रात 11 बजे भी सुरक्षित: महिलाओं की सुरक्षा राज्य का कर्तव्य है, महिलाओं पर कर्फ़्यू नहीं
कालकाजी पार्क की घटना और दिल्ली-एनसीआर के कई मामलों के बाद सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर महिला को रात 11 बजे भी सुरक्षित महसूस होना चाहिए। क़ानून पीड़िताओं से पहले से क्या वादा करता है, और गेट बंद करना या महिलाओं को दोष देना ग़लत जवाब क्यों है।
संक्षेप में
- 28 सितंबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर के कई बलात्कार मामलों का स्वतः संज्ञान लिया, जिनमें कालकाजी मंदिर के पास आस्था कुंज पार्क में 17 साल की लड़की पर हमला भी शामिल है। 5 अक्टूबर को अदालत ने पुलिस से कहा: “ज़रूरी है अपराध को रोकना, न कि अपराध होने के बाद आप क्या करते हैं।”
- अब तक के सरकारी जवाब में सूर्यास्त के बाद पार्क के गेट बंद करना शामिल है। महिलाओं के आने-जाने पर रोक लगाना उन्हें ही समस्या मान लेना है। संविधान कहता है कि सुरक्षा राज्य का कर्तव्य है (अनुच्छेद 21) और महिलाएँ स्वतंत्र रूप से घूम सकती हैं (अनुच्छेद 19(1)(d))।
- नए आपराधिक क़ानून पीड़िताओं को ठोस अधिकार देते हैं: किसी भी थाने में ज़ीरो एफ़आईआर, महिला अधिकारी द्वारा बयान, किसी भी अस्पताल में मुफ़्त इलाज, 7 दिन में मेडिकल रिपोर्ट, 2 महीने में जाँच, और मुआवज़ा।
- ज़्यादातर यौन हिंसा कोई परिचित ही करता है। असली सुरक्षा का मतलब है रोशनी, परिवहन, गश्त, काम करने वाली शिकायत समितियाँ और तेज़, संवेदनशील जाँच, न कि कर्फ़्यू या कपड़ों पर सलाह।
- आपातकाल: 112 · महिला हेल्पलाइन: 181 · मुफ़्त क़ानूनी सहायता: 15100।
21 सितंबर 2026 की शाम एक 17 साल की लड़की दक्षिण दिल्ली के कालकाजी मंदिर में पूजा करके अपने दोस्त के साथ पीछे वाले पार्क में गई। पुलिस के अनुसार, ख़ुद को पुलिसवाला बताने वाले तीन आदमियों ने दोनों को अलग किया और उसके साथ यौन हमला किया। अगले दिन तीनों गिरफ़्तार हो गए। अगले कुछ हफ़्तों में दिल्ली-एनसीआर से एक के बाद एक मामले आए, जिनमें चलती स्लीपर बस में एक नाबालिग पर हमला भी शामिल है।
फिर वही पुराने जवाब आए। सूर्यास्त के बाद पार्कों में कम गेट से प्रवेश होगा। सोशल मीडिया पर लोगों ने पूछा कि लड़की ने क्या पहना था और वह बाहर क्यों थी। अपराधशास्त्र और पीड़ित-विज्ञान (victimology) की शिक्षक के रूप में मैंने 2012 के बाद हर ऐसे मामले में यही सवाल सुने हैं। ये सवाल ग़लत हैं, और क़ानून भी यही कहता है।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा
न्यायमूर्ति जे.बी. पारदीवाला और न्यायमूर्ति के. विनोद चंद्रन की पीठ ने इन मामलों को स्वयं उठाया। 5 अक्टूबर को पीठ ने कहा कि “दिल्ली-एनसीआर की हर महिला को रात 11 बजे भी सुरक्षित महसूस होना चाहिए।” अदालत ने यह भी कहा कि कालकाजी मामले में लोगों ने पहले ही पुलिस को उन लोगों के बारे में चेताया था, कॉलेजों के पास “छात्राओं को परेशान करने वाले गुंडों” की बात की, और हज़ारों अवैध भोजनालयों की ओर इशारा किया जहाँ असामाजिक तत्व जमा होते हैं। अदालत ने पुलिस से यौन अपराधियों के राष्ट्रीय डेटाबेस का इस्तेमाल करने और आदतन अपराधियों में डर पैदा करने को कहा।
अदालत का संदेश रोकथाम का है। यह राज्य का कर्तव्य है, महिलाओं पर बोझ नहीं।
सुरक्षा एक अधिकार है, और यह राज्य की ज़िम्मेदारी है
- अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करता है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट लंबे समय से गरिमा और शारीरिक अखंडता को शामिल मानता आया है।
- अनुच्छेद 19(1)(d) हर नागरिक को, महिला हो या पुरुष, पूरे भारत में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार देता है। जो शहर अँधेरा होते ही असुरक्षित हो जाए, वह व्यवहार में इस अधिकार को छीन लेता है।
- अनुच्छेद 14 और 15 भेदभाव मना करते हैं, और अनुच्छेद 15(3) महिलाओं के लिए विशेष प्रावधान की अनुमति देता है, महिलाओं पर रोक की नहीं।
इसलिए जब कोई सरकारी संस्था हमले के जवाब में यह तय करती है कि महिलाएँ पार्क में कब जा सकती हैं, तो वह राज्य की विफलता की क़ीमत महिलाओं से वसूलती है। बेहतर जवाब वही है जो दिल्ली विश्वविद्यालय की छात्राओं ने 23 सितंबर को मार्च में माँगा: जलती स्ट्रीटलाइटें, सचमुच देखे जाने वाले सीसीटीवी, भरोसेमंद गश्त और कॉलेज तक सुरक्षित रास्ते।
क़ानून पीड़िता से क्या वादा करता है
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) कुछ ठोस अधिकार देती है। हर महिला को ये पता होने चाहिए:
- ज़ीरो एफ़आईआर, कहीं भी: धारा 173 BNSS के तहत कोई भी थाना एफ़आईआर दर्ज करेगा, अपराध चाहे किसी भी इलाक़े में हुआ हो। इसे इलेक्ट्रॉनिक रूप से भी दर्ज कराया जा सकता है।
- महिला अधिकारी: यौन अपराध का आरोप लगाने वाली महिला का बयान महिला पुलिस अधिकारी ही दर्ज करेगी।
- किसी भी अस्पताल में मुफ़्त इलाज: धारा 397 BNSS के तहत हर अस्पताल, सरकारी या निजी, मुफ़्त प्राथमिक उपचार और इलाज देगा और पुलिस को सूचित करेगा।
- मेडिकल जाँच: धारा 184 BNSS के तहत पंजीकृत डॉक्टर 24 घंटे के भीतर, पीड़िता की सहमति से जाँच करेगा, और रिपोर्ट 7 दिन में जाँच अधिकारी को भेजी जाएगी।
- समय-सीमा: बलात्कार की जाँच दो महीने में पूरी होनी चाहिए (धारा 193 BNSS), और मुक़दमा आरोप-पत्र के दो महीने के भीतर (धारा 346 BNSS)।
- निजता: पीड़िता की पहचान उजागर करना धारा 72 BNS के तहत अपराध है। इसमें सोशल मीडिया पोस्ट भी शामिल हैं।
- मुआवज़ा: धारा 396 BNSS के तहत राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण मुक़दमा ख़त्म होने से पहले भी मुआवज़ा, अंतरिम राहत सहित, दे सकता है। मुफ़्त क़ानूनी सहायता 15100 पर उपलब्ध है।
अगर पीड़िता 18 साल से कम है, तो पॉक्सो अधिनियम भी लागू होता है, बच्चों के अनुकूल प्रक्रिया और कड़ी सज़ा के साथ। 18 साल से कम उम्र की लड़की से सामूहिक बलात्कार पर धारा 70(2) BNS के तहत शेष प्राकृतिक जीवन तक आजीवन कारावास या मृत्युदंड है।
“ढककर रहो” और कर्फ़्यू क्यों काम नहीं करते
पीड़ित-विज्ञान सिखाता है कि पीड़िता को दोष देना दो तरह से नुक़सान करता है। यह पीड़िताओं को शर्म के कारण चुप करा देता है, और अपराध करने वालों से ध्यान हटा देता है। राष्ट्रीय अपराध आँकड़े सालों से दिखाते हैं कि बलात्कार के अधिकांश मामलों में आरोपी पीड़िता का परिचित होता है। महिलाओं पर कर्फ़्यू इनमें से ज़्यादातर अपराध नहीं रोक पाता।
चुप्पी पहले से गहरी है। राष्ट्रीय महिला आयोग के 2025 के सर्वे में 31 शहरों की 12,770 महिलाओं में से 40% ने कहा कि वे “ज़्यादा सुरक्षित नहीं” या “असुरक्षित” महसूस करती हैं, और उत्पीड़न की लगभग दो-तिहाई घटनाओं की शिकायत ही नहीं हुई। सुप्रीम कोर्ट की अपनी लैंगिक रूढ़ियों से निपटने की पुस्तिका (2023) न्यायाधीशों से महिलाओं को दोष देने वाली भाषा छोड़ने को कहती है। समाज को भी यही करना चाहिए।
क्या बदलना चाहिए
- महिलाओं की भागीदारी से सुरक्षा ऑडिट: पार्क, बस स्टॉप और मेट्रो के निकास द्वारों की रोशनी, दृश्यता और सहायता केंद्रों के लिए जाँच हो, जिसमें महिला निवासी और छात्राएँ शामिल हों।
- जहाँ उत्पीड़न होता है, वहाँ गश्त: कॉलेजों, बाज़ारों और देर रात खुले भोजनालयों के पास, जैसा अदालत ने ख़ुद पहचाना।
- काम करने वाली शिकायत समितियाँ: UGC के 2015 के यौन उत्पीड़न विनियमों के तहत हर कॉलेज में सक्रिय आंतरिक शिकायत समिति हो, और छात्राओं को पता हो कि उसमें कौन है।
- संवेदनशील और समयबद्ध जाँच: BNSS की समय-सीमाओं का पालन हो, और पीड़िताओं को उनके मामले की जानकारी दी जाती रहे।
- बिना देरी मुआवज़ा: विधिक सेवा प्राधिकरण अंतरिम मुआवज़ा जल्दी दें, ताकि लंबे मुक़दमे में पीड़िता अकेली न रहे।
और पढ़ें: एफ़आईआर कैसे दर्ज करें, कार्यस्थल और कॉलेज में यौन उत्पीड़न, राज्य से मुआवज़ा और मुफ़्त क़ानूनी सहायता।
आम सवाल
क्या पुलिस यह कहकर शिकायत लेने से मना कर सकती है कि घटना दूसरे इलाक़े की है?
नहीं। धारा 173 BNSS के तहत हर थाने को संज्ञेय अपराध की ज़ीरो एफ़आईआर दर्ज करनी होगी, इलाक़ा चाहे कोई भी हो, और उसे सही थाने को भेजना होगा। मना करने पर आप पुलिस अधीक्षक या आयुक्त को शिकायत भेज सकती हैं, या मजिस्ट्रेट के पास जा सकती हैं।
क्या निजी अस्पताल बलात्कार पीड़िता का इलाज करने से मना कर सकता है?
नहीं। धारा 397 BNSS हर अस्पताल, सरकारी या निजी, को यौन अपराध और एसिड हमले की पीड़िताओं को मुफ़्त प्राथमिक उपचार और इलाज देने के लिए बाध्य करती है। मना करना अपने-आप में दंडनीय है।
क्या सोशल मीडिया पर पीड़िता का नाम या फ़ोटो साझा करना अपराध है?
हाँ। धारा 72 BNS के तहत बलात्कार पीड़िता का नाम या पहचान बताने वाली कोई भी जानकारी छापने या प्रकाशित करने पर दो साल तक की क़ैद और जुर्माना हो सकता है।
जाँच में कितना समय लग सकता है?
धारा 193 BNSS कहती है कि बलात्कार की जाँच सूचना दर्ज होने की तारीख़ से दो महीने में पूरी होनी चाहिए। मुक़दमा आरोप-पत्र के दो महीने के भीतर पूरा होना चाहिए।
स्रोत
यह लेख जागरूकता के लिए सामान्य जानकारी है, क़ानूनी सलाह नहीं। अपनी स्थिति के लिए किसी वकील से सलाह लें या मुफ़्त क़ानूनी सहायता के लिए 15100 पर कॉल करें।