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Delhi Police headquarters building in New Delhiस्वतंत्रता

फ़ोटो: Arjuncm3, Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0. सांकेतिक चित्र.

कार्यकारी मजिस्ट्रेट के आदेश पर जेल: CJP नेताओं की पाँच दिन की हिरासत के पीछे का क़ानून

लेखक: वसी उल्लाहसह-संपादक, Nyaya Pathshala · 14 अक्टूबर 2026
विश्लेषण8 मिनटRead in English

जंतर-मंतर पर विरोध के बाद सौरव दास और आशुतोष रांका को पाँच दिन के लिए तिहाड़ भेजा गया। “शांति बॉन्ड” क्या है, कार्यकारी मजिस्ट्रेट के पास असल में कितनी शक्ति है, और यह आदेश कौन-से सवाल उठाता है।

क़ानून: भारत का संविधान, अनुच्छेद 19, 21 और 22 · धारा 126, 135, 136 और 141 BNSS · धारा 221, 223 और 329 BNS

संक्षेप में

  • 14 अक्टूबर 2026 को दिल्ली के एक विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के नेताओं सौरव दास और आशुतोष रांका को पाँच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। पुलिस का कहना है कि दोनों ने कुछ दिन पहले भरा गया एक साल का “शांति बॉन्ड” तोड़ा, और विरोध-स्थल के रूप में अधिसूचना रद्द होने के एक दिन बाद जंतर-मंतर में अनधिकृत प्रवेश किया।
  • कार्यकारी मजिस्ट्रेट सरकार का अधिकारी होता है, न्यायाधीश नहीं। यहाँ इस्तेमाल हुई शक्ति निवारक है: इसका मक़सद शांति भंग को रोकना है, सज़ा देना नहीं।
  • धारा 141 BNSS के तहत बॉन्ड तोड़ने वाले को बॉन्ड की अवधि ख़त्म होने तक जेल भेजा जा सकता है, लेकिन तभी जब उल्लंघन “साबित” हो और मजिस्ट्रेट उसके कारण लिखित में दर्ज करे।
  • अलग से दर्ज एफ़आईआर के अपराध (अनधिकृत प्रवेश, आदेश की अवहेलना, लोक सेवक के काम में बाधा) छोटी सज़ा वाले हैं। ऐसे अपराधों में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ज़मानत नियम है।
  • इस तरह हिरासत में रखा गया व्यक्ति सत्र न्यायालय या हाईकोर्ट में पुनरीक्षण माँग सकता है, और हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण (हेबियस कॉर्पस) याचिका दे सकता है।

जंतर-मंतर पर तिरंगा लहराने वाले दो युवा आज तिहाड़ जेल में हैं। उन्हें किसी जज ने मुक़दमे के बाद जेल नहीं भेजा। उन्हें एक कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने ऐसी कार्यवाही में भेजा, जिसके बारे में ज़्यादातर नागरिकों ने कभी सुना भी नहीं। CJP की राजनीति के बारे में कोई कुछ भी सोचे, यह आदेश क़ानूनी नज़र से ध्यान से पढ़ने लायक़ है, क्योंकि यही शक्ति विरोध करने वाले किसी भी व्यक्ति के ख़िलाफ़ इस्तेमाल हो सकती है।

क्या हुआ

PTI द्वारा उद्धृत पुलिस सूत्रों के अनुसार, CJP नेता सौरव दास, आशुतोष रांका और अजिंक्य शिंदे मंगलवार, 13 अक्टूबर 2026 की सुबह-सुबह बैरिकेड पार करके बिना अनुमति जंतर-मंतर में दाख़िल हुए। उन्होंने मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) में कथित गड़बड़ियों को लेकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े की माँग में नारे लगाए। एक दिन पहले ही जंतर-मंतर की विरोध-स्थल के रूप में अधिसूचना रद्द हुई थी।

इससे कुछ दिन पहले, एक पिछले विरोध के बाद, दास और रांका ने एक साल तक शांति बनाए रखने का बॉन्ड भरा था। पुलिस ने जंतर-मंतर में प्रवेश को उस बॉन्ड का उल्लंघन माना। बुधवार, 14 अक्टूबर को मंदिर मार्ग स्थित विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट ने दोनों को पाँच दिन की न्यायिक हिरासत में भेज दिया। शिंदे को बॉन्ड पर छोड़ दिया गया। पुलिस ने अनधिकृत प्रवेश, निषेधाज्ञा के उल्लंघन, बॉन्ड तोड़ने और लोक सेवकों के काम में बाधा डालने का मामला भी दर्ज किया है।

पार्टी का पक्ष अलग है। पार्टी की क़ानूनी प्रमुख रत्ना सिंह का कहना है कि नेताओं को रात क़रीब 3 बजे एक निजी वैन में थाने ले जाया गया और देर रात तक वकीलों से मिलने नहीं दिया गया। संस्थापक अभिजीत दिपके ने कहा कि उनकी “ग़लती” बस जंतर-मंतर पर तिरंगा फहराना थी। ये दावे हैं, जिनकी अभी अदालत में जाँच नहीं हुई है।

कार्यकारी मजिस्ट्रेट कौन होता है?

भारत में दो तरह के मजिस्ट्रेट होते हैं। न्यायिक मजिस्ट्रेट अदालत का हिस्सा हैं। वे मुक़दमे चलाते हैं, अपराधों का संज्ञान लेते हैं और ज़मानत देते हैं। कार्यकारी मजिस्ट्रेट, जैसे ज़िलाधिकारी, एसडीएम और तहसीलदार, सरकार के अधिकारी होते हैं जो सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखते हैं। राज्य किसी इलाक़े या काम के लिए विशेष कार्यकारी मजिस्ट्रेट भी नियुक्त कर सकता है। दिल्ली में ये शक्तियाँ आमतौर पर वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को दी जाती रही हैं।

चिंता की जड़ यही है। जब प्रदर्शनकारी को हिरासत में लेने वाला ही यह तय करे कि उसने “शांति भंग” की या नहीं, तो पुलिस और जज के बीच का फ़र्क़ धुँधला हो जाता है। इसीलिए अदालतों ने इन शक्तियों को हमेशा सख़्ती से पढ़ा है।

“शांति बॉन्ड” क्या है?

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) का अध्याय IX कार्यकारी मजिस्ट्रेट को किसी व्यक्ति से शांति बनाए रखने का बॉन्ड भरवाने की अनुमति देता है। इसके चरण हैं:

  • सूचना: धारा 126 BNSS (पुरानी धारा 107 CrPC) के तहत मजिस्ट्रेट के पास यह सूचना होनी चाहिए कि वह व्यक्ति शांति भंग कर सकता है या सार्वजनिक शांति बिगाड़ सकता है।
  • कारण बताओ: मजिस्ट्रेट को लिखित आदेश जारी करना होगा, जिसमें सूचना का सार हो और पूछा जाए कि बॉन्ड क्यों न लिया जाए।
  • जाँच: धारा 135 BNSS के तहत मजिस्ट्रेट सूचना की सच्चाई की जाँच करता है। जाँच के दौरान अंतरिम बॉन्ड माँगा जा सकता है।
  • अंतिम आदेश: धारा 136 BNSS के तहत बॉन्ड अधिकतम एक साल के लिए तय हो सकता है।
  • उल्लंघन: धारा 141(1)(b) BNSS (पुरानी धारा 122 CrPC) के तहत, यदि बॉन्ड का उल्लंघन “मजिस्ट्रेट की संतुष्टि तक साबित” हो जाए, तो मजिस्ट्रेट “उस सबूत के आधार दर्ज करने के बाद” व्यक्ति को बॉन्ड की अवधि ख़त्म होने तक जेल में रखने का आदेश दे सकता है।

अब तक की ख़बरों में यह नहीं बताया गया है कि पाँच दिन का आदेश किस प्रावधान के तहत दिया गया। यह फ़र्क़ अहम है। धारा 141 के तहत हिरासत उल्लंघन के दर्ज सबूत पर ही टिकी होनी चाहिए, और व्यक्ति को पहले सुना जाना चाहिए।

एक उदाहरण। मोहल्ले में झगड़े के बाद रमेश से छह महीने का शांति बॉन्ड भरवाया जाता है। दो महीने बाद पुलिस कहती है कि वह एक मारपीट में शामिल था। उल्लंघन के लिए जेल भेजने से पहले मजिस्ट्रेट को रमेश को सुनना होगा, सबूत देखने होंगे और लिखना होगा कि उल्लंघन क्यों साबित है। बिना इस जाँच के सिर्फ़ पुलिस रिपोर्ट काफ़ी नहीं है।

रोकथाम, सज़ा नहीं

मधु लिमये बनाम एसडीएम, मुंगेर (1970) में सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि ये प्रावधान शांति भंग को रोकने के लिए हैं, सज़ा देने के लिए नहीं। चूँकि ये व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर रोक लगाते हैं, इसलिए प्रक्रिया का हर क़दम सख़्ती से मानना होगा। हाईकोर्ट बार-बार ऐसे बॉन्ड और हिरासत आदेश रद्द करते रहे हैं जो यांत्रिक ढंग से या बिना कारण दिए पारित हुए।

CJP आदेश पर पहला सवाल यहीं से उठता है। जो विरोध ख़त्म हो चुका, उसके बाद पाँच दिन की जेल रोकथाम कम और सज़ा ज़्यादा लगती है। अगर असली चिंता अनधिकृत प्रवेश की थी, तो वह आपराधिक मामले का विषय है, जो न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने ज़मानत के सामान्य नियमों के साथ चलना चाहिए।

आपराधिक मामला और ज़मानत

एफ़आईआर में बताए गए अपराध हैं: आपराधिक अतिचार (धारा 329 BNS), लोक सेवक के काम में बाधा (धारा 221 BNS) और लोक सेवक के आदेश की अवहेलना (धारा 223 BNS)। सभी में अधिकतम सज़ा कम है। धारा 223 के अपराध का संज्ञान अदालत संबंधित लोक सेवक की लिखित शिकायत पर ही ले सकती है (धारा 215 BNSS)।

सतेंदर कुमार अंतिल बनाम सीबीआई (2022) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे अपराधों में जेल अपवाद और ज़मानत नियम होनी चाहिए। जब आपराधिक मामला ख़ुद हिरासत को सही न ठहराए, तब बॉन्ड की कार्यवाही से किसी को जेल में रखना इस फ़ैसले से मेल नहीं खाता।

जंतर-मंतर पर विरोध का अधिकार

शांतिपूर्ण सभा अनुच्छेद 19(1)(a) और 19(1)(b) के तहत मौलिक अधिकार है, जिस पर सार्वजनिक व्यवस्था के लिए उचित प्रतिबंध लग सकते हैं। मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जंतर-मंतर और बोट क्लब पर विरोध पर पूरी तरह रोक नहीं लगाई जा सकती, और पुलिस से ऐसे दिशानिर्देश बनाने को कहा जो प्रदर्शनकारियों और निवासियों दोनों के अधिकारों में संतुलन रखें। अमित साहनी बनाम पुलिस आयुक्त (2020) में अदालत ने कहा कि विरोध तय जगहों पर होना चाहिए और सार्वजनिक रास्तों पर अनिश्चित काल तक क़ब्ज़ा नहीं किया जा सकता।

9 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से बुनियादी सुविधाओं वाली कोई उपयुक्त वैकल्पिक जगह तय करने पर विचार करने को कहा। कुछ दिन बाद जंतर-मंतर की अधिसूचना रद्द कर दी गई। नई जगहें लोगों को दिखने और सुने जाने का असली मौक़ा देती हैं या नहीं, यह जायज़ सवाल है। जिस विरोध को ऐसी जगह धकेल दिया जाए जहाँ उसे कोई देख-सुन ही न सके, उसका मतलब काफ़ी हद तक ख़त्म हो जाता है।

दूसरा पक्ष

पुलिस के पक्ष में भी वज़न है। प्रदर्शनकारियों ने कुछ ही दिन पहले बॉन्ड भरा था। आरोप है कि उन्होंने रात में ताले लगे गेट और बैरिकेड पार किए, ऐसी जगह पर जो अब विरोध-स्थल नहीं थी, और ऐसे समय जब राजधानी में सुरक्षा कड़ी थी। क़ानून बॉन्ड तोड़ने वाले को हिरासत में रखने की अनुमति देता है। अगर मजिस्ट्रेट ने उन्हें सुना, सबूत जाँचे और कारण दर्ज किए, तो आदेश टिक भी सकता है। मुद्दा यह नहीं कि आदेश ज़रूर ग़लत है। मुद्दा यह है कि स्वतंत्रता सिर्फ़ प्रक्रिया का पूरी तरह पालन करके ही छीनी जा सकती है।

गिरफ़्तारी के समय अधिकार

अनुच्छेद 22(1) हर गिरफ़्तार व्यक्ति को गिरफ़्तारी के कारण जानने और अपनी पसंद के वकील से सलाह लेने का अधिकार देता है। धारा 38 BNSS पूछताछ के दौरान वकील से मिलने की अनुमति देती है, और डी.के. बसु दिशानिर्देशों के तहत गिरफ़्तारी दर्ज करना और परिजन को सूचित करना ज़रूरी है। अगर पार्टी के आरोप के मुताबिक़ नेताओं को दिन के ज़्यादातर समय वकीलों से नहीं मिलने दिया गया, तो बॉन्ड आदेश सही हो या ग़लत, यह गंभीर चूक है।

अब क्या किया जा सकता है

  • पुनरीक्षण: आदेश को सत्र न्यायालय या हाईकोर्ट में पुनरीक्षण के ज़रिए चुनौती दी जा सकती है।
  • रिट: अगर हिरासत का क़ानूनी आधार नहीं है या प्रक्रिया नहीं मानी गई, तो अनुच्छेद 226 के तहत हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दी जा सकती है।
  • एफ़आईआर मामले में ज़मानत: आपराधिक मामले में न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने अलग से ज़मानत अर्ज़ी दी जा सकती है।

और पढ़ें: विरोध का आपका अधिकार, गिरफ़्तारी के समय आपके अधिकार और ज़मानत नियम क्यों है।

अगर आपसे शांति बॉन्ड भरने को कहा जाए: लिखित कारण बताओ आदेश माँगें और अपने ख़िलाफ़ “सूचना का सार” पढ़ें। आपको सुने जाने और वकील रखने का अधिकार है। आदेश में लिखी अवधि से ज़्यादा का बॉन्ड न भरें। मुफ़्त क़ानूनी सहायता: 15100।

आम सवाल

क्या कार्यकारी मजिस्ट्रेट किसी को जेल भेज सकता है?

केवल सीमित निवारक स्थितियों में: जैसे जब कोई व्यक्ति BNSS के अध्याय IX के तहत आदेशित ज़मानत (सिक्योरिटी) न दे, या जब शांति बॉन्ड का उल्लंघन साबित हो और धारा 141 के तहत कारण दर्ज हों। कार्यकारी मजिस्ट्रेट किसी अपराध का मुक़दमा नहीं चला सकता और न ही किसी को दोषी ठहरा सकता है।

न्यायिक हिरासत और पुलिस हिरासत में क्या फ़र्क़ है?

पुलिस हिरासत में व्यक्ति थाने में रहता है और उससे पूछताछ हो सकती है। न्यायिक हिरासत में व्यक्ति अदालत या मजिस्ट्रेट के आदेश पर जेल में रहता है, और पूछताछ के लिए पुलिस को अनुमति लेनी होती है।

शांति बॉन्ड तोड़ने पर कितने समय तक जेल हो सकती है?

धारा 141(1)(b) BNSS के तहत अधिकतम सीमा बॉन्ड की बची हुई अवधि है। धारा 136 के तहत बॉन्ड एक साल से ज़्यादा का नहीं हो सकता। किसी भी हिरासत से पहले उल्लंघन साबित होना और कारण दर्ज होना ज़रूरी है।

क्या तय जगह के बाहर विरोध करना अपराध है?

विरोध करना अपने-आप में अपराध नहीं है। लेकिन अगर धारा 163 BNSS के तहत निषेधाज्ञा लागू है, तो उसकी अवहेलना धारा 223 BNS के तहत अपराध है। बंद या प्रतिबंधित जगह में घुसना आपराधिक अतिचार भी हो सकता है।

स्रोत

  1. Business Standard / PTI, 14 Oct 2026
  2. The Quint, 14 Oct 2026
  3. Deccan Herald, 14 Oct 2026
  4. ThePrint / PTI, 9 Oct 2026 (Supreme Court on an alternative protest venue)

यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।

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