Englishफ़ॉलो करें:
Iron bars of an empty prison cellस्वाधीनता

फ़ोटो: Jobs For Felons Hub, Wikimedia Commons, CC BY 2.0. सांकेतिक चित्र.

भारत में क़ैदियों के अधिकार: परिवार के लिए गाइड

न्याय पाठशाला8 मिनट✓ समीक्षा और अद्यतन: अक्टूबर 2026Read in English

सलाखों के पीछे क़ैदी के पास क्या बचता है: गरिमा, इलाज, मुफ़्त वकील, मुलाक़ात, मज़दूरी, पैरोल, धारा 479 BNSS से विचाराधीन की रिहाई, और शिकायत कैसे करें।

क़ानून: अनुच्छेद 14, 21 और 39A, भारत का संविधान · धारा 479 BNSS · राज्यों के जेल क़ानून और मैनुअल · Sunil Batra v. Delhi Administration (1978)

संक्षेप में

  • जेल घूमने-फिरने की आज़ादी छीनती है, मौलिक अधिकार नहीं। यातना, जाति के आधार पर काम और रूटीन में एकांत क़ैद ग़ैरक़ानूनी हैं।
  • हर क़ैदी को मुफ़्त वकील (अनुच्छेद 39A), इलाज, भोजन, परिवार से संपर्क और अपील के लिए फ़ैसले की मुफ़्त कॉपी का अधिकार है।
  • विचाराधीन क़ैदी (undertrial, यानी जिसका मुक़दमा चल रहा है) को अपराध की अधिकतम सज़ा का आधा समय काटने पर बॉन्ड पर छोड़ना होगा; पहली बार के आरोपी को एक-तिहाई पर (धारा 479 BNSS)।
  • शिकायत का क्रम: जेल अधीक्षक, विज़िटिंग जज, जेल का क़ानूनी सहायता क्लिनिक, मानवाधिकार आयोग, हाई कोर्ट।
  • परिवार: मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें और अदालत का हर काग़ज़ एक फ़ाइल में रखें।

जेल की सज़ा किसी इंसान की घूमने-फिरने की आज़ादी छीनती है। उसकी इंसानियत नहीं छीनती। भारतीय अदालतें साफ़ कह चुकी हैं कि मौलिक अधिकार जेल के फाटक पर ख़त्म नहीं होते। यह लेख बताता है कि ये अधिकार क्या हैं, राज्य-दर-राज्य क्या अलग है, और क़ैदी या उसका परिवार इनका इस्तेमाल कैसे करे।

अदालतों ने क्या कहा है

Sunil Batra v. Delhi Administration (1978) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि क़ैदियों के मौलिक अधिकार बने रहते हैं और जेलों में क्रूरता रोकने के लिए अदालतें दख़ल दे सकती हैं। Charles Sobhraj v. Superintendent, Central Jail, Tihar (1978) में उसने कहा कि क़ैदियों के पास सभी अधिकार रहते हैं, सिवाय उनके जो क़ानूनी क़ैद की वजह से ज़रूरी तौर पर चले जाते हैं। Prem Shankar Shukla v. Delhi Administration (1980) में कहा कि हथकड़ी अपवाद होनी चाहिए, नियम नहीं।

Sukanya Shantha v. Union of India (2024) में कोर्ट ने जेल मैनुअल के उन नियमों को रद्द किया जो सफ़ाई या रसोई का काम जाति के आधार पर बाँटते थे, या जाति या जनजाति के आधार पर क़ैदियों को "आदतन अपराधी" मानकर अलग रखते थे। उसने सभी राज्यों को मैनुअल बदलने और जेल रजिस्टरों से जाति का कॉलम हटाने का निर्देश दिया।

जेल के नियम कौन बनाता है

जेलें राज्य का विषय हैं, इसलिए हर राज्य का अपना जेल अधिनियम, नियम और मैनुअल है। कई राज्यों में आज भी कारागार अधिनियम, 1894 आधार है। केंद्र सरकार ने राज्यों के अपनाने के लिए मॉडल जेल मैनुअल (2016) और मॉडल कारागार एवं सुधार सेवा अधिनियम, 2023 भेजा है, और अपनाना अलग-अलग है। इसलिए मुलाक़ात का समय, फ़ोन कॉल, पैरोल और सज़ा में छूट (remission) राज्य-दर-राज्य अलग हैं। जेल से उसके नियम माँगें, या राज्य के कारागार विभाग की वेबसाइट देखें।

हर क़ैदी के पास बने रहने वाले अधिकार

  • गरिमा और सुरक्षा। न यातना, न क्रूर सज़ा, न अपमानजनक व्यवहार। एकांत क़ैद (solitary confinement) और बेड़ियाँ सिर्फ़ बहुत सीमित मामलों में, और अदालतों ने इन्हें सख़्ती से सीमित किया है।
  • स्वास्थ्य। पर्याप्त भोजन, साफ़ पानी, स्वच्छता और इलाज। गंभीर रूप से बीमार क़ैदी को बाहर के अस्पताल भेजा जा सकता है, और बीमारी अंतरिम ज़मानत का आधार हो सकती है।
  • क़ानूनी सहायता। पैसे न हों तो मुफ़्त वकील (अनुच्छेद 39A)। हर जेल में ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) का क़ानूनी सहायता क्लिनिक होना चाहिए, जहाँ पैरा-लीगल वॉलंटियर ज़मानत और अपील की अर्ज़ियाँ बनाने में मदद करते हैं।
  • समानता। जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के आधार पर कोई भेदभाव नहीं (अनुच्छेद 14)।
  • परिवार से संपर्क। चिट्ठियाँ, मुलाक़ात, और फ़ोन या वीडियो कॉल, राज्य के नियमों के अनुसार। कई जेलें अब राष्ट्रीय कारागार सूचना पोर्टल पर ई-मुलाक़ात से मुलाक़ात की बुकिंग लेती हैं।
  • मज़दूरी। काम करने वाले क़ैदियों को मज़दूरी मिलनी चाहिए। State of Gujarat v. High Court of Gujarat (1998) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि श्रम करने वाले क़ैदी उचित मज़दूरी के हक़दार हैं।
  • अपील। दोषी को फ़ैसले की मुफ़्त कॉपी मिलनी चाहिए और वह अपील कर सकता है; क़ानूनी सहायता वकील जेल से ही अपील दाख़िल कर सकता है।
  • पैरोल और फ़र्लो। पारिवारिक आपात स्थिति में, या सज़ा का कुछ हिस्सा काटने के बाद, राज्य के नियमों के तहत अस्थायी रिहाई। अधीक्षक को लिखित अर्ज़ी दें; मना होने पर हाई कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

महिला क़ैदियों को अलग रखा जाना चाहिए और महिला कर्मचारी ही उनकी निगरानी करें। ज़्यादातर राज्यों के नियमों में छह साल तक का बच्चा माँ के साथ रह सकता है। गर्भवती क़ैदी इलाज की हक़दार हैं, और अदालतों ने प्रसव के लिए ज़मानत या सज़ा का निलंबन दिया है।

विचाराधीन क़ैदी: धारा 479 BNSS का रिहाई का अधिकार

भारत की जेलों में हर चार में से लगभग तीन क़ैदी विचाराधीन हैं। धारा 479 BNSS (पहले धारा 436A CrPC, अब ज़्यादा व्यापक) कहती है कि जिस विचाराधीन क़ैदी ने अपराध की अधिकतम सज़ा का आधा समय हिरासत में बिता लिया है, उसे बॉन्ड पर छोड़ना होगा, और पहली बार के आरोपी (जिसे पहले कभी सज़ा न हुई हो) को अधिकतम का एक-तिहाई बिताने पर। यह मौत या उम्रक़ैद की सज़ा वाले अपराधों पर, या जहाँ एक से ज़्यादा मामले लंबित हों, लागू नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त 2024 में कहा कि यह नियम सभी विचाराधीन क़ैदियों पर लागू है, 1 जुलाई 2024 से पहले दर्ज मामलों में भी, और जेल अधीक्षकों को निर्देश दिया कि वे पात्र क़ैदियों की पहचान करके ख़ुद अर्ज़ी दें।

सुझाव

चार्जशीट से अपराध की अधिकतम सज़ा निकालें, उसे दो से (पहली बार के आरोपी के लिए तीन से) भाग दें, और हिरासत की अवधि से मिलाएँ। अवधि पूरी हो गई हो तो जेल के क़ानूनी सहायता क्लिनिक या DLSA से तुरंत धारा 479 की अर्ज़ी लगवाएँ।

क़ैदी क्या नहीं कर सकते

धारा 62(5), लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 के तहत क़ैदी, चाहे दोषी हों या विचाराधीन, वोट नहीं दे सकते, हालाँकि निवारक निरोध (preventive detention) में रखे व्यक्ति डाक मतपत्र से वोट दे सकते हैं। दोषी व्यक्ति सेवा नियमों के तहत सरकारी नौकरी जैसे कुछ लाभ भी खो सकता है।

क़दम दर क़दम: शिकायत कैसे करें

  1. जेल अधीक्षक को लिखें। हर जेल में शिकायत पेटी या शिकायत रजिस्टर होता है। शिकायत छोटी और तारीख़ सहित रखें; परिवार का सदस्य कॉपी रजिस्टर्ड डाक से भेज सकता है।
  2. विज़िटिंग जज को बताएँ। न्यायिक अधिकारी और ज़िला जज समय-समय पर जेल का दौरा करते हैं। क़ैदी सीधे उनसे शिकायत कर सकते हैं।
  3. जेल के क़ानूनी सहायता क्लिनिक का इस्तेमाल करें या DLSA सचिव (दफ़्तर ज़िला अदालत परिसर में) को लिखें। परिवार 15100 पर कॉल कर सकता है।
  4. मानवाधिकार आयोग। राष्ट्रीय या राज्य मानवाधिकार आयोग दुर्व्यवहार, इलाज न मिलने और हिरासत में मौत की जाँच कर सकता है। शिकायत ऑनलाइन या डाक से की जा सकती है।
  5. हाई कोर्ट। अदालतों ने क़ैदियों की चिट्ठियों को याचिका माना है। वकील अनुच्छेद 226 के तहत इलाज, पैरोल, तबादले या मुआवज़े के लिए रिट याचिका भी दायर कर सकता है।
उदाहरण

32 साल का सुरेश बिहार की एक ज़िला जेल में 22 महीने से मुक़दमे के इंतज़ार में बंद है; अपराध में अधिकतम पाँच साल की सज़ा है। उसे पहले कभी सज़ा नहीं हुई। उसकी बहन कविता जेल के क़ानूनी सहायता क्लिनिक में पैरा-लीगल वॉलंटियर से मिलती है, जो समझाते हैं कि पहली बार के आरोपी के तौर पर सुरेश 20 महीने (पाँच साल का एक-तिहाई) बाद ही धारा 479 BNSS के तहत रिहाई का पात्र हो गया था। DLSA का वकील जेल से हिरासत प्रमाणपत्र लेकर अर्ज़ी दाख़िल करता है। अदालत दो हफ़्ते के भीतर सुरेश को निजी बॉन्ड पर छोड़ देती है, और मुक़दमा घर रहते हुए चलता रहता है।

ये तैयार रखें

  • FIR नंबर, केस नंबर, अदालत का नाम और क़ैदी का जेल नंबर
  • चार्जशीट की कॉपी (अधिकतम सज़ा जानने के लिए) और हर ज़मानत या रिमांड आदेश
  • जेल से हिरासत प्रमाणपत्र (custody certificate), जिसमें दाख़िले की तारीख़ हो
  • मेडिकल काग़ज़, पर्चे और इलाज की हर माँग की तारीख़
  • जेल को भेजी हर शिकायत की कॉपी, डाक रसीद के साथ
सावधान

ज़मानत, पैरोल या तबादले का वादा करके पैसे माँगने वाले "एजेंटों" को पैसे न दें। जेल के अंदर का क़ानूनी सहायता क्लिनिक और DLSA मुफ़्त हैं। कोई जेल अधिकारी मुलाक़ात या फ़ोन कॉल के लिए पैसे माँगे, तो अधीक्षक और मानवाधिकार आयोग को शिकायत करें।

कहाँ जाएँ

  • जेल अधीक्षक (शिकायत पेटी या लिखित अर्ज़ी), फिर विज़िटिंग जज
  • जेल का क़ानूनी सहायता क्लिनिक, ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण, या NALSA हेल्पलाइन 15100
  • राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग या राज्य मानवाधिकार आयोग
  • हाई कोर्ट, अनुच्छेद 226 के तहत; पैरोल नियमों और मुलाक़ात बुकिंग के लिए राज्य कारागार विभाग की वेबसाइट
  • बुज़ुर्ग क़ैदी के परिवार के लिए वरिष्ठ नागरिक हेल्पलाइन 14567; जेल में माँ के साथ रह रहे बच्चे के लिए 1098

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

विचाराधीन क़ैदी को बिना मुक़दमे के कितने समय तक जेल में रखा जा सकता है?

धारा 479 BNSS के तहत विचाराधीन क़ैदी को अपराध की अधिकतम सज़ा का आधा समय काटने पर बॉन्ड पर छोड़ना होगा, और पहली बार के आरोपी को एक-तिहाई पर। यह मौत या उम्रक़ैद की सज़ा वाले अपराधों पर, या जहाँ कई मामले लंबित हों, लागू नहीं होता। इसके अलावा, गिरफ़्तारी के 60 या 90 दिन में चार्जशीट दाख़िल न हो तो डिफ़ॉल्ट ज़मानत का अधिकार बनता है।

क्या क़ैदी चुनाव में वोट दे सकते हैं?

नहीं। लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 की धारा 62(5) जेल में बंद किसी भी व्यक्ति को, दोषी हो या विचाराधीन, वोट देने से रोकती है। निवारक निरोध क़ानूनों के तहत बंद व्यक्ति डाक मतपत्र से वोट दे सकते हैं। क़ैदी का नाम मतदाता सूची में बना रहता है।

जेल में बंद रिश्तेदार से मुलाक़ात या फ़ोन पर बात कैसे करें?

हर राज्य के जेल नियम मुलाक़ातों (आमतौर पर हफ़्ते या पखवाड़े में) और फ़ोन कॉल की संख्या तय करते हैं। फ़ोटो पहचान पत्र साथ रखें। कई राज्य राष्ट्रीय कारागार सूचना पोर्टल पर ई-मुलाक़ात से बुकिंग लेते हैं, और कुछ वीडियो कॉल की इजाज़त देते हैं। स्थानीय नियम जेल के विज़िटर काउंटर से पूछें।

पैरोल और फ़र्लो में क्या फ़र्क़ है?

पैरोल किसी ख़ास वजह से, जैसे परिवार में मौत या गंभीर बीमारी, अस्थायी रिहाई है, और यह अवधि आमतौर पर सज़ा में नहीं गिनी जाती। फ़र्लो सज़ा का कुछ हिस्सा काटने के बाद समय-समय पर मिलने वाली रिहाई है, जिसके लिए कारण नहीं देना पड़ता, और यह आमतौर पर सज़ा में गिनी जाती है। दोनों राज्य के नियमों से चलते हैं और जेल या सरकारी अधिकारी मंज़ूर करते हैं।

क़ैदी को इलाज नहीं मिल रहा। परिवार क्या करे?

जेल अधीक्षक को सरकारी अस्पताल रेफ़र करने के लिए लिखें और कॉपी रखें। जवाब न मिले तो DLSA या वकील ट्रायल कोर्ट या हाई कोर्ट में अर्ज़ी दे सकता है, जो इलाज या अंतरिम ज़मानत का आदेश दे सकता है। मानवाधिकार आयोग भी इलाज न मिलने की शिकायतें लेता है।

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

क्या यह लेख उपयोगी था?कोई ग़लती दिखी? हमें बताएँ

हर हफ़्ते एक सरल क़ानूनी लेख पाएँ

आपके अधिकारों पर नए लेख, सीधे आपके ईमेल पर। कोई स्पैम नहीं।