त वकील के लिए। आपातकाल: 112।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल
क्या सोशल मीडिया पर मानहानि की एफ़आईआर हो सकती है?
नहीं। धारा 356 BNS के तहत मानहानि असंज्ञेय अपराध है, और धारा 222 BNSS के तहत अदालत इसे तभी लेती है जब जिसकी मानहानि हुई वह ख़ुद शिकायत करे। शिकायत न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने, आम तौर पर वकील के ज़रिए, दायर होती है। पुलिस एफ़आईआर सिर्फ़ धमकी, पीछा करने या निजी तस्वीरें फैलाने जैसे अलग संज्ञेय अपराधों के लिए दर्ज कर सकती है।
क्या किसी कारोबार की नकारात्मक समीक्षा मानहानि है?
नहीं, अगर वह जनता के सामने रखे गए उत्पाद या सेवा पर आपकी ईमानदार राय है, या तथ्य का सच्चा बयान है। जो आपके साथ हुआ वह लिखें और "धोखेबाज़" या "चोर" जैसे लेबल तब तक न लगाएँ जब तक आप उन्हें साबित न कर सकें। गढ़ी हुई या पैसे लेकर लिखी समीक्षाएँ, जो झूठे तथ्य कहती हैं, मानहानिकारक हो सकती हैं।
रिपोर्ट किए गए कंटेंट को प्लेटफ़ॉर्म कितनी जल्दी हटाए?
फ़रवरी 2026 में संशोधित आईटी नियम, 2021 के तहत प्लेटफ़ॉर्म को बिना सहमति की नग्नता, यौन सामग्री या नक़ली पहचान को उपयोगकर्ता की शिकायत के 2 घंटे में हटाना है, बाक़ी शिकायत किए गए ग़ैरक़ानूनी कंटेंट को 36 घंटे में, हर शिकायत की पावती 24 घंटे में देनी है और 15 दिन में निपटारा करना है। ऐसा न हो तो 30 दिन के भीतर शिकायत अपील समिति में अपील करें।
भारत में मानहानि की सज़ा क्या है?
धारा 356 BNS के तहत दो साल तक की साधारण क़ैद, या जुर्माना, या दोनों, या सामुदायिक सेवा। यह अपराध ज़मानती और शमनीय (compoundable) है, यानी पक्ष अदालत की इजाज़त से समझौता कर सकते हैं। अलग से दीवानी अदालत हर्जाना दिला सकती है और कंटेंट हटाने का आदेश दे सकती है।
मुझे एक पोस्ट पर मानहानि का नोटिस मिला है। मैं क्या करूँ?
घबराएँ नहीं और सार्वजनिक जवाब न दें। अपनी पोस्ट और उसके पीछे के तथ्य सुरक्षित रखें, और नोटिस में दिए समय के भीतर वकील से सलाह लें। जनहित में सच, ईमानदार राय और सही प्राधिकारी से नेक नीयत की शिकायत पूरे बचाव हैं। मजिस्ट्रेट को शिकायत का संज्ञान लेने से पहले आपको सुनना होता है, इसलिए आपको शुरू में ही अपनी बात रखने का मौक़ा मिलेगा।
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।