Englishफ़ॉलो करें:
Delhi Police headquarters building in New Delhiनागरिक

फ़ोटो: Arjuncm3, Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0. सांकेतिक चित्र.

पुलिस के ख़िलाफ़ शिकायत: FIR से इनकार, बदसलूकी, हिरासत में ज़्यादती

न्याय पाठशाला7 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

पुलिस की शिकायत कहाँ करें: FIR न लिखने पर SP और मजिस्ट्रेट, पुलिस शिकायत प्राधिकरण, मानवाधिकार आयोग और अदालतें। क़दम, दस्तावेज़, हेल्पलाइन।

क़ानून: अनुच्छेद 21, 22 और 226, भारत का संविधान · धारा 36–38, 47–48, 53, 58, 173, 175(3) और 196 BNSS · धारा 120 और 199 BNS · D.K. Basu बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) · प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006)

संक्षेप में

  • FIR से इनकार? अपनी शिकायत लिखित में पुलिस अधीक्षक (SP) को भेजें (धारा 173(4) BNSS); वह भी न हो तो न्यायिक मजिस्ट्रेट को अर्ज़ी दें (धारा 175(3) BNSS)।
  • बदसलूकी, रिश्वत, ग़ैरक़ानूनी हिरासत? SP या कमिश्नर, राज्य के पुलिस शिकायत प्राधिकरण (Police Complaints Authority), और राज्य या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (मुफ़्त, ऑनलाइन, एक साल के भीतर) में शिकायत करें।
  • हिरासत में मौत या यातना? न्यायिक मजिस्ट्रेट की जाँच ज़रूरी है (धारा 196 BNSS); NHRC को 24 घंटे में सूचना देनी होती है; परिवार मुआवज़ा माँग सकता है।
  • नाम, बैज नंबर, तारीख़, समय और गवाह लिख लें। हर चीज़ की कॉपी रखें।
  • आपातकाल 112; महिलाएँ 181; मुफ़्त क़ानूनी सहायता 15100।

कुछ ग़लत होने पर सबसे पहले पुलिस के पास ही जाना होता है। ज़्यादातर अधिकारी भारी दबाव में अपना काम करते हैं। पर जब कोई अधिकारी आपकी शिकायत दर्ज करने से मना करे, अपमान करे, पैसे माँगे या हिरासत में बल प्रयोग करे, तो लग सकता है कि कहीं जाने की जगह नहीं। है। क़ानून आपको कई रास्ते देता है, और इन्हें इस्तेमाल करना ईमानदार अधिकारी की भी हिफ़ाज़त करता है।

पुलिस के साथ आपके बुनियादी अधिकार

  • संज्ञेय अपराध में FIR। संज्ञेय अपराध (cognizable offence) वह है जिसमें पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है, जैसे चोरी, मारपीट या बलात्कार। इसकी सूचना FIR के रूप में दर्ज होनी ही चाहिए (धारा 173 BNSS, पहले धारा 154 CrPC); ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2014) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दर्ज करना अनिवार्य है, और छोटी प्रारंभिक जाँच सिर्फ़ सीमित श्रेणियों में हो सकती है। आप किसी भी थाने में ("ज़ीरो FIR"), ईमेल से या राज्य पुलिस पोर्टल पर (तीन दिन में दस्तख़त करके) रिपोर्ट कर सकते हैं, और आपको मुफ़्त कॉपी मिलनी चाहिए।
  • गिरफ़्तारी पर अधिकार। अनुच्छेद 22 और BNSS के तहत आपको गिरफ़्तारी के आधार बताने होंगे (धारा 47), पुलिस को आपके बताए रिश्तेदार या दोस्त को सूचित करना होगा (धारा 48), आप पूछताछ के दौरान अपने वकील से मिल सकते हैं (धारा 38), आपकी मेडिकल जाँच होनी चाहिए (धारा 53), और आपको 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना होगा (धारा 58)। हर थाने को गिरफ़्तार लोगों और ज़िम्मेदार अधिकारियों के नाम प्रदर्शित करने होंगे (धारा 37)।
  • यातना से सुरक्षा। D.K. Basu बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) में सुप्रीम कोर्ट ने बाध्यकारी नियम बनाए: अधिकारी साफ़ दिखने वाले नाम-पट्ट पहनें, गिरफ़्तारी मेमो पर गवाह और गिरफ़्तार व्यक्ति के दस्तख़त हों, और मेडिकल जाँच हो। ये अब धारा 36 BNSS में हैं। इक़बालिया बयान निकलवाने के लिए चोट पहुँचाना अपराध है (धारा 120 BNS)।

क़दम दर क़दम: पुलिस FIR दर्ज करने से मना करे तो

  1. लिखित में माँगें, और सबूत रखें। लिखित शिकायत दें और मुहर लगी रसीद माँगें। मना करें तो अधिकारी का नाम और समय नोट करें।
  2. पुलिस अधीक्षक को लिखें (कमिश्नरेट में उपायुक्त को) धारा 173(4) BNSS के तहत, अपनी शिकायत का सार पंजीकृत डाक से भेजकर। SP ख़ुद जाँच कर सकता है या किसी अधिकारी को दर्ज करके जाँच का निर्देश दे सकता है। डाक रसीद रखें।
  3. न्यायिक मजिस्ट्रेट को अर्ज़ी दें धारा 175(3) BNSS के तहत, अगर SP भी कार्रवाई न करे। अपनी शिकायत, SP को भेजने का सबूत और शपथपत्र लगाएँ। मजिस्ट्रेट जाँच करके पुलिस को दर्ज करने और जाँच का आदेश दे सकता है।
  4. जानिए कि इनकार अपराध हो सकता है। जो अधिकारी बलात्कार, एसिड हमले और महिलाओं के ख़िलाफ़ अपराधों समेत कुछ तय गंभीर अपराधों की सूचना दर्ज नहीं करता, उस पर धारा 199 BNS (पहले धारा 166A IPC) के तहत मुक़दमा चल सकता है, जिसमें छह महीने से दो साल की क़ैद है।
सुझाव

थाने में शांति से बोलें और सिर्फ़ दो बातें कहें: "कृपया मेरी FIR दर्ज करें" और "कृपया मना करने वाले अधिकारी का नाम बताएँ।" बहुत से इनकार यहीं ख़त्म हो जाते हैं। फ़ोन हो तो हर चक्कर की तारीख़ और समय ख़ुद को मैसेज करके दर्ज कर लें।

कदाचार की शिकायत कहाँ करें

  • वरिष्ठ अधिकारी। बदसलूकी, देरी, बिना वजह हिरासत या रिश्वत की माँग के लिए SP, उपायुक्त या पुलिस आयुक्त को लिखें। कई राज्यों में ऑनलाइन शिकायत पोर्टल हैं; पावती संख्या माँगें।
  • पुलिस शिकायत प्राधिकरण (PCA)। प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) में सुप्रीम कोर्ट ने हर राज्य को निर्देश दिया कि पुलिस उपाधीक्षक और ऊपर के अधिकारियों की शिकायतों के लिए राज्य PCA और निचले पदों के लिए ज़िला PCA बनाए, सेवानिवृत्त जजों की अध्यक्षता में, गंभीर कदाचार देखने के लिए: हिरासत में मौत, गंभीर चोट, हिरासत में बलात्कार, ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तारी या हिरासत, वसूली और ज़मीन हड़पना। ज़्यादातर राज्यों ने इन्हें बनाया है, पर शक्तियाँ और कामकाज अलग-अलग हैं; विभागीय कार्रवाई या FIR के लिए इनकी सिफ़ारिशें आमतौर पर सरकार पर बाध्यकारी हैं।
  • राज्य या राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग। हिरासत में हिंसा, ग़ैरक़ानूनी हिरासत और पुलिस की निष्क्रियता की शिकायतें लेता है। कोई शुल्क नहीं, वकील की ज़रूरत नहीं, ऑनलाइन दाख़िल, घटना के एक साल के भीतर। यह मुआवज़े और मुक़दमे की सिफ़ारिश कर सकता है।
  • भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो। रिश्वत की माँग पर राज्य ACB ट्रैप की व्यवस्था कर सकता है।
  • हाई कोर्ट। अनुच्छेद 226 के तहत रिट से ग़ैरक़ानूनी हिरासत से रिहाई (बंदी प्रत्यक्षीकरण या habeas corpus, "शरीर को पेश करो"), अदालत की निगरानी में या CBI जाँच, या मुआवज़ा माँगा जा सकता है। क़ानूनी सलाह लें।

हिरासत में मौत, बलात्कार या ग़ायब होना

कोई व्यक्ति पुलिस हिरासत में मर जाए, ग़ायब हो जाए या उसके साथ बलात्कार का आरोप हो, तो सिर्फ़ पुलिस नहीं, न्यायिक मजिस्ट्रेट को जाँच करनी होगी (धारा 196 BNSS, पहले धारा 176 CrPC), शव की जाँच डॉक्टर करेगा, और परिवार को जाँच में मौजूद रहने का हक़ है। NHRC हर हिरासत मौत की सूचना 24 घंटे में माँगता है और पोस्टमार्टम की वीडियो रिकॉर्डिंग ज़रूरी करता है। परिवार लिखित में पोस्टमार्टम वीडियो, जाँच रिपोर्ट और स्वतंत्र जाँच माँगे। नीलाबती बेहरा बनाम उड़ीसा राज्य (1993) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हिरासत में जीवन के अधिकार का उल्लंघन होने पर राज्य को मुआवज़ा देना होगा।

उदाहरण

मेरठ में इमरान की दुकान में चोरी होती है। ड्यूटी अधिकारी "आपस में निपटा लो" कहकर FIR से मना कर देता है। इमरान एक पन्ने की शिकायत लिखते हैं, धारा 173(4) BNSS के तहत पंजीकृत डाक से SSP को भेजते हैं, और रसीद रखते हैं। दस दिन बाद कोई जवाब न आने पर वे धारा 175(3) BNSS के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने अर्ज़ी दायर करते हैं, शिकायत, डाक रसीद और शपथपत्र लगाकर। मजिस्ट्रेट थाने को FIR दर्ज करके जाँच का निर्देश देता है, और इमरान को हफ़्ते भर में मुफ़्त कॉपी मिल जाती है। वे अलग से SSP को अधिकारी के इनकार की शिकायत करते हैं, अपने चक्कर की तारीख़ और समय के साथ।

ये तैयार रखें

  • आपकी लिखित शिकायत, तारीख़ के साथ, थाने की मुहर के लिए एक कॉपी
  • अधिकारियों के नाम या बैज नंबर, थाना, हर चक्कर की तारीख़ और समय, गवाहों के नाम
  • SP को शिकायत भेजने की पंजीकृत डाक रसीद; मजिस्ट्रेट के लिए शपथपत्र
  • हिरासत के मामलों में: गिरफ़्तारी मेमो, मेडिकल जाँच रिपोर्ट, चोटों की फ़ोटो, अस्पताल या पोस्टमार्टम के काग़ज़
सावधान

इस इंतज़ार में न रहें कि पुलिस "मान जाएगी"। मानवाधिकार आयोग सामान्यतः एक साल से पुराना मामला नहीं लेते, और चोटों के सबूत और CCTV फ़ुटेज कुछ दिनों में मिट जाते हैं। पहली शिकायत पहले ही दिन लिखित में दें, और किसी चीज़ की अपनी इकलौती कॉपी कभी न सौंपें।

कहाँ जाएँ

  • थाना प्रभारी, फिर SP / उपायुक्त / पुलिस आयुक्त; फिर न्यायिक मजिस्ट्रेट (धारा 175(3) BNSS)
  • राज्य या ज़िला पुलिस शिकायत प्राधिकरण (प्रकाश सिंह के निर्देशों के तहत बना)
  • राज्य मानवाधिकार आयोग या NHRC: hrcnet.nic.in, हेल्पलाइन 14433
  • रिश्वत की माँग: राज्य भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो; महिलाएँ 181; बच्चे 1098; आपातकाल 112
  • मजिस्ट्रेट की अर्ज़ी या हाई कोर्ट रिट के लिए मुफ़्त वकील: 15100 (NALSA), ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

पुलिस मेरी FIR दर्ज करने से मना कर रही है। क्या करूँ?

अपनी शिकायत का सार धारा 173(4) BNSS के तहत पंजीकृत डाक से लिखित में पुलिस अधीक्षक को भेजें। SP कार्रवाई न करे तो धारा 175(3) BNSS के तहत न्यायिक मजिस्ट्रेट को शिकायत, डाक रसीद और शपथपत्र के साथ अर्ज़ी दें; मजिस्ट्रेट दर्ज करने और जाँच का आदेश दे सकता है। आप किसी दूसरे थाने में ज़ीरो FIR के रूप में भी रिपोर्ट कर सकते हैं।

क्या पुलिस अधिकारी के ख़िलाफ़ ऑनलाइन शिकायत कर सकते हैं?

हाँ। ज़्यादातर राज्य पुलिस वेबसाइटों पर अधिकारियों के ख़िलाफ़ शिकायत का हिस्सा है, और राष्ट्रीय व राज्य मानवाधिकार आयोग hrcnet.nic.in पर बिना शुल्क ऑनलाइन शिकायतें लेते हैं। कई पुलिस शिकायत प्राधिकरण ईमेल या डाक से भी शिकायत लेते हैं। पावती संख्या हमेशा नोट करें और लिखित में फ़ॉलो-अप करें।

पुलिस शिकायत प्राधिकरण क्या है और कब इस्तेमाल करें?

यह वह स्वतंत्र संस्था है जिसे बनाने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह (2006) में राज्यों को दिया, सेवानिवृत्त जज की अध्यक्षता में, गंभीर कदाचार जैसे हिरासत में मौत, गंभीर चोट, हिरासत में बलात्कार, ग़ैरक़ानूनी हिरासत या वसूली के लिए। इसे वरिष्ठ अधिकारियों की शिकायत के साथ-साथ इस्तेमाल करें। इसकी बनावट और शक्तियाँ राज्य के हिसाब से अलग हैं; पता अपने राज्य की पुलिस या गृह विभाग की वेबसाइट पर देखें।

मेरे रिश्तेदार को हवालात में पीटा गया। सबसे पहले क्या करूँ?

तुरंत मेडिकल जाँच पर ज़ोर दें और रिपोर्ट लें; चोटों की तारीख़ वाली फ़ोटो लें। पक्का करें कि गिरफ़्तारी मेमो बना है और व्यक्ति 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश हो, और मजिस्ट्रेट को चोटों के बारे में बताएँ। फिर SP, पुलिस शिकायत प्राधिकरण और मानवाधिकार आयोग को लिखित शिकायत करें, और वकील के लिए 15100 पर कॉल करें। इक़बालिया बयान निकलवाने के लिए चोट पहुँचाना धारा 120 BNS के तहत अपराध है।

क्या ग़ैरक़ानूनी हिरासत या हिरासत में हिंसा का मुआवज़ा मिल सकता है?

हाँ। मानवाधिकार आयोग मुआवज़े की सिफ़ारिश कर सकते हैं, और हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट रिट याचिका में सीधे मुआवज़ा दे सकते हैं, जैसा सुप्रीम कोर्ट ने नीलाबती बेहरा (1993) और D.K. Basu (1997) में किया। मुआवज़ा अधिकारियों पर आपराधिक मुक़दमे या विभागीय कार्रवाई को नहीं रोकता।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

क्या यह लेख उपयोगी था?कोई ग़लती दिखी? हमें बताएँ

हर हफ़्ते एक सरल क़ानूनी लेख पाएँ

आपके अधिकारों पर नए लेख, सीधे आपके ईमेल पर। कोई स्पैम नहीं।